सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
परिशिष्ट २ ३८५
§. ६०
२९.७ क्षेत्रं, सयोगकेवलिनां दण्डकवाटावस्थापेक्षया लोकस्यासंख्येयभागः क्षेत्रम् प्रतरापेक्षया असंख्येय-भागाः वातवलयत्रयादवगिव तदात्मप्रदेशैनिरन्तरं लोकव्याप्तेः । लोकपूरणापेक्षया सर्वलोकः ।
[ सयोगकेवलियोंका क्षेत्र दण्ड और कपाट रूप समुद्घातकी अपेक्षा लोकका असंख्यातवां भाग है । प्रतर रूप समुद्घातकी अपेक्षा असंख्यात बहुभाग क्षेत्र है क्योंकि तीनों वातवलयसे पहले तक ही उनकी आत्माके प्रदेशोंसे बिना किसी अन्तरालके लोक व्याप्त होता है । और लोक पूरण समुद्घातकी अपेक्षा सयोगकेवलियोंका क्षेत्र सर्वलोक है । ]
§. ६२
२९.१३ एकेन्द्रियाणां क्षेत्रं सर्वलोकः, तेषां सर्वत्र संभवात् । विकलेन्द्रियाणां लोकस्यासंख्येयभागः । देवनारकमनुष्यवत्तेषां नियतोत्पादस्थानत्वात् । ते हि अर्धतृतीयद्वीपे लवणोदकालोद-समुद्रद्वये स्वयम्भूरमणे द्वीपे समुद्रे चोत्पद्यन्ते, न पुनरसंख्यातद्वीपसमुद्रेषु नरकेस्वर्गादिषु भोगभूमिषु म्लेच्छादिषु च । पञ्चे-न्द्रियाणां मनुष्यवत् । इत्ययुक्तम्, मनुष्याणां प्राग्मा
३८६ सर्वार्थसिद्धि
चाहिए । परस्थानविहारकी अपेक्षा तो सासादन
सम्यग्दृष्टि देवोंका प्रथम तीन पृथिवियोंमें विहार
करनेसे दो राजु और ऊपर अच्युत स्वर्ग तक विहार
करनेसे छह राजू इस तरह आठ बटे चौदह राजु
स्पर्शन होता है अर्थात् त्रसनाडीके चौदह राजुओंमेंसे
आठ राजु प्रमाण । सर्वत्र आठ बटे चौदह इसी प्रकार
जानना । तथा बारह बटे चौदह इस प्रकार जानना—
सातवीं पृथ्वीमें सासादन आदि गुणस्थानोंको छोड़कर
मिथ्यात्व गुणस्थानवाला जीव ही नियमसे मारणान्तिक
समुद्घात करता है ऐसा नियम है । और छठी पृथ्वीसे
मध्य लोक पर्यन्त पाँच राजू सासादन सम्यग्दृष्टि
मारणान्तिक करता है। और मध्यलोकसे लोकके
अग्रभागमें बादर पृथिवीकाय, जलकाय और वनस्पति-
कायमें मारणान्तिक करनेसे सात राजू, इस तरह
बारह राजू स्पर्श होता है। सासादनसम्यग्दृष्टि वायु-
काय, तेजस्काय, नरक और सर्व सूक्ष्मकाय, इन चार
स्थानोंको
परिशिष्ट २ ३८७
अतः पहली पृथिवीके चारों गुणस्थानवर्ती नार-
कियोंका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ भाग है ।
दूसरी पृथिवी मध्यलोकसे नीचे एक राजूके परिमाण-
पर स्थित है तथा उससे नीचेकी तीसरी आदि
पृथिवियाँ भी एक-एक राजूका अन्तराल देकर स्थित
हैं अतः उन पृथिवियोंके मिथ्यादृष्टि और सासादन-
सम्यग्दृष्टि नारकियोंने क्रमसे एक, दो, तीन, चार
और पाँच राजुका स्पर्शन किया है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि
मारणान्तिकसमुद्घात, उत्पाद और आयुबन्धके समय
नियमसे तीसरे गुणस्थानको छोड़ देते हैं क्योंकि तीसरे
गुणस्थानमें ये तीनों कार्य नहीं होते । अतः स्वस्थान
विहारकी अपेक्षा उनका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ
भाग है । असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियोंका स्पर्शन
मारणान्तिककी अपेक्षा भी लोकका असंख्यातवाँ भाग
है क्योंकि वे नियमसे मनुष्योंमें ही उत्पन्न होते हैं
और मनुष्योंका क्षेत्र अल्प है ।
सातवीं पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि नारकियोंने मारणान्तिक
और उत्पादकी अपेक्षा छह राजुका स्पर्श किया है ।
शेष तीन गुणस्थानवर्ती नारकियोंका स्पर्शन लोकका
असंख्यातवाँ भाग है ।
शंका—स्वस्थानविहारकी अपेक्षा और मारणान्तिक-
की अपेक्षा इन तीन गुणस्थानवर्ती नारकियोंका स्पर्शन
क्यों नहीं कहा ?
उत्तर—सप्तम पृथिवीके नारकी मारणान्तिक और
उत्पादसे पूर्व नियमसे उन गुणस्थानोंको छोड़
देते हैं ।
सासादन सम्यग्दृष्टि मरकर नरकमें नहीं जाता ऐसा
नियम है । अतः सासादन सम्यग्दृष्टि तिर्यंचका
स्पर्शन लोकाग्रमें बादर पृथिवी आदिमें मारणान्तिक-
की अपेक्षा भी सात राजु है । मिथ्यादृष्टि मनुष्योंका
स्पर्शन मारणान्तिककी अपेक्षा सर्वलोक है । अथवा
पृथिवीकायिक आदिके मनुष्योंमें उत्पन्न होनेकी
अपेक्षा सर्वलोक है; क्योंकि जो मरकर जहाँ उत्पन्न
होता है वह उत्पाद अवस्थामें वही कहा जाता है
अर्थात् पृथिवीकायिक आदिसे मरकर मनुष्योंमें उत्पन्न
होनेवाले जीव उत्पाद अवस्थामें मनुष्य ही कहलाते
हैं । सर्वलोक स्पर्शन आगे सर्वत्र इसी प्रकार जानना
चाहिए । तीसरे नरक गये मिथ्यादृष्टि और सासा-
दन सम्यग्दृष्टि देवोंका लोकके अग्रभागमें बादर-
पृथिवीकायिक आदिमें मारणान्तिक समुद्घातकी
अपेक्षा नौ राजु स्पर्शन है। नौ राजु स्पर्शन आगे
भी इसी प्रकार जानना चाहिए । और सम्यग्मिथ्या-
दृष्टि तथा असंयत सम्यग्दृष्टि एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न
नहीं होते । उनका विहारवत्स्वस्थानकी अपेक्षा आठ
राजू स्पर्शन है । ]
§. ७७
३५.१. पञ्चेन्द्रियमिथ्यादृष्टिभिः अष्टौ देवान् प्रति
सर्वलोको मनुष्यान् प्रति । सयोगकेवलिनां दण्डाद्यव-
स्थायां वाङ्मनसवर्गणामवलम्ब्यात्मप्रदेशपरिस्पन्दा-
भावाल्लोकस्यासंख्येयभागः ।
[ पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टियोंका आठ राजु स्पर्शन देवों-
की अपेक्षा जानना अर्थात् पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टिदेव
तीसरे नरक तक विहार करते हैं अतः मेरुके मूलसे
ऊपर छह राजु और नीचे दो राजु, इस प्रकार आठ
राजु क्षेत्रके भीतर सर्वत्र उक्त प्रकारसे पंचेन्द्रिय पाये
जाते हैं । सर्वलोक स्पर्शन मनुष्योंकी अपेक्षा है
सयोगकेवलियोंके दण्ड आदि अवस्थामें वचनवर्गणा
मनोवर्गणाका अवलम्बन लेकर आत्मप्रदेशोंका परि-
स्पन्दन नहीं होता अतः लोकका असंख्यातवां भाग
स्पर्शन है ]
§. ८५
३७. ३ सप्तनरकेषु नारका यथासंख्यमेतल्लेशिया
भवन्ति । उक्तं च—
'कोऊ काऊ तह काऊणीला णीला य णीलकिण्हाए ।
किण्हा य परमकिण्हा लेस्सा रयणादिपुढवीसु १॥'
—[मूलाचार ११३४]
तत्र षष्ठपृथिव्यां कृष्णलेश्यैः सासादनसम्यग्दृष्टिभि-
र्मारणान्तिकाद्यपेक्षया पञ्च । पञ्चमपृथिव्यां कृष्णलेश्याऽ-
विवक्षया नीललेश्यैश्चतस्रो रज्जवः स्पृष्टाः । तृतीय-
पृथिव्यां नीललेश्याविवक्षया कापोतलेश्यैर्द्वे रज्जू
स्पृष्टे । सप्तमपृथिव्यां यद्यपि कृष्णलेश्यास्ति तथापि
मारणान्तिकाद्यवस्थायां सासादनस्य तत्र ने सा संभ-
वति तदा नियमेन मिथ्यात्वग्रहणादिति नोदाहृता ।
१. गो०जी०गा० । मूलाचार गा० ११३४ ।
३८८ सर्वार्थसिद्धि
तेजोलेश्यैः संयतासंयतैः प्रथमस्वर्गे मारणान्तिकाद्य-
पेक्षया सार्धरज्जुः स्पृष्टा । पद्मलेश्यैः संयतासंयतैः
सहस्रारे मारणान्तिकादिविधानात् पञ्चरज्जवः स्पृष्टाः।
शुक्ललेश्यैर्मिथ्यादृष्ट्यादिसंयतासंयतान्तैर्मारणान्तिका-
द्यपेक्षया । सम्यग्मिथ्यादृष्टिभिस्तु मारणान्तिके तद्-
गुणस्थानत्यागाद्विहारापेक्षया षड्रज्जवः स्पृष्टाः ।
अष्टावपि कुतो नेति नाशङ्कनीयम्, शुक्ललेश्यानामधो
विहाराभावात् । यथा च कृष्णलेश्यादित्रयापेक्षयाव-
स्थितलेश्या नारकाः, तथा तेजोलेश्यादित्रयापेक्षया
देवा अपि । तदुक्तम् —
'तेऊ तेऊ तह तेऊपम्मा पम्मा य पम्मसुक्काय ।
सुक्का य परमसुक्कालेस्सा भवणादिदेवाणं ॥
—[ प्रा० पंचसं० १८९ ]
तद्यथा भवनवासिव्यन्तरज्योतिष्केषु जघन्या तेजो-
लेश्या । सौधर्मेशानयोर्मध्यमा । सानत्कुमारमाहेन्द्र-
योरुत्कृष्टा तेजोलेश्या जघन्यपद्मलेश्याविवक्षया ।
ब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठशुक्रमहाशुक्रेषु मध्यमा
पद्मलेश्या । शतारसहस्रारयोरुत्कृष्टा पद्मलेश्या जघन्य-
शुक्ललेश्याविवक्षया । आनतप्राणतारणाच्युतनव-
ग्रैवेयकेषु मध्यमा शुक्ललेश्या । नवानुदिशपञ्चानुत्तरेषू-
त्कृष्टा । उक्तं च—
'तिण्हं दोण्हं दोण्हं छहं दोण्हं च तेरसहं च ।
एत्तो य चोद्दसण्हं लेस्सा भवणादिदेवाणं ॥'
—[ पंच० गा० १८८ ]
ततोऽन्यत्र लेश्यानियमा
परिशिष्ट २ ३८९
इनके सिवाय अन्यत्र लेश्याका नियम नहीं है ।
§. ८७
३८. ६ क्षायिकसम्यक्त्वयुक्तसंयतासंयतानामितर -
सम्यक्त्वयुक्तसंयतासंयतानामिव षडपि रज्जवः कुतो
नेति नाशङ्कनीयं तेषां नियतक्षेत्रत्वात् । कर्मभूमिजो
हि मनुष्यः सप्तप्रकृतिकक्षयप्रारम्भको भवति । तद्दर्शन-
लाभात्प्रागेव तिर्यक्षु बद्धायुष्कस्तु संयतासंयतत्वं न
प्रतिपद्यते । औपशमिकसम्यक्त्वयुक्तसंयतासंयतानां
कुतो लोकस्यासंख्येयभाग इति चेत् मनुजेष्वेव तत्संभ-
वात् । वेदकपूर्वकोपशमिकसम्यक्त्वयुक्तो हि श्रेण्या-
रोहणं विधाय मारणान्तिकं करोति । मिथ्यात्वपूर्व-
कोपशमिकयुक्तानां मारणान्तिकासंभवात् ।
[ शंका—क्षायिकसम्यक्त्वसे युक्त संयतासंयतोंका
अन्य सम्यक्त्वसे युक्त संयतासंयतोंकी तरह छह राजु
स्पर्शन क्यों नहीं है ?
उत्तर—ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए क्योंकि
उनका क्षेत्र नियत है। कर्मभूमिमें जन्मा मनुष्य
सात प्रकृतियोंके क्षयका प्रारम्भ करता है। क्षायिक-
सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिसे पहले ही जो तिर्यंचगतिकी
आयुका बन्ध कर लेता है वह तो संयतासंयतपनेको
प्राप्त नहीं कर सकता ।
शंका—औपशमिक सम्यक्त्वसे युक्त संयतासंयतोंका
स्पर्शन कैसे लोकका असंख्यातवां भाग है ?
उत्तर—औपशमिक सम्यक्त्वसे युक्त संयतासंयत
मनुष्योंमें ही होते हैं क्योंकि वेदकसम्यक्त्वपूर्वक औप-
शमिक सम्यक्त्वसे युक्त मनुष्य श्रेणीपर आरोहण
करके मारणान्तिक समुद्घात करता है। और
मिथ्यात्वपूर्वक औपशमिक सम्यग्दृष्टि मारणान्तिक
समुद्घात नहीं करते । ]
§. ८९
३९. १ सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येयभागः कुतः ।
इति चेत्, आहारकावस्थायां समचतुरस्ररज्ज्वादि-
व्याप्त्यभावात् दण्डद्वयावस्थायां कपाटद्वयावस्थायां च
सयोगकेवली औदारिकौदारिकमिश्रशरीरयोग्यपुद्-
गलादानेनाहारकः ।
उक्तं च—
दंडदुगे ओराले कवाटजुगले य पयरसंवरणे ।
मिस्सोरालं मणियं १सेसतिण्हे जाण कम्मइयं ॥
दण्डकवाटयोश्च पिण्डतोऽल्पक्षेत्रतया समचतुरस्र-
रज्ज्वादिव्याप्त्यभावात् सिद्धो लोकस्यासंख्येय-
भागः । अनाहारकेषु सासादनस्य षष्ठपृथ्वोतो निसृत्य
तिर्यग्लोके प्रादुर्भावात् पञ्च, अच्युतादागत्य तत्रैवो-
त्पादात् षडित्येकादश । ननु पूर्वं द्वादशोक्ता इदानीं
त्वेकादशेति पूर्वापरविरोधः । तदयुक्तम्, मारणान्तिका-
पेक्षया पूर्वं तथाभिधानात् । न च मारणान्तिकाव-
स्थायामनाहारकत्वं किन्तूत्पादावस्थायाम् । सासा-
दनश्च मारणान्तिकमेकेन्द्रियेषु करोति नोत्पादं तदा
सासादनत्वत्यागात् ।
[ शंका—सयोगकेवलियोंका स्पर्शन लोकके असंख्या-
तवें भाग कैसे है ?
उत्तर—आहारक अवस्थामें समचतुरस्र रज्जु आदि-
की व्याप्तिका अभाव होनेसे सयोगकेवलीके आहारक
अवस्थामें स्पर्शन लोकका असंख्यातवां भाग है। तथा
विस्तार और संकोच रूप दोनों दण्डसमुद्घातोंमें
तथा दोनों कपाटसमुद्घातोंमें औदारिक और औदा-
रिकमिश्र शरीरके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करनेसे
सयोगकेवली आहारक होते हैं। कहा भी है—
'विस्तार और संकोचरूप दोनों दण्डसमुद्घातोंमें
औदारिककाययोग होता है। विस्तार और संकोच-
रूप दोनों कपाट समुद्घातोंमें तथा संकोचरूप प्रतर
समुद्घातमें औदारिकमिश्रकाययोग होता है। शेष
तीनमें कार्मणकाययोग होता है।'
दण्ड और कपाटमें पिण्डरूपसे अल्पक्षेत्र होनेके कारण
समचतुरस्ररज्जु आदिकी व्याप्तिका अभाव होनेसे
लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्शन सिद्ध होता है।
अनाहारकोंमें सासादन सम्यग्दृष्टिके छठी पृथिवीसे
निकलकर तिर्यग्लोकमें उत्पन्न होनेसे पांच राजु होते
हैं और अच्युतस्वर्गसे आकर तिर्यग्लोकमें उत्पन्न
होनेसे छह राजु होते हैं इस तरह ग्यारह राजु
होते हैं।
१. 'कम्मइओसेस तत्थ अणहारी' ।। —प्रा० पं० सं० १११९९ ।
[पृ. ३९०]
३९० सर्वार्थसिद्धि
[वाम स्तम्भ]
शंका—पहले तो आपने बारह राजु कहे थे अब
ग्यारह कहे हैं इससे तो पूर्वापर विरोध आता है ?
उत्तर—ऐसा कहना उचित नहीं है, पहले मारणान्तिक
समुद्घातकी अपेक्षा बारह राजु स्पर्शन कहा है।
किन्तु मारणान्तिक अवस्थामें जीव अनाहारक नहीं
होता किन्तु उत्पाद अवस्थामें अनाहारक होता है ।
सासादन सम्यग्दृष्टि एकेन्द्रियोंमें मारणान्तिक करता
है उत्पाद नहीं करता; क्योंकि उत्पाद अवस्थामें
सासादनपना छूट जाता है ।]
§. १०
३९. ५ काल:— जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः मुहूर्तश्च सहस्र-
त्रितयसप्तशतत्र्यधिकसप्ततिपरिमाणोच्छ्वासलक्षणः ।
तस्यान्तरन्तर्मुहूर्तः समयाधिकामवलिकामादिं कृत्वा
समयोनमुहूर्तं यावत् । स चेत्थमसंख्यातभेदो भवति ।
तदुक्तम्—
‘तिण्णि सहस्सा सत्तय सदाणि तेहत्तरिं च उस्सासा।
एसो हवदि मुहुत्तो सव्वेसिं चेव मणुयाणं ।’
उत्कर्षेणार्धपुद्गलपरिवर्त्तो देशोनः । स च 'संसारिणो
मुक्ताश्च' (त. सू. २,१०) इत्यत्र वक्ष्यते । सासा-
दनैकजीवं प्रत्युत्कर्षेण षडावलिकाः । आवलिका
चासंख्यातसमयलक्षणा भवति ।
'आवलि¹ असंखसमया संखेज्जा आवली य उस्सासो ।
सत्तुस्सासो थोवो सत्तत्थोवो लवो मणियो ॥
²अट्ठत्तीसल्लवा णाली बे णालियामुहुत्तं तु ।
तीसमुहुत्तं दिवसं पणरस दिवसाण हवइ तह पक्खं ॥'
इति वचनात् । सम्यग्मिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रति जघन्येन
जघन्योऽन्तर्मुहूर्तः, उत्कर्षेण चोत्कृष्टो अन्तर्मुहूर्तश्च
पश्चाद् गुणान्तरं यातीत्यग्रे बोद्धव्यम् । असंयतसम्य-
ग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि
सातिरेकाणि । तथाहि कश्चिज्जीवः पूर्वकोटचायुरुत्पन्न-
[दक्षिण स्तम्भ]
स्सान्तर्मुहूर्ताष्टवर्षानन्तरं सम्यक्त्वमादाय तपोविशेषं
विधाय सर्वार्थसिद्धावुपद्यते ततश्च्युत्वा पूर्वकोटचा-
युरुत्पन्नोऽष्टवर्षानन्तरं संयममाददातीति । जघन्येनैकः
समयः । तथाहि-सर्वो जीवः परिणामविशेषवशात्
प्रथमतोऽप्रमत्तगुणं प्रतिपद्यते । पश्चात्सप्रतिपक्षभूतं
प्रमत्तगुणम् । तत्र गुणस्थानान्तरस्थितो निजायुःसमय-
शेषेऽप्रमत्तगुणं प्रतिपद्य म्रियत इत्यप्रमत्तैकजीवं प्रति
जघन्येनैकसमयः । तथाऽप्रमत्तस्थाने स्थितो निजायुः-
कालान्त्यसमये प्रमत्तगुणं प्रतिपद्य म्रियते इति प्रमत्तैक-
जीवं प्रत्यपि जघन्येनैकसमयः । चतुर्णामुपशमकानां
चतुःपञ्चाशच्चावद्यथासंभवं भवतां युगपदपि प्रवेशमरण³-
संभवान्नानाजीवापेक्षयैकजीवापेक्षया च जघन्येनैकः
समयः । नन्वेवं मिथ्यादृष्टेरप्येकसमयः कस्मान्न
भवतीत्यप्यनुपपन्नं, प्रतिपन्नमिथ्यात्वस्यान्तर्मुहूर्त्तमध्ये
मरणासंभवात् । तदुक्तं, श्लोकः—
‘मिथ्यादर्शनसंप्राप्तेर्नास्त्यनन्तानुबन्धिनाम् ।
यावदावलिकापाकोऽन्तर्मुहूर्ते मृतिर्न च ।'
सम्यग्मिथ्यादृष्टेरपि मरणकाले तद्गुणस्थानत्यागान्नैक-
समयः संभवति । प्रतिपन्नासंयतसंयतासंयतगुणोऽपि
नान्तर्मुहूर्तमध्ये म्रियते ततो नासंयतसंयतासंयतयोर-
प्येकसमयः संभवति । चतुर्णां क्षपकाणामयोगकेवली-
नां च मुक्तिभावत्वेनावान्तरमरणासंभवान्नै कजीवा-
पेक्षया जघन्यश्चोत्कृष्टश्चान्तर्मुहूर्तः । सयोगकेवल्येक-
जीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तस्तद्गुणस्थानप्राप्त्यनन्तर-
मन्तर्मुहूर्त्तमध्येऽयोगगुणस्थानप्राप्तेः । उत्कर्षेण पूर्व-
कोटी अष्टवर्षानन्तरं तपो गृहीत्वा केवलमुत्पादयतीति
कियद्वर्षहीनत्वात् देशोना ।
• [ अब कालका कथन करते हैं । जघन्यकाल अन्तर्मु-
हूर्त है । तीन हजार सात सौ तिहत्तर उच्छ्वासोंका
एक मुहूर्त होता है । उसके अन्तर्गत अन्तर्मुहूर्त
होता है । अर्थात् एक समय अधिक आवलीसे लेकर
[पादटिप्पणी]
१. गो. जी. ५७३ । २. गो. जी. ५७४ । 'एगसमएण हीणं भिण्णमुहुत्तं तदो सेसं' इति उत्तरार्धपाठः ।
जम्बू० प० १३।५-६ । ३. अपूर्वकरणस्य अवरोहणकाले मरणमबोद्धव्यम् । आरोहकापूर्वकरणस्य
प्रथमभागे—'मिस्साहारस्स य खवगा चढमाणपढमपुव्वा य । पढमुवसम्मा तमतमगुणपडिवण्णा य ण
मरंति ॥' इत्यागमोक्तप्रकारेण मरणाभावात् । ननु अधस्तनगुणस्थानेभ्यः स्वस्वगुणस्थानानि प्राप्य तत्रैकैक-
समयान् स्थित्वा निवृत्तानां चतुर्णामुपशमकानामप्येकसमयाः संभवन्तीति न शङ्कनीयम्, तदसंभवात्,
तत्संभवे च जघन्यतोऽन्तर्मुहूर्तान्तरवचनानुपपत्तेः । वक्ष्यते च तत् चतुर्णामुपशमकानामेकजीवं प्रति जघन्येना-
न्तर्मुहूर्त इति ।
परिशिष्ट २ ३९१
एक समय कम मुहूर्त पर्यन्त अन्तर्मुहूर्त होता है । इस
प्रकार अन्तर्मुहूर्तके असंख्यात भेद होते हैं । कहा भी
है—‘सभी मनुष्योंके तीन हजार सात सौ तिहत्तर
उच्छ्वासोंका एक मुहूर्त होता है ।’
उत्कृष्ट काल कुछ कम अर्ध पुद्गल परिवर्त है । उसका
कथन आगे ‘संसारिणो मुक्ताश्च’ इस सूत्रके अन्तर्गत
करेंगे । सासादन गुणस्थानका काल एक जीवकी अपेक्षा
उत्कर्षसे छह आवली है । असंख्यात समयोंको एक
आवली होती है । कहा है—असंख्यात समयकी एक
आवली होती है । संख्यात आवलीका एक उच्छ्वास
होता है । सात उच्छ्वासका एक स्तोक होता है ।
सात स्तोकका एक लव होता है । साढ़े अड़तीस
लवकी एक नाली होती है । दो नालीका एक मुहूर्त
होता है । तीस मुहूर्तका दिन होता है और पन्द्रह
दिनका एक पक्ष होता है ।’
सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थानका काल एक जीवकी
अपेक्षा जघन्यसे जघन्य अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्टसे
उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त है । अन्तर्मुहूर्त आगे गुणित होता
जाता है ऐसा आगे जानना चाहिए । असंयतसम्यग्-
दृष्टि गुणस्थानका काल एक जीवकी अपेक्षा उत्कर्षसे
कुछ अधिक तेतीस सागर है । उसका खुलासा इस
प्रकार है—कोई जीव एक पूर्वकोटिकी आयु लेकर
उत्पन्न हुआ । एक अन्तर्मुहूर्त अधिक आठ वर्षके
पश्चात् सम्यक्त्वको ग्रहण करके तथा तपस्या करके
सर्वार्थसिद्धिमें उत्पन्न हुआ वहाँसे च्युत होकर पुनः
एकपूर्वकोटिकी आयु लेकर उत्पन्न हुआ । आठ वर्षके
पश्चात् संयमको स्वीकार किया । इस तरह सातिरेक
तेतीस सागर काल होता है । प्रमत्त और अप्रमत्त
गुणस्थानका काल एक जीवकी अपेक्षा जघन्यसे एक
समय है वह इस प्रकार है—सभी जीव विशेष
परिणामोंके वश सर्वप्रथम अप्रमत्त गुणस्थानको प्राप्त
करते हैं । उसके पश्चात् उसके प्रतिपक्षी प्रमत्त
गुणस्थानको प्राप्त करते हैं । अतः अन्य गुणस्थानमें
स्थित जीव अपनी आयुमें एक समय शेष रहनेपर
अप्रमत्त गुणस्थानको प्राप्त करके मर जाता है । इस
प्रकार एक जीवकी अपेक्षा अप्रमत्तका काल जघन्यसे
एक समय होता है । तथा अप्रमत्त गुणस्थानमें स्थित
जीव अपनी आयुके कालमें एक समय शेष रहनेपर
प्रमत्तगुणस्थानको प्राप्त करके मरता है । इस प्रकार
एक जीवकी अपेक्षा प्रमत्त गुणस्थानका काल भी
एक समय है । चारों उपशमकोंका यथा सम्भव
चौवन संख्यापर्यन्त एक साथ भी प्रवेश और मरण
सम्भव होनेसे नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य काल एक समय है ।
शंका—इस तरह मिथ्यादृष्टिका भी काल एक समय
क्यों नहीं होता ?
