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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 558 में से

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पृष्ठ 504

३९२ | सर्वार्थसिद्धि

§. ९३
४१. २ मिथ्यादृष्टिममुष्यैकजीवं प्रत्युत्कर्षेण त्रीणि
पल्योपमानि पूर्वकोटिपृथक्त्वैः सप्तचत्वारिंशत् पूर्व-
कोटिभिरभ्यधिकानि । तथाहि—नपुंसक-स्त्री-पुंवेदे-
नाष्टावष्टौ वारान् पूर्वकोट्यायुषोत्पद्यावान्तरेऽन्त-
र्मुहूर्तमध्येऽपर्याप्तकमनुष्यक्षुद्रभवेनाष्टौ वारानुत्पद्यते ।
पुनरपि नपुंसकस्त्रीवेदेनाष्टावष्टौ पुंवेदेन तु सप्त ।
ततो भोगभूमौ त्रिपल्योपमायुष्कः, भोगभूमिजानां निय-
मेन देवेषूत्पादात् । पश्चाद् गत्यतिक्रमः । असंयत-
सम्यग्दृष्टिममुष्यैकजीवं प्रत्युत्कर्षेण त्रीणि पल्योप-
मानि । कर्मभूमिजो हि मनुष्यः क्षायिकसम्यक्त्वयुक्तो
दर्शनमोहक्षपकवेदकयुक्तो वा भोगभूमिजमनुष्येषू-
त्पद्यते । इति मनुष्यगत्यपरित्यागात् सातिरेकाणि
पश्चाद्गत्यतिक्रमः ।
[ मनुष्य गतिमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानका काल एक
जीवकी अपेक्षा उत्कर्षसे पूर्वकोटि पृथक्त्व तथा सैंता-
लीस पूर्वकोटिसे अधिक तीन पल्य है। उसका खुलासा
इस प्रकार है— नपुंसकवेद, स्त्रीवेद और पुरुषवेदके
साथ आठ-आठ बार पूर्वकोटिकी आयुसे उत्पन्न होकर
अवान्तरमें अन्तर्मुहूर्तके अन्दर लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यके
क्षुद्रभवके साथ आठ बार उत्पन्न होता है। उसके
पश्चात् पुनः नपुंसक वेद और स्त्रीवेदके साथ आठ-
आठ बार उत्पन्न होता है किन्तु पुरुषवेदके साथ सात-
सात बार उत्पन्न होता है । उसके बाद भोगभूमिमें
तीन पल्यकी आयुसे उत्पन्न होता है। भोगभूमिके
जीव मरकर देवोंमें ही उत्पन्न होते हैं अतः उसके
बाद गति बदल जाती है। असंयत सम्यग्दृष्टि गुण-
स्थानका काल एक जीवकी अपेक्षा उत्कर्षसे तीन
पल्य है। क्योंकि कर्मभूमिका जन्मा (बद्धमनुष्यायु )
मनुष्य क्षायिक सम्यक्त्वसे युक्त हो या दर्शनमोहके
क्षपक वेदकसम्यक्त्वसे युक्त हो, मरकर भोगभूमिज
मनुष्योंमें उत्पन्न होता है। अतः मनुष्यगतिके न
छूटनेसे साधिक तीन पल्य काल होता है। उसके
बाद गति बदल जाती है ]
§. ९५
४१.११ एकेन्द्रियैकजीवं प्रति जघन्येन क्षुद्रभवग्रह-
णम् । तत्कीदृशमिति चेदुच्यते । उक्तलक्षणमुहूर्तमध्ये
तावदेकेन्द्रियो भूत्वा कश्चिज्जीवः षट्षष्टिसहस्रद्वा-
त्रिंशदधिकशतपरिमाणानि जन्ममरणान्यनुभवति ।
६६१३२ । तथा स एव जीवस्तस्यैव मुहूर्तस्य मध्ये
द्वित्रिचतुःपञ्चेन्द्रियो भूत्वा यथासंख्यमशीतिषष्ठिचत्वा-
रिंशच्चतुर्विंशतिजन्ममरणानि स्वकृतकर्मवैचित्र्यादनु-
भवति ॥८०।६०।४०।२४॥ सर्वेऽप्येते समुदिताः क्षुद्र-
भवा एतावन्तो भवन्ति ॥६६३३६॥ उक्तं च—
“१तिण्णिसया छत्तीसा छावट्ठीसहस्सजम्ममरण।णि ।
एवदिया खुदमवा हवंति अंतोमुहुत्तस्स ॥
२विगलिंदिए असीदिं सट्ठी चालीसमेव जाणांहि ।
पंचेंदिय चउवीसं खुद्दभवांतोमुहुत्तस्स ॥”
यदा चैवंमुहूर्तस्य मध्ये एतावन्ति जन्ममरणानि भवन्ति
तदैकस्मिन्नुच्छ्वासेऽष्टादश जन्ममरणानि लभ्यन्ते ।
तत्रैकस्य क्षुद्रभवसंज्ञा । उत्कर्षेणानन्तकालोऽसंख्यात-
पुद्गलपरिवर्तनलक्षणो, निरन्तरमेकेन्द्रियत्वेन मृत्वा-
मृत्वा पुनर्भवानात् । ततो विकलेन्द्रियः पञ्चेन्द्रियो वा
भवति ।
[ एकेन्द्रिय एक जीवके प्रति जघन्यकाल क्षुद्रभवग्रहण
है। वह क्षुद्रभव किस प्रकार है यह कहते है — उक्त
लक्षणवाले मुहूर्तमें एकेन्द्रिय होकर कोई जीव छियासठ
हजार एक सौ बत्तीस जन्म मरणका अनुभव करता
है। तथा वही जीव उसी मुहूर्तके भीतर दो इन्द्रिय,
ते-इन्द्रिय, चौइन्द्रिय और पञ्चेन्द्रिय होकर यथाक्रमसे
अस्सी, साठ, चालीस और चौबीस जन्म मरणोंको
अपने द्वारा किये गये कर्मबन्धकी विचित्रतासे अनुभव
करता है। ये सभी क्षुद्रभव मिलकर छियासठ हजार
तीन सौ छत्तीस होते हैं। कहा है—छियासठ हजार
तीन सौ छत्तीस जन्ममरण होते हैं। एक अन्तर्मुहूर्तमें
उतने ही क्षुद्रभव होते हैं। इसी अन्तर्मुहूर्तमें विकले-
न्द्रियके अस्सी, साठ और चालीस तथा पञ्चेन्द्रियके
चौबीस क्षुद्रभव जानना चाहिए ।'
जब एक मुहूर्तके भीतर ( अन्तर्मुहूर्तमें ) इतने जन्म-
मरण होते हैं तब एक उच्छ्वासमें १८ जन्ममरण
प्राप्त होते हैं। उनमेंसे एककी संज्ञा क्षुद्रभव है।
उत्कर्षसे अनन्तकाल है जो असंख्यात पुद्गल परावर्त


१. गो० जी० गा० १२२, १२३ । २. कल्लाणा-लोयणा ६ ।