सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
- ९।१२ § ८४३ ] नवमोऽध्यायः ३२९
§ ८४२. आह, यदि सूक्ष्मसांपरायादिषु व्यस्ताः परिषहाः अथ समस्ताः¹ ताः क्वेति—
²बादरसांपराये सर्वे ॥१२॥
§ ८४३. सांपरायः कषायः । बादरः सांपरायो यस्य स बादरसांपराय इति । नेदं
किया है । अब यहाँ यह देखना है कि जिन भगवान्के क्षुधादि ग्यारह परीषह नहीं होते यह कैसे
समझा जाय । वे इस कालमें पाये तो जाते नहीं, इसलिए प्रत्यक्ष देखकर तो यह जाना नहीं जा
सकता । एक मात्र आगमको पुष्ट करनेवाली युक्तियां ही शेष रहती हैं जिनके अवलम्बनसे यह
बात समझी जा सकती है, अतः यहाँ उन्हींका निर्देश करते हैं—
१. केवली जिनके शरीरमें निगोद और त्रस जीव नहीं रहते । उनका क्षीणमोह गुणस्थान
में अभाव होकर वे परम औदारिक शरीरके धारी होते हैं । अतः भूख, प्यास और रोगादिकका
कारण नहीं रहनेसे उन्हें भूख, प्यास और रोगादिककी बाधा नहीं होती । देवोंके शरीरमें इन
जीवोंके न होनेसे जो विशेषता होती है उससे अनन्तगुणी विशेषता इनके शरीरमें उत्पन्न हो
जाती है । २. श्रेणि आरोहण करने पर प्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्तगुणा बढ़ता
जाता है और अप्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभाग प्रति समय अनन्तगुणा हीन होता जाता है । इसलिए
तेरहवें गुणस्थानमें होनेवाला असाता प्रकृतिका उदय इतना बलवान् नहीं होता जिससे उसे
क्षुधादि कार्योंका सूचक माना जा सके । ३. असाताकी उदीरणा छठे गुणस्थान तक ही होती है,
आगे नहीं होती, इसलिए उदीरणाके अभावमें वेदनीय कर्म क्षुधादिरूप कार्यका वेदन करानेमें
असमर्थ है । जब कि केवली जिनके शरीरको पानी और भोजनकी ही आवश्यकता नहीं रहती
तब इनके न मिलनेसे जो क्षुधा और तृषा होती है वह उनके हो ही कैसे सकती है । वेदनीय
कर्मका कार्य कुछ शरीरमें पानी तत्त्व और भोजन तत्त्वका अभाव करना नहीं है । वास्तवमें
इनका अभाव अन्य कारणोंसे होता है । हाँ, इनका अभाव होनेपर इनकी पूर्तिके लिए जो वेदना
होती है वह वेदनीय कर्मका काम है । सो जब कि केवली जिनके शरीरको उनकी आवश्यकता
ही नहीं रहती, तब वेदनीयके निमित्तसे तज्जनित वेदना कैसे हो सकती है ? अर्थात् नहीं हो
सकती । ४. केवली जिनके साताका आस्रव सदाकाल होनेसे उसकी निर्जरा भी सदाकाल
होती रहती है, इसलिए जिस कालमें असाताका उदय होता है उस कालमें केवल उसका
ही उदय नहीं होता किन्तु अनन्तगुणी शक्तिवाले साताके साथ वह उदयमें आता है । माना
कि उस समय उसका स्वमुखेन उदय है पर वह प्रति समय बँधनेवाले साता कर्मपरमाणुओंकी
निर्जराके साथ ही होता है, इसलिए असाताका उदय वहाँ क्षुधादिरूप वेदनाका कारण नहीं
हो सकता । ५. सुख दुखका वेदन वेदनीय कर्मका कार्य होने पर भी वह मोहनीयकी सहायतासे
ही होता है। यतः केवली जिनके मोहनीयका अभाव होता है अतः वहाँ क्षुधादिरूप वेदनाओंका
सद्भाव मानना युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता । इन प्रमाणोंसे निश्चित होता है कि केवली जिनके
क्षुधादि ग्यारह परीषह नहीं होते ।
§ ८४२. कहते हैं—यदि सूक्ष्मसाम्पराय आदि में अलग-अलग परीषह होते हैं तो मिलकर
वे कहाँ होते हैं, यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बादरसाम्परायमें सब परीषह सम्भव हैं ॥१२॥
§ ८४३. साम्पराय कषायको कहते हैं । जिसके साम्पराय बादर होता है वह बादर-
१. समस्ताः क्वेति मु० । २. 'निसेज्जा जायणाकोसो अरई इत्थिनग्गया । सक्कारो दंसणं मोहा
बावीसा चेव रागिसु ।।' -पञ्चसं० द्वा० ४, गा० २३ ।
४२ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
३३० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।१३ § ८४४ –
गुणस्थानविशेषग्रहणम् । किं तर्हि । अर्थनिर्देशः । तेन प्रमत्तादीनां संयतानां ग्रहणम् । तेषु हि
अक्षीणकषायदोषत्वात्सर्वे संभवन्ति । कस्मिन् पुनश्चारित्रे सर्वेषां संभवः । सामायिकच्छेदो-
पस्थापनपरिहारविशुद्धिसंयमेषु प्रत्येकं सर्वेषां संभवः ।
§ ८४४. आह, गृहीतमेतत्परीषहाणां स्थानविशेषावधारणम्, इदं तु न विद्मः कस्याः प्रकृतेः
५ कः कार्य इत्यत्रोच्यते—
ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने ॥१३॥
§ ८४५. इदमयुक्तं वर्तते । किमत्रायुक्तम् । ज्ञानावरणे सत्यज्ञानपरीषह उपपद्यते, प्रज्ञापरी-
षहः पुनस्तदपाये भवतीति कथं ज्ञानावरणे स्यात् । इत्यत्रोच्यते—क्षायोपशमिकी प्रज्ञा अन्यस्मिन्
ज्ञानावरणे सति मदं जनयति न सकलावरणक्षये इति ज्ञानावरणे सतीत्युपपद्यते ।
१० साम्पराय कहलाता है। यह गुणस्थान विशेषका ग्रहण नहीं है। तो क्या है ? सार्थंकनिर्देश है।
इससे प्रमत्त आदिक संयतोंका ग्रहण होता है। इनमें कषाय और दोषोंके क्षीण न होनेसे सब
परीषह सम्भव हैं। शंका—तो किस चारित्रमें सब परीषह सम्भव हैं ? समाधान—सामायिक,
छेदोपस्थापना और परिहारविशुद्धिसंयम इनमेंसे प्रत्येकमें सब परीषह सम्भव हैं।
विशेषार्थ—बादरसाम्पराय अनिवृत्तिकरण नामक नौवें गुणस्थानका दूसरा नाम है। नौवे
१५ गुणस्थान तक स्थूल कषायका सद्भाव होता है, इसलिए अन्तदीपक न्यायसे इस गुणस्थानका नाम
भी बादरसम्पराय है। यहाँ 'बादरसाम्पराय' पदसे इस गुणस्थानका ग्रहण न हो इसीलिए टीकामें
इसका निषेध किया है, क्योंकि बादरसाम्परायमें तो बाईस परीषह सम्भव हैं, बादरसाम्पराय
नामक नौवें गुणस्थानमें नहीं। कारण कि इस गुणस्थानमें दर्शनमोहनीयका उदय नहीं होता।
दर्शनमोहनीयके तीन भेद हैं। उनमेंसे सम्यक्त्वमोहनीयका उदय सातवें गुणस्थान तक ही सम्भव
२० है, क्योंकि यहीं तक वेदक सम्यक्त्व होता है, इसलिए यहाँ पर बादरसाम्पराय अर्थात् स्थूल
कषायमें सब परीषह सम्भव हैं यही अर्थ लेना चाहिए।
§ ८४४. कहते हैं—इन परीषहोंके स्थानविशेषका अवधारण किया, किन्तु हम यह नहीं
जानते कि किस प्रकृतिका क्या कार्य है इसलिए यहाँपर यह कहते हैं—
ज्ञानावरणके सद्भावमें प्रज्ञा और अज्ञान परीषह होते हैं ॥१३॥
२५ § ८४५. शंका—यह अयुक्त है ? प्रतिशंका—यहाँ क्या अयुक्त है। शंका—माना कि
ज्ञानावरणके होनेपर अज्ञान परीषह उत्पन्न होता है परन्तु प्रज्ञा परीषह उसके अभावमें होता है
इसलिए वह ज्ञानावरणके सद्भावमें कैसे हो सकता है ? समाधान—यहाँ कहते हैं—क्षायोपशमिकी
प्रज्ञा अन्य ज्ञानावरणके होनेपर मदको उत्पन्न करती है, समस्त ज्ञानावरणके क्षय होनेपर नहीं,
इसलिए ज्ञानावरणके होनेपर प्रज्ञा परीषह होती है यह कथन बन जाता है ।
३० विशेषार्थ—विकल्पका अर्थ श्रुतज्ञान है, इसलिए जहाँ तक श्रुतज्ञान होता है वहाँ तक 'मैं
अधिक जानता हूँ, यह कुछ भी नहीं जानता' ऐसा विकल्प देखा जाता है। यद्यपि इस प्रकारका
विकल्प करनेवाले व्यक्तिको अधिक ज्ञानका लाभ ज्ञानावरण कर्मके प्रकृष्ट क्षयोपशमसे होता है
तथापि जबतक क्षायोपशमिक ज्ञान होता है तभी तक यह विकल्प होता है और क्षायोपशमिक
ज्ञान उदयसापेक्ष होता है इसलिए यहाँ पर इस प्रकारके विकल्पका मुख्य कारण ज्ञानावरण कर्मका
३५ उदय कहा है। बहुतसे जीवोंको मोहका उदय रहते हुए भी ऐसा भाव होता है कि 'मैं महाप्राज्ञ हूँ,
मेरी बराबरी करनेवाला अन्य कोई नहीं।' पर यहाँ मोहके उदयसे होनेवाले इस भावका ग्रहण
१. अक्षीणकषायत्वात्सर्व- आ०, दि०, मु०, ता०, वा० । २. प्रत्येकं सर्व-आ०, दि०, मु०, ता० ।
- ९।१५ § ८४८ ] नवमोऽध्यायः ३३१
§ ८४६. पुनरपरयोः परिषहयोः प्रकृतिविशेषनिर्देशार्थमाह—
दर्शनमोहान्तराययोर्दर्शनालाभौ ॥१४॥
§ ८४७. यथासंख्यमभिसंबन्धः । दर्शनमोहे अदर्शनपरिषहो, लाभान्तराये अलाभपरिषह
इति । आह, यद्याद्ये मोहनीयभेदे एकः परिषहः, अथ द्वितीयस्मिन् कति भवन्तीत्यत्रोच्यते—
चारित्रमोहे नाग्न्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशायाचनासत्कारपुरस्काराः ॥१५॥ ५
§ ८४८. पुंवेदोदयादिनिमित्तत्वान्नाग्न्यादिपरिषहाणां मोहोदयनिमित्तत्वं प्रतिपद्यामहे ।
नहीं किया है। यहाँ तो अपनी अज्ञानतावश जो अल्पज्ञानको महाज्ञान माननेका विकल्प होता है
उसीका ग्रहण किया है। इस प्रकार ज्ञानावरणके सद्भावमें प्रज्ञा और अज्ञान दो परीषह होते हैं
यह निश्चित होता है ।
§ ८४६. पुनः अन्य दो परीषहोंकी प्रकृति विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र १०
कहते हैं—
दर्शनमोह और अन्तरायके सद्भावमें क्रमसे अदर्शन और अलाभ परीषह होते हैं ॥१४॥
इस सूत्रमें 'यथासंख्य' पदका सम्बन्ध होता है। दर्शनमोहके सद्भावमें अदर्शन परीषह
होता है और लाभान्तरायके सद्भावमें अलाभ परीषह होता है।
विशेषार्थ—दर्शनमोहसे यहाँ सम्यक्त्वमोहनीय प्रकृति ली गयी है। इसका उदय रहते हुए १५
चल, मल और अगाढ़ दोष उत्पन्न होते हैं। सम्यक्त्वके रहते हुए भी आप्त, आगम और पदार्थोंके