उत्तर—ऐसा कहना ठीक नहीं है । मिथ्यात्व गुण-
स्थानको प्राप्त होनेवाले जीवका मरण अन्तर्मुहूर्तके
मध्य असम्भव है । कहा है—‘अनन्तानुबन्धीका
विसंयोजन करनेवाले वेदक सम्यग्दृष्टिके मिथ्यात्व
गुणस्थानको प्राप्त होनेपर एक आवलीकाल तक
अनन्तानुबन्धीका उदय नहीं होता तथा एक अन्त-
र्मुहूर्त काल तक मरण नहीं होता । सम्यग्मिथ्यादृष्टि
का भी काल एक समय नहीं है क्योंकि मरणकाल
आनेपर वह गुणस्थान छूट जाता है । असंयत और
संयतासंयत गुणस्थानको प्राप्त होनेवाला भी अन्त-
र्मुहूर्त तक नहीं मरता अतः असंयत और संयतासंयत
का भी काल एक समय नहीं होता ।
चारों क्षपकों और अयोगकेवलियोंके मुक्तिगामी होनेके
कारण अवान्तरमें मरण सम्भव न होनेसे नाना
जीवों और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट
काल अन्तर्मुहूर्त है । सयोगकेवलीका काल एक जीव-
की अपेक्षा जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त है क्योंकि उस
गुणस्थानको प्राप्त होनेके अनन्तर अन्तर्मुहूर्तमें
अयोगकेवली गुणस्थानको प्राप्त हो जाता है ।
उत्कृष्टकाल कुछ कम पूर्वकोटी है क्योंकि जन्मसे
आठ वर्षके पश्चात् तप स्वीकार करके केवलज्ञानको
उत्पन्न करता है इसलिए पूर्वकोटिमें कुछ वर्ष कम
हो जाते हैं ।
§. ९२
४०. १५ तिर्यगसंयतसम्यग्दृष्टचेकजीवं प्रत्युत्कर्षेण
दर्शनमोहक्षपकवेदकापेक्षया त्रीणि पल्योपमानि ।
पश्चाद् गत्यतिक्रमः ।
[ तिर्यंचगतिमें असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानका काल
एक जीवकी अपेक्षा उत्कर्षसे दर्शनमोहका क्षय करने-
वाले वेदक सम्यग्दृष्टिकी अपेक्षा तीन पल्योपम है ।
उसके पश्चात् गति बदल जाती है ]
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
३९२ | सर्वार्थसिद्धि
§. ९३
४१. २ मिथ्यादृष्टिममुष्यैकजीवं प्रत्युत्कर्षेण त्रीणि
पल्योपमानि पूर्वकोटिपृथक्त्वैः सप्तचत्वारिंशत् पूर्व-
कोटिभिरभ्यधिकानि । तथाहि—नपुंसक-स्त्री-पुंवेदे-
नाष्टावष्टौ वारान् पूर्वकोट्यायुषोत्पद्यावान्तरेऽन्त-
र्मुहूर्तमध्येऽपर्याप्तकमनुष्यक्षुद्रभवेनाष्टौ वारानुत्पद्यते ।
पुनरपि नपुंसकस्त्रीवेदेनाष्टावष्टौ पुंवेदेन तु सप्त ।
ततो भोगभूमौ त्रिपल्योपमायुष्कः, भोगभूमिजानां निय-
मेन देवेषूत्पादात् । पश्चाद् गत्यतिक्रमः । असंयत-
सम्यग्दृष्टिममुष्यैकजीवं प्रत्युत्कर्षेण त्रीणि पल्योप-
मानि । कर्मभूमिजो हि मनुष्यः क्षायिकसम्यक्त्वयुक्तो
दर्शनमोहक्षपकवेदकयुक्तो वा भोगभूमिजमनुष्येषू-
त्पद्यते । इति मनुष्यगत्यपरित्यागात् सातिरेकाणि
पश्चाद्गत्यतिक्रमः ।
[ मनुष्य गतिमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानका काल एक
जीवकी अपेक्षा उत्कर्षसे पूर्वकोटि पृथक्त्व तथा सैंता-
लीस पूर्वकोटिसे अधिक तीन पल्य है। उसका खुलासा
इस प्रकार है— नपुंसकवेद, स्त्रीवेद और पुरुषवेदके
साथ आठ-आठ बार पूर्वकोटिकी आयुसे उत्पन्न होकर
अवान्तरमें अन्तर्मुहूर्तके अन्दर लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यके
क्षुद्रभवके साथ आठ बार उत्पन्न होता है। उसके
पश्चात् पुनः नपुंसक वेद और स्त्रीवेदके साथ आठ-
आठ बार उत्पन्न होता है किन्तु पुरुषवेदके साथ सात-
सात बार उत्पन्न होता है । उसके बाद भोगभूमिमें
तीन पल्यकी आयुसे उत्पन्न होता है। भोगभूमिके
जीव मरकर देवोंमें ही उत्पन्न होते हैं अतः उसके
बाद गति बदल जाती है। असंयत सम्यग्दृष्टि गुण-
स्थानका काल एक जीवकी अपेक्षा उत्कर्षसे तीन
पल्य है। क्योंकि कर्मभूमिका जन्मा (बद्धमनुष्यायु )
मनुष्य क्षायिक सम्यक्त्वसे युक्त हो या दर्शनमोहके
क्षपक वेदकसम्यक्त्वसे युक्त हो, मरकर भोगभूमिज
मनुष्योंमें उत्पन्न होता है। अतः मनुष्यगतिके न
छूटनेसे साधिक तीन पल्य काल होता है। उसके
बाद गति बदल जाती है ]
§. ९५
४१.११ एकेन्द्रियैकजीवं प्रति जघन्येन क्षुद्रभवग्रह-
णम् । तत्कीदृशमिति चेदुच्यते । उक्तलक्षणमुहूर्तमध्ये
तावदेकेन्द्रियो भूत्वा कश्चिज्जीवः षट्षष्टिसहस्रद्वा-
त्रिंशदधिकशतपरिमाणानि जन्ममरणान्यनुभवति ।
६६१३२ । तथा स एव जीवस्तस्यैव मुहूर्तस्य मध्ये
द्वित्रिचतुःपञ्चेन्द्रियो भूत्वा यथासंख्यमशीतिषष्ठिचत्वा-
रिंशच्चतुर्विंशतिजन्ममरणानि स्वकृतकर्मवैचित्र्यादनु-
भवति ॥८०।६०।४०।२४॥ सर्वेऽप्येते समुदिताः क्षुद्र-
भवा एतावन्तो भवन्ति ॥६६३३६॥ उक्तं च—
“१तिण्णिसया छत्तीसा छावट्ठीसहस्सजम्ममरण।णि ।
एवदिया खुदमवा हवंति अंतोमुहुत्तस्स ॥
२विगलिंदिए असीदिं सट्ठी चालीसमेव जाणांहि ।
पंचेंदिय चउवीसं खुद्दभवांतोमुहुत्तस्स ॥”
यदा चैवंमुहूर्तस्य मध्ये एतावन्ति जन्ममरणानि भवन्ति
तदैकस्मिन्नुच्छ्वासेऽष्टादश जन्ममरणानि लभ्यन्ते ।
तत्रैकस्य क्षुद्रभवसंज्ञा । उत्कर्षेणानन्तकालोऽसंख्यात-
पुद्गलपरिवर्तनलक्षणो, निरन्तरमेकेन्द्रियत्वेन मृत्वा-
मृत्वा पुनर्भवानात् । ततो विकलेन्द्रियः पञ्चेन्द्रियो वा
भवति ।
[ एकेन्द्रिय एक जीवके प्रति जघन्यकाल क्षुद्रभवग्रहण
है। वह क्षुद्रभव किस प्रकार है यह कहते है — उक्त
लक्षणवाले मुहूर्तमें एकेन्द्रिय होकर कोई जीव छियासठ
हजार एक सौ बत्तीस जन्म मरणका अनुभव करता
है। तथा वही जीव उसी मुहूर्तके भीतर दो इन्द्रिय,
ते-इन्द्रिय, चौइन्द्रिय और पञ्चेन्द्रिय होकर यथाक्रमसे
अस्सी, साठ, चालीस और चौबीस जन्म मरणोंको
अपने द्वारा किये गये कर्मबन्धकी विचित्रतासे अनुभव
करता है। ये सभी क्षुद्रभव मिलकर छियासठ हजार
तीन सौ छत्तीस होते हैं। कहा है—छियासठ हजार
तीन सौ छत्तीस जन्ममरण होते हैं। एक अन्तर्मुहूर्तमें
उतने ही क्षुद्रभव होते हैं। इसी अन्तर्मुहूर्तमें विकले-
न्द्रियके अस्सी, साठ और चालीस तथा पञ्चेन्द्रियके
चौबीस क्षुद्रभव जानना चाहिए ।'
जब एक मुहूर्तके भीतर ( अन्तर्मुहूर्तमें ) इतने जन्म-
मरण होते हैं तब एक उच्छ्वासमें १८ जन्ममरण
प्राप्त होते हैं। उनमेंसे एककी संज्ञा क्षुद्रभव है।
उत्कर्षसे अनन्तकाल है जो असंख्यात पुद्गल परावर्त
१. गो० जी० गा० १२२, १२३ । २. कल्लाणा-लोयणा ६ ।
letter has a vertical line, then वा? No, look at वा in वारान् right above it!
