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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 525, कुल 558 में से

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पृष्ठ 525

परिशिष्ट २ ४१३
[ मोहनीयकर्मकी उत्कृष्टस्थिति अन्य जीवोंके
आगमके अनुसार जानना चाहिए। वह इस प्रकार
है—एकेन्द्रिय आदि जीवोंके मोहनीयकी उत्कृष्ट
स्थिति एक सागर, पच्चीस सागर, पचास सागर,
सौ सागर और एक हजार सागर होती है। इतना
विशेष है कि मोहनीयकी इस स्थितिमें सातसे गुणा
और सातसे भाग देना चाहिए । अपर्याप्तक जीवोंके
उक्त स्थिति पूर्ववत् पल्यके असंख्यातवें भाग और
संख्यातवें भाग कम जानना । ]
विंशतिर्नाम.........॥१६॥
§ ७६५
३०१. ८ इतरेषां यथागमम्—या पूर्वं चतसृणां
कर्मप्रकृतीनां स्थितिरुक्ता सा न त्रिगुणा किन्तु द्विगुणा
कर्तव्या ततो नामगोत्रयोर्भवति । शेषं पूर्ववत् ।
[ अर्थात् पर्याप्तक एकेन्द्रिय जीवके नाम और गोत्र-
कर्मकी उत्कृष्टस्थिति एक सागरके सात भागोंमें से
दो भाग प्रमाण है। पर्याप्तक दो इन्द्रिय जीवके
पच्चीस सागरके सात भागोंमें से दो भाग है। पर्याप्तक
तीन इन्द्रिय जीवके पचास सागरके सात भागोंमें से
दो भाग है। पर्याप्तक चार इन्द्रिय जीवके सौ सागर-
के सात भागोंमें से दो भाग है। असंज्ञी पंचेन्द्रिय
पर्याप्तक जीवके हजार सागरके सात भागोंमें से दो
भाग है। इनके जघन्य स्थिति पूर्ववत् पल्यके
असंख्यातवें भाग और संख्यातवें भाग कम जाननी
चाहिए । ]
त्रय.........॥१७॥
§ ७६७
३०१. १२ शेषाणामागमतः, तथाहि—असंज्ञिनः
स्थितिरायुषः पल्योपमासंख्येयभागः, तिर्यगसंज्ञी हि
स्वर्गे नरके वा पल्योपमासंख्येयभागमायुर्बध्नाति ।
एकेन्द्रियविकलेन्द्रियास्तु पूर्वकोटिप्रमाणं, पश्चाद्विदेहा-
दावुत्पद्यन्ते ।
[ असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवके आयु कर्मकी
उत्कृष्ट स्थिति पल्यके असंख्यातवें भाग है क्योंकि
तिर्यंच असंज्ञी स्वर्ग या नरककी पल्योपमके
असंख्यातवें भाग आयु का बंध करता है। एकेन्द्रिय
और विकलेन्द्रिय जीव पूर्वकोटि प्रमाण आयुका
बन्ध करते हैं। पीछे विदेह आदिमें उत्पन्न होते हैं ।]
अपरा.........॥१८॥
§ ७६९
३०२. ४ सूक्ष्मसाम्पराये इति वाक्यशेषः ।
विपाकः ...॥२१॥
§ ७७४
३०३. ३ स्वमुखेन मतिज्ञानावरणं मतिज्ञानावरण-
रूपेणैव । परमुखेन श्रुतज्ञानावरणरूपेणापि
भुज्यते ।
§ ७७५
३०३. ८ प्रसंख्यातोऽन्वर्थः । अप्रसंख्यातोऽन्वर्थः ।
स यथा......॥२२॥
§ ७७६
३०३. १० दर्शनशक्त्युपरोधो—दर्शनशक्तिप्रच्छा-
दनता ।
ततश्च .......॥२३॥
§ ७७८
३०४. २ जातिविशेषावगृणिते एकेन्द्रियादिजीव -
विशेषैः संस्कृते । अनुभवोदयावली स्रोतः अनुभवो-
दयावलीप्रवाहः ।
नामप्रत्यया.......॥२४॥
§ ७८०
३०६. ६ नामप्रत्ययाः कर्मकारणभूताः । यैः
पुद्गलैः कर्माणि प्रारभ्यन्ते त एव कृष्यन्ते नान्ये
इति । एकक्षेत्रावगाहस्थिताः—जीव संलग्ना इत्यर्थः ।
पञ्चरस....मधुररसे लवणरसस्यान्तर्भावात् । स्पर्श-
स्याष्टविधत्वात्कथं चतुःस्पर्शस्ते, इति नाशङ्कनीयं,
शीतोष्णस्पर्शादीनां विरोधिना सहभावाभावात् ।
इत्यष्टमोऽध्यायः ।