विषयमें नाना विकल्प होना चल दोष है। जिस प्रकार जलके स्वस्थ होते हुए भी उसमें वायुके
निमित्तसे तरंगमाला उठा करती है उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि पुरुष यद्यपि अपने स्वरूपमें स्थित
रहता है तथापि सम्यक्त्व मोहनीयके उदयसे आप्त, आगम और पदार्थोंके विषयमें उसकी बुद्धि
चलायमान होती रहती है। यही चल दोष है। मलका अर्थ मैल है। शंकादि दोषोंके निमित्तसे २०
सम्यग्दर्शनका मलिन होना मल दोष है। यह भी सम्यक्त्व मोहनीयके उदयमें होता है। तथा
अगाढका अर्थ स्थिर न रहना है। सम्यग्दृष्टि जीव लौकिक प्रयोजनवश कदाचित् तत्त्वसे चलाय-
मान होने लगता है। उदाहरणार्थ—अन्य अन्यका कर्ता नहीं होता यह सिद्धान्त है और
सम्यग्दृष्टि इसे भले प्रकार जानता है पर रागवश वह इस सिद्धान्त पर स्थिर नहीं रह पाता।
वह पारमार्थिक कार्यको भी लौकिकप्रयोजनका प्रयोजक मान बैठता है। इस प्रकार सम्यक्त्व २५
मोहनीयके उदयसे ये तीन दोष होते हैं। ये तीनों एक हैं फिर भी भिन्न-भिन्न अभिप्रायकी दृष्टिसे
यहाँ इन्हें पृथक्-पृथक् रूपसे परिगणित किया है। प्रकृतमें इसी दोषको ध्यानमें रखकर अदर्शन
परीषहका निर्देश किया है। यह दर्शनमोहनीयके उदयसे होता है इसलिए इसे दर्शनमोहनीयका
कार्य कहा है। भोजनादि पदार्थोंका न प्राप्त होना अन्य बात है पर भोजनादि पदार्थोंके न मिलने
पर जिसके 'अलाभ' परिणाम होता है उसका वह परिणाम लाभान्तराय कर्मका कार्य होनेसे ३०
अलाभको लाभान्तराय कर्मका कार्य कहा है। परके लाभको स्वका लाभ मानना मिथ्यात्व
दर्शनमोहनीयका कार्य है इसलिए यहाँ इसकी विवक्षा नहीं है। यहाँ तो अलाभ परिणाम किसके
उदयमें होता है इतना ही विचार किया गया है। इस प्रकार अदर्शनभाव मोहनीय कर्मका और
अलाभभाव लाभान्तराय कर्मका कार्य है यह निश्चित होता है।
§ ८४७. कहते हैं—यदि आदिके मोहनीयके भेदके होनेपर एक परीषह होता है तो दूसरे ३५
भेदके होनेपर कितने परीषह होते हैं इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
चारित्रमोहके सद्भावमें नाग्न्य, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कारपुर-
स्कार परीषह होते हैं ॥१५॥
§ ८४८. शंका—नाग्न्यादि परीषह पुंवेदोदय आदिके निमित्तसे होते हैं इसलिए मोहोदयको
३३२ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।१६ § ८४९ –
निषद्यापरीषहस्य कथम् । तत्रापि प्राणिपीडापरिहारार्थत्वात् । मोहोदये सति प्राणिपीडापरिणामः
संजायत इति ।
§ ८४९. अवशिष्टपरीषहप्रकृतिविशेषप्रतिपादनार्थमाह—
वेदनीये शेषाः ॥१६॥
§ ८५०. उक्ता एकादश परीषहाः । तेभ्योऽन्ये शेषाः वेदनीये सति 'भवन्ति' इति वाक्यशेषः ।
के पुनस्ते । क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकचर्याशय्यावधरोगतृणस्पर्शमलपरीषहाः ।
§ ८५१. आह, व्याख्यातनिमित्तलक्षणविकल्पाः प्रत्यात्मनि प्रादुर्भवन्तः कति युगपदवतिष्ठन्त
इत्यत्रोच्यते—
एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नैकान्नविंशतेः ॥१७॥
उनका निमित्त कहते हैं पर निषद्यापरीपह मोहोदयके निमित्तसे कैसे होता है ? समाधान—उसमें
भी प्राणिपीडाके परिहारकी मुख्यता होनेसे वह मोहोदय निमित्तक माना गया है, क्योंकि मोहोदय-
के होनेपर प्राणिपीडारूप परिणाम होता है ।
विशेषार्थ—आगे चर्या और शय्याको वेदनीयनिमित्तक कहा है और यहाँ निषद्याको
मोहनीयनिमित्तक । ये तीनों परीषह एक श्रेणीके हैं । फिर क्या कारण है कि इनमें-से निषद्याको
मोहोदय निमित्तक कहा है । यदि चर्या और शय्या परीषह वेदनीयनिमित्तक होते हैं तो इसे
वेदनीयनिमित्तक क्यों नहीं माना जाता । यह एक प्रश्न है जिसका उत्तर टीकामें दिया है । वहाँ
बतलाया है कि प्राणिपीडारूप परिणाम मोहोदयसे होता है और निषद्यापरीषहजयमें इस प्रकारके
परिणामपर विजय पानेकी मुख्यता है । यही कारण है कि निषद्याको चारित्रमोहनिमित्तक माना
है । माना कि इस विवक्षासे चर्या और शय्या परीषहको भी मोहोदयनिमित्तक मान सकते थे पर
वहाँ कण्टकादिकके निमित्तसे होनेवाली वेदनाकी मुख्यता करके उक्त दोनों परीषह वेदनीयनिमित्तक
कहे हैं । तात्पर्य यह है कि चर्या, शय्या और निषद्या इनमें प्राणिपोड़ा और कण्टकादिनिमित्तक
वेदना ये दोनों कार्य सम्भव हैं। इसलिए इन दोनों कार्योंका परिज्ञान करानेके लिए निषद्याको
मोहनिमित्तक और शेष दोको वेदनीयनिमित्तक कहा है ।
§ ८४९. अब अवशिष्ट परीषहोंकी प्रकृति विशेषका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
बाकीके सब परीषह वेदनीयके सद्भावमें होते हैं ॥१६॥
§ ८५०. ग्यारह परीषह पहले कह आये हैं । उनसे अन्य शेष परीषह हैं । वे वेदनीयके
सद्भावमें होते हैं। यहां 'भवन्ति' यह वाक्यशेष है । शंका—वे कौन-कौन हैं ? समाधान—क्षुधा,
पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या. वध, रोग, तृणस्पर्श और मलपरीषह ।
विशेषार्थ—शरीरमें भोजनका कम होना, पानीका कम होना. कण्ठका सूखना, ऋतुमें
ठण्डी या गरमीका होना, डांस-मच्छरका काटना, गमन व शयन करते समय कण्टक आदिका
चुभना, किसीके द्वारा मारना, गाली-गलौज करना, शरीरमें रोगका होना, तिनका आदिका
चुभना और शरीरमें मलका जमा होना आदि अपने-अपने कारणोंसे होते हैं। इनका कारण
वेदनीय कर्मका उदय नहीं है पर इन कामोंके होने पर भूखकी वेदना होती है, प्यास लगती है
आदि वह वेदनीय कर्मका कार्य है । ऐसा यहाँ अभिप्राय समझना चाहिए ।
§ ८५१. कहते हैं, परीषहोंके निमित्त, लक्षण और भेद कहे । प्रत्येक आत्मामें उत्पन्न होते
हुए वे एक साथ कितने हो सकते हैं, इस बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
एक साथ एक आत्मामें एकसे लेकर उन्नीस तक परीषह विकल्पसे हो सकते हैं ॥१७॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
- ९।१८ ६ ८५४ ] नवमोऽध्यायः ३३३
§ ८५२. आङभिविध्यर्थः । तेन एकोनविंशतिरपि क्वचित् युगपत्संभवतीत्यवगम्यते ।
तत्कथमिति चेदुच्यते - शीतोष्णपरीषहयोरेकः शय्यानिषद्याचर्याणां $^१$चान्यतम एव भवति एक-
स्मिन्नात्मनि । कुतः । विरोधात् । तत्रयाणामपगमे युगपदेकात्मनीतरेषां संभवादेकोनविंशति-
विकल्पा$^२$ बोद्धव्याः । ननु प्रज्ञाज्ञानयोरपि विरोधाद्युगपदसंभवः । श्रुतज्ञानापेक्षया प्रज्ञापरीषहः
अवधिज्ञानाद्यभावापेक्षया अज्ञानपरीषह इति नास्ति विरोधः ।
§ ८५३. आह, उक्ता गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयाः संवरहेतवः पञ्च । संवरहेतुश्चा-
रित्रसंज्ञो वक्तव्य इति तद्भेदप्रदर्शनार्थमुच्यते—
सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययथाख्यातमिति
चारित्रम् ॥१८॥
§ ८५४. अत्र चोद्यते - दशविधे धर्मे संयम उक्तः स एव चारित्रमिति पुनर्ग्रहणमनर्थक- १०
मिति । नानर्थकम्; धर्मेऽन्तर्भूतमपि चारित्रमन्ते गृह्यते मोक्षप्राप्तेः साक्षात्कारणमिति ज्ञापनार्थम् ।
सामायिकमुक्तम् । क्व । 'दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिक-' इत्यत्र । तद् द्विविधं नियतकालम-
नियतकालं च । स्वाध्यायादि नियतकालम् । ईर्यापथाद्यनियतकालम्$^४$ । प्रमादकृतानर्थप्रबन्ध-
विलोपे सम्यक्प्रतिक्रिया छेदोपस्थापना विकल्पनिवृत्तिर्वा । परिहरणं परिहारः प्राणिवधान्निवृत्तिः ।
§ ८५२. यहाँ 'आङ्' अभिविधि अर्थ में आया है। इससे किसी एक आत्मामें एक साथ उन्नीस १५
भी सम्भव हैं यह ज्ञात होता है। शंका-यह कैसे ? समाधान-एक आत्मामें शीत और उष्ण
परीषहोंमें-से कोई एक तथा शय्या, निषद्या और चर्या इनमें-से कोई एक परीषह ही होते हैं, क्योंकि
शीत और उष्ण इन दोनोंके तथा शय्या, निषद्या और चर्या इन तीनोंके एक साथ होनेमें विरोध
आता है। इन तीनोंके निकाल देनेपर एक साथ एक आत्मामें इतर परीषह सम्भव होनेसे वे सब
मिलकर उन्नीस परीषह जानना चाहिए। शंका-प्रज्ञा और अज्ञान परीषहमें भी विरोध है, इस- २०
लिए इन दोनों का एक साथ होना असम्भव है ? समाधान - एक साथ एक आत्मामें श्रुतज्ञानकी
अपेक्षा प्रज्ञा परीषह और अवधिज्ञान आदिके अभावकी अपेक्षा अज्ञान परीषह रह सकते हैं इसलिए
कोई विरोध नहीं है।
§ ८५३. कहते हैं, गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा और परीषहजय ये पाँच संवरके हेतु कहे ।
अब चारित्रसंज्ञक संवरका हेतु कहना चाहिए इसलिए उसके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र २५
कहते हैं-
सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात यह पाँच
प्रकारका चारित्र है ॥१८॥
§ ८५४. शंका-दश प्रकारके धर्ममें संयमका कथन कर आये हैं और वह ही चारित्र है
इसलिए उसका फिरसे ग्रहण करना निरर्थक है ? समाधान-निरर्थक नहीं है, क्योंकि धर्ममें ३०
अन्तर्भाव होनेपर भी चारित्र मोक्ष-प्राप्तिका साक्षात् कारण है यह दिखलानेके लिए उसका अन्तमें
ग्रहण किया है। सामायिकका कथन पहले कर आये हैं। शंका-कहाँ पर ? समाधान- 'दिग्देशा-
नर्थदण्डविरतिसामायिक'- इस सूत्रका व्याख्यान करते समय । वह दो प्रकारका है—नियतकाल
और अनियतकाल । स्वाध्याय आदि नियतकाल सामायिक है और ईर्यापथ आदि अनियतकाल
सामायिक है। प्रमादकृत अनर्थप्रबन्धका अर्थात् हिंसादि अव्रतोंके अनुष्ठानका विलोप अर्थात् सर्वथा ३५
त्याग करनेपर जो भले प्रकार प्रतिक्रिया अर्थात् पुनः व्रतोंका ग्रहण होता है वह छेदोपस्थापना
१. -चर्याणामन्यतम मु० । २. कल्पो बोद्धव्यो । ननु आ०, दि० १, दि० २ । ३. - ज्ञानापेक्षया मु० ।
४. -कालञ्च । प्रमा-ता० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
तेन विशिष्टा शुद्धिर्यस्मिंस्तत्परिहारविशुद्धिचारित्रम् । अतिसूक्ष्मकषायत्वात्सूक्ष्मसांपरायचारित्रम् ।
मोहनीयस्य निरवशेषस्योपशामात्क्षयाच्च आत्मस्वभावावस्थापेक्षालक्षणं अथाख्यातचारित्रमित्या-
ख्यायते । पूर्वचारित्रानुष्ठायिभिराख्यातं न तत्प्राप्तं प्राङ्मोहक्षयोपशमाभ्यामित्यथाख्यातम् । अथ-
शब्दस्यानन्तर्यार्थवृत्तित्वान्निरवशेषमोहक्षयोपशमानन्तरमाविर्भवतीत्यर्थः२ । 'यथाख्यातम्' इति
५ वा; यथात्मस्वभावोऽवस्थितस्तथैवाख्यातत्वात् । 'इति'शब्दः परिसमाप्तौ द्रष्टव्यः । ततो यथा-
ख्यातचारित्रात्सकलकर्मक्षयपरिसमाप्तिर्भवतीति ज्ञायते । सामायिकादीनामानुपूर्व्यवचनमुत्तरोत्तर-
गुणप्रकर्ष३ख्यापनार्थं क्रियते ।
चारित्र है। अथवा विकल्पोंकी निवृत्तिका नाम छेदोपस्थापनाचारित्र है। प्राणिवधसे निवृत्तिको
परिहार करते हैं। इस युक्त शुद्धि जिस चारित्रमें होती है वह परिहारविशुद्धि चारित्र है। जिस
१० चारित्रमें कषाय अतिसूक्ष्म हो जाता है वह सूक्ष्मसाम्परायचारित्र है। समस्त मोहनीय कर्मके
उपशम या क्षयसे जैसा आत्माका स्वभाव है उस अवस्था रूप जो चारित्र होता है वह अथाख्यात-
चारित्र कहा जाता है। पूर्व चारित्रका अनुष्ठान करनेवालोंने जिसका कथन किया है पर मोहनीयके
क्षय या उपशम होनेके पहले जिसे प्राप्त नहीं किया इसलिए उसे अथाख्यात कहते हैं। 'अथ' शब्द
'अनन्तर' अर्थवर्ती होनेसे समस्त मोहनीय कर्मके क्षय या उपशमके अनन्तर वह आविर्भूत
१५ होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। अथवा इस चारित्रका एक नाम यथाख्यात भी है। जिस
प्रकार आत्माका स्वभाव अवस्थित है उसी प्रकार यह कहा गया है, इसलिए इसे यथाख्यात कहते
हैं। सूत्रमें आया हुआ 'इति' शब्द परिसमाप्ति अर्थमें जानना चाहिए। इसलिए इससे यथाख्यात
चारित्रसे समस्त कर्मोंके क्षयकी परिसमाप्ति होती है यह जाना जाता है। उत्तरोत्तर गुणोंके
प्रकर्षका ख्यापन करनेके लिए सामायिक, छेदोपस्थापना इत्यादि क्रमसे इनका नामनिर्देश
२० किया है।
विशेषार्थ—चारित्र यह एक प्रकारका होकर भी उसके पांच भेद विवक्षाविशेषसे किये गये
हैं। सामायिकमें सर्वसावद्यकी निवृत्तिरूप संकल्पकी मुख्यता है। छेदोपस्थापनामें चारित्रमें लगनेवाले
दोषोंके परिमार्जनकी मुख्यता है। परिहारविशुद्धि चारित्र ऐसे संयतके होता है जो तीस वर्षतक
गृहस्थ अवस्थामें सुखपूर्वक बिताकर संयत होनेपर तीर्थंकरके पादमूलकी परिचर्या करते हुए आठ
२५ वर्ष तक प्रत्याख्यानपूर्वका अध्ययन करता है। यह जन्तुओंकी रक्षा कैसे करनी चाहिए, वे किस
द्रव्यके निमित्तसे किस क्षेत्र और किस कालमें विशेषतः उत्पन्न होते हैं, जीवोंकी योनि और जन्म
कितने प्रकारके होते हैं इत्यादि बातोंको भले प्रकार जानता है। यह प्रमादरहित, महाबलशाली,
कर्मोंकी महानिर्जरा करनेवाला और अति दुष्कर चर्याका अनुष्ठान करनेवाला होता है। तथा यह
तीनों संध्याकालोंको छोड़कर दो कोस गमन करनेवाला होता है। इन सब कारणोंसे इस संयतके
३० ऐसी सामर्थ्य उत्पन्न होती है जिसके बलसे यह अन्य जीवोंको बाधा पहुँचाये बिना चर्या करनेमें
समर्थ होता है। सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात चारित्रका अर्थ स्पष्ट ही है। इस प्रकार विवक्षाभेद-
से एक चारित्र पाँच प्रकारका कहा गया है।
इनमें से सामायिक और छेदोपस्थापनाकी जघन्य विशुद्धिलब्धि सबसे अल्प होती है।
इससे परिहारविशुद्धि चारित्रकी जघन्य विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है। इससे इसीकी उत्कृष्ट
३५ विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है। इससे सामायिक और छेदोपस्थापनाकी उत्कृष्ट विशुद्धिलब्धि
अनन्तगुणी होती है। इससे सूक्ष्मसाम्पराय चारित्रकी जघन्य विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है।
इससे इसीकी उत्कृष्ट विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है। इससे यथाख्यात चारित्रकी विशुद्धिलब्धि
१. -नन्तरार्थवर्ति-मु०, ता० । २. -त्यर्थः । तथा-मु०, ता०, ना० । ३. -कर्षज्ञापनार्थम् मु० ।
– ९।१९ § ८५६ ] नवमोऽध्यायः ३३५
§ ८५५. आह, उक्तं चारित्रम् । तदनन्तरमुद्दिष्टं यत् 'तपसा निर्जरा च' इति तस्येदानीं
तपसो विधानं कर्तव्यमित्यत्रोच्यते । तद् द्विविधं बाह्यमाभ्यन्तरं च । तत्प्रत्येकं षड्विधम् । तत्र
बाह्यभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह ।
अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनकायक्लेशा
बाह्यं तपः ॥ १६ ॥ ५
§ ८५६. दृष्टफलानपेक्षं संयमप्रसिद्धिरागोच्छेदकर्मविनाशध्यानागमावाप्त्यर्थमनशनम् ।
संयमप्रजागेरदोषप्रशमसंतोषस्वाध्यायादिसुखसिद्धयर्थमवमौदर्यम् । भिक्षार्थिनो मुनेरेकागारा-
दिविषयः२ संकल्पः चिन्तावरोधो वृत्तिपरिसंख्यानमाशानिवृत्त्यर्थमवगन्तव्यम् । इन्द्रियदर्पनिग्रह-
निद्राविजयस्वाध्यायसुखसिद्धयर्था३ चर्थो घृतादिवृष्यरसपरित्यागश्चतुर्थं तपः । शून्यागारादिषु
विविक्तेषु जन्तुपीडाविरहितेषु संयतस्य शय्यासनमाबाधात्ययब्रह्मचर्यस्वाध्यायध्यानादिप्रसिद्ध्यर्थं १०
कर्तव्यमिति पञ्चमं तपः । आतपस्थानं वृक्षमूलनिवासो निरावरणशयनं बहुविधप्रतिमास्थान-
मित्येवमादिः कायक्लेशः४ तत् षष्ठं तपः । तत्किमर्थम् । देहदुःखतितिक्षासुखानभिष्वङ्गप्रवचनप्रभा-
एक प्रकारकी होकर भी अनन्तगुणी होती है। यही कारण है कि सूत्रमें सामायिक, छेदोपस्थापना
इत्यादि क्रमसे इन पाँचोंका नाम निर्देश किया है। पहले दस प्रकारके धर्मका निर्देश करते समय
संयमधर्म कह आये हैं, इसलिए चारित्रका अन्तर्भाव उसमें हो जानेके कारण यहाँ इसका अलगसे १५
कथन करनेकी आवश्यकता नहीं है ऐसा प्रश्न होता है, फिर भी समस्त कर्मका क्षय चारित्रसे होता
है यह दिखलानेके लिए यहाँ चारित्रका पृथक् रूपसे व्याख्यान किया है ।
§ ८५५. कहते हैं, चारित्रका कथन किया । संवरके हेतुओंका निर्देश करनेके बाद 'तपसा
निर्जरा च' यह सूत्र कहा है, इसलिए यहाँ पर तपका विधान करना चाहिए, अतः यहाँ कहते हैं—
वह दो प्रकारका है—बाह्य और आभ्यन्तर । उसमें भी यह प्रत्येक छह प्रकारका है। उनमें से २०
पहले बाह्य तपके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश यह
छह प्रकारका बाह्य तप है ॥१९॥
§ ८५६. दृष्टफल मन्त्र साधना आदिकी अपेक्षा किये बिना संयमकी सिद्धि, रागका उच्छेद,
कर्मोंका विनाश, ध्यान और आगमकी प्राप्तिके लिए अनशन तप किया जाता है। संयमको जागृत २५
रखने, दोषोंके प्रशम करने, सन्तोष और स्वाध्याय आदिकी सुखपूर्वक सिद्धिके लिए अवमौदर्य तप
किया जाता है। भिक्षाके इच्छुक मुनिका एक घर आदि विषयक संकल्प अर्थात् चिन्ताका अवरोध
करना वृत्तिपरिसंख्यान तप है। आशाकी निवृत्ति इसका फल जानना चाहिए। इन्द्रियोंके दर्पका
निग्रह करनेके लिए, निद्रापर विजय पानेके लिए और सुखपूर्वक स्वाध्यायकी सिद्धिके लिए घृतादि
गरिष्ठ रसका त्याग करना चौथा तप है। एकान्त जन्तुओंकी पीड़ासे रहित शून्य घर आदिमें ३०
निर्बाध ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय और ध्यान आदिकी सिद्धिके लिए संयतको शय्यासन लगाना चाहिए।
यह पाँचवाँ तप है। आतापनयोग, वृक्षके मूलमें निवास, निरावरण शयन और नाना प्रकारके
प्रतिमास्थान इत्यादि करना कायक्लेश है, यह छठवाँ तप है। यह किसलिए किया जाता है ? यह
देह-दुःखको सहन करनेके लिए, सुखविषयक आसक्तिको कम करनेके लिए और प्रवचनकी प्रभावना
१. –गरणदोष- आ०, दि० १, दि० २, ना०। २. –विषयसंकल्पचित्ताव-ता०, मु० । -विषयः संकल्प- ३५
चिन्ताव- दि० १, दि० २ । ३. -सिद्धयर्थो मु०, दि० २ । ४. –क्लेशः षष्ठं मु० ता० ।
३३६ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।२० ६ ८५७ -
वनाद्यर्थम् । परिषहस्यास्य च को विशेषः । यदृच्छयोपनिपतितः परिषहः । स्वयं कृतः कायक्लेशः ।
बाह्यत्वमस्य कुतः । बाह्यद्रव्यापेक्षत्वात्परप्रत्यक्षत्वाच्च बाह्यत्वम् ।
§ ८५७. आभ्यन्तरतपोभेदप्रदर्शनार्थमाह—
प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥२०॥
