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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 503

परिशिष्ट २ ३९१
एक समय कम मुहूर्त पर्यन्त अन्तर्मुहूर्त होता है । इस
प्रकार अन्तर्मुहूर्तके असंख्यात भेद होते हैं । कहा भी
है—‘सभी मनुष्योंके तीन हजार सात सौ तिहत्तर
उच्छ्वासोंका एक मुहूर्त होता है ।’
उत्कृष्ट काल कुछ कम अर्ध पुद्गल परिवर्त है । उसका
कथन आगे ‘संसारिणो मुक्ताश्च’ इस सूत्रके अन्तर्गत
करेंगे । सासादन गुणस्थानका काल एक जीवकी अपेक्षा
उत्कर्षसे छह आवली है । असंख्यात समयोंको एक
आवली होती है । कहा है—असंख्यात समयकी एक
आवली होती है । संख्यात आवलीका एक उच्छ्वास
होता है । सात उच्छ्वासका एक स्तोक होता है ।
सात स्तोकका एक लव होता है । साढ़े अड़तीस
लवकी एक नाली होती है । दो नालीका एक मुहूर्त
होता है । तीस मुहूर्तका दिन होता है और पन्द्रह
दिनका एक पक्ष होता है ।’
सम्यग्मिथ्यादृष्टि गुणस्थानका काल एक जीवकी
अपेक्षा जघन्यसे जघन्य अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्टसे
उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त है । अन्तर्मुहूर्त आगे गुणित होता
जाता है ऐसा आगे जानना चाहिए । असंयतसम्यग्-
दृष्टि गुणस्थानका काल एक जीवकी अपेक्षा उत्कर्षसे
कुछ अधिक तेतीस सागर है । उसका खुलासा इस
प्रकार है—कोई जीव एक पूर्वकोटिकी आयु लेकर
उत्पन्न हुआ । एक अन्तर्मुहूर्त अधिक आठ वर्षके
पश्चात् सम्यक्त्वको ग्रहण करके तथा तपस्या करके
सर्वार्थसिद्धिमें उत्पन्न हुआ वहाँसे च्युत होकर पुनः
एकपूर्वकोटिकी आयु लेकर उत्पन्न हुआ । आठ वर्षके
पश्चात् संयमको स्वीकार किया । इस तरह सातिरेक
तेतीस सागर काल होता है । प्रमत्त और अप्रमत्त
गुणस्थानका काल एक जीवकी अपेक्षा जघन्यसे एक
समय है वह इस प्रकार है—सभी जीव विशेष
परिणामोंके वश सर्वप्रथम अप्रमत्त गुणस्थानको प्राप्त
करते हैं । उसके पश्चात् उसके प्रतिपक्षी प्रमत्त
गुणस्थानको प्राप्त करते हैं । अतः अन्य गुणस्थानमें
स्थित जीव अपनी आयुमें एक समय शेष रहनेपर
अप्रमत्त गुणस्थानको प्राप्त करके मर जाता है । इस
प्रकार एक जीवकी अपेक्षा अप्रमत्तका काल जघन्यसे
एक समय होता है । तथा अप्रमत्त गुणस्थानमें स्थित
जीव अपनी आयुके कालमें एक समय शेष रहनेपर
प्रमत्तगुणस्थानको प्राप्त करके मरता है । इस प्रकार
एक जीवकी अपेक्षा प्रमत्त गुणस्थानका काल भी
एक समय है । चारों उपशमकोंका यथा सम्भव
चौवन संख्यापर्यन्त एक साथ भी प्रवेश और मरण
सम्भव होनेसे नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य काल एक समय है ।
शंका—इस तरह मिथ्यादृष्टिका भी काल एक समय
क्यों नहीं होता ?
उत्तर—ऐसा कहना ठीक नहीं है । मिथ्यात्व गुण-
स्थानको प्राप्त होनेवाले जीवका मरण अन्तर्मुहूर्तके
मध्य असम्भव है । कहा है—‘अनन्तानुबन्धीका
विसंयोजन करनेवाले वेदक सम्यग्दृष्टिके मिथ्यात्व
गुणस्थानको प्राप्त होनेपर एक आवलीकाल तक
अनन्तानुबन्धीका उदय नहीं होता तथा एक अन्त-
र्मुहूर्त काल तक मरण नहीं होता । सम्यग्मिथ्यादृष्टि
का भी काल एक समय नहीं है क्योंकि मरणकाल
आनेपर वह गुणस्थान छूट जाता है । असंयत और
संयतासंयत गुणस्थानको प्राप्त होनेवाला भी अन्त-
र्मुहूर्त तक नहीं मरता अतः असंयत और संयतासंयत
का भी काल एक समय नहीं होता ।
चारों क्षपकों और अयोगकेवलियोंके मुक्तिगामी होनेके
कारण अवान्तरमें मरण सम्भव न होनेसे नाना
जीवों और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट
काल अन्तर्मुहूर्त है । सयोगकेवलीका काल एक जीव-
की अपेक्षा जघन्यसे अन्तर्मुहूर्त है क्योंकि उस
गुणस्थानको प्राप्त होनेके अनन्तर अन्तर्मुहूर्तमें
अयोगकेवली गुणस्थानको प्राप्त हो जाता है ।
उत्कृष्टकाल कुछ कम पूर्वकोटी है क्योंकि जन्मसे
आठ वर्षके पश्चात् तप स्वीकार करके केवलज्ञानको
उत्पन्न करता है इसलिए पूर्वकोटिमें कुछ वर्ष कम
हो जाते हैं ।
§. ९२
४०. १५ तिर्यगसंयतसम्यग्दृष्टचेकजीवं प्रत्युत्कर्षेण
दर्शनमोहक्षपकवेदकापेक्षया त्रीणि पल्योपमानि ।
पश्चाद् गत्यतिक्रमः ।
[ तिर्यंचगतिमें असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानका काल
एक जीवकी अपेक्षा उत्कर्षसे दर्शनमोहका क्षय करने-
वाले वेदक सम्यग्दृष्टिकी अपेक्षा तीन पल्योपम है ।
उसके पश्चात् गति बदल जाती है ]
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri