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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 510, कुल 558 में से

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पृष्ठ 510

वेदभावात् । नानाजीवापेक्षया उत्कर्षेण संवत्सरः
सातिरेकः अष्टादशमासा इत्यर्थः ।
[ पुरुषवेदमें 'दो क्षपकोंका' पृथक् कथन इसलिए
किया है कि आगे वेदका अभाव हो जाता है । नाना
जीवोंकी अपेक्षा उत्कर्षसे कुछ अधिक एक वर्ष
अन्तर है । कुछ अधिक एक वर्षसे १८ मास लेना
चाहिए । ]
§. ११८
५२. १२ अवेदेषूपशान्तकषायकैकजीवं प्रति नास्त्य-
न्तरं सवेदत्वात् ।
[ अपगत वेदियोंमें उपशान्तकषाय एक जीवके प्रति
अन्तर नहीं है क्योंकि उपशान्तकषायसे नीचेके
गुणस्थान नौवें आदिमें वेद पाया जाता है अर्थात्
नीचे गिरनेपर अवेदरूपसे उपशान्तकषाय गुणस्थान-
को प्राप्त करना सम्भव नहीं है । ]
§. १२०
५३. ४ अज्ञानत्रययुक्तैकजीवेऽपि मिथ्यात्वस्यान्तरं
नास्ति गुणान्तरेऽज्ञानत्रयव्यभिचारात् । सासादनेऽस्ती
ति चेन्न, तस्य सम्यक्त्वग्रहणपूर्वकत्वात् सम्यग्दृष्टेश्च
मिथ्याज्ञानविरोधात् । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानि-
ष्वसंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण पूर्वकोटी
देशविरतादिगुणस्थानेनान्तरमवसानकाले शेषे पुनर-
संयतत्वं प्रतिपद्यत इति देशोना । संयतासंयतैकजीवं
प्रत्युत्कर्षेण षट्षष्ट्सागरोपमाणि, असंयतप्रमत्ता-
दिगुणस्थानेनान्तरं पूर्वकोटिचतुष्टयाष्टवर्षैः सातिरे-
काणि मनुजेषूत्पन्नो हि अष्टवर्षाणन्तरं संयतासंयतत्वं
प्रतिपद्यत इति । मनःपर्ययज्ञानिष्वेकजीवं प्रति
जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । अधिकमपि कस्मान्नेति
चेत् अधोगुणस्थानेषु वर्तमानानां मनःपर्ययासंभवात् ।
तेषु वर्तमानानां चाधिकमन्तरं संभवतीति । चतुर्णा-
मुपशमकानामुत्कर्षेण पूर्वकोटी । उपशमश्रेणितो हि
पतितास्ते मनःपर्ययज्ञानमपरित्यजन्तः प्रमत्ताप्रमत्त-
गुणस्थाने वर्तन्ते यावत्पूर्वकोटिकालशेषः पुनस्तदा-
रोहणं कुर्वन्तीति देशोना ।
[ कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान और विभङ्गज्ञानसे युक्त एक
जीवके प्रति मिथ्यात्वका अन्तर नहीं है क्योंकि
अन्य गुणस्थानमें कुमति, आदि तीनों ज्ञान
नहीं होते ।
शंका—सासादन में जानेपर अन्तर पड़ सकता है ?
उत्तर—नहीं, क्योंकि सासादन गुणस्थान सम्यक्त्व
ग्रहण करनेके बाद होता है और सम्यग्दृष्टिके मिथ्या-
ज्ञान नहीं होता । मतिज्ञानी, श्रुतज्ञानी अवधि-
ज्ञानियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टी एक जीवके प्रति उत्कर्षसे
देशविरत आदि गुणस्थानके द्वारा पूर्वकोटि अन्तर
काल है । अर्थात् एक असंयतसम्यग्दृष्टी जीव संयमा-
संयमको प्राप्त हुआ । कुछ कम पूर्वकोटिकाल तक
संयमासंयमका पालन करके अन्तमें असंयमी हो गया
तो कुछ कम पूर्वकोटी अन्तर होता १ है । संयतासंयत
एक जीवके प्रति उत्कर्षसे छियासठ सागर अन्तरकाल
है । असंयत प्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानके द्वारा
अन्तर होने पर चार पूर्वकोटी और आठ वर्ष अधिक
छियासठ सागर होता है क्योंकि मनुष्योंमें उत्पन्न
हुआ जीव आठ वर्षके अनन्तर संयतासंयतपनेको
प्राप्त करता है । मनःपर्ययज्ञानियोंमें एक जीवके प्रति
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है ।
शंका—अधिक अन्तर क्यों नहीं होता ?
उत्तर—नीचे के गुणस्थानोंमें आनेपर ही अधिक अन्तर
संभव है किन्तु उनमें मनःपर्ययज्ञान संभव नहीं है ।
मनःपर्ययज्ञानी चारों उपशमकोंका उत्कृष्ट अन्तर
पूर्वकोटी है क्योंकि उपशमश्रेणीसे गिरकर मनःपर्यय-
ज्ञानको अपनाये हुए प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानमें
१. धवलामें लिखा है—पूर्वकोटिकाल प्रमाण संयमासंयमको पालकर मरा और देव हुआ । पु० ५, पृ० ११३ ।
२. धवलामें लिखा है—एक जीव मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ । आठ वर्षका होकर एक साथ संयमासंयम और
वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ । पुनः अन्तर्मुहूर्तमें संयमको प्राप्त करके अन्तरको प्राप्त हुआ । संयमके
साथ पूर्वकोटि काल बिताकर तेतीस सागरकी आयुके साथ देव हुआ । वहाँसे च्युत होकर पूर्वकोटि आयुके
साथ मनुष्य हुआ । पुनः मरकर तेतीस सागरकी आयु लेकर देव हुआ । वहाँसे च्युत हो पुनः पूर्वकोटि
आयु लेकर मनुष्य हुआ वहाँ दीर्घकाल तक रहकर संयमासंयमको प्राप्त