५ § ८५८. कथमस्याभ्यन्तरत्वम् । मनोनियमनार्थत्वात् । प्रमाददोषपरिहारः प्रायश्चित्तम् ।
पूज्येष्वादरो विनयः । कायचेष्टया द्रव्यान्तरेण चोपासनं १वैयावृत्त्यम् । ज्ञानभावनालस्यत्यागः
स्वाध्यायः । आत्मात्मीयसंकल्पत्यागो व्युत्सर्गः । चित्तविक्षेपत्यागो ध्यानम् ।
§ ८५९. तद्भेदप्रतिपादनार्थमाह—
नवचतुर्दशपञ्चद्विभेदा यथाक्रमं प्राग्ध्यानात् ॥२१॥
१० § ८६०. 'यथाक्रमम्' इति वचनान्नवभेदं प्रायश्चित्तम्, विनयश्चतुर्विधः, वैयावृत्त्यं दश-
विधम्, स्वाध्यायः पञ्चविधः, द्विभेदो२ व्युत्सर्ग इत्यभिसंबध्यते । 'प्राग्ध्यानात्' इति वचनं ध्यानस्य
बहुवक्तव्यत्वात्पश्चाद्वक्ष्यत इति ।
§ ८६१. आद्यस्य भेदस्वरूपनिर्ज्ञानार्थमाह—
आलोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्ग तपश्छेदपरिहारोपस्थापनाः ॥२२॥
१५ करनेके लिए किया जाता है । शंका—परीषह और कायक्लेशमें क्या अन्तर है ? समाधान—अपने
आप प्राप्त हुआ परीषह और स्वयं किया गया कायक्लेश है, यही इन दोनोंमें अन्तर है। शंका—
इस तपको बाह्य क्यों कहते हैं ? समाधान—यह बाह्य-द्रव्यके आलम्बनसे होता है और दूसरोंके
देखनेमें आता है इसलिए इसे बाह्य तप कहते हैं।
§ ८५७. अब आभ्यन्तर तपके भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
२० प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान यह छह प्रकारका आभ्यन्तर
तप है ॥२०॥
§ ८५८. शंका—इसे आभ्यन्तर तप क्यों कहते हैं ? समाधान—मनका नियम करनेवाला
होनेसे इसे आभ्यन्तर तप कहते हैं। प्रमादजन्य दोषका परिहार करना प्रायश्चित्त तप है। पूज्य
पुरुषोंका आदर करना विनय तप है। शरीरकी चेष्टा या दूसरे द्रव्यद्वारा उपासना करना वैयावृत्त्य
२५ तप है। आलस्यका त्यागकर ज्ञानकी आराधना करना स्वाध्याय तप है। अहंकार और ममकार-
रूप संकल्पका त्याग करना व्युत्सर्ग तप है, तथा चित्तके विक्षेपका त्याग करना ध्यान तप है।
§ ८५९. अब इनके भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ध्यानसे पूर्वके आभ्यन्तर तपोंके अनुक्रमसे नौ, चार, दश, पाँच और दो भेद हैं ॥२१॥
§ ८६०. सूत्रमें 'यथाक्रमम्' यह वचन दिया है। इससे प्रायश्चित्त नौ प्रकारका है, विनय
३० चार प्रकारका है, वैयावृत्त्य दश प्रकारका है, स्वाध्याय पाँच प्रकारका है और व्युत्सर्ग दो प्रकारका
है ऐसा सम्बन्ध होता है। सूत्रमें—'प्राग्ध्यानात्' यह वचन दिया है, क्योंकि ध्यानके विषयमें
बहुत कुछ कहना है, इसलिए उसका आगेका कथन करेंगे।
§ ८६१. अब पहले आभ्यन्तर तपके भेदोंके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
३५ आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार और उपस्थापना यह
नव प्रकारका प्रायश्चित्त है ॥२२॥
१. –रेण वोप-ता० । २. द्विविधो व्युत्स-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
– ९।२२ § ८६२ ] नवमोऽध्यायः ३३७
§ ८६२. तत्र गुरवे प्रमादनिवेदनं दशदोषविवर्जितमालोचनम्¹ । मिथ्यादुष्कृताभिधानादभि-
व्यक्तप्रतिक्रियं प्रतिक्रमणम् । [ तदुभय ] संसर्गे सति विशोधनात्तदुभयम् । संसक्तान्नपानोपकरणा-
दिविभजनं विवेकः । कायोत्सर्गादिकरणं व्युत्सर्गः । अनशनावमौदर्यादिलक्षणं तपः । दिवसपक्ष-
मासादिना² प्रव्रज्याहापनं छेदः । पक्षमासादिविभागेन दूरतः परिवर्जनं³ परिहारः । पुनर्दीक्षा- ५
प्रापणमुपस्थापना ।
§ ८६२. गुरुके समक्ष दश दोषोंको टालकर अपने प्रमादका निवेदन करना आलोचना है।
‘मेरा दोष मिथ्या हो’ गुरुसे ऐसा निवेदन करके अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना प्रतिक्रमण है ।
आलोचना और प्रतिक्रमण इन दोनोंका संसर्ग होनेपर दोषोंका शोधन होनेसे तदुभय प्रायश्चित्त
है । संसक्त हुए अन्न, पान और उपकरण आदिका विभाग करना विवेक प्रायश्चित्त है । कायोत्सर्ग १०
आदि करना व्युत्सर्ग प्रायश्चित्त है, अनशन, अवमौदर्य आदि करना तप प्रायश्चित्त है । दिवस,
पक्ष और महीना आदिकी प्रव्रज्याका छेद करना छेदप्रायश्चित्त है। पक्ष, महीना आदिके विभागसे
संघसे दूर रखकर त्याग करना परिहारप्रायश्चित्त है । पुनः दीक्षा देना उपस्थापना प्रायश्चित्त है ।
विशेषार्थ—यहाँ प्रायश्चित्तके नौ भेद गिनाये हैं । प्रायः शब्दका अर्थ साधुलोक है । उसका
जिस कर्ममें चित्त होता है वह प्रायश्चित्त कहलाता है । अथवा प्रायः शब्दका अर्थ अपराध है और १५
चित्त शब्दका अर्थ शुद्धि है, इसलिए प्रायश्चित्तका अर्थ अपराधोंका शोधन करना होता है । ये ही
वे नौ भेद हैं जिनके द्वारा साधु दोषोंका परिमार्जन करता है । पहला भेद आलोचना है । आलोचना
इन दश दोषोंसे रहित होकर की जाती है । दश दोष यथा—उपकरण देनेपर मुझे लघु प्रायश्चित्त
देंगे ऐसा विचारकर उपकरण प्रदान करना यह प्रथम आलोचना दोष है । मैं प्रकृतिसे दुर्बल हूँ,
ग्लान हूँ, उपवास आदि नहीं कर सकता । यदि लघु प्रायश्चित्त दें तो दोष कहूँगा ऐसा कहना २०
दूसरा दोष है । अन्य अदृष्ट (गुप्त) दोषोंको छिपा कर प्रकाशमें आये हुए दोषका निवेदन करना
तीसरा मायाचार दोष है । आलस्यवश या प्रमादवश अपने अपराधोंकी जानकारी प्राप्त करनेमें
निरुत्सुक होनेपर स्थूल दोष कहना चौथा दोष है । महा दुश्चर प्रायश्चित्तके भयसे महादोष
छिपा कर उससे हलके दोषका ज्ञान कराना पाँचवां दोष है । व्रतमें इस प्रकार दोष लगनेपर हमें
क्या प्रायश्चित्त करना पड़ेगा इस विधिसे गुरुकी उपासना करना छठा दोष है । पाक्षिक और २५
चातुर्मासिक आदि क्रिया कर्मके समय बहुत साधुओं द्वारा की जानेवाली आलोचनाजन्य शब्दोंसे
प्रदेशके व्यास होनेपर पूर्व दोष कहना सातवां दोष है । गुरुद्वारा दिया हुआ प्रायश्चित्त क्या युक्त
है, आगममें इसका विधान है या नहीं इस प्रकारकी शंका अन्य साधुके समक्ष प्रकट करना आठवां
दोष है । किसी प्रयोजनवश अपने समान साधुके समक्ष दोष कह कर प्रायश्चित्त लेना नौवां दोष
है । इस विधिसे लिया हुआ बड़ासे बड़ा प्रायश्चित्त भी फलदायक नहीं होता । मेरा दोष इसके ३०
अपराधके समान है । इसे यह भी जानता है । इसे जो प्रायश्चित्त मिलेगा वह मुझे भी युक्त है इस
प्रकार अपने दोषको छिपाना दसवाँ दोष है ।
अन्यत्र इन दश दोषोंके आकंपित, अनुमानित, दृष्ट, बादर, सूक्ष्म, छन्न, शब्दाकुलित,
बहुजन, अव्यक्त और तत्सेवी ये नाम आये हैं । प्रायश्चित्तका दूसरा भेद प्रतिक्रमण है । मेरा दोष
मिथ्या हो ऐसा निवेदन करना प्रतिक्रमण है । यह शिष्य करता है और गुरुके द्वारा जो आलोचना-
पूर्वक प्रतिक्रमण किया जाता है वह तदुभय कहलाता है । यह प्रायश्चित्तका तीसरा भेद है । आगे ३५
के प्रायश्चित्तोंके जिनके जो नाम हैं तदनुसार उनका स्वरूप है । यहाँ प्रायश्चित्तके ये नौ भेद कहे
१. –लोचनम् । आकंपिय अणुमाणिय जं दिट्ठं बादरं च सुहुमं च । छण्णं सद्दाउलियं बहुजण अव्वत्त
सस्सेवि ।। इति दश दोषाः । मिथ्या–मु० । २. –मासादीनां प्रत्र–मु० । ३. परिवर्जनीयं परि–आ० ।
४३
३३८ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।२३ § ८६३ -
§ ८६३. विनयविकल्पप्रतिपत्त्यर्थमाह—
ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः ॥२३॥
§ ८६४. 'विनयः' इत्यधिकारेणाभिसंबन्धः क्रियते। ज्ञानविनयो दर्शनविनयश्चारित्र-
विनय उपचारविनयश्चेति। सबहुमानं मोक्षार्थं ज्ञानग्रहणाभ्यासस्मरणादिर्ज्ञानविनयः। शङ्कादि-
दोषविरहितं तत्त्वार्थश्रद्धानं दर्शनविनयः। तद्वैतश्चारित्रे¹ समाहितचित्तता चारित्रविनयः। प्रत्य-
क्षेष्वाचार्यादिष्वभ्युत्थानाभिगमनाञ्जलिकरणादिरुपचारविनयः। परोक्षेष्वपि कायवाङ्मनोऽभि-
रञ्जलिक्रियागुणसङ्कीर्तनानुस्मरणादिः।
§ ८६५. वैयावृत्त्यभेदप्रतिपादनार्थमाह—
आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्षग्लानगणकुलसंघसाधुमनोज्ञानाम् ॥२४॥
§ ८६६. वैयावृत्त्यं दशधा भिद्यते। कुतः। विषयभेदात्। आचार्यवैयावृत्त्यमुपाध्यायवैया-
वृत्त्यमित्यादि। तत्र आचरन्ति² तस्माद् व्रतानीत्याचार्यः। मोक्षार्थं शास्त्रमुपेत्य³ तस्मादधीयत
इत्युपाध्यायः। महोपवासाद्यनुष्ठायी तपस्वी। शिक्षाशीलः शैक्षः। रुजादिक्क्लिष्टशरीरो ग्लानः।
गणः स्थविरसंततिः। दीक्षाचार्यशिष्यसंस्त्यार्यैः⁴ कुलम्। चातुर्वर्णं⁵ श्रमणनिवहः संघः। चिरप्रव्र-
हैं किन्तु मूलाचारमें इसके आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, मूल,
परिहार और श्रद्धान इस प्रकार दस भेद किये हैं। टीकाकारने इनका स्पष्टीकरण करते समय
मूलका वही अर्थ किया है जो यहाँ उपस्थापनाका किया गया है। तथा मानसिक दोषके होनेपर
उसके परिमार्जनके लिए मेरा दोष मिथ्या हो ऐसा अभिव्यक्त करनेको श्रद्धान नामका प्रायश्चित्त
बतलाया है।
§ ८६३. विनयके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय और उपचारविनय यह चार प्रकारका विनय
है ॥२३॥
§ ८६४. अधिकारके अनुसार 'विनय' इस पदका सम्बन्ध होता है—ज्ञानविनय, दर्शन-
विनय, चारित्रविनय और उपचारविनय। बहुत आदरके साथ मोक्षके लिए ज्ञानका ग्रहण करना,
अभ्यास करना और स्मरण करना आदि ज्ञानविनय है। शंकादि दोषोंसे रहित तत्त्वार्थका श्रद्धान
करना दर्शनविनय है। सम्यग्दृष्टिका चारित्रमें चित्तका लगना चारित्रविनय है तथा आचार्य
आदिके समक्ष आनेपर खड़े हो जाना, उनके पीछे-पीछे चलना और नमस्कार करना आदि
उपचारविनय है तथा उनके परोक्षमें भी काय, वचन और मनसे नमस्कार करना, उनके गुणोंका
कीर्तन करना और स्मरण करना आदि उपचारविनय है।
§ ८६५. अब वैयावृत्त्यके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष, ग्लान, गण, कुल, संघ, साधु और मनोज्ञ इनकी
वैयावृत्त्यके भेदसे वैयावृत्त्य दश प्रकारका है ॥२४॥
§ ८६६. वैयावृत्त्यके दश भेद हैं, क्योंकि उसका विषय दश प्रकारका है। यथा—आचार्य-
वैयावृत्त्य और उपाध्याय-वैयावृत्त्य आदि। जिसके निमित्तसे व्रतोंका आचरण करते हैं वह आचार्य
कहलाता है। मोक्षके लिए पास जाकर जिससे शास्त्र पढ़ते हैं वह उपाध्याय कहलाता है।
महोपवास आदिका अनुष्ठान करनेवाला तपस्वी कहलाता है। शिक्षाशील शैक्ष कहलाता है। रोग
आदिसे क्लान्त शरीरवाला ग्लान कहलाता है। स्थविरोंकी सन्ततिको गण कहते हैं। दीक्षाचार्य-
१. तत्त्वतश्चा-मु० । २. -रन्ति सस्या-आ०, दि० १, दि० २, ता०, ना० । ३. 'उपेत्याधीयते तस्मादु-
पाध्यायः।' -पा० म० सा० ३, ३, ११ । ४. -संस्त्ययः मु० । ५. चातुर्वर्ण्यश्च -मु० ।
जितः साधुः । मनोज्ञो लोकसंमतः । तेषां व्याधिपरिषहमिथ्यात्वाद्युपनिपाते कायचेष्टया द्रव्यान्तरेण
वा तत्प्रतीकारो वैयावृत्यं समाध्याधानविचिकित्साभावप्रवचनवात्सल्याद्यभिव्यक्त्यर्थम्² ।
§ ८६७. स्वाध्यायविकल्पविज्ञानार्थमाह—
वाचनाप्रच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशाः ॥२५॥
§ ८६८. निरवद्यग्रन्थार्थोभयप्रदानं वाचना । संशयच्छेदाय निश्चितबलाधानाय वा परानु- ५
योगः प्रच्छना । अधिगताथंस्य मनसाभ्यासोऽनुप्रेक्षा । घोषशुद्धं परिवर्तनमाम्नायः । धर्मकथाद्य-
नुष्ठानं धर्मोपदेशः । स एष पञ्चविधः स्वाध्यायः किमर्थः । प्रज्ञातिशयः प्रशस्ताध्यवसायः परमसं-
वेगस्तपोवृद्धिरतिचारविशुद्धिरित्येवमाद्यर्थः ।
§ ८६९. व्युत्सर्गभेदनिर्ज्ञानार्थमाह—
बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ॥२६॥ १०
§ ८७०. व्युत्सर्जनं व्युत्सर्गस्त्यागः । स द्विविधः—बाह्योपधित्यागोऽभ्यन्तरोपधित्यागश्चेति ।
अनुपात्तं वस्तुधनधान्यादि बाह्योपधिः । क्रोधादिरात्मभावोऽभ्यन्तरोपधिः । कायत्यागश्च नियत-
कालो यावज्जीवं वाभ्यन्तरोपधित्याग इत्युच्यते । स किमर्थः । निस्सङ्गत्वनिर्भयत्वजीविताशाव्यु-
दासाद्यर्थः ।
के शिष्यसमुदायको कुल कहते हैं। चार वर्णके श्रमणोंके समुदायको संघ कहते हैं। चिरकालसे १५
प्रव्रजितको साधु कहते हैं। लोकसम्मत साधुको मनोज्ञ कहते हैं। इन्हें व्याधि होनेपर, परीषहके
होनेपर व मिथ्यात्व आदिके प्राप्त होनेपर शरीरकी चेष्टा द्वारा या अन्य द्रव्यद्वारा उनका प्रतीकार
करना वैयावृत्य तप है। यह समाधिकी प्राप्ति, विचिकित्साका अभाव और प्रवचनवात्सल्यकी
अभिव्यक्तिके लिए किया जाता है।
§ ८६७. अब स्वाध्यायके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश यह पाँच प्रकारका स्वाध्याय है ॥२५॥
§ ८६८. निर्दोष ग्रन्थ, अर्थ और दोनोंका प्रदान करना वाचना है। संशयका उच्छेद
करनेके लिए अथवा निश्चित बलको पुष्ट करनेके लिए प्रश्न करना प्रच्छना है। जाने हुए अर्थका
मनमें अभ्यास करना अनुप्रेक्षा है। उच्चारणकी शुद्धिपूर्वक पाठको पुनःपुनः दुहराना आम्नाय है
और धर्मकथा आदिका अनुष्ठान करना धर्मोपदेश है। शंका—यह पूर्वोक्त पाँच प्रकारका स्वाध्याय २५
किसलिए किया जाता है। समाधान—प्रज्ञामें अतिशय लानेके लिए, अध्यवसायको प्रशस्त करनेके
लिए, परम संवेगके लिए, तपमें वृद्धि करनेके लिए और अतीचारोंमें विशुद्धि लाने आदिके लिए
किया जाता है।
§ ८६९. अब व्युत्सर्ग तपके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बाह्य और अभ्यन्तर उपधिका त्याग यह दो प्रकारका व्युत्सर्ग है ॥२६॥ ३०
§ ८७०. व्युत्सर्जन करना व्युत्सर्ग है। जिसका अर्थ त्याग होता है। वह दो प्रकारका है—
बाह्य उपधित्याग और अभ्यन्तर उपधित्याग। आत्मासे एकत्वको नहीं प्राप्त हुए ऐसे वास्तु, धन
और धान्य आदि बाह्य उपधि है और क्रोधादिरूप आत्मभाव अभ्यन्तर उपधि है। तथा नियत
काल तक या यावज्जीवन तक कायका त्याग करना भी अभ्यन्तर उपधि त्याग कहा जाता है।
यह निःसंगता, निर्भयता और जीविताशाका व्युदास आदिकरनेके लिए किया जाता है। ३५
१. -माध्यायान- मु० । २. -व्यक्तार्थम् आ०, दि० १, दि० २, ना० ।
३४० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।२७ § ८७१ -
§ ८७१. यद् बहुवक्तव्यं ध्यानमिति पृथग्व्यवस्थापितं तस्येदानीं भेदाभिधानं प्राप्तकालम् ।
तदुल्लङ्घ्य तस्य प्रयोक्तृस्वरूपकालनिर्धारणार्थमुच्यते—
उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ॥२७॥
§ ८७२. आद्यं त्रितयं संहननमुत्तमं वज्रर्षभनाराचसंहननं वज्रनाराचसंहननं नाराच-
संहननमिति । तत्तितयमपि ध्यानस्य साधनं भवति । मोक्षस्य तु आद्यमेव । तदुत्तमं संहननं यस्य
सोऽयमुत्तमसंहननः, तस्योत्तमसंहननस्येति । अनेन प्रयोक्तृनिर्देशः कृतः । अग्रं मुखम् । एकमग्रम-
स्येत्येकाग्रः । नानार्थालम्बनेन चिन्ता परिस्पन्दवती, तस्या अन्याशेषमुखेभ्यो व्यावत्र्य एकस्मिन्नग्रे
नियम एकाग्रचिन्तानिरोध इत्युच्यते । अनेन ध्यानस्वरूपमुक्तं भवति । मुहूर्तं इति कालपरिमाणम् ।
अन्तर्गंतो मुहूर्तादन्तर्मुहूर्तः । 'आ अन्तर्मुहूर्तात्' इत्यनेन कालावधिः कृतः । ततः परं २दुर्धरत्वादेकाग्र-
चिन्तायाः । चिन्ताया निरोधो यदि ध्यानं, निरोधश्चाभावः, तेन ध्यानमसत्खरविषाणवत्स्यात् ।
नैष दोषः; अन्यचिन्तानिवृत्त्यपेक्षयासदिति चोच्यते, स्वविषयाकारप्रवृत्तेः सदिति च; अभावस्य
भावान्तरत्वाद् हेत्वङ्गत्वादिभिरभावस्य वस्तुधर्मत्वसिद्धेश्च । अथवा नायं भावसाधनः, निरोधनं
विशेषार्थ—यहाँ यह प्रश्न होता है कि जब कि पाँच महाव्रतोंमें परिग्रहत्यागका उपदेश
दिया है, दश धर्मोंमें त्याग धर्मका उपदेश दिया है तथा नौ प्रकारके प्रायश्चित्तोंमें व्युत्सर्ग नामका
प्रायश्चित्त अलगसे कहा है ऐसी अवस्थामें पुनः व्युत्सर्ग तपका अलगसे कथन करना कोई मायने
नहीं रखता, क्योंकि इस प्रकार एक ही तत्त्वका पुनः-पुनः कथन करनेसे पुनरुक्त दोष आता है ।
समाधान यह है कि पाँच महाव्रतोंमें जो परिग्रह त्याग महाव्रत है उसमें गृहस्थसम्बन्धी उपधिके
त्यागकी मुख्यता है । त्यागधर्ममें आहारादि विषयक आसक्तिके कम करनेकी मुख्यता है, व्युत्सर्ग
प्रायश्चित्तमें परिग्रह त्याग धर्ममें लगनेवाले दोषके परिमार्जनकी मुख्यता है, और व्युत्सर्ग तपमें
वसतिकाम आदि बाह्य व मनोविकार तथा शरीर आदि अभ्यन्तर उपधिमें आसक्तिके त्यागकी
मुख्यता है, इसलिए पुनरुक्त दोष नहीं आता ।
§ ८७१. जो बहुवक्तव्य ध्यान पृथक् स्थापित कर आये हैं उसके भेदोंका कथन करना इस
समय प्राप्तकाल है तथापि उसे उल्लंघन करके इस समय ध्यानके प्रयोक्ता, स्वरूप और कालका
निर्धारण करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उत्तम संहननवालेका एक विषयमें चित्तवृत्तिका रोकना ध्यान है जो अन्तर्मुहूर्त काल तक
होता है ॥२७॥
§ ८७२. आदिके वज्रर्षभनाराचसंहनन, वज्रनाराचसंहनन और नाराचसंहनन ये तीन
संहनन उत्तम हैं । ये तीनों ही ध्यानके साधन हैं । मोक्षका साधन तो प्रथम ही है । जिसके ये
उत्तम संहनन होते हैं वह उत्तम संहननवाला कहलाता है उस उत्तम संहननवाले के । यहाँ इस
पदद्वारा प्रयोक्ताका निर्देश किया है । 'अग्र' पदका अर्थ मुख है । जिसका एक अग्र होता है वह
एकाग्र कहलाता है । नाना पदार्थोंका अवलम्बन लेनेसे चिन्ता परिस्पन्दवती होती है । उसे अन्य
अशेष मुखोंसे लौटाकर एक अग्र अर्थात् एक विषयमें नियमित करना एकाग्रचिन्तानिरोध कहलाता
है । इस द्वारा ध्यानका स्वरूप कहा गया है । मुहूर्त यह कालका विवक्षित परिमाण है । जो मुहूर्तके
भीतर होता है वह अन्तर्मुहूर्त कहलाता है । 'अन्तर्मुहूर्त काल तक' इस पद द्वारा कालकी अवधि
की गयी है । इतने कालके बाद एकाग्रचिन्ता दुर्धर होती है । शंका—यदि चिन्ताके निरोधका
नाम ध्यान है और निरोध अभावरूप होता है इसलिए गधेके सींगके समान ध्यान असत् ठहरता
१. 'ध्यानं निर्विषयं मनः ।' - सां० सू० ६, २५ । २.-दुर्धरत्वात् । चिन्ताया नि- ता०, ना० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
- ९।२९ § ८७६ ] नवमोऽध्यायः ३४१
