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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 507

परिशिष्ट २ | ३९५

सम्भव है। सर्वत्र लेश्यायुक्त जीवका अन्तर्मुहूर्तकाल
तिर्यंच और मनुष्यकी अपेक्षासे देखना चाहिए । उत्कर्ष-
से नारकोंकी अपेक्षा सातवीं, पाँचवीं और तीसरी
पृथिवीमें क्रमसे तेतीस सागर, सत्रह सागर और
सात सागर काल होता है क्योंकि देवों और नारकोंकी
लेश्या अवस्थित होती है। जब वे अपनी गतिमें जाते
हैं तो नियमसे उसी लेश्याके साथ जाते हैं किन्तु
वहाँसे आते हुए नियम नहीं हैं इसलिए कुछ अधिक
उक्त काल होता है। उक्त लेश्याओंसे युक्त असंयत
सम्यग्दृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे नारकोंकी
अपेक्षासे उक्त तेतीस आदि सागर ही काल है। किन्तु
पर्याप्ति समापक अन्तर्मुहूर्तमें और सातवीं पृथिवीमें
मारणान्तिक समुद्घातमें सम्यक्त्व नहीं होता इसलिए
कुछ कम उक्त काल होता है। तेजोलेश्या और पद्म-
लेश्यावाले मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि एक
जीवके प्रति उत्कर्षसे क्रमानुसार प्रथम और बारहवें
स्वर्गकी अपेक्षा दो सागरोपम और अठारह सागरोपम-
काल है । उक्त अवस्थाविशिष्ट उन जीवोंके मारणान्तिक
और उत्पाद सम्भव है इसलिए कुछ अधिक उक्त काल
लेना चाहिए । शुक्ललेश्यावाले मिथ्यादृष्टि एक जीवके
प्रति उत्कर्षसे सबसे ऊपरवाले ग्रैवेयकके देवोंकी अपेक्षा
इकतीस सागर काल है । उनके मारणान्तिक और
उत्पाद अवस्थामें भी शुक्ललेश्या होती है अतः कुछ
अधिक इकतीस सागर लेना चाहिए । शुक्ललेश्यावाले
संयतासंयत-गुणस्थानवर्ती एक जीवके प्रति गुणस्थान
और लेश्यापरिवर्तनकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय
और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त काल है । ]
§. १०७
४६.४ आहारकेषु मिथ्यादृष्टचैकजीवं प्रति जघन्येना-
न्तर्मुहूर्तः । वक्रेण गतः क्षुद्रभवेनोत्पन्नः पुनरपि वक्रेण
गतः । उत्कर्षेणासंख्यातासंख्यातमानावच्छिन्नोत्सर्पिण्य-
वसर्पिणीलक्षणोऽङ्गुल्यसंख्येयभागः शश्वदन्तऋजुगति-
मत्त्वात् । अनाहारकसासादनसम्यग्दृष्ट्यसंयतसम्यग्-
दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षयोत्कर्षेणावलिकाया असंख्येय-
भागः । नन्वालिकाया असंख्यातसमयमानलक्षणत्वा-
त्तदसंख्येयभाग एकसमय एव स्यात् । तदयुक्तं,
बृहदसंख्यातसमयमानलक्षणत्वात् । आवलिकासंख्येय-
भागस्य चाल्पासख्यातसमयमानलक्षणत्वादिति ।
सयोगकेवलिनां नानाजीवापेक्षया जघन्येन त्रयः
समयाः समसमये दण्डादिप्रारम्भकत्वात् । उत्कर्षेण
संख्येयाः समयाः अजघन्योत्कृष्टसंख्यातमाना-
वच्छिन्नाः निरन्तरं विषमसमये दण्डादिप्रारम्भ-
कत्वात्। एकजीवं प्रति जघन्य उत्कृष्टाश्च त्रयः समयाः
प्रतरद्वयलोकपूरणलक्षणाः ।
[ आहारकोंमें मिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति जघन्यसे
अन्तर्मुहूर्त काल है, वक्रगतिसे जाकर क्षुद्रभवसे उत्पन्न
हुआ और पुनः मरकर वक्रगतिसे गया (वक्रगतिमें
अनाहारक रहा और मध्यमें आहारक) । उत्कर्षसे
अंगुलके असंख्यातवें भाग है जो असंख्यातासंख्यात
उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी कालप्रमाण है ।
शंका—आवलीका प्रमाण असंख्यात समय है अतः
उसका असंख्यातवां भाग एक समय ही होगा ?
उत्तर—ऐसा कहना युक्त नहीं है क्योंकि आवलीके
समयोंका प्रमाण बृहत् असंख्यात है और आवलीके
असंख्यातवें भागके समयोंका प्रमाण अल्प असं-
ख्यात है ।
सयोगकेवलियोंका काल नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य-
से तीन समय है क्योंकि समान समयमें दण्डादि
समुद्घातका प्रारम्भ करते हैं । उत्कर्षसे संख्यात-
समय है जो मध्यमसंख्यात प्रमाण है क्योंकि लगा-
तार विभिन्न समयोंमें दण्डादिसमुद्घातका प्रारम्भ
करते हैं । एक जीवकी अपेक्षा अनाहारकका जघन्य
और उत्कृष्ट काल तीन समय है विस्तार और
संकोच रूप दो प्रतर और एक लोकपूरणसमुद्घात
के समय । ]
§. १०८
४६. १२ अन्तरम् । मिथ्यादृष्टचैकजीवं प्रत्यन्तरमु-
त्कर्षेण द्वे षट्षष्ठी सागरोपमानाम् । तथाहि—वेदक-
सम्यक्त्वेन युक्त एको षट्षष्ठीं तिष्ठति तत्सम्यक्त्व-
स्योत्कर्षेणैतावन्मात्रस्थितिकत्वात् । पुनरवान्तरेऽन्त-
१. आदावन्ते च वक्रगतिकालयोरनाहारकः । मध्येऽन्तर्मुहूर्तं यावदाहारक इत्यर्थः ।