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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 524, कुल 558 में से

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पृष्ठ 524

४१२ सर्वार्थसिद्धि
§ ७५५
२९७. १० साधारणं शरीरमनन्तकायिकानाम् ।
तदुक्तम्—
“साहारणमाहारो साहारणमाणपाणगहणं च ।
साहारणजीवाणं साहारणलक्खणं एदं ॥
गूढसिरसंधिपव्वं समभंगमहीरुहं च छिन्नरुहं ।
साहारणं शरीरं तव्विवरीयं च पत्तेयं ॥”
§ ७५९
दान........॥१३॥
३००. १ भेदनिर्देशः—षष्ठीनिर्देशः ।
§ ७६१
आदितस्तिसृणां........॥१४॥
३००. १२ अन्येषामप्यागमात् संप्रत्ययः । तथा हि—
एक-द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रियाणामसंज्ञिपर्याप्तकानां यथासंख्यं
प्रत्येकं त्रिगुणितसप्तविभक्त एक-पञ्चविंशति-पञ्चाशच्छ-
तसहस्रसागरोपमाणि । तदुक्तम्—
'एइंदिय वियलिंदिय-असण्णिपज्जत्तयाण बोधव्वा ।
एगं तह पणुवीसं पंचासं तह सयसहस्सं च ॥
तिहयं सत्तविहत्तं सायरसंखा ठिदी एसा ॥'
तेषां चापर्याप्तकाना मियमेव स्थितिरेकेन्द्रियाणां पल्यो-
पमासंख्येयभागोना । शेषाणां संख्येयभागोना ।
उक्तं च—
'अप्पजत्ताण पुणो थावर वियलिंदियादीणं ।
ठिदि एसा परिहीणा पल्लासंखेयसंखभागेहि ॥
अंतोकोडाकोडी सण्णी अपज्जत्तयस्स णारयव्वा ।
दंसणणाणावरणे वेदे तह अंतराये य ॥'
[ अन्य जीवोंके आगमसे जानना चाहिए । वह इस
प्रकार है—एकेन्द्रिय, दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय
और असंज्ञी पर्याप्तकोंके क्रमानुसार प्रत्येकके तीनसे
गुणित और सातसे भाजित एक सागर, पच्चीस
सागर, पचास सागर, सौ सागर और हजार सागर
प्रमाण स्थिति जाननी चाहिए । कहा भी है—एकेन्द्रिय,
दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय, और असंज्ञी पंचेन्द्रिय
पर्याप्तकके तीनसे गुणित और सातसे भाजित एक
सागर, पच्चीस सागर, पचास सागर, सौ सागर और
एक हजार सागर प्रमाण स्थिति जाननी चाहिए ।
आशय यह है कि संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक मिथ्या-
दृष्टिके मोहनीय कर्मका उत्कृष्टबन्ध सत्तर कोड़ाकोड़ी
सागर प्रमाण होता है किन्तु एकेन्द्रिय पर्याप्तकके एक
सागर प्रमाण, दोइन्द्रिय पर्याप्तकके पच्चीस सागर
प्रमाण, तेइन्द्रिय पर्याप्तकके पचास सागर प्रमाण,
चौइन्द्रिय पर्याप्तकके सौ सागर प्रमाण और असंज्ञी