In L9: वारान् has वा.
In L10, right below वा of वारान्: it's वा!
Wait, before वा is दा! So it literally is printed as दावान्तरे!
Wait, could it be द्वयान्तरे? No, it's a typesetter typo in the book for तदन्तरे or द्वयोरन्तरे! The typesetter printed दावान्तरे!
Let's look really closely at: दा वा न्तः? No, दावान्तरेऽन्तर्मुहूर्त्तमध्ये.
Yes, it is physically printed as दावान्तरेऽन्तर्मुहूर्त्तमध्ये! We must transcribe what is printed.
-
Let's check
त्रसकायॆऽपिin L13:
त्रसकायेऽपि- the matra is clearly an 'e' matra (े). -
Let's check
पर्यन्तःvsपर्यन्त;:
In L55:योगकाल पर्यन्तःorपर्यन्त;?
Look atपर्यन्त;: there is a dot on top and a comma below ->;(semicolon).
Wait, look
स्तम्भ १ (बायाँ स्तम्भ)
३९४
§. ९८
४३. १ एकजीवस्य मिथ्यात्वयुक्तस्त्रीवेदकालो जघन्ये-
नान्तर्मुहूर्तः । ततो गुणान्तरसंक्रमः । उत्कर्षेण-
पल्योपमशतपृथक्त्वम् । तथाहि--स्त्रीवेद्युक्तो
मिथ्यादृष्टिर्देवेषु आयुर्बध्नाति । ततस्तिर्यग्मनुष्येषु
नारकसम्मूर्च्छनवजं तावद्यावत्पल्योपमशतपृथक्त्वं ततो
वेदपरित्यागः । स्त्रीवेदासंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रति
उत्कर्षेण पञ्चपञ्चाशतपल्योपमानि, गृहीतसम्यक्त्वस्य
स्त्रीवेदेनोत्पादाभावात् पर्याप्तः सम्यक्त्वं ग्रहीष्यतीति
पर्याप्तिसमापकान्तर्मुहूर्तहीनत्वाद्देशोनानि । नपुंसक-
वेदासंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण सप्तमपृथिव्यां
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि तत्र च पर्याप्तः कियत्कालं
विश्रम्य विशुद्धो भूत्वा सम्यक्त्वं गृह्णात्यन्ते त्यजति
चेति देशोनानि ।
[ एक जीवके मिथ्यात्वयुक्त स्त्रीवेदका काल जघन्य-
से अन्तर्मुहूर्त है । उसके बाद गुणस्थान बदल जाता
है । उत्कर्षसे सौ पल्योपमपृथक्त्व है जो इस प्रकार
है—स्त्रीवेदसे युक्त मिथ्यादृष्टि देवगतिकी आयुका
बन्ध करता है । वहाँसे तिर्यंच और मनुष्योंमें उत्पन्न
होता है। इस तरह नारक और सम्मूर्छनको छोड़कर
सौ पल्योपमपृथक्त्व तक स्त्रीवेद सहित रहता है फिर
वेद बदल जाता है। स्त्रीवेद सहित असंयत सम्यग्दृष्टि
एक जीवका उत्कर्षसे पचपन पल्य काल है। सम्यग्दृष्टि
तो स्त्रीवेदके साथ उत्पन्न नहीं होता अतः स्त्रीवेदी
जीव पर्याप्त अवस्थामें सम्यक्त्वको ग्रहण करता है
इसलिए पर्याप्तिकी पूर्ति में लगनेवाला अन्तर्मुहूर्त
कम कर देनेसे देशोन (कुछ कम पचपन पल्य) होता
है। नपुंसकवेदी असंयत सम्यग्दृष्टि एक जीवका
उत्कर्षसे सातवें नरकमें तेतीस सागर काल है।
क्योंकि वहाँ पर्याप्त होकर कुछ काल विश्राम करके
विशुद्ध होकर सम्यक्त्वको ग्रहण करता है और अन्त-
में छोड़ देता है इसलिए देशोन (कुछ कम) तेतीस-
सागर होता है । ]
§. ९९
४३. ११ चतुःकषायाणां मिथ्यादृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां
कषायगुणपरावर्तपेक्षया एकजीवं प्रति मनोयोगिवज्ज-
घन्येनेकः समयः, उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः ।
स्तम्भ २ (दायाँ स्तम्भ)
सर्वार्थसिद्धि
[ चारों कषायोंका मिथ्यादृष्टिसे लेकर अप्रमत्तगुण-
स्थान पर्यन्त कषाय और गुणस्थानके बदल जानेकी
अपेक्षासे एक जीवके मनोयोगीकी तरह जघन्यसे एक
समय और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त काल है । ]
§. १००
४३. १४ विभङ्गज्ञानिमिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण
नारकापेक्षया त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि । पर्याप्तश्च
विभङ्गज्ञानं प्रतिपद्यत इति पर्याप्तिसमापकान्तर्मुहूर्त-
हीनत्वाद्देशोनानि ।
[ विभंगज्ञानी मिथ्यादृष्टि एक जीवके उत्कर्षसे नारकों
की अपेक्षासे तेतीस सागर काल है । पर्याप्त जीव ही
विभंगज्ञानको प्राप्त होता है इसलिए पर्याप्तिके समापक
अन्तर्मुहूर्तके कम कर देनेसे देशोन लेना चाहिए । ]
§. १०३
४४. ७ कृष्णनीलकापोतलेश्यमिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः, तिर्यग्मनुष्यापेक्षया तेषामेव लेश्या-
परावर्तसंभवात् । सर्वत्र च लेश्यायुक्तस्यान्तर्मुहूर्तः
तिर्यग्मनुष्यापेक्षया द्रष्टव्यः । उत्कर्षेण नारकापेक्षया
यथासंख्यं सप्तमपञ्चम-तृतीयपृथिव्यां त्रयस्त्रिंशत्
सप्तदशसप्तसागरोपमाणि देवनारकाणामवस्थितलेश्य-
त्वात् । व्रजन्नियमैन तल्लेश्योक्तो व्रजति आग-
च्छतो नियमो नास्तीति सातिरेकाणि । उक्तलेश्या-
युक्तासंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण नारका-
पेक्षया उक्तान्येव सागरोपमाणि । पर्याप्तिसमापकान्त-
र्मुहूर्ते सप्तम्यां मारणान्तिके च सम्यक्तवाभावाद्देशो-
नानि । तेजःपद्मलेश्यमिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्यैक-
जीवं प्रत्युत्कर्षेण यथासंख्यं प्रथमद्वादशस्वर्गापेक्षया
द्वे सागरोपमे अष्टादश च । तद्युक्तानां मारणान्ति-
कोत्पादः संभवतीति सातिरेकाणि । शुक्ललेश्यमिथ्या-
दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण एकत्रिंशत्सागरोपमाणि
अग्रग्रैवेयकदेवापेक्षया तेषां मारणान्तिकोत्पादावस्थाया-
मपि शुक्ललेश्यासंभवात् सातिरेकाणि । संयतासंयत-
शुक्ललेश्यैकजीवं प्रति गुणलेश्यापरावर्तपेक्षेतराभ्यां
जघन्येनेकः समयः उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः ।
[कृष्ण नील या कापोतलेश्यावाले मिथ्यादृष्टि एक
जीवके प्रति जघन्यसे अन्तर्मुहूर्तकाल है क्योंकि तिर्यंच
और मनुष्यकी अपेक्षासे उनकी लेश्यामें परिवर्तन
परिशिष्ट २ | ३९५
सम्भव है। सर्वत्र लेश्यायुक्त जीवका अन्तर्मुहूर्तकाल
तिर्यंच और मनुष्यकी अपेक्षासे देखना चाहिए । उत्कर्ष-
से नारकोंकी अपेक्षा सातवीं, पाँचवीं और तीसरी
पृथिवीमें क्रमसे तेतीस सागर, सत्रह सागर और
सात सागर काल होता है क्योंकि देवों और नारकोंकी
लेश्या अवस्थित होती है। जब वे अपनी गतिमें जाते
हैं तो नियमसे उसी लेश्याके साथ जाते हैं किन्तु
वहाँसे आते हुए नियम नहीं हैं इसलिए कुछ अधिक
उक्त काल होता है। उक्त लेश्याओंसे युक्त असंयत
सम्यग्दृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे नारकोंकी
अपेक्षासे उक्त तेतीस आदि सागर ही काल है। किन्तु
पर्याप्ति समापक अन्तर्मुहूर्तमें और सातवीं पृथिवीमें
मारणान्तिक समुद्घातमें सम्यक्त्व नहीं होता इसलिए
कुछ कम उक्त काल होता है। तेजोलेश्या और पद्म-
लेश्यावाले मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि एक
जीवके प्रति उत्कर्षसे क्रमानुसार प्रथम और बारहवें
स्वर्गकी अपेक्षा दो सागरोपम और अठारह सागरोपम-
काल है । उक्त अवस्थाविशिष्ट उन जीवोंके मारणान्तिक
और उत्पाद सम्भव है इसलिए कुछ अधिक उक्त काल
लेना चाहिए । शुक्ललेश्यावाले मिथ्यादृष्टि एक जीवके
प्रति उत्कर्षसे सबसे ऊपरवाले ग्रैवेयकके देवोंकी अपेक्षा
इकतीस सागर काल है । उनके मारणान्तिक और
उत्पाद अवस्थामें भी शुक्ललेश्या होती है अतः कुछ
अधिक इकतीस सागर लेना चाहिए । शुक्ललेश्यावाले
संयतासंयत-गुणस्थानवर्ती एक जीवके प्रति गुणस्थान
और लेश्यापरिवर्तनकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय
और उत्कर्षसे अन्तर्मुहूर्त काल है । ]
§. १०७
४६.४ आहारकेषु मिथ्यादृष्टचैकजीवं प्रति जघन्येना-
न्तर्मुहूर्तः । वक्रेण गतः क्षुद्रभवेनोत्पन्नः पुनरपि वक्रेण
गतः । उत्कर्षेणासंख्यातासंख्यातमानावच्छिन्नोत्सर्पिण्य-
वसर्पिणीलक्षणोऽङ्गुल्यसंख्येयभागः शश्वदन्तऋजुगति-
मत्त्वात् । अनाहारकसासादनसम्यग्दृष्ट्यसंयतसम्यग्-
दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षयोत्कर्षेणावलिकाया असंख्येय-
भागः । नन्वालिकाया असंख्यातसमयमानलक्षणत्वा-
त्तदसंख्येयभाग एकसमय एव स्यात् । तदयुक्तं,
बृहदसंख्यातसमयमानलक्षणत्वात् । आवलिकासंख्येय-
भागस्य चाल्पासख्यातसमयमानलक्षणत्वादिति ।
सयोगकेवलिनां नानाजीवापेक्षया जघन्येन त्रयः
समयाः समसमये दण्डादिप्रारम्भकत्वात् । उत्कर्षेण
संख्येयाः समयाः अजघन्योत्कृष्टसंख्यातमाना-
वच्छिन्नाः निरन्तरं विषमसमये दण्डादिप्रारम्भ-
कत्वात्। एकजीवं प्रति जघन्य उत्कृष्टाश्च त्रयः समयाः
प्रतरद्वयलोकपूरणलक्षणाः ।
[ आहारकोंमें मिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति जघन्यसे
अन्तर्मुहूर्त काल है, वक्रगतिसे जाकर क्षुद्रभवसे उत्पन्न
हुआ और पुनः मरकर वक्रगतिसे गया (वक्रगतिमें
अनाहारक रहा और मध्यमें आहारक) । उत्कर्षसे
अंगुलके असंख्यातवें भाग है जो असंख्यातासंख्यात
उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी कालप्रमाण है ।
शंका—आवलीका प्रमाण असंख्यात समय है अतः
उसका असंख्यातवां भाग एक समय ही होगा ?
उत्तर—ऐसा कहना युक्त नहीं है क्योंकि आवलीके
समयोंका प्रमाण बृहत् असंख्यात है और आवलीके
असंख्यातवें भागके समयोंका प्रमाण अल्प असं-
ख्यात है ।
सयोगकेवलियोंका काल नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य-
से तीन समय है क्योंकि समान समयमें दण्डादि
समुद्घातका प्रारम्भ करते हैं । उत्कर्षसे संख्यात-
समय है जो मध्यमसंख्यात प्रमाण है क्योंकि लगा-
तार विभिन्न समयोंमें दण्डादिसमुद्घातका प्रारम्भ
करते हैं । एक जीवकी अपेक्षा अनाहारकका जघन्य
और उत्कृष्ट काल तीन समय है विस्तार और
संकोच रूप दो प्रतर और एक लोकपूरणसमुद्घात
के समय । ]
§. १०८
४६. १२ अन्तरम् । मिथ्यादृष्टचैकजीवं प्रत्यन्तरमु-
त्कर्षेण द्वे षट्षष्ठी सागरोपमानाम् । तथाहि—वेदक-
सम्यक्त्वेन युक्त एको षट्षष्ठीं तिष्ठति तत्सम्यक्त्व-
स्योत्कर्षेणैतावन्मात्रस्थितिकत्वात् । पुनरवान्तरेऽन्त-
१. आदावन्ते च वक्रगतिकालयोरनाहारकः । मध्येऽन्तर्मुहूर्तं यावदाहारक इत्यर्थः ।
३९६ सर्वार्थसिद्धि
र्मुहूर्तं यावत् सम्यग्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यते । पुनरपरां
षट्षष्ठीं वेदकसम्यक्त्वेन तिष्ठति । अन्त्यसागरोपमाव-
सानशेषे मिथ्यात्वं प्रतिपद्यत इति देशोने । सासा-
दनैकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागः ।
अन्तर्मुहूर्तः कस्मान्नेति च न चोद्यम्, अन्तर्मुहूर्तमध्ये
पुनः सासादनगुणग्रहणे योग्यतासंभवात् । परित्यक्तौप-
शमिकसम्यक्त्वो हि मिथ्यात्वप्राप्त्यन्तराले वर्तमानः
सासादनोऽभिधीयते । तस्य च मिथ्यात्वं गतस्य
पुनरौपशमिकसम्यक्त्वग्रहणे योग्यता पल्योपमासंख्येय-
भागे सत्येव नावान्तरे तत्र वेदकग्रहणयोग्यताया
एव संभवात् ।
[ आगे अन्तरका कथन करते हैं । मिथ्यादृष्टि एक
जीवके प्रति अन्तरकाल उत्कर्षसे दो छियासठ सागर
है । जो इस प्रकार है—वेदकसम्यक्त्वसे युक्त जीव
एक छियासठसागर तक रहता है क्योंकि वेदक-
सम्यक्त्वकी उत्कृष्ट स्थिति इतनी ही है । उसके
पश्चात् एक अन्तर्मुहूर्तके लिए सम्यग्मिथ्यात्व गुण-
स्थानको प्राप्त करता है । पुनः दूसरे छियासठ सागर
तक वेदकसम्यक्त्वके साथ रहता है। अन्तिम सागर-
के अन्तमें कुछ काल शेष रहनेपर मिथ्यात्वमें चला
जाता है इस प्रकार देशोन दो छियासठ सागर
अन्तरकाल होता है । सासादन एक जीवके प्रति
अन्तरकाल जघन्यसे पल्योपमके असंख्यातवें भाग है ।
शंका — अन्तर्मुहूर्त अन्तरकाल क्यों नहीं है ।
उत्तर — ऐसा तर्क नहीं करना चाहिए क्योंकि अन्त-
र्मुहूर्तकालके अन्दर पुनः सासादनगुणस्थानको ग्रहण
करनेकी योग्यता सम्भव नहीं है । इसका कारण
यह है कि जो जीव औपशमिक सम्यक्त्वको छोड़कर
मिथ्यात्व गुणस्थान प्राप्तिके बीचके समयमें रहता है
उसे सासादन कहते हैं । उसके मिथ्यात्वमें चले
जानेपर पुनः औपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण करनेकी
योग्यता पल्योपमके असंख्यातवें भाग काल बीतनेपर
ही मानी है उससे पहले नहीं । उससे पहले वेदक
सम्यक्त्वको ग्रहण करनेकी योग्यता ही सम्भव
है । ]
§. ११०
४८. ४ तिर्यङ्मिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण त्रीणि
पल्योपमान्यन्तरम् । अधिकमपि कस्मान्नेति चेत्,
वेदकयुक्तस्य तिर्यक्त्व्यादाभावात् तद्युक्तो हि देवेष्वेवो-
त्पद्यते । अतो मिथ्यात्वयुक्तस्त्रिपत्योपमायुष्को भोग-
भूमिषूत्पद्यते । तत्र चोत्पन्नानां तिर्यङ्मनुष्याणां
किंचिदधिकाष्टचत्वारिशद्दिनेषु सम्यक्त्वग्रहण-
योग्यता भवतीति नियमादेतावद्दिनेषु गतेषु मिथ्यात्व-
परित्यागेन सम्यक्त्वं गृह्णातीति त्रिपल्योपमायुः-
शेषे पुनर्मिथ्यात्वं प्रतिपद्यत इति गर्भकालेन किंचिद-
धिकाष्टचत्वारिंशद्दिनैरवसानकालशेषेण च हीनत्वा-
द्देशोनानि ।
[ तिर्यंचमिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे तीन
पल्योपम अन्तरकाल है ।
शंका — अधिक क्यों नहीं है ?
उत्तर — क्योंकि वेदक सम्यक्त्वसे युक्त जीव तिर्यंचों-
में उत्पन्न नहीं होता, देवोंमें ही उत्पन्न होता है ।
अतः तीन पल्यकी आयुका बन्ध करनेवाला मिथ्या-
दृष्टि भोगभूमिमें उत्पन्न होता है। भोगभूमिमें उत्पन्न
हुए तिर्यंच और मनुष्योंमें कुछ अधिक अड़तालीस
दिन बीतने पर सम्यक्त्वग्रहणकी योग्यता आती है
ऐसा नियम है । अतः इतने दिन बीतने पर वह
मिथ्यात्वको त्याग कर सम्यक्त्वको ग्रहण करता है
और तीन पल्यकी आयुमें कुछ शेष रहने पर पुनः
मिथ्यात्वको ग्रहण कर लेता है। इस तरह गर्भ-
कालसे किंचित् अधिक अड़तालीस दिनों और अन्तिम-
कालसे हीन होनेसे देशोन² तीन पल्य अन्तरकाल
होता है । ]
§. १११
४८. ७ मनुष्यगतौ सासादनसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्या-
दृष्टि-असंयतसम्यग्दृष्टयः पूर्वकोटिपृथक्त्वकाले सति
स्वस्वगुणं परित्यज्य भोगभूमावुत्पद्यन्ते । पश्चात् स्व-
गुणं गृह्णन्ति । एकमेव जीवं प्रति उत्कर्षेण त्रीणि
पल्योपमानि पूर्वकोटिपृथक्त्ववाधिकानि भवन्ति ।
१. धवला पु० ५, पृ० ७ में प्रथम छियासठ सागरमें अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहनेपर ही सम्यक् मिथ्यात्व-
को प्राप्त कराया है —सं० । २. धवला पु० ५, पृ० ३२ में आदिके मुहूर्तपृथक्त्वसे अधिक दो मास
और आयुके अवसानमें उपलब्ध दो अन्तर्मुहूर्तोंसे हीन तीन पल्योपम अन्तरकाल कहा है—सं० ।
परिशिष्ट २ [३९७]
[ मनुष्यगतिमें सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि,
असंयतसम्यग्दृष्टि जीव अपने-अपने गुणस्थानको छोड़-
कर पूर्वकोटिपृथक्त्वकाल होनेपर भोगभूमिमें उत्पन्न
होते हैं । पीछे अपने गुणस्थानको ग्रहण करते हैं
इस तरह एक जीवके प्रति उत्कर्षसे पूर्वकोटि पृथक्त्व
अधिक तीन पल्योपम अन्तरकाल होता है । ]
§. ११२
४९. ५ देवगतौ मिथ्यादृष्टेरेकजीवं प्रत्युत्कर्षेणैक-
त्रिंशत्सागरोपमाणि । तथाहि—मिथ्यात्वयुक्तोऽग्रग्रैवे-
यकेषूत्पद्यते पश्चात् सम्यक्त्वमादायैकत्रिंशत्सागरोप-
माणि तिष्ठति । अवसानकालशेषे पुनर्मिथ्यात्वं प्रति-
पद्यतेऽन्यथा गत्यतिक्रमः स्यादिति देशोनानि । एवम-
संयतसम्यग्दृष्टेरपि योजनीयम् ।
[ देवगतिमें मिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे
इकतीस सागर अन्तरकाल है जो इस प्रकार है—
एक द्रव्यलिंगी मिथ्यादृष्टि उपरिमग्रैवेयकमें उत्पन्न
हुआ । पीछे सम्यक्त्वको ग्रहण करके इकतीस सागर
तक रहा । अन्त समयमें पुनः मिथ्यादृष्टि हो गया ।
यदि ऐसा न हो तो गति बदल जायेगी । अतः
देशोन इकतीससागर होता है । इसी तरह असंयत
सम्यग्दृष्टिका भी अन्तरकाल लगा लेना चाहिए । ]
§. ११३
४१. ९ एकेन्द्रियैकजीवस्योत्कर्षेण द्वे सागरोपम-
सहस्रे पूर्वकोटिपृथक्त्वैः षण्णवतिपूर्वकोटिभिरभ्य-
धिकेऽन्तरम् । अग्रे हीत्थं सर्वत्र सागरोपमसहस्र-
द्वयस्य पूर्वकोटिपृथक्त्वैरभ्यधिकत्वं द्रष्टव्यम् । एके-
न्द्रियविकलेन्द्रियाणां च गुणस्थानान्तरासंभवादि-
न्द्रियेणान्तरम् । पञ्चेन्द्रियाणां तु तत्संभवान्मिथ्यात्वादेः
सम्यक्त्वादिनान्तरं द्रष्टव्यम् ।
[ एकेन्द्रिय एक जीवका अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व
छियानबे पूर्वकोटियोंसे अधिक दो हजार सागर है ।
आगे इस प्रकार सर्वत्र पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक
दो हजार सागर जानना चाहिए । एकेन्द्रिय और
विकलेन्द्रियोंके मिथ्यात्व गुणस्थानके अतिरिक्त अन्य
गुणस्थान नहीं होता इसलिए इन्द्रियोंकी अपेक्षा
अन्तर लगा लेना अर्थात् विकलेन्द्रिय जीव एके-
न्द्रियोंमें उत्पन्न होकर पुनः विकलेन्द्रियोंमें उत्पन्न हो
और एकेन्द्रियजीव विकलेन्द्रियोंमें उत्पन्न होकर पुनः
एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न हो तो अन्तरकाल आता है ।
किन्तु पंचेन्द्रियोंमें तो गुणस्थान बदलना सम्भव है
अतः मिथ्यात्व आदिका अन्तर सम्यक्त्व आदिके द्वारा
लगा लेना चाहिए । ]
§. ११४
५०. ५ पृथिव्यादिकायिकानां वनस्पतिकायिकैरन्तर-
मुत्कर्षेणासंख्येयाः पुद्गलपरावर्ताः । तेषां तु नैर-
न्तरमुत्कर्षेणासंख्येया लोकाः वनस्पतिकायिकेभ्योऽ-
न्येषामल्पकालत्वात् ।
[ पृथिवीकायिकोंका वनस्पतिकायिक जीवोंके द्वारा
अन्तर उत्कर्षसे असंख्यात पुद्गलपरावर्त है और
वनस्पतिकायिकोंका पृथिवीकायिक आदिके द्वारा
अन्तर उत्कर्षसे असंख्यातलोक है क्योंकि वनस्पति-
कायिकोंसे पृथिवीकायिक आदिका काल थोड़ा है । ]
§. ११५
५१. ३ कायवाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादि-
षड्गुणस्थानानां नानैकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवापेक्षया कथं नास्तीति चेत् कायादियोगा-
नामन्तर्मुहूर्तकालत्वात् कायादियोगे स्थितस्यात्मनो
मिथ्यात्वादिगुणस्य गुणान्तरेणान्तरं पुनस्तत्प्राप्तिश्च
संभवतीति । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनामप्येकजीवा-
पेक्षया तत एव नास्त्यन्तरम् ।
[ काययोगी, वचनयोगी और मनोयोगियोंमें मिथ्या-
दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत,
अप्रमत्तसंयत और सयोगकेवलिका नानाजीवों और
एकजीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
शंका—एक जीवकी अपेक्षा अन्तर क्यों नहीं है ?