निरोध इति । किं तर्हि । कर्मसाधनः, 'निरुध्यत इति निरोधः' । चिन्ता चासौ निरोधश्च चिन्ता-
निरोध इति । एतदुक्तं भवति — ज्ञानमेवापरिस्पन्दाग्निशिखावदवभासमानं ध्यानमिति ।
§ ८७३. तद्भेदप्रदर्शनार्थमाह—
आर्त्तरौद्रधर्म्यशुक्लानि ॥२८॥
§ ८७४. ऋतं दुःखम्, अर्दनमर्तिर्वा, तत्र भवमार्तम् । रुद्रः क्रूराशयस्तस्य कर्म तत्र भवं वा ५
रौद्रम् । धर्मो व्याख्यातः । धर्मादनपेतं धर्म्यम् । शुचिगुणयोगाच्छुक्लम् । तदेतच्चतुर्विधं ध्यानं
द्वैविध्यमश्नुते । कुतः । प्रशस्ताप्रशस्तभेदात् । अप्रशस्तमपुण्यास्रवकारणत्वात् । कर्मनिर्दहनसाम-
र्थ्यात्प्रशस्तम् ।
§ ८७५. किं पुनस्तदिति चेदुच्यते—
परे मोक्षहेतू ॥२९॥ १०
§ ८७७. तत्तार्तं चतुर्विधम् । तत्रादिविकल्पलक्षणनिर्देशार्थमाह—
आर्तममनोज्ञस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः ॥३०॥
§ ८७८. अमनोज्ञमप्रियं विषकण्टकशत्रुशस्त्रादि, तद्बाधाकारणत्वाद् 'अमनोज्ञम्' इत्युच्यते ।
तस्य संप्रयोगे, स कथं नाम मे न स्यादिति संकल्पश्चिन्ताप्रबन्धः स्मृतिसमन्वाहारः प्रथममार्त-
मित्याख्यायते ।
§ ८७९. द्वितीयस्य विकल्पस्य लक्षणनिर्देशार्थमाह—
विपरीतं मनोज्ञस्य ॥३१॥
§ ८८०. कुतो विपरीतम् । पूर्वोक्तात् । तेनैतदुक्तं भवति—मनोज्ञस्येष्टस्य स्वपुत्रदारधना-
देर्विप्रयोगे तत्संप्रयोगे संकल्पश्चिन्ताप्रबन्धो द्वितीयमार्तमवगन्तव्यम् ।
§ ८८१. तृतीयस्य विकल्पस्य लक्षणप्रतिपादनार्थमाह—
वेदनायाश्च ॥३२॥
§ ८८२. 'वेदना'शब्दः सुखे दुःखे च वर्तमानोऽपि आर्तस्य प्रकृतत्वाद् दुःखवेदनायां प्रवर्तते,
तस्या वातादिविकारजनितवेदनाया उपनिपाते तस्या अपायः कथं नाम मे स्यादिति संकल्प-
श्चिन्ताप्रबन्धस्तृतीयमार्तमुच्यते ।
§ ८८३. तुरीयस्यार्तस्य लक्षणनिर्देशार्थमाह—
निदानं च ॥३३॥
§ ८७७. आर्तध्यान चार प्रकारका है। उनमें से प्रथम भेदके लक्षणका निर्देश करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
अमनोज्ञ पदार्थके प्राप्त होनेपर उसके वियोगके लिए चिन्तासातत्यका होना प्रथम आर्त-
ध्यान है ॥३०॥
§ ८७८. विष, कण्टक, शत्रु और शस्त्र आदि जो अप्रिय पदार्थ हैं वे बाधाके कारण होनेसे
अमनोज्ञ कहे जाते हैं। उनका संयोग होनेपर वे मेरे कैसे न हों इस प्रकारका संकल्प चिन्ता प्रबन्ध
अर्थात् स्मृति समन्वाहार यह प्रथम आर्तध्यान कहलाता है ।
§ ८७९. अब दूसरे भेदके लक्षणका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मनोज्ञ वस्तुके वियोग होनेपर उसकी प्राप्तिकी सतत चिन्ता करना दूसरा आर्तध्यान
है ॥३१॥
§ ८८०. किससे विपरीत ? पूर्वमें कहे हुएसे । इससे यह तात्पर्य निकलता है कि मनोज्ञ
अर्थात् इष्ट अपने पुत्र, स्त्री और धनादिकके वियोग होनेपर उसकी प्राप्तिके लिए संकल्प अर्थात्
निरन्तर चिन्ता करना दूसरा आर्तध्यान जानना चाहिए ।
§ ८८१. अब तीसरे भेदके लक्षणका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वेदनाके होनेपर उसे दूर करनेके लिए सतत चिन्ता करना तीसरा आर्तध्यान है ॥३२॥
§ ८८२. वेदना शब्द यद्यपि सुख और दुःख दोनों अर्थोंमें विद्यमान है पर यहाँ आर्तध्यानका
प्रकरण होनेसे उससे दुःखवेदना ली गयी है। वातादि विकारजनित दुःख वेदनाके होनेपर उसका
अभाव मेरे कैसे होगा इस प्रकार विकल्प अर्थात् निरन्तर चिन्ता करना तीसरा आर्तध्यान कहा
जाता है ।
§ ८८३. अब चौथे आर्तध्यानके लक्षणका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
निदान नामका चौथा आर्तध्यान है ॥३३॥
- ९।३५ § ८८८ ] नवमोऽध्यायः ३४३
§ ८८४. भोगाकाङ्क्षातुरास्यानागतविषयप्राप्तिं प्रति मनःप्रणिधानं संकल्पश्चिन्ताप्रबन्ध-
स्तुरीयमार्तं निदानमित्युच्यते ।
§ ८८५. तदेतच्चतुर्विधमार्तं किंस्वामिकमिति चेदुच्यते—
तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् ॥३४॥
§ ८८६. अविरता असंयतसम्यग्दृष्ट्यन्ताः । देशविरताः संयतासंयताः । प्रमत्तसंयताः पञ्च-
दशप्रमादोपेताः क्रियानुष्ठायिनः । तत्राविरतदेशविरतानां चतुर्विधमप्यार्तं भवति; असंयमपरिणामो-
पेतत्त्वात् । प्रमत्तसंयतानां तु निदानवर्ज्यमन्यदार्तत्रयं प्रमादोदयोद्रेकात्कदाचित्स्यात् ।
§ ८८७. व्याख्यातमार्तं संज्ञादिभिः । द्वितीयस्य संज्ञाहेतुस्वामिनिर्द्धारणार्थमाह—
हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयोः ॥३५॥
§ ८८८. हिंसादीन्युक्तलक्षणानि । तानि रौद्रध्यानोत्पत्तेर्निमित्तीभवन्तीति हेतुनिर्देशो विज्ञा-
यते । तेन हेतुनिर्देशेनानुवर्तमानः 'स्मृतिसमन्वाहारः' अभिसंबध्यते । हिंसायाः स्मृतिसमन्वाहार
इत्यादि । तद्रौद्रध्यानमविरतदेशविरतयोर्वेदितव्यम् । अविरतस्य भवतु रौद्रध्यानं, देशविरतस्य
§ ८८४. भोगोंकी आकांक्षाके प्रति आतुर हुए व्यक्तिके आगामी विषयोंकी प्राप्तिके लिए
मनःप्रणिधानका होना अर्थात् संकल्प तथा निरन्तर चिन्ता करना निदान नामका चौथा
आर्तध्यान कहा जाता है ।
§ ८८५. इस चार प्रकारके आर्तध्यानका स्वामी कौन है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
यह आर्तध्यान अविरत, देशविरत और प्रमत्तसंयत जीवोंके होता है ॥३४॥
§ ८८६. असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तकके जीव अविरत कहलाते हैं, संयतासंयत जीव
देशविरत कहलाते हैं और पन्द्रह प्रकारके प्रमादसे युक्त क्रिया करनेवाले जीव प्रमत्तसंयत कहलाते
हैं । इनमें से अविरत और देशविरत जीवोंके चारों ही प्रकारका आर्तध्यान होता है, क्योंकि ये
असंयमरूप परिणामसे युक्त होते हैं। प्रमत्तसंयतोंके तो निदानके सिवा बाकीके तीन प्रमादकी
तीव्रतावश कदाचित् होते हैं।
विशेषार्थ—पुराण साहित्यमें मुनियों द्वारा निदान करनेके कई उदाहरण हैं पर इन
उदाहरणोंसे प्रमत्तसंयत अवस्थामें उन साधुओंने निदान किया ऐसा अर्थ नहीं लेना चाहिए । एक
तो भावलिंगी साधुके आगामी भोगोंकी आकांक्षा होती ही नहीं और कदाचित् होती है तो उस
समयसे वह भावलिंगी नहीं रहता ऐसा अर्थ यहाँ ग्रहण करना चाहिए ।
§ ८८७. संज्ञा आदिके द्वारा आर्तध्यानका व्याख्यान किया । अब दूसरे ध्यानकी संज्ञा,
हेतु और स्वामीका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
हिंसा, असत्य, चोरी और विषयसंरक्षणके लिए सतत चिन्तन करना रौद्रध्यान है। वह
अविरत और देशविरतके होता है ॥३५॥
§ ८८८. हिंसादिकके लक्षण पहले कह आये हैं । वे रौद्रध्यानकी उत्पत्तिके निमित्त होते हैं
इसलिए हेतुनिर्देश जाना जाता है । हेतुका निर्देश करनेवाले इन हिंसादिक के साथ अनुवृत्तिको
प्राप्त होनेवाले 'स्मृतिसमन्वाहार' पदका सम्बन्ध होता है। यथा - हिंसाका स्मृतिसमन्वाहार
आदि । यह रौद्रध्यान अविरत और देशविरतके जानना चाहिए । शंका—रौद्रध्यान अविरतके
१. -विधमार्तं ता० मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अध्याय ९-१०: संवर, निर्जरा, शुक्लध्यान, केवलज्ञान एवं मोक्ष-सिद्धि उपसंहार
३४४ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।३६ ६ ८८९ –
कथम् । तस्यापि हिंसाद्यावेशाद्वित्तादिसंरक्षणतन्त्रत्वाच्च कदाचिद् भवितुमर्हति । तत्पुनर्नारका-
दीनामकारणं; सम्यग्दर्शनसामर्थ्यात् । संयतस्य तु न भवत्येव; तदारम्भे संयमप्रच्युतेः ।
§ ८८९. आह, 'परे मोक्षहेतू' उपदिष्टे । तत्राद्यस्य मोक्षहेतोर्ध्यानस्य भेदस्वरूपस्वामिनिर्देशः
कर्तव्य इत्यत आह—
आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयाय धर्म्यम् ॥३६॥
§ ८९०. विचयनं विचयो विवेको विचारणेत्यर्थः । आज्ञापायविपाकसंस्थानानां विचय
आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयः । 'स्मृतिसमन्वाहारः' इत्यनुवर्तते । स प्रत्येकं संबध्यते—आज्ञा-
विचयाय स्मृतिसमन्वाहार इत्यादि । तद्यथा—उपदेष्टुरभावान्मन्दबुद्धित्वात्कर्मोदयात्सूक्ष्मत्वाच्च
पदार्थानां हेतुदृष्टान्तोपरमे सति सर्वज्ञप्रणीतमागमं प्रमाणीकृत्य इत्थमेवेदं "नान्यथावादिनो जिनाः”
इतिगहनपदार्थश्रद्धानादर्थावधारणमाज्ञाविचयः । अथवा—स्वयं विदितपदार्थतत्त्वस्य सतः परं
प्रति पिपादयिषोः स्वसिद्धान्ताविरोधेन तत्त्वसमर्थनार्थं तर्कनयप्रमाणयोजनपरः स्मृतिसमन्वाहारः
सर्वज्ञाज्ञाप्रकाशनार्थत्वादाज्ञाविचय इत्युच्यते । जात्यन्धवन्मिथ्यादृष्टयः सर्वज्ञप्रणीतमार्गाद्विमुखा
मोक्षार्थिनः सम्यङ्मार्गापरिज्ञानात्सुदूरमेवापयन्तीति सन्मार्गापायचिन्तनमपायविचयः । अथवा—
मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्रेभ्यः कथं नाम इमे प्राणिनोऽपेयुरिति स्मृतिसमन्वाहारोऽपायविचयः ।
होओ देशविरतके कैसे हो सकता है ? समाधान - हिंसादिकके आवेशसे या वित्तादिके संरक्षणके
परतन्त्र होनेसे कदाचित् उसके भी हो सकता है । किन्तु देशविरतके होनेवाला वह रौद्रध्यान
नारकादि दुर्गत्तियोंका कारण नहीं है, क्योंकि सम्यग्दर्शन की ऐसी ही सामर्थ्य है । परन्तु संयतके
तो वह होता ही नहीं है, क्योंकि उसका आरम्भ होनेपर संयमसे पतन हो जाता है ।
§ ८८९. कहते हैं, अन्तके दो ध्यान मोक्षके हेतु हैं यह कह आये । उनमें से मोक्षके हेतुरूप
प्रथम ध्यानके भेद, स्वरूप और स्वामीका निर्देश करना चाहिए इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं-
आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान इनकी विचारणाके निमित्त मनको एकाग्र करना
धर्म्यध्यान है ॥३६॥
§ ८९०. विचयन करना विचय है । विचय, विवेक और विचारणा ये पर्याय नाम हैं।
आज्ञा, अपाय, विपाक और संस्थान इनका परस्पर द्वन्द्व समास होकर विचय शब्दके साथ
षष्ठीतत्पुरुष समास है और इस प्रकार 'आज्ञापायविपाकसंस्थानविचयः' पद बना है। 'स्मृति-
समन्वाहारः' पदकी अनुवृत्ति होती है। और उसका प्रत्येकके साथ सम्बन्ध होता है। यथा-
आज्ञाविचयके लिए स्मृतिसमन्वाहार आदि । स्पष्ट इस प्रकार है- उपदेश देनेवालेका अभाव
होनेसे, स्वयं मन्दबुद्धि होनेसे, कर्मोंका उदय होनेसे और पदार्थोंके सूक्ष्म होनेसे तथा तत्त्वके
समर्थनमें हेतु और दृष्टान्तका अभाव होनेपर सर्वज्ञप्रणीत आगमको प्रमाण करके 'यह इसी प्रकार
है, क्योंकि जिन अन्यथावादी नहीं होते' इस प्रकार गहन पदार्थके श्रद्धानद्वारा अर्थका अवधारण
करना आज्ञाविचय धर्म्यध्यान है । अथवा स्वयं पदार्थोंके रहस्यको जानता है और दूसरोंके प्रति
उसका प्रतिपादन करना चाहता है, इसलिए स्व-सिद्धान्तके अविरोधद्वारा तत्त्वका समर्थन करनेके
लिए उसके जो तर्क, नय और प्रमाणकी योजनारूप निरन्तर चिन्तन होता है वह सर्वज्ञकी आज्ञा-
को प्रकाशित करनेवाला होनेसे आज्ञाविचय कहा जाता है। मिथ्यादृष्टि जीव जन्मान्ध पुरुषके
समान सर्वज्ञप्रणीत मार्गसे विमुख होते हैं, उन्हें सन्मार्गका परिज्ञान न होनेसे वे मोक्षार्थी पुरुषोंको
दूरसे ही त्याग देते हैं इस प्रकार सन्मार्गके अपायका चिन्तन करना अपायविचय धर्म्यध्यान है।
अथवा, ये प्राणी मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रसे कैसे दूर होंगे इस प्रकार निरन्तर
१. विचारणमित्यर्थः मु० । विचारमित्यर्थः ता० । २. - द्वानमर्था-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
- ९।३६ § ८९० ] नवमोऽध्यायः ३४५
कर्मणां ज्ञानावरणादीनां द्रव्यक्षेत्रकालभवभावप्रत्ययफलानुभवनं प्रति प्रणिधानं विपाकविचयः ।
लोकसंस्थानस्वभावविचयाय स्मृतिसमन्वाहारः संस्थानविचयः । उत्तमक्षमादिलक्षणो धर्म उक्तः ।
तस्मादनपेतं धर्म्यं ध्यानं चतुर्विकल्पमवसेयम् । तदविरतदेशविरतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां भवति ।
चिन्तन करना अपायविचय धर्म्यध्यान है। ज्ञानावरणादि कर्मोंके द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और
भावनिमित्तक फलके अनुभवके प्रति उपयोगका होना विपाकविचय धर्म्यध्यान है। तथा लोकके ५
आकार और स्वभावका निरन्तर चिन्तन करना संस्थानविचय धर्म्यध्यान है। पहले उत्तम क्षमादि-
रूप धर्मका स्वरूप कह आये हैं। उससे अनपेत अर्थात् युक्त धर्म्यध्यान चार प्रकारका जानना
चाहिए। यह अविरत, देशविरत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत जीवोंके होता है।
विशेषार्थ—संसार, शरीर और भोगोंसे विरक्त होनेके लिए या विरक्त होनेपर उस भावको
स्थिर बनाये रखनेके लिए जो प्रणिधान होता है उसे धर्म्यध्यान कहते हैं। यह उत्तम क्षमादिरूप १०
धर्मसे युक्त होता है इसलिए इसे धर्म्यध्यान कहते हैं। यहाँ निमित्तभेदसे इसके चार भेद किये गये
हैं। यथा—आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय। आज्ञाविचय तत्त्वनिष्ठामें
सहायक होता है, अपायविचय संसार, शरीर और भोगोंसे विरक्ति उत्पन्न करता है। विपाक
विचयसे कर्मफल और उसके कारणोंकी विचित्रताका ज्ञान दृढ़ होता है और संस्थानविचयसे
लोककी स्थितिका ज्ञान दृढ़ होता है। १५
मूल टीकामें विपाकविचयके स्वरूपका निर्देश करते हुए जो द्रव्य, क्षेत्र और काल आदिके
निमित्तसे कर्मफलकी चर्चा की है उसका आशय यह है कि यद्यपि कर्मोंके उदय या उदीरणासे
जीवके औदयिक भाव और विविध प्रकारके शरीरादिककी प्राप्ति होती है पर इन कर्मोंका
उदय और उदीरणा बिना अन्य निमित्तके नहीं होती किन्तु द्रव्य, क्षेत्र आदिका निमित्त पाकर
ही कर्मोंका उदय और उदीरणा होती है। आगे इसी बातको विशेष रूपसे स्पष्ट करते हैं। २०
द्रव्यनिमित्त—मान लो एक व्यक्ति हँस खेल रहा है, वह अपने बाल-बच्चोंके साथ गप्पागोष्ठीमें
तल्लीन है। इतनेमें अकस्मात् मकानकी छत टूटती है और वह उससे घायल होकर दुःखका वेदन
करने लगता है तो यहाँ उसके दुःखवेदनके कारणभूत असाता वेदनीयके उदय और उदीरणामें
टूट कर गिरनेवाली छतका संयोग निमित्त है। टूट कर गिरनेवाली छतके निमित्तसे उस व्यक्तिके
असातावेदनीयकी उदय-उदीरणा हुई और असातावेदनीयके उदय-उदीरणासे उस व्यक्तिको दुःखका २५
अनुभवन हुआ यह उक्त कथनका तात्पर्य है। इसी प्रकार अन्य कर्मोंके उदय-उदीरणामें बाह्य
द्रव्य कैसे निमित्त होता है इसका विचार कर लेना चाहिए। कालनिमित्त—कालके निमित्त होने-
का विचार दो प्रकारसे किया जाता है। एक तो प्रत्येक कर्मका उदय-उदीरणा काल और दूसरा
वह काल जिसके निमित्तसे बीचमें ही कर्मोंकी उदय-उदीरणा बदल जाती है। आगममें अध्रुवोदय
रूप कर्मके उदय-उदीरणा कालका निर्देश किया है उसके समाप्त होते ही विवक्षित कर्मके उदय- ३०
उदीरणाका अभाव होकर उसका स्थान दूसरे कर्मकी उदय-उदीरणा ले लेती है। जैसे सामान्यसे
हास्य और रतिका उत्कृष्ट उदय-उदीरणाकाल छह महीना है। इसके बाद इनकी उदय-उदीरणा
न होकर अरति और शोककी उदय-उदीरणा होने लगती है। किन्तु छह महीनाके भीतर यदि
हास्य और रतिके विरुद्ध निमित्त मिलता है तो बीचमें ही इनकी उदय-उदीरणा बदल जाती है।
यह कर्मका उदय-उदीरणा काल है। अब एक ऐसा जीव लो जो निर्भय होकर देशान्तरको जा रहा ३५
है किन्तु किसी दिन मार्गमें ही ऐसे जंगल में रात्रि हो जाती है जहाँ हिंस्र जन्तुओंका प्राबल्य है
और विश्राम करनेके लिए कोई निरापद स्थान नहीं है। यदि दिन होता तो उसे रंचमात्र भी भय
न होता किन्तु रात्रि होनेसे वह भयभीत होता है इससे इसके असाता, अरति, शोक और भय
कर्मकी उदय-उदीरणा होने लगती है। यह कालनिमित्तक उदय-उदीरणा है। इसी प्रकार क्षेत्र,
४४
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
भव और भावनिमित्तक उदय और उदीरणा जान लेनी चाहिए । कालप्राप्त कर्मपरमाणुओंके
अनुभव करनेको उदय कहते हैं और उदयावलिके बाहर स्थित कर्मपरमाणुओंको कषायसहित या
कषायरहित योग संज्ञावाले वीर्यविशेषके द्वारा उदयावलिमें लाकर उनका उदयप्राप्त कर्मपरमाणुओं
के साथ अनुभवन करनेको उदीरणा कहते हैं । इस प्रकार कर्मपरमाणुओंका अनुभवन उदय और
उदीरणा दोनोंमें लिया जाता है । यदि इनमें अन्तर है तो कालप्राप्त और अकालप्राप्त परमाणुओं-
का है । उदयमें कालप्राप्त कर्मपरमाणु रहते हैं और उदीरणामें अकालप्राप्त कर्मपरमाणु रहते हैं ।
सामान्य नियम यह है कि जहाँ जिस कर्मका उदय होता है वहाँ उसकी उदीरणा अवश्य होती है ।
फिर भी इनमें जो विशेषता है उसका यहाँ निर्देश करते हैं—मिथ्यात्वका उदय और उदीरणा
मिथ्यात्व गुणस्थानमें होती है । इतनी विशेषता है कि उपशम सम्यक्त्वके अभिमुख हुए जीवके
अन्तिम आवली प्रमाण कालमें मिथ्यात्वकी उदीरणा नहीं होती वहाँ मात्र उसका उदय होता है ।
एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रियजाति, आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त
और साधारण इन नौ प्रकृतियोंका मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं ।
अनन्तानुबन्धी चतुष्कका प्रारम्भके दो गुणस्थानोंमें ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं ।
सम्यङ्मिथ्यात्वका तीसरे गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है, अन्यत्र नहीं । अप्रत्याख्यान
चार, नरकगति, देवगति, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, दुर्भग, अनादेय और अयशस्कीर्ति
इन ग्यारह प्रकृतियोंका चौथे गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । नरकायु
और देवायुका चौथे गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । मात्र मरणके
समय अन्तिम आवलिकालमें उदीरणा नहीं होती । चार आनुपूर्वीयोंका प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ
गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है अन्यत्र नहीं । प्रत्याख्यानावरणचतुष्क, तिर्यंचगति,
उद्योत और नीचगोत्र इन सात प्रकृतियोंका संयतासंयत गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा
होती है आगे नहीं । तिर्यंच आयुका पाँचवें गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है । मात्र
मरणके समय अन्तिम आवलि कालके शेष रहनेपर उदय ही होता है उदीरणा नहीं । निद्रानिद्रा,
प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, सातावेदनीय और असातावेदनीय इन पाँच प्रकृतियोंका छठे गुणस्थान
तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । मात्र निद्रानिद्रादि त्रिकको उदीरणा वही करता
है जिसने इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण कर ली है । ऐसा जीव यदि उत्तर शरीरकी विक्रिया करता है या
आहारकसमुद्घातको प्राप्त होता है तो इन्हें प्राप्त होनेके एक आवलि कालपूर्वसे लेकर मूल शरीरमें
प्रवेश होने तक इन तीनकी उदीरणा नहीं होती । तथा देव, नारकी और भोगभूमियाँ जीव भी
इन तीनकी उदीरणा नहीं करते । आहारक शरीर और आहारक अंगोपांगको प्रमत्तसंयतमें ही
उदीरणा और उदय होता है, आगे पीछे नहीं । मनुष्यायुकी छठे गुणस्थानतक उदीरणा और १४वें
गुणस्थान तक उदय होता है । मात्र मरणके समय अन्तिम आवलि काल शेष रहने पर उदीरणा
नहीं होती । सम्यक्त्वप्रकृतिकी उदीरणा और उदय चौथेसे लेकर सातवें गुणस्थानतक वेदकसम्य-
ग्दृष्टिके होता है । मात्र कृतकृत्यवेदकके कालमें व द्वितीयोपशम सम्यक्त्वके उत्पत्तिकालमें एक
आवलि शेष रहनेपर उदय ही होता है उदीरणा नहीं । अन्तके तीन संहननोंकी उदीरणा व उदय
सातवें गुणस्थान तक ही होता है आगे नहीं । हास्यादि छहकी उदीरणा और उदय आठवें
गुणस्थान तक होता है आगे नहीं । इतनी विशेषता है कि देवोंके उत्पत्ति समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त
काल तक हास्य और रतिकी नियमसे उदीरणा होती है आगे भजनीय है । तथा नारकियोंके
उत्पत्तिसमयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त कालतक अरति और शोककी नियमसे उदीरणा होती है आगे
भजनीय है । तीन वेद और क्रोधादि तीन संज्वलनोंकी उदीरणा व उदय नौवेंके उपान्त्य भाग तक
ही होता है आगे नहीं । इतनी विशेषता है कि जो जिस वेदके उदयसे श्रेणि चढ़ता है उसके प्रथम
- ९।३८ § ८९४ ] नवमोऽध्यायः ३४७
§ ८९१. त्रयाणां ध्यानानां निरूपणं कृतम् । इदानीं शुक्लध्यानं निरूपयितव्यम् । तल्लक्ष्य-
माणचतुर्विकल्पम् । तत्राद्ययोः स्वामिनिर्देशार्थमिदमुच्यते—
शुक्ले चाद्ये पूर्वविदः ॥३७॥
§ ८९२. वक्ष्यमाणेषु शुक्लध्यानविकल्पेषु आद्ये शुक्लध्याने पूर्वविदो भवतः श्रुतकेवलिन
इत्यर्थः । 'च'शब्देन धर्म्यमपि समुच्चीयते । तत्र "व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिः" इति श्रेण्या- ५
रोहणात्प्राग्धर्म्यं, श्रेण्योः शुक्ले इति व्याख्यायते ।
§ ८९३. अवशिष्टे कस्य भवत इत्यत्रोच्यते—
परे केवलिनः ॥३८॥
§ ८९४. प्रक्षीणसकलज्ञानावरणस्य केवलिनः सयोगस्यायोगस्य च परे उत्तरे शुक्लध्याने
भवतः । १०
स्थितिमें एक आवलिकाल शेष रहनेपर उदीरणा नहीं होती । लोभसंज्वलनकी दसवें गुणस्थान तक
उदीरणा व उदय होता है । मात्र दसवें गुणस्थानके अन्तिम आवलि कालके शेष रहनेपर उदीरणा
नहीं होती, उदय होता है । वज्रनाराच और नाराच संहननकी ग्यारहवें गुणस्थान तक उदीरणा
और उदय होता है । निद्रा और प्रचलाकी बारहवें गुणस्थानमें एक समय अधिक एक आवलि
काल शेष रहने तक उदय व उदीरणा दोनों होते हैं, आगे बारहवें गुणस्थानके उपान्त्य समय १५
तक इनका उदय ही होता है । पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय इन चौदह
प्रकृतियोंका उदय तो बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समय तक होता है और उदीरणा बारहवें
गुणस्थानमें एक आवलि काल शेष रहने तक होती है । मनुष्यगति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक,
तैजस और कार्मण शरीर, छह संस्थान, औदारिक अंगोपांग, वज्रवृषभनाराच संहनन, वर्णादिक
चार, अगुरुलघु, उपघात, उच्छ्वास, दोनों विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, २०
अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, दुःस्वर, आदेय, यशकीर्ति, निर्माण और उच्चगोत्र इन
अड़तीस प्रकृतियोंकी तेरहवें गुणस्थान तक उदीरणा व उदय होता है आगे नहीं । तथा तीर्थंकर
प्रकृतिकी तेरहवें गुणस्थानमें ही उदीरणा व उदय होता है । इस प्रकार आज्ञा आदिके निमित्तसे
सतत चिन्तन करना धर्म्यध्यान है यह उक्त कथनका तात्पर्य है !
§ ८९१. तीन ध्यानोंका कथन किया, इस समय शुक्लध्यानका कथन करना चाहिए, उसके २५
आगे चार भेद कहनेवाले हैं उनमें-से आदिके दो भेदोंके स्वामीका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्के होते हैं ॥३७॥
§ ८९२. आगे कहे जानेवाले शुक्लध्यानके भेदोंमें-से आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्
अर्थात् श्रुतकेवलीके होते हैं । सूत्रमें 'च' शब्द आया है उससे धर्म्यध्यानका समुच्चय होता है । ३०
'व्याख्यानसे विशेष ज्ञान होता है' इस नियमके अनुसार श्रेणि चढ़नेसे पूर्व धर्म्यध्यान होता है और
दोनों श्रेणियोंमें आदिके दो शुक्लध्यान होते हैं ऐसा व्याख्यान करना चाहिए ।
§ ८९३. शेषके दो शुक्लध्यान किसके होते हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शेषके दो शुक्लध्यान केवलीके होते हैं ॥३८॥
§ ८९४. जिसके समस्त ज्ञानावरणका नाश हो गया है ऐसे सयोगकेवली और अयोगकेवलीके ३५
पर अर्थात् अन्तके दो शुक्लध्यान होते हैं ।
१. 'व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षणम् ।'—परि० शे०, पृ० ८ । पा० म० मा०; पृ० ५७,
१३०, १५४ । वक्खाणओ विसेसो न हि संदेहादलक्खणया ।।'—वि० भा० गा०, ३४७ ।
§ ८९५. यथासंख्यं तद्विकल्पप्रतिपादनार्थमिदमुच्यते—
पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरतक्रियानिवर्तीनि ॥३९॥
§ ८९६. पृथक्त्ववितर्कमेकत्ववितर्कं सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति व्युपरतक्रियानिवर्ति चेति चतुर्विधं
शुक्लध्यानम् । वक्ष्यमाणलक्षणमपेक्ष्य¹ सर्वेषामन्वर्थत्व²मवसेयम् ।
§ ८९७. तस्यालम्बनविशेषनिर्धारणार्थमाह—
त्र्येकयोगकाययोगायोगानाम् ॥४०॥
§ ८९८. 'योग' शब्दो व्याख्यातार्थः 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इत्यत्र । उक्तैश्चतुर्भिः
शुक्लध्यानविकल्पैस्त्रियोगादीनां चतुर्णां यथासंख्येन नाभिसंबन्धो वेदितव्यः । त्रियोगस्य पृथक्त्व-
वितर्कम्, त्रिषु योगेष्वेकयोगस्यैकत्ववितर्कम्, काययोगस्य सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति, अयोगस्य व्युपरत-
क्रियानिवर्ति ।
§ ८९९. तत्राद्ययोर्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
एकाश्रये सवितर्कवीचारे पूर्वे ॥४१॥
§ ९००. एक आश्रयो ययोस्ते एकाश्रये । ³उभेऽपि परिप्राप्तश्रुतज्ञाननिष्ठेनारभ्येते, इत्यर्थः ।
वितर्कश्च वीचारश्च वितर्कवीचारौ, सह वितर्कवीचाराभ्यां वर्तेत इति सवितर्कवीचारे । पूर्वे
पृथक्त्वैकत्ववितर्के इत्यर्थः ।
§ ८९५. अब क्रमसे शुक्लध्यानके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति ये चार शुक्ल-
ध्यान हैं ॥३९॥
§ ८९६. पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति ये
चार शुक्लध्यान हैं। आगे कहे जानेवाले लक्षणकी अपेक्षा सबका सार्थक नाम जानना चाहिए।
§ ८९७. अब उसके आलम्बन विशेषका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वे चार ध्यान क्रमसे तीन योगवाले, एक योगवाले, काययोगवाले और अयोगके होते
हैं ॥४०॥
§ ८९८. 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इस सूत्रमें योग शब्दका व्याख्यान कर आये हैं। पूर्वमें
कहे गये शुक्लध्यानके चार भेदोंके साथ त्रियोग आदि चार पदोंका क्रमसे सम्बन्ध जान लेना
चाहिए। तीन योगवालेके पृथक्त्ववितर्क होता है। तीन योगोंमें-से एक योगवालेके एकत्ववितर्क
होता है। काययोगवालेके सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यान होता है और अयोगीके व्युपरतक्रियानिवर्ति
ध्यान होता है।
§ ८९९. अब इन चार भेदोंमें-से आदिके दो भेदोंके सम्बन्धमें विशेष ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
पहलेके दो ध्यान एक आश्रयवाले, सवितर्क और सवीचार होते हैं ॥४१॥
§ ९००. जिन दो ध्यानोंका एक आश्रय होता है वे एक आश्रयवाले कहलाते हैं। जिसने
सम्पूर्ण श्रुतज्ञान प्राप्त कर लिया है उसके द्वारा ही ये दो ध्यान आरम्भ किये जाते हैं। यह उक्त
कथनका तात्पर्य है। जो वितर्क और वीचारके साथ रहते हैं वे सवितर्कवीचार ध्यान कहलाते हैं।
सूत्रमें आये हुए पूर्व पदसे पृथक्त्ववितर्क और एकत्ववितर्क ये दो ध्यान लिये गये हैं।
१. -क्षणमुपेत्य सर्वे-मु० । २. -मन्वर्थमव-मु० । ३. उभयेऽपि आ०, दि० १, दि० २, ना० ।