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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 558 में से

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पृष्ठ 497

परिशिष्ट २ ३८५

§. ६०

२९.७ क्षेत्रं, सयोगकेवलिनां दण्डकवाटावस्थापेक्षया लोकस्यासंख्येयभागः क्षेत्रम् प्रतरापेक्षया असंख्येय-भागाः वातवलयत्रयादवगिव तदात्मप्रदेशैनिरन्तरं लोकव्याप्तेः । लोकपूरणापेक्षया सर्वलोकः ।

[ सयोगकेवलियोंका क्षेत्र दण्ड और कपाट रूप समुद्घातकी अपेक्षा लोकका असंख्यातवां भाग है । प्रतर रूप समुद्घातकी अपेक्षा असंख्यात बहुभाग क्षेत्र है क्योंकि तीनों वातवलयसे पहले तक ही उनकी आत्माके प्रदेशोंसे बिना किसी अन्तरालके लोक व्याप्त होता है । और लोक पूरण समुद्घातकी अपेक्षा सयोगकेवलियोंका क्षेत्र सर्वलोक है । ]

§. ६२

२९.१३ एकेन्द्रियाणां क्षेत्रं सर्वलोकः, तेषां सर्वत्र संभवात् । विकलेन्द्रियाणां लोकस्यासंख्येयभागः । देवनारकमनुष्यवत्तेषां नियतोत्पादस्थानत्वात् । ते हि अर्धतृतीयद्वीपे लवणोदकालोद-समुद्रद्वये स्वयम्भूरमणे द्वीपे समुद्रे चोत्पद्यन्ते, न पुनरसंख्यातद्वीपसमुद्रेषु नरकेस्वर्गादिषु भोगभूमिषु म्लेच्छादिषु च । पञ्चे-न्द्रियाणां मनुष्यवत् । इत्ययुक्तम्, मनुष्याणां प्राग्मा