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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 512, कुल 558 में से

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पृष्ठ 512

४०० सर्वार्थसिद्धि
यदि कोई भी जीव औपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण तीन समय है; और मिथ्यात्व गुणस्थानका काल
नहीं करता तो सात रातदिन तक ही ग्रहण नहीं उससे बहुत है अतः वहाँ उसका अन्य गुणस्थानसे
करता । औपशमिक सम्यक्त्वके साथ संयतासंयतोंका अन्तर असम्भव है । ]
अन्तरकाल चौदह दिन है और प्रमत्तसंयत तथा
अप्रमत्तसंयतका पन्द्रह दिन है । एक जीवके प्रति §. १३३
जघन्य अन्तरकाल जघन्य अन्तर्मुहूर्त है, उत्कृष्ट ५९. ९ भावः - मिथ्यादृष्टिरित्यौदयिको भावो
अन्तरकाल उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त है । कहा है - मिथ्यात्वप्रकृतेरुदये प्रादुर्भावात् । सासादनसम्य-
औपशमिक सम्यक्त्वका अन्तरकाल सात दिन, ग्दृष्टिरिति पारिणामिको भावः । नन्वनन्तानुबन्धि-
औपशमिक सम्यक्त्वके साथ विरताविरतका अन्तर- क्रोधाद्युदयेऽस्य प्रादुर्भावादौदयिकत्वं कस्मान्नोच्यत
काल चौदह दिन और विरतोंका अन्तरकाल पन्द्रह इति चेत्, अविवक्षितत्वात् । दर्शनमोहापेक्षया हि
दिन जानना चाहिए । मिथ्यादृष्ट्यादिगुणस्थानचतुष्टये भावो निरूपयितुमभि-
उपशान्तकषायका एक जीवके प्रति अन्तर नहीं है प्रेतोऽतः सासादने सम्यक्त्व-मिथ्यात्व-तदुभयलक्षणस्य
क्योंकि वेदकसम्यक्त्वपूर्वक होनेवाले औपशमिक- त्रिविधस्यापि दर्शनमोहस्योदय-क्षय-क्षयोपशमाभा-
सम्यक्त्वसे जीव उपशमश्रेणिपर आरोहण करता है । वात् पारिणामिकत्वम् । सम्यग्मिथ्यादृष्टिरिति क्षायो-
उससे गिरनेपर पुनः उसी सम्यक्त्वसे श्रेणिपर पशमिको भावः । ननु सर्वघातिनामुदयाभावे
आरोहण नहीं करता किन्तु अन्य सम्यक्त्वको ग्रहण देशघातीनां चोदये य उत्पद्यते भावः स क्षायोप-
करके या मिथ्यात्वमें जाकर पुनः सम्यक्त्वको ग्रहण शमिकः । न च सम्यक्मिथ्यात्वप्रकृतेर्देशघातित्वं
करके तब श्रेणिपर आरोहण करता है । अतः उसका संभवति, सर्वघातित्वेनागमे तस्याः प्रतिपादित-
अन्तर नहीं है । सासादनसम्यक्त्व, सम्यक्मिथ्यात्व त्वादिति । तदयुक्तम्, उपचारतस्तस्या देशघातित्व-
और मिथ्यात्वसे युक्त एक जीवके प्रति अन्तर नहीं है स्यापि संभवात् । उपचारनिमित्तं च देशतः सम्यक्त्व-
क्योंकि एक गुणमें दूसरे गुणका विरोध होनेसे सासादन स्य घातित्वं, न हि मिथ्यात्वप्रकृतिवत् सम्यग्मिथ्यात्व-
आदि गुण स्थानमें स्थित जीवका मिथ्यात्व आदि प्रकृत्या सर्वस्य सम्यग्मिथ्यात्वस्वरूपस्य (सम्यक्त्व-
गुणस्थानसे अन्तर असम्भव है । ] स्वरूपस्य ) घातः संभवति सर्वज्ञोपदिष्टतत्त्वेषु रुच्यं-
§. १३० शस्यापि संभवात् । तदुपदिष्टतत्त्वेषु रुच्यरुच्यात्मको
५८. ९ असंज्ञिनां नानैकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम्, हि परिणामः सम्यग्मिथ्यात्वमिति ।
एक मिथ्यात्वगुणस्थानवर्तित्वेन तेषां सासादिनान्तरा- [ अब भावका कथन करते हैं - मिथ्यादृष्टि यह
संभवात् । औदयिक भाव है क्योंकि मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयमें
[ असंज्ञियोंका नाना और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर होता है । सासादनसम्यग्दृष्टि यह पारिणामिक
नहीं है क्योंकि असंज्ञियोंके केवल एक मिथ्यात्वगुण- भाव है ।
स्थान ही होता है अतः उनका सासादन आदि शङ्का - अनन्तानुबन्धि क्रोध आदि कषायके उदयमें
गुणस्थानोंसे अन्तर सम्भव नहीं है । ] सासादन गुणस्थान प्रकट होता है तो इसे औदयिक
§. १३२ क्यों नहीं कहते ?
५९. ३ अनाहारकेषु मिथ्यादृष्ट्यैकजीवं प्रति उत्तर- उसकी यहाँ विवक्षा नहीं है । दर्शनमोहकी
नास्त्यन्तरमनाहारकत्वस्यैक-द्वि-त्रिसमयत्वात् गुण- अपेक्षासे ही मिथ्यादृष्टि आदि चार गुणस्थानोंमें भाव
स्थानस्य च ततो बहुकालत्वात् तत्र तस्य गुणान्तरे- बतलाना इष्ट है अतः सासादनमें सम्यक्त्व प्रकृति,
णान्तरासंभवादिति । मिथ्यात्व और सम्यमिथ्यात्वरूप दर्शनमोहकी तीनों
[ अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति अन्तर प्रकृतियोंका उदय, क्षय और क्षयोपशमका अभाव
नहीं है क्योंकि अनाहारकपनेका काल एक, दो या होनेसे पारिणामिक भाव कहा है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि
यह क्षायोपशमिक भाव है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri