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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 558 में से

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पृष्ठ 499

परिशिष्ट २ ३८७
अतः पहली पृथिवीके चारों गुणस्थानवर्ती नार-
कियोंका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ भाग है ।
दूसरी पृथिवी मध्यलोकसे नीचे एक राजूके परिमाण-
पर स्थित है तथा उससे नीचेकी तीसरी आदि
पृथिवियाँ भी एक-एक राजूका अन्तराल देकर स्थित
हैं अतः उन पृथिवियोंके मिथ्यादृष्टि और सासादन-
सम्यग्दृष्टि नारकियोंने क्रमसे एक, दो, तीन, चार
और पाँच राजुका स्पर्शन किया है। सम्यग्मिथ्यादृष्टि
मारणान्तिकसमुद्घात, उत्पाद और आयुबन्धके समय
नियमसे तीसरे गुणस्थानको छोड़ देते हैं क्योंकि तीसरे
गुणस्थानमें ये तीनों कार्य नहीं होते । अतः स्वस्थान
विहारकी अपेक्षा उनका स्पर्शन लोकका असंख्यातवाँ
भाग है । असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियोंका स्पर्शन
मारणान्तिककी अपेक्षा भी लोकका असंख्यातवाँ भाग
है क्योंकि वे नियमसे मनुष्योंमें ही उत्पन्न होते हैं
और मनुष्योंका क्षेत्र अल्प है ।
सातवीं पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि नारकियोंने मारणान्तिक
और उत्पादकी अपेक्षा छह राजुका स्पर्श किया है ।
शेष तीन गुणस्थानवर्ती नारकियोंका स्पर्शन लोकका
असंख्यातवाँ भाग है ।
शंका—स्वस्थानविहारकी अपेक्षा और मारणान्तिक-
की अपेक्षा इन तीन गुणस्थानवर्ती नारकियोंका स्पर्शन
क्यों नहीं कहा ?
उत्तर—सप्तम पृथिवीके नारकी मारणान्तिक और
उत्पादसे पूर्व नियमसे उन गुणस्थानोंको छोड़
देते हैं ।
सासादन सम्यग्दृष्टि मरकर नरकमें नहीं जाता ऐसा
नियम है । अतः सासादन सम्यग्दृष्टि तिर्यंचका
स्पर्शन लोकाग्रमें बादर पृथिवी आदिमें मारणान्तिक-
की अपेक्षा भी सात राजु है । मिथ्यादृष्टि मनुष्योंका
स्पर्शन मारणान्तिककी अपेक्षा सर्वलोक है । अथवा
पृथिवीकायिक आदिके मनुष्योंमें उत्पन्न होनेकी
अपेक्षा सर्वलोक है; क्योंकि जो मरकर जहाँ उत्पन्न
होता है वह उत्पाद अवस्थामें वही कहा जाता है
अर्थात् पृथिवीकायिक आदिसे मरकर मनुष्योंमें उत्पन्न
होनेवाले जीव उत्पाद अवस्थामें मनुष्य ही कहलाते
हैं । सर्वलोक स्पर्शन आगे सर्वत्र इसी प्रकार जानना
चाहिए । तीसरे नरक गये मिथ्यादृष्टि और सासा-
दन सम्यग्दृष्टि देवोंका लोकके अग्रभागमें बादर-
पृथिवीकायिक आदिमें मारणान्तिक समुद्घातकी
अपेक्षा नौ राजु स्पर्शन है। नौ राजु स्पर्शन आगे
भी इसी प्रकार जानना चाहिए । और सम्यग्मिथ्या-
दृष्टि तथा असंयत सम्यग्दृष्टि एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न
नहीं होते । उनका विहारवत्स्वस्थानकी अपेक्षा आठ
राजू स्पर्शन है । ]
§. ७७
३५.१. पञ्चेन्द्रियमिथ्यादृष्टिभिः अष्टौ देवान् प्रति
सर्वलोको मनुष्यान् प्रति । सयोगकेवलिनां दण्डाद्यव-
स्थायां वाङ्मनसवर्गणामवलम्ब्यात्मप्रदेशपरिस्पन्दा-
भावाल्लोकस्यासंख्येयभागः ।
[ पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टियोंका आठ राजु स्पर्शन देवों-
की अपेक्षा जानना अर्थात् पंचेन्द्रिय मिथ्यादृष्टिदेव
तीसरे नरक तक विहार करते हैं अतः मेरुके मूलसे
ऊपर छह राजु और नीचे दो राजु, इस प्रकार आठ
राजु क्षेत्रके भीतर सर्वत्र उक्त प्रकारसे पंचेन्द्रिय पाये
जाते हैं । सर्वलोक स्पर्शन मनुष्योंकी अपेक्षा है
सयोगकेवलियोंके दण्ड आदि अवस्थामें वचनवर्गणा
मनोवर्गणाका अवलम्बन लेकर आत्मप्रदेशोंका परि-
स्पन्दन नहीं होता अतः लोकका असंख्यातवां भाग
स्पर्शन है ]
§. ८५
३७. ३ सप्तनरकेषु नारका यथासंख्यमेतल्लेशिया
भवन्ति । उक्तं च—
'कोऊ काऊ तह काऊणीला णीला य णीलकिण्हाए ।
किण्हा य परमकिण्हा लेस्सा रयणादिपुढवीसु १॥'
—[मूलाचार ११३४]
तत्र षष्ठपृथिव्यां कृष्णलेश्यैः सासादनसम्यग्दृष्टिभि-
र्मारणान्तिकाद्यपेक्षया पञ्च । पञ्चमपृथिव्यां कृष्णलेश्याऽ-
विवक्षया नीललेश्यैश्चतस्रो रज्जवः स्पृष्टाः । तृतीय-
पृथिव्यां नीललेश्याविवक्षया कापोतलेश्यैर्द्वे रज्जू
स्पृष्टे । सप्तमपृथिव्यां यद्यपि कृष्णलेश्यास्ति तथापि
मारणान्तिकाद्यवस्थायां सासादनस्य तत्र ने सा संभ-
वति तदा नियमेन मिथ्यात्वग्रहणादिति नोदाहृता ।
१. गो०जी०गा० । मूलाचार गा० ११३४ ।