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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 501

परिशिष्ट २ ३८९
इनके सिवाय अन्यत्र लेश्याका नियम नहीं है ।
§. ८७
३८. ६ क्षायिकसम्यक्त्वयुक्तसंयतासंयतानामितर -
सम्यक्त्वयुक्तसंयतासंयतानामिव षडपि रज्जवः कुतो
नेति नाशङ्कनीयं तेषां नियतक्षेत्रत्वात् । कर्मभूमिजो
हि मनुष्यः सप्तप्रकृतिकक्षयप्रारम्भको भवति । तद्दर्शन-
लाभात्प्रागेव तिर्यक्षु बद्धायुष्कस्तु संयतासंयतत्वं न
प्रतिपद्यते । औपशमिकसम्यक्त्वयुक्तसंयतासंयतानां
कुतो लोकस्यासंख्येयभाग इति चेत् मनुजेष्वेव तत्संभ-
वात् । वेदकपूर्वकोपशमिकसम्यक्त्वयुक्तो हि श्रेण्या-
रोहणं विधाय मारणान्तिकं करोति । मिथ्यात्वपूर्व-
कोपशमिकयुक्तानां मारणान्तिकासंभवात् ।
[ शंका—क्षायिकसम्यक्त्वसे युक्त संयतासंयतोंका
अन्य सम्यक्त्वसे युक्त संयतासंयतोंकी तरह छह राजु
स्पर्शन क्यों नहीं है ?
उत्तर—ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए क्योंकि
उनका क्षेत्र नियत है। कर्मभूमिमें जन्मा मनुष्य
सात प्रकृतियोंके क्षयका प्रारम्भ करता है। क्षायिक-
सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिसे पहले ही जो तिर्यंचगतिकी
आयुका बन्ध कर लेता है वह तो संयतासंयतपनेको
प्राप्त नहीं कर सकता ।
शंका—औपशमिक सम्यक्त्वसे युक्त संयतासंयतोंका
स्पर्शन कैसे लोकका असंख्यातवां भाग है ?
उत्तर—औपशमिक सम्यक्त्वसे युक्त संयतासंयत
मनुष्योंमें ही होते हैं क्योंकि वेदकसम्यक्त्वपूर्वक औप-
शमिक सम्यक्त्वसे युक्त मनुष्य श्रेणीपर आरोहण
करके मारणान्तिक समुद्घात करता है। और
मिथ्यात्वपूर्वक औपशमिक सम्यग्दृष्टि मारणान्तिक
समुद्घात नहीं करते । ]
§. ८९
३९. १ सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येयभागः कुतः ।
इति चेत्, आहारकावस्थायां समचतुरस्ररज्ज्वादि-
व्याप्त्यभावात् दण्डद्वयावस्थायां कपाटद्वयावस्थायां च
सयोगकेवली औदारिकौदारिकमिश्रशरीरयोग्यपुद्-
गलादानेनाहारकः ।
उक्तं च—
दंडदुगे ओराले कवाटजुगले य पयरसंवरणे ।
मिस्सोरालं मणियं १सेसतिण्हे जाण कम्मइयं ॥
दण्डकवाटयोश्च पिण्डतोऽल्पक्षेत्रतया समचतुरस्र-
रज्ज्वादिव्याप्त्यभावात् सिद्धो लोकस्यासंख्येय-
भागः । अनाहारकेषु सासादनस्य षष्ठपृथ्वोतो निसृत्य
तिर्यग्लोके प्रादुर्भावात् पञ्च, अच्युतादागत्य तत्रैवो-
त्पादात् षडित्येकादश । ननु पूर्वं द्वादशोक्ता इदानीं
त्वेकादशेति पूर्वापरविरोधः । तदयुक्तम्, मारणान्तिका-
पेक्षया पूर्वं तथाभिधानात् । न च मारणान्तिकाव-
स्थायामनाहारकत्वं किन्तूत्पादावस्थायाम् । सासा-
दनश्च मारणान्तिकमेकेन्द्रियेषु करोति नोत्पादं तदा
सासादनत्वत्यागात् ।
[ शंका—सयोगकेवलियोंका स्पर्शन लोकके असंख्या-
तवें भाग कैसे है ?
उत्तर—आहारक अवस्थामें समचतुरस्र रज्जु आदि-
की व्याप्तिका अभाव होनेसे सयोगकेवलीके आहारक
अवस्थामें स्पर्शन लोकका असंख्यातवां भाग है। तथा
विस्तार और संकोच रूप दोनों दण्डसमुद्घातोंमें
तथा दोनों कपाटसमुद्घातोंमें औदारिक और औदा-
रिकमिश्र शरीरके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करनेसे
सयोगकेवली आहारक होते हैं। कहा भी है—
'विस्तार और संकोचरूप दोनों दण्डसमुद्घातोंमें
औदारिककाययोग होता है। विस्तार और संकोच-
रूप दोनों कपाट समुद्घातोंमें तथा संकोचरूप प्रतर
समुद्घातमें औदारिकमिश्रकाययोग होता है। शेष
तीनमें कार्मणकाययोग होता है।'
दण्ड और कपाटमें पिण्डरूपसे अल्पक्षेत्र होनेके कारण
समचतुरस्ररज्जु आदिकी व्याप्तिका अभाव होनेसे
लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्शन सिद्ध होता है।
अनाहारकोंमें सासादन सम्यग्दृष्टिके छठी पृथिवीसे
निकलकर तिर्यग्लोकमें उत्पन्न होनेसे पांच राजु होते
हैं और अच्युतस्वर्गसे आकर तिर्यग्लोकमें उत्पन्न
होनेसे छह राजु होते हैं इस तरह ग्यारह राजु
होते हैं।
१. 'कम्मइओसेस तत्थ अणहारी' ।। —प्रा० पं० सं० १११९९ ।