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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 445, कुल 558 में से

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पृष्ठ 445
  • ९।१८ ६ ८५४ ] नवमोऽध्यायः ३३३
    § ८५२. आङभिविध्यर्थः । तेन एकोनविंशतिरपि क्वचित् युगपत्संभवतीत्यवगम्यते ।
    तत्कथमिति चेदुच्यते - शीतोष्णपरीषहयोरेकः शय्यानिषद्याचर्याणां $^१$चान्यतम एव भवति एक-
    स्मिन्नात्मनि । कुतः । विरोधात् । तत्रयाणामपगमे युगपदेकात्मनीतरेषां संभवादेकोनविंशति-
    विकल्पा$^२$ बोद्धव्याः । ननु प्रज्ञाज्