सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 508, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें३९६ सर्वार्थसिद्धि
र्मुहूर्तं यावत् सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यते । पुनरपरां
षट्षष्ठीं वेदकसम्यक्त्वेन तिष्ठति । अन्त्यसागरोपमाव-
सानशेषे मिथ्यात्वं प्रतिपद्यत इति देशोने । सासा-
दनैकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागः ।
अन्तर्मुहूर्तः कस्मान्नेति च न चोद्यम्, अन्तर्मुहूर्तमध्ये
पुनः सासादनगुणग्रहणे योग्यतासंभवात् । परित्यक्तौप-
शमिकसम्यक्त्वो हि मिथ्यात्वप्राप्त्यन्तराले वर्तमानः
सासादनोऽभिधीयते । तस्य च मिथ्यात्वं गतस्य
पुनरौपशमिकसम्यक्त्वग्रहणे योग्यता पल्योपमासंख्येय-
भागे सत्येव नावान्तरे तत्र वेदकग्रहणयोग्यताया
एव संभवात् ।
[ आगे अन्तरका कथन करते हैं । मिथ्यादृष्टि एक
जीवके प्रति अन्तरकाल उत्कर्षसे दो छियासठ सागर
है । जो इस प्रकार है—वेदकसम्यक्त्वसे युक्त जीव
एक छियासठसागर तक रहता है क्योंकि वेदक-
सम्यक्त्वकी उत्कृष्ट स्थिति इतनी ही है । उसके
पश्चात् एक अन्तर्मुहूर्तके लिए सम्यग्मिथ्यात्व गुण-
स्थानको प्राप्त करता है । पुनः दूसरे छियासठ सागर
तक वेदकसम्यक्त्वके साथ रहता है। अन्तिम सागर-
के अन्तमें कुछ काल शेष रहनेपर मिथ्यात्वमें चला
जाता है इस प्रकार देशोन दो छियासठ सागर
अन्तरकाल होता है । सासादन एक जीवके प्रति
अन्तरकाल जघन्यसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग है ।
शंका — अन्तर्मुहूर्त अन्तरकाल क्यों नहीं है ।
उत्तर — ऐसा तर्क नहीं करना चाहिए क्योंकि अन्त-
र्मुहूर्तकालके अन्दर पुनः सासादनगुणस्थानको ग्रहण
करनेकी योग्यता सम्भव नहीं है । इसका कारण
यह है कि जो जीव औपशमिक सम्यक्त्वको छोड़कर
मिथ्यात्व गुणस्थान प्राप्तिके बीचके समयमें रहता है
उसे सासादन कहते हैं । उसके मिथ्यात्वमें चले
जानेपर पुनः औपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण करनेकी
योग्यता पल्योपमके असंख्यातवें भाग काल बीतनेपर
ही मानी है उससे पहले नहीं । उससे पहले वेदक
सम्यक्त्वको ग्रहण करनेकी योग्यता ही सम्भव
है । ]
§. ११०
४८. ४ तिर्यङ्मिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण त्रीणि
पल्योपमान्यन्तरम् । अधिकमपि कस्मान्नेति चेत्,
वेदकयुक्तस्य तिर्यक्त्व्यादाभावात् तद्युक्तो हि देवेष्वेवो-
त्पद्यते । अतो मिथ्यात्वयुक्तस्त्रिपत्योपमायुष्को भोग-
भूमिषूत्पद्यते । तत्र चोत्पन्नानां तिर्यङ्मनुष्याणां
किंचिदधिकाष्टचत्वारिशद्दिनेषु सम्यक्त्वग्रहण-
योग्यता भवतीति नियमादेतावद्दिनेषु गतेषु मिथ्यात्व-
परित्यागेन सम्यक्त्वं गृह्णातीति त्रिपल्योपमायुः-
शेषे पुनर्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यत इति गर्भकालेन किंचिद-
धिकाष्टचत्वारिंशद्दिनैरवसानकालशेषेण च हीनत्वा-
द्देशोनानि ।
[ तिर्यंचमिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे तीन
पल्योपम अन्तरकाल है ।
शंका — अधिक क्यों नहीं है ?
उत्तर — क्योंकि वेदक सम्यक्त्वसे युक्त जीव तिर्यंचों-
में उत्पन्न नहीं होता, देवोंमें ही उत्पन्न होता है ।
अतः तीन पल्यकी आयुका बन्ध करनेवाला मिथ्या-
दृष्टि भोगभूमिमें उत्पन्न होता है। भोगभूमिमें उत्पन्न
हुए तिर्यंच और मनुष्योंमें कुछ अधिक अड़तालीस
दिन बीतने पर सम्यक्त्वग्रहणकी योग्यता आती है
ऐसा नियम है । अतः इतने दिन बीतने पर वह
मिथ्यात्वको त्याग कर सम्यक्त्वको ग्रहण करता है
और तीन पल्यकी आयुमें कुछ शेष रहने पर पुनः
मिथ्यात्वको ग्रहण कर लेता है। इस तरह गर्भ-
कालसे किंचित् अधिक अड़तालीस दिनों और अन्तिम-
कालसे हीन होनेसे देशोन² तीन पल्य अन्तरकाल
होता है । ]
§. १११
४८. ७ मनुष्यगतौ सासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्या-
दृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टयः पूर्वकोटिपृथक्त्वकाले सति
स्वस्वगुणं परित्यज्य भोगभूमावुत्पद्यन्ते । पश्चात् स्व-
गुणं गृह्णन्ति । एकमेव जीवं प्रति उत्कर्षेण त्रीणि
पल्योपमानि पूर्वकोटिपृथक्त्ववाधिकानि भवन्ति ।
१. धवला पु० ५, पृ० ७ में प्रथम छियासठ सागरमें अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहनेपर ही सम्यक् मिथ्यात्व-
को प्राप्त कराया है —सं० । २. धवला पु० ५, पृ० ३२ में आदिके मुहूर्तपृथक्त्वसे अधिक दो मास
और आयुके अवसानमें उपलब्ध दो अन्तर्मुहूर्तोंसे हीन तीन पल्योपम अन्तरकाल कहा है—सं० ।