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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 558 में से

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पृष्ठ 511

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परिशिष्ट २ ३९९
(कुछ कम) पूर्वकोटिकाल तक रहता है पुनः उपशम- जाती है (और लेश्याके कालसे गुणस्थानका काल
श्रेणिपर आरोहण करता है इस तरह देशोन पूर्वकोटि- बहुत है।]
अन्तर होता है ।]
§. १२५
§. १२१
५६. ३ शुक्ललेश्येष्वप्रमत्तादीनामुपशमश्रेण्यारोह-
५४. १ सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतेषु द्वयोरुप- णाभिमुख्यारोहणसद्भावाभ्यां लेश्यान्तरपरावर्ताभावा-
शमकयोरेकजीवं प्रत्युत्कर्षेण पूर्वकोटी अष्टवर्षानन्तरं देकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । उपशान्त-
तपो गृहीत्वोपशमश्रेणिमारुह्य पतितः प्रमत्ताप्रमत्तयोः कषायस्य पतितस्य प्रमत्ते लेश्यान्तरं संस्पृश्य श्रेण्या-
पूर्वकोटिकालशेषं यावद् वर्तित्वा पुनस्तदारोहणं करो- रोहणादेकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् ।
तीति देशोना । सूक्ष्मसांपरायसंयमे उपशमकस्यक- [शुक्ललेश्यामें अप्रमत्तसंयत आदिका एक जीवके
जीवं प्रति नास्त्यन्तरं गुणान्तरे तत्संयमाभावात् । प्रति जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि
असंयमेषु मिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण नरके सप्तम- शुक्ललेश्यावाला कोई एक अप्रमत्तसंयत उपशम श्रेणि-
पृथिव्यामुत्पद्यतेऽन्तर्मुहूर्ते गते सम्यक्त्वं प्रतिपद्यते पर चढ़कर अन्तरको प्राप्त हुआ और सर्वजघन्यकाल-
मुहूर्त्तशेषे त्यजतीति देशोनानि । में लौटकर अप्रमत्त संयत हुआ। इसी प्रकार उत्कृष्ट
अन्तर भी होता है, इस कालमें लेश्या परिवर्तन नहीं
[ सामायिक छेदोपस्थापना संयमियोंमें दो उपशमकों-
होता। शुक्ललेश्यावाले उपशान्त कषायका एक जीव-
का एक जीवके प्रति उत्कर्षसे कुछ कम पूर्वकोटि के प्रति अन्तर नहीं है क्योंकि उपशान्तकषायसे गिर-
अन्तर है क्योंकि पूर्वकोटिकी आयुवाला मनुष्य आठ- कर छठे गुणस्थानमें लेश्या परिवर्तन होकर ही श्रेणि-
वर्षके पश्चात् संयमको ग्रहण करके उपशम श्रेणिपर पर आरोहण होता है । ]
आरोहण करके गिरा और प्रमत्त-अप्रमत्त गुणस्थानोंमें
पूर्वकोटिकालके शेष होने तक रहकर पुनः उपशम- §. १२९
श्रेणिपर आरोहण करता है इस तरह देशोन होता
५७. ७ औपशामिकासंयतसम्यग्दृष्टीनां सान्तरत्वा-
है । सूक्ष्मसाम्पराय संयममें एक जीवके प्रति उप- न्नानाजीवापेक्षया सप्तरात्रिंदिनानि । औपशमिक-
शमकका अन्तर नहीं है क्योंकि सूक्ष्मसाम्पराय संयम
सम्यक्त्वं हि यदि कश्चिदपि न गृह्णाति तदा सप्तरात्रिं-
दसवें गुणस्थानमें ही होता है। असंयमियोंमें मिथ्या- दिनान्येव । संयतासंयतस्य चतुर्दश, प्रमत्ताप्रमत्तयोः
दृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे कुछ कम तेतीससागर
पञ्चदश एकजीवं प्रति जघन्येन जघन्य उत्कर्षेण
अन्तर है क्योंकि एक मिथ्यादृष्टि जीव सातवीं पृथिवी- चोत्कृष्टोऽन्तर्मुहूर्तः । तदुक्तम्-
में उत्पन्न होता है । अन्तर्मुहूर्त बीतनेपर सम्यक्त्वको
ग्रहण करता है। अन्तर्मुहूर्त प्रमाण आयु शेष रहनेपर सम्मत्ते सत्तदिणा विरदाविरदेसु चोद्दसा होंति ।
सम्यक्त्वको छोड़कर मिथ्यात्वमें आ जाता है इस विरदेसु य पण्णरसा विरहणकालो य बोधव्वो ॥
प्रकार देशोन तेतीससागर अन्तर होता है । ] [प्रा० पं० सं० २०५]
उपशान्तकषायैकजीवं प्रति नास्त्यन्तरं वेदकपूर्वकोप-
§. १२४ शमिकेन हि श्रेण्यारोहणभाग् भवति, तस्याः पतितो
५५. ११ तेजःपद्मलेश्यसंयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयता- न तेनैव श्रेण्यारोहणं करोति, सम्यक्त्वान्तरं मिथ्यात्वं
नामेकजीवापेक्षयापि नास्त्यन्तरमन्तर्मुहूर्ते परावर्तमान- वा गत्वा पश्चात्तदादाय करोतीति । अतो नास्ति
लेश्यत्वात् । तस्यान्तरम् । सासादनसम्यग्मिथ्यात्व-मिथ्यात्व-
युक्तैकजीवं प्रति नास्त्यन्तरं गुणे गुणान्तरविरोघतः
[ तेजोलेश्या और पद्मलेश्यावाले संयतासंयत, प्रमत्त- सासादनादिगुणे स्थितस्य मिथ्यात्वादिनान्तरासंभवात् ।
संयत, और अप्रमत्तसंयतोंका एक जीवकी अपेक्षासे [ औपशामिक असंयतसम्यग्दृष्टियोंके सान्तर होनेसे
भी अन्तर नहीं है क्योंकि अन्तर्मुहूर्तमें लेश्या बदल नाना जीवोंकी अपेक्षा सात रातदिन अन्तरकाल है।