उत्तर—क्योंकि कायादियोगोंका अन्तर्मुहूर्त काल है
इसलिए कायादि योगमें स्थित जीवके मिथ्यात्व आदि
गुणस्थानका अन्य गुणस्थानसे अन्तर करके पुनः उसी
गुणस्थानमें आना सम्भव नहीं है । सासादन
सम्यग्दृष्टि आदिका भी एक जीवकी अपेक्षा इसीलिए
अन्तर नहीं है । ]
§. ११७
५२. ६ पुंवेदे द्वयोः क्षपकयोरिति पृथग्वचनमुत्तरत्र
वेदभावात् । नानाजीवापेक्षया उत्कर्षेण संवत्सरः
सातिरेकः अष्टादशमासा इत्यर्थः ।
[ पुरुषवेदमें 'दो क्षपकोंका' पृथक् कथन इसलिए
किया है कि आगे वेदका अभाव हो जाता है । नाना
जीवोंकी अपेक्षा उत्कर्षसे कुछ अधिक एक वर्ष
अन्तर है । कुछ अधिक एक वर्षसे १८ मास लेना
चाहिए । ]
§. ११८
५२. १२ अवेदेषूपशान्तकषायकैकजीवं प्रति नास्त्य-
न्तरं सवेदत्वात् ।
[ अपगत वेदियोंमें उपशान्तकषाय एक जीवके प्रति
अन्तर नहीं है क्योंकि उपशान्तकषायसे नीचेके
गुणस्थान नौवें आदिमें वेद पाया जाता है अर्थात्
नीचे गिरनेपर अवेदरूपसे उपशान्तकषाय गुणस्थान-
को प्राप्त करना सम्भव नहीं है । ]
§. १२०
५३. ४ अज्ञानत्रययुक्तैकजीवेऽपि मिथ्यात्वस्यान्तरं
नास्ति गुणान्तरेऽज्ञानत्रयव्यभिचारात् । सासादनेऽस्ती
ति चेन्न, तस्य सम्यक्त्वग्रहणपूर्वकत्वात् सम्यग्दृष्टेश्च
मिथ्याज्ञानविरोधात् । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानि-
ष्वसंयतसम्यग्दृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण पूर्वकोटी
देशविरतादिगुणस्थानेनान्तरमवसानकाले शेषे पुनर-
संयतत्वं प्रतिपद्यत इति देशोना । संयतासंयतैकजीवं
प्रत्युत्कर्षेण षट्षष्ट्सागरोपमाणि, असंयतप्रमत्ता-
दिगुणस्थानेनान्तरं पूर्वकोटिचतुष्टयाष्टवर्षैः सातिरे-
काणि मनुजेषूत्पन्नो हि अष्टवर्षाणन्तरं संयतासंयतत्वं
प्रतिपद्यत इति । मनःपर्ययज्ञानिष्वेकजीवं प्रति
जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । अधिकमपि कस्मान्नेति
चेत् अधोगुणस्थानेषु वर्तमानानां मनःपर्ययासंभवात् ।
तेषु वर्तमानानां चाधिकमन्तरं संभवतीति । चतुर्णा-
मुपशमकानामुत्कर्षेण पूर्वकोटी । उपशमश्रेणितो हि
पतितास्ते मनःपर्ययज्ञानमपरित्यजन्तः प्रमत्ताप्रमत्त-
गुणस्थाने वर्तन्ते यावत्पूर्वकोटिकालशेषः पुनस्तदा-
रोहणं कुर्वन्तीति देशोना ।
[ कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान और विभङ्गज्ञानसे युक्त एक
जीवके प्रति मिथ्यात्वका अन्तर नहीं है क्योंकि
अन्य गुणस्थानमें कुमति, आदि तीनों ज्ञान
नहीं होते ।
शंका—सासादन में जानेपर अन्तर पड़ सकता है ?
उत्तर—नहीं, क्योंकि सासादन गुणस्थान सम्यक्त्व
ग्रहण करनेके बाद होता है और सम्यग्दृष्टिके मिथ्या-
ज्ञान नहीं होता । मतिज्ञानी, श्रुतज्ञानी अवधि-
ज्ञानियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टी एक जीवके प्रति उत्कर्षसे
देशविरत आदि गुणस्थानके द्वारा पूर्वकोटि अन्तर
काल है । अर्थात् एक असंयतसम्यग्दृष्टी जीव संयमा-
संयमको प्राप्त हुआ । कुछ कम पूर्वकोटिकाल तक
संयमासंयमका पालन करके अन्तमें असंयमी हो गया
तो कुछ कम पूर्वकोटी अन्तर होता १ है । संयतासंयत
एक जीवके प्रति उत्कर्षसे छियासठ सागर अन्तरकाल
है । असंयत प्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानके द्वारा
अन्तर होने पर चार पूर्वकोटी और आठ वर्ष अधिक
छियासठ सागर होता है क्योंकि मनुष्योंमें उत्पन्न
हुआ जीव आठ वर्षके अनन्तर संयतासंयतपनेको
प्राप्त करता है । मनःपर्ययज्ञानियोंमें एक जीवके प्रति
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है ।
शंका—अधिक अन्तर क्यों नहीं होता ?
उत्तर—नीचे के गुणस्थानोंमें आनेपर ही अधिक अन्तर
संभव है किन्तु उनमें मनःपर्ययज्ञान संभव नहीं है ।
मनःपर्ययज्ञानी चारों उपशमकोंका उत्कृष्ट अन्तर
पूर्वकोटी है क्योंकि उपशमश्रेणीसे गिरकर मनःपर्यय-
ज्ञानको अपनाये हुए प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानमें
१. धवलामें लिखा है—पूर्वकोटिकाल प्रमाण संयमासंयमको पालकर मरा और देव हुआ । पु० ५, पृ० ११३ ।
२. धवलामें लिखा है—एक जीव मनुष्योंमें उत्पन्न हुआ । आठ वर्षका होकर एक साथ संयमासंयम और
वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त हुआ । पुनः अन्तर्मुहूर्तमें संयमको प्राप्त करके अन्तरको प्राप्त हुआ । संयमके
साथ पूर्वकोटि काल बिताकर तेतीस सागरकी आयुके साथ देव हुआ । वहाँसे च्युत होकर पूर्वकोटि आयुके
साथ मनुष्य हुआ । पुनः मरकर तेतीस सागरकी आयु लेकर देव हुआ । वहाँसे च्युत हो पुनः पूर्वकोटि
आयु लेकर मनुष्य हुआ वहाँ दीर्घकाल तक रहकर संयमासंयमको प्राप्त
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परिशिष्ट २ ३९९
(कुछ कम) पूर्वकोटिकाल तक रहता है पुनः उपशम- जाती है (और लेश्याके कालसे गुणस्थानका काल
श्रेणिपर आरोहण करता है इस तरह देशोन पूर्वकोटि- बहुत है।]
अन्तर होता है ।]
§. १२५
§. १२१
५६. ३ शुक्ललेश्येष्वप्रमत्तादीनामुपशमश्रेण्यारोह-
५४. १ सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतेषु द्वयोरुप- णाभिमुख्यारोहणसद्भावाभ्यां लेश्यान्तरपरावर्ताभावा-
शमकयोरेकजीवं प्रत्युत्कर्षेण पूर्वकोटी अष्टवर्षानन्तरं देकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । उपशान्त-
तपो गृहीत्वोपशमश्रेणिमारुह्य पतितः प्रमत्ताप्रमत्तयोः कषायस्य पतितस्य प्रमत्ते लेश्यान्तरं संस्पृश्य श्रेण्या-
पूर्वकोटिकालशेषं यावद् वर्तित्वा पुनस्तदारोहणं करो- रोहणादेकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् ।
तीति देशोना । सूक्ष्मसांपरायसंयमे उपशमकस्यक- [शुक्ललेश्यामें अप्रमत्तसंयत आदिका एक जीवके
जीवं प्रति नास्त्यन्तरं गुणान्तरे तत्संयमाभावात् । प्रति जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि
असंयमेषु मिथ्यादृष्ट्येकजीवं प्रत्युत्कर्षेण नरके सप्तम- शुक्ललेश्यावाला कोई एक अप्रमत्तसंयत उपशम श्रेणि-
पृथिव्यामुत्पद्यतेऽन्तर्मुहूर्ते गते सम्यक्त्वं प्रतिपद्यते पर चढ़कर अन्तरको प्राप्त हुआ और सर्वजघन्यकाल-
मुहूर्त्तशेषे त्यजतीति देशोनानि । में लौटकर अप्रमत्त संयत हुआ। इसी प्रकार उत्कृष्ट
अन्तर भी होता है, इस कालमें लेश्या परिवर्तन नहीं
[ सामायिक छेदोपस्थापना संयमियोंमें दो उपशमकों-
होता। शुक्ललेश्यावाले उपशान्त कषायका एक जीव-
का एक जीवके प्रति उत्कर्षसे कुछ कम पूर्वकोटि के प्रति अन्तर नहीं है क्योंकि उपशान्तकषायसे गिर-
अन्तर है क्योंकि पूर्वकोटिकी आयुवाला मनुष्य आठ- कर छठे गुणस्थानमें लेश्या परिवर्तन होकर ही श्रेणि-
वर्षके पश्चात् संयमको ग्रहण करके उपशम श्रेणिपर पर आरोहण होता है । ]
आरोहण करके गिरा और प्रमत्त-अप्रमत्त गुणस्थानोंमें
पूर्वकोटिकालके शेष होने तक रहकर पुनः उपशम- §. १२९
श्रेणिपर आरोहण करता है इस तरह देशोन होता
५७. ७ औपशामिकासंयतसम्यग्दृष्टीनां सान्तरत्वा-
है । सूक्ष्मसाम्पराय संयममें एक जीवके प्रति उप- न्नानाजीवापेक्षया सप्तरात्रिंदिनानि । औपशमिक-
शमकका अन्तर नहीं है क्योंकि सूक्ष्मसाम्पराय संयम
सम्यक्त्वं हि यदि कश्चिदपि न गृह्णाति तदा सप्तरात्रिं-
दसवें गुणस्थानमें ही होता है। असंयमियोंमें मिथ्या- दिनान्येव । संयतासंयतस्य चतुर्दश, प्रमत्ताप्रमत्तयोः
दृष्टि एक जीवके प्रति उत्कर्षसे कुछ कम तेतीससागर
पञ्चदश एकजीवं प्रति जघन्येन जघन्य उत्कर्षेण
अन्तर है क्योंकि एक मिथ्यादृष्टि जीव सातवीं पृथिवी- चोत्कृष्टोऽन्तर्मुहूर्तः । तदुक्तम्-
में उत्पन्न होता है । अन्तर्मुहूर्त बीतनेपर सम्यक्त्वको
ग्रहण करता है। अन्तर्मुहूर्त प्रमाण आयु शेष रहनेपर सम्मत्ते सत्तदिणा विरदाविरदेसु चोद्दसा होंति ।
सम्यक्त्वको छोड़कर मिथ्यात्वमें आ जाता है इस विरदेसु य पण्णरसा विरहणकालो य बोधव्वो ॥
प्रकार देशोन तेतीससागर अन्तर होता है । ] [प्रा० पं० सं० २०५]
उपशान्तकषायैकजीवं प्रति नास्त्यन्तरं वेदकपूर्वकोप-
§. १२४ शमिकेन हि श्रेण्यारोहणभाग् भवति, तस्याः पतितो
५५. ११ तेजःपद्मलेश्यसंयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयता- न तेनैव श्रेण्यारोहणं करोति, सम्यक्त्वान्तरं मिथ्यात्वं
नामेकजीवापेक्षयापि नास्त्यन्तरमन्तर्मुहूर्ते परावर्तमान- वा गत्वा पश्चात्तदादाय करोतीति । अतो नास्ति
लेश्यत्वात् । तस्यान्तरम् । सासादनसम्यग्मिथ्यात्व-मिथ्यात्व-
युक्तैकजीवं प्रति नास्त्यन्तरं गुणे गुणान्तरविरोघतः
[ तेजोलेश्या और पद्मलेश्यावाले संयतासंयत, प्रमत्त- सासादनादिगुणे स्थितस्य मिथ्यात्वादिनान्तरासंभवात् ।
संयत, और अप्रमत्तसंयतोंका एक जीवकी अपेक्षासे [ औपशामिक असंयतसम्यग्दृष्टियोंके सान्तर होनेसे
भी अन्तर नहीं है क्योंकि अन्तर्मुहूर्तमें लेश्या बदल नाना जीवोंकी अपेक्षा सात रातदिन अन्तरकाल है।
४०० सर्वार्थसिद्धि
यदि कोई भी जीव औपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण तीन समय है; और मिथ्यात्व गुणस्थानका काल
नहीं करता तो सात रातदिन तक ही ग्रहण नहीं उससे बहुत है अतः वहाँ उसका अन्य गुणस्थानसे
करता । औपशमिक सम्यक्त्वके साथ संयतासंयतोंका अन्तर असम्भव है । ]
अन्तरकाल चौदह दिन है और प्रमत्तसंयत तथा
अप्रमत्तसंयतका पन्द्रह दिन है । एक जीवके प्रति §. १३३
जघन्य अन्तरकाल जघन्य अन्तर्मुहूर्त है, उत्कृष्ट ५९. ९ भावः - मिथ्यादृष्टिरित्यौदयिको भावो
अन्तरकाल उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त है । कहा है - मिथ्यात्वप्रकृतेरुदये प्रादुर्भावात् । सासादनसम्य-
औपशमिक सम्यक्त्वका अन्तरकाल सात दिन, ग्दृष्टिरिति पारिणामिको भावः । नन्वनन्तानुबन्धि-
औपशमिक सम्यक्त्वके साथ विरताविरतका अन्तर- क्रोधाद्युदयेऽस्य प्रादुर्भावादौदयिकत्वं कस्मान्नोच्यत
काल चौदह दिन और विरतोंका अन्तरकाल पन्द्रह इति चेत्, अविवक्षितत्वात् । दर्शनमोहापेक्षया हि
दिन जानना चाहिए । मिथ्यादृष्ट्यादिगुणस्थानचतुष्टये भावो निरूपयितुमभि-
उपशान्तकषायका एक जीवके प्रति अन्तर नहीं है प्रेतोऽतः सासादने सम्यक्त्व-मिथ्यात्व-तदुभयलक्षणस्य
क्योंकि वेदकसम्यक्त्वपूर्वक होनेवाले औपशमिक- त्रिविधस्यापि दर्शनमोहस्योदय-क्षय-क्षयोपशमाभा-
सम्यक्त्वसे जीव उपशमश्रेणिपर आरोहण करता है । वात् पारिणामिकत्वम् । सम्यग्मिथ्यादृष्टिरिति क्षायो-
उससे गिरनेपर पुनः उसी सम्यक्त्वसे श्रेणिपर पशमिको भावः । ननु सर्वघातिनामुदयाभावे
आरोहण नहीं करता किन्तु अन्य सम्यक्त्वको ग्रहण देशघातीनां चोदये य उत्पद्यते भावः स क्षायोप-
करके या मिथ्यात्वमें जाकर पुनः सम्यक्त्वको ग्रहण शमिकः । न च सम्यक्मिथ्यात्वप्रकृतेर्देशघातित्वं
करके तब श्रेणिपर आरोहण करता है । अतः उसका संभवति, सर्वघातित्वेनागमे तस्याः प्रतिपादित-
अन्तर नहीं है । सासादनसम्यक्त्व, सम्यक्मिथ्यात्व त्वादिति । तदयुक्तम्, उपचारतस्तस्या देशघातित्व-
और मिथ्यात्वसे युक्त एक जीवके प्रति अन्तर नहीं है स्यापि संभवात् । उपचारनिमित्तं च देशतः सम्यक्त्व-
क्योंकि एक गुणमें दूसरे गुणका विरोध होनेसे सासादन स्य घातित्वं, न हि मिथ्यात्वप्रकृतिवत् सम्यग्मिथ्यात्व-
आदि गुण स्थानमें स्थित जीवका मिथ्यात्व आदि प्रकृत्या सर्वस्य सम्यग्मिथ्यात्वस्वरूपस्य (सम्यक्त्व-
गुणस्थानसे अन्तर असम्भव है । ] स्वरूपस्य ) घातः संभवति सर्वज्ञोपदिष्टतत्त्वेषु रुच्यं-
§. १३० शस्यापि संभवात् । तदुपदिष्टतत्त्वेषु रुच्यरुच्यात्मको
५८. ९ असंज्ञिनां नानैकजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम्, हि परिणामः सम्यग्मिथ्यात्वमिति ।
एक मिथ्यात्वगुणस्थानवर्तित्वेन तेषां सासादिनान्तरा- [ अब भावका कथन करते हैं - मिथ्यादृष्टि यह
संभवात् । औदयिक भाव है क्योंकि मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयमें
[ असंज्ञियोंका नाना और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर होता है । सासादनसम्यग्दृष्टि यह पारिणामिक
नहीं है क्योंकि असंज्ञियोंके केवल एक मिथ्यात्वगुण- भाव है ।
स्थान ही होता है अतः उनका सासादन आदि शङ्का - अनन्तानुबन्धि क्रोध आदि कषायके उदयमें
गुणस्थानोंसे अन्तर सम्भव नहीं है । ] सासादन गुणस्थान प्रकट होता है तो इसे औदयिक
§. १३२ क्यों नहीं कहते ?
५९. ३ अनाहारकेषु मिथ्यादृष्ट्यैकजीवं प्रति उत्तर- उसकी यहाँ विवक्षा नहीं है । दर्शनमोहकी
नास्त्यन्तरमनाहारकत्वस्यैक-द्वि-त्रिसमयत्वात् गुण- अपेक्षासे ही मिथ्यादृष्टि आदि चार गुणस्थानोंमें भाव
स्थानस्य च ततो बहुकालत्वात् तत्र तस्य गुणान्तरे- बतलाना इष्ट है अतः सासादनमें सम्यक्त्व प्रकृति,
णान्तरासंभवादिति । मिथ्यात्व और सम्यमिथ्यात्वरूप दर्शनमोहकी तीनों
[ अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टि एक जीवके प्रति अन्तर प्रकृतियोंका उदय, क्षय और क्षयोपशमका अभाव
नहीं है क्योंकि अनाहारकपनेका काल एक, दो या होनेसे पारिणामिक भाव कहा है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि
यह क्षायोपशमिक भाव है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
परिशिष्ट २ ४०१
शङ्का—सर्वघातिप्रकृतियोंके उदयके अभावमें और
देशघाती प्रकृतियोंके उदयमें जो भाव उत्पन्न होता है
उसे क्षायोपशमिक कहते हैं । किन्तु सम्यग्मिथ्यात्व-
प्रकृतिको देशघातिपना तो संभव नहीं है क्योंकि
आगममें उसे सर्वघाती कहा है ?
उत्तर—ऐसा कहना युक्त नहीं है, उपचारसे सम्यक्-
मिथ्यात्व प्रकृतिको देशघातिपना भी सम्भव है।
उपचारका निमित्त है एक देशसे सम्यक्त्वका घाती
होना । मिथ्यात्वप्रकृतिकी तरह सम्यग्मिथ्यात्व
प्रकृतिके द्वारा समस्त सम्यक्त्वरूप और मिथ्यात्व-
रूपका घात सम्भव नहीं है । सर्वज्ञके द्वारा उपदिष्ट
तत्त्वोंमें रुचिका भी अंश रहता है । सर्वज्ञके द्वारा
उपदिष्ट तत्त्वोंमें रुचि और अरुचिरूप परिणामको
सम्यग्मिथ्यात्व कहते हैं ।]
§. १४८
६२. २ अल्पबहुत्वम् । उपशमकानामितरगुणस्थान-
वत्तिभ्योऽल्पत्वात् प्रथमतोऽभिधानम् । तत्रापि त्रय
उपशमकाः सकषायत्वादुपशान्तकषायेभ्यो भेदेन
निर्दिष्टाः । प्रवेशेन तुल्यसंख्याः सर्वेऽप्येते षोडशादि-
संख्याः । त्रयः क्षपकाः संख्येयगुणा उपशमकेभ्यो
द्विगुणा इत्येवमादिसंख्या संख्याविचारे विचारितमिह
द्रष्टव्यम् । सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयता विशेषाधिकास्त-
त्संयमयुक्तानामुपशमकानामिव क्षपकाणामपि ग्रहणात् ।
संयतासंयतानां नास्त्यल्पबहुत्वमेकगुणस्थानवर्तित्वात्
संयतानामिव गुणस्थानभेदासम्भवादिति ।
[ उपशमक उपशमश्रेणिपर आरोहण करनेवाले
अन्य गुणस्थानवर्ती जीवोंसे अल्प होते हैं इसलिए
उनका प्रथम कथन किया है । उनमें भी तीन उप-
शमकोंको कषायसहित होनेके कारण उपशान्तकषायोंसे
भिन्न निर्दिष्ट किया है । प्रवेशकी अपेक्षा इन सभीकी
संख्या सोलह आदि समान है । तीन क्षपक संख्यात-
गुने हैं, उपशमकोंसे दूने हैं इत्यादि संख्याका संख्या-
विचारमें विचार किया है उसे ही यहाँ देख लेना
चाहिए । सूक्ष्मसाम्पराय संयमवाले विशेष हैं क्योंकि
सूक्ष्मसाम्पराय संयमसे युक्त उपशमकोंकी तरह
क्षपकोंको भी ग्रहण किया है । संयतासंयतोंमें अल्प-
बहुत्व नहीं है क्योंकि उनके एक ही गुणस्थान होता
है, संयतोंकी तरह उनमें गुणस्थानभेद नहीं है । ]
५१
§. १६४
मति······॥१२॥
६६.४ अवाग्घानात् अधस्ताद् बहुतरविषयग्रहणात् ।
अवच्छिन्नविषयत्वाद्वा । रूपिलक्षणविविक्तविषय-
त्वाद्वा ।
६६.७ स्वपरमनोभिर्व्यपदिश्यते यथा परमनस्थि-
तमर्थं मनसा परिविद्यत (परिच्छिद्यत) इति ।
६६.८ यदर्थं केवन्ते सेवां कुर्वन्ति । कस्येति चेत्,
केवलस्यैव संपन्नतत्प्राप्तिपरिज्ञाततदुपायस्यार्हदादेर्वा ।
६७.१ सुगमत्वात् सुखप्राप्यत्वात् ।
६७.२ मतिश्रुतपद्धतिः-मतिश्रुतानुपरिपाटी । तस्या
वचनेन श्रुतायाः सकृत्स्वरूपसंवेदनमात्रत्वं परिचि-
तत्त्वम् । अशेषविशेषतः पुनश्चेतसि तत्स्वरूपपरि-
भावनमनुभूतत्वम् ।
बहुबहुविध····॥१६॥
§ १९५
७९.५ अपरेषां निस्स्रुत इति पाठः । तत्र द्विः
सकारनिर्देशस्यायमर्थो मयूरस्य कुररस्य वेति स्वतः
परोपदेशमन्तरेणैव कश्चित् प्रतिपद्यते । येषां तु
निस्रुत इति पाठस्तेषां 'अपरः' प्रतिपत्तौ स्वरूपमेव
शब्दमेवाश्रित्य विशेषरूपतयानावधार्य प्रतिपद्यत इति
व्याख्या ।
§ २००
व्यञ्जनस्य ······॥१८॥
८१.१ व्यञ्जनं शब्दादिजातं शब्दादिसंघातः ।
८१. ३ अन्तरेणैवकारं—एवकारं विना ।
§ २०२
न चक्षु········॥१९॥
८२.२ अविदिकं—यन्मुखदिशम् ।
४०२ सर्वार्थसिद्धिः
§ २०६ § २१३
श्रुतं मतिपूर्वं·······॥२०॥ भवप्रत्यय·······॥२२॥
८३.४ उपादाय — आश्रित्य । ८७. ८ प्रकर्षाप्रकर्षवृत्तिरागमंतः । तथाहि, देवानां
८३.५ पर्यवदाते क्षेमे । तावत्—
§ २०७ सक्कीसाणा पढमं दोव्वं² च सणक्कुमारमाहिंदा ।
८४.२ द्रव्यादिसामान्यार्पणात् — द्रव्यक्षेत्रकाल- बम्हालांतव तइयं सुक्कसहस्सारया चउत्थीओ ॥
भावार्पणात् । पंचम माणदपाणद छट्ठीओ आरणाच्चुदाय पस्संति ।
८४.३ उत्प्रेक्षितं — कृतम् । तेषामेव — द्रव्यादी- णवगेवेज्जा सत्तंम³ माणुत्तरा सव्वलोयं तु ॥
नामेव । तथा नारकाणां—
§ २०८ रयणप्पहाए जोयणमेगं आहिबिसओ सुणेयव्वो ।
८४.८ सम्यक्त्वस्य — समीचीनत्वस्य । ज्ञाने तद- पुढवीदो पुढवीदो गाउदयद्धं⁴ परिहरंज्ञा ॥
पेक्षत्वात्-सम्यक्त्वसापेक्षत्वात् । तदुक्तम्— [ अवधिज्ञानकी हीनाधिकता आगमसे जाननी चाहिए ।
¹कारणकज्जविहाणं दीवपयासाम जुगवजम्मे वि । जो इस प्रकार है—देवोंमें सौधर्म ऐशान स्वर्गके देव
जुगवुप्पण्णं पि तहा हेऊ णाणस्स सम्मत्तं ॥ पहली पृथिवीपर्यन्त, सानत्कुमार माहेन्द्र स्वर्गके देव
§ २०९ दूसरी पृथिवीपर्यन्त, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर लान्तव कापिष्ठ
८४.१० आहितो धृतः स्थापितो वा । कृतसंगीतिः स्वर्गके देव तीसरी पृथिवीपर्यन्त, शुक्र-महाशुक्र, शतार,
—कृतसंकेतः । घट इत्युक्ते घकार-टकार-विसर्ज- सहस्रार स्वर्गके देव चतुर्थ पृथिवीपर्यन्त, आनत, प्राणत
नीयात्मकं शब्दं मतिज्ञानेन प्रतिपद्यते । ततो घट- स्वर्गके देव पाँचवीं पृथिवीपर्यन्त, आरण-अच्युत स्वर्गके
शब्दात् घटार्थं श्रुतज्ञानेन, तस्मादपि घटार्था- देव छठी पृथिवीपर्यन्त, नवग्रैवेयकोंके देव सातवीं
ज्जलधारणादिकार्यम् । तथा चक्षुरादिविषयाद्भू- पृथिवीपर्यन्त और अनुदिश अनुत्तरवासी सर्वलोकको
मादेः । तत्रापि धूमदर्शनं मतिज्ञानं तस्मादग्निविषयं जानते हैं । तथा नारकोंमें रत्नप्रभा पृथिवीमें एक
ज्ञानं श्रुतज्ञानम् । तस्मादपि दाहादिकार्यज्ञानं योजन क्षेत्र अवधिज्ञानका विषय है । आगे प्रत्येक
श्रुतमिति । पृथिवीमें आधा-आधा कोस कम करते जाना चाहिए ।
§ २११ § २१५
८५.१० आरातीयाऽवान्तरः । क्षयोपशमनिमित्तः·······॥२३॥
§ २१२ ८८. २ देशघातिस्पर्धकानां किं पुनः स्पर्धकम्
८६. ३ व्याक्रियेतां — व्युत्पाद्यताम् । इति चेत्, कर्मपुद्गल शक्तीनां क्रमवृद्धिः क्रमहानिश्च
स्पर्धकम् । शान्तः — उपशान्तः । उन्मुग्धैत्यादि,
उन्मुग्धस्य विवेकपराङ्मुखस्य, प्रश्ने सति आदिेशि-
पुरुषवचनं यथा तत्रैवातिपतति नाभिहितेऽर्थे तेनाग्रे
प्रवर्त्यते । लिङ्गवत्—लाञ्छनवत् ।
रूपि·······॥२७॥
१. कारणकार्यविधानं समकालं जायमानयोरपि हि । दीपप्रकाशयोरिव सम्यक्त्वज्ञानयोः सुघटम् ॥
—पुरुषार्थ०, ३४ । २. विदियं ०००।—मूलाचार १।४८ । ३. ०००सत्तम अणुदिस अणुत्तराय लोगं तु ॥
—मूलाचार १।४९ । ४. ०००गाऊ अद्धद्ध परिहाणी ॥—मूलाचार, १।५२ ।
परिशिष्ट २ ४०३
न च पुद्गलद्रव्यसंबन्धजीवानां रूपित्वाभिधाने §. २७५
प्रवचनविरोधः । तत्रापि तेषां तथाभिधानात् । ११३. १८ नोकर्मपरिवर्तनम् - औदारिकवैक्रियिका-
उक्तञ्च- हारकलक्षणानां त्रयाणां शरीराणामाहारशरीरेन्द्रियान-
'बंधं पडि एयत्तं लक्खणदो हवदि तस्स णाणत्तं । प्राणभाषामनोलक्षणषट्पर्याप्तीनां च योग्या ये
तम्हा अमुत्तिभावो णेयंतो हवदि जीवाणं ॥' पुद्गला एकजीवेन एकस्मिन् समये गृहीताः
स्निग्धादिस्वरूपैस्तीव्रमन्दं मध्यभावेन चेति । तेषां
नैगम............॥३३॥ फलदानसामर्थ्यस्वरूपनिरूपणम् । तेषामल्पकालत्वात् ।
वस्तुनि - जीवाद्यौ । अनेकात्मन्यनेकरूपे। अविरोधेन- द्वितीयादिसमयेषु यथावस्थितास्तीव्रादिभावेन स्थिता
प्रतीत्यनतिक्रमेण हेत्वर्पणात् - द्रव्यपर्यायार्पणात् । निर्जीर्णाः फलमनुभूय त्यक्ताः । पश्चाच्चे कदाचनापि
साध्यविशेषस्य-नित्यत्वादेः । याथात्म्यप्रापणप्रवण- शरीरत्रयादिरूपतया न गृहीतास्तानेवागृहीतान् गृहीत्वा
प्रयोगो यथावस्थितस्वरूपेण प्रदर्शनसमर्थव्यापारो नयो त्यजत्यवान्तरे स पूर्वान् मिश्रकांश्च गृहीतानपरिगणय्य
वस्त्वेक-देशग्राही ज्ञातुरभिप्रायः । उक्तं च - यावत्तेषामेवानन्तवारत्वरत्वं पश्चादेकवारं मध्ये
मिश्रकान् स्वगृहीतानादाय त्यजति । पुनरप्यगृहीताने
'अर्थस्यानेकरूपस्य धीः प्रमाणं तदंशधीः । वानन्तवारानादाय त्यजति। पुनरप्येकवारं मिश्रकानेव
स्यान्नयोऽर्थान्तरापेक्षी दुर्नयस्तन्निराकृतेः ॥' तावद्यावन्मिश्रकाणामप्यनन्तवारत्वं पश्चाद् गृहीताने-
अनभिनिवृत्तार्थः - अनिष्पन्नार्थः । वकवारमादाय त्यजति । अनेनोक्तविधिनाऽरगर्त-
भ्रमणन्यायेन मिश्रकाननन्तवारान् गृहीत्वा गृहीता-
उत्तरोत्तरसूक्ष्मविषयत्वात् । नैगमात् खलु संग्रहोऽ- नेवादाय त्यजति । यावत्तेषामप्यनन्तवारत्वं पश्चात्
ल्पविषयः, सन्मात्रग्राहित्वात्, नैगमस्तु भावाभाव- एव ये प्रथमतौ गृहीतास्तेनैव स्निग्धादितीव्रादि-
विषयत्वाद् बहुविषयः । यथैव हि भावे संकल्पस्तथा- प्रकारेण तस्यैव नोकर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्
भावेऽपि । एवमुत्तरत्रापि योज्यम् । अर्थमात्रः- समुदितं नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते । तदेवाद्धित-
प्रयोजनलेशः । मर्धपुद्गलावर्त इति । कर्मद्रव्यपरिवर्तनं संसारयोग्यं
बहुस्थितिकं कर्म बध्नाति । तस्यापक्वपाचनलक्षणो-
इति प्रथमोऽध्यायः समाप्तः । दीरणापेक्षया समयाधिकामवालिकामतीत्येत्युक्तम् ।
पूर्ववत् प्रक्रिया द्रष्टव्या ।
§. २७६
औपशमिक क्षायिकौ........॥१॥
११७. ११ क्षेत्रपरिवर्तनम् । अनन्तमानावच्छिन्नवन-
स्पतिकायः साधारणशरीराहारोच्छ्वासनिःश्वास-
§. २५३ मरणोत्पादा निगोताः । जघन्यावगाहप्रतिपादनार्थं
सूक्ष्म-अपर्याप्तकविशेषणम् । तेषामपि परस्परतः
१०५. ११ औपशमिकमादौ लभ्यते । तदुक्तम्--
तरतमभावसद्भावात् सर्वजघन्यप्रदेशशरीरत्वविशे-
'पढमप्पढमं णियदं पढमं विदियं च सव्वकालेसु । षणम् । स इत्थंभूतो जीवो मेरोरधोभागे गोस्त-
खाइयसम्मत्तं पुण जत्थ जिणा केवलीकाले ॥' नाकाराष्टलोकमध्यप्रदेशान् स्वशरीरमध्यप्रदेशान्
द्रव्यतः जीवतः । संसारिक्षायिकसम्यग्दृष्टिजीवानां कृत्वाऽपन्नः । सर्वजघन्यप्रदेशशरीरस्याष्टप्रदेशव्यापित्वं
तत औपशमिकसम्यग्दृष्टिजीवेभ्योऽसंख्येयगुणत्वात् । विरुद्धमिति चेत् न, तच्छरीरस्यासंख्याताकाश-
प्रदेशावगाहित्वात् । क्षुद्रभवग्रहणं जीवित्वा मृतःस
संसारिणः.........॥१०॥
१. सर्वार्थसिद्धिमैं उद्धृत । २. अकलंकदेवकृत अष्टशतीमें उद्धृत, अष्टस०, पृ० २९० ।
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एवं पुनस्तेनैव सर्वजघन्यशरीराल्लोकमध्यप्रदेशा-
वगाहेन द्विरुत्पन्नो निरन्तरम् । अन्यत्रोत्पद्य वा तत्रै-
वाधिकामवगाहेन वा उत्पद्यमानं न गणयित्वा तथा
त्रिस्तथा चतुरिति एवं यावतो विस्तारोत्सेधावगाहतः
समचतुरस्रोत्सेधाङ्गुलस्यासंख्येयभागप्रमिताकाश -
प्रदेशास्तावतो वारान् तत्रैवोत्पद्य पुनर्व्याप्तिक्षेत्रापरि-
त्यागेनाभिनवैकेकप्रदेशादिकावगाहेनैव सर्वलोक-
व्याप्तिः । नन्वेवं लोकपरिमाणं तत् शरीरं स्यादिति
चेत् न, पूर्वपूर्वव्याप्ताकाशप्रदेशपरित्यागेन तद् व्याप्त्य-
भ्युपगमात् ।
§ २७७
११८. ३ कालपरिवर्तनम् । प्रथमद्वितीयाद्युत्सर्पि-
णीनां क्रमेण प्रथमद्वितीयादिसमयेषूत्पद्यते यावद्दश-
सागरोपमकोटीकोटिपरिमाणोत्सर्पिणी परिसमाप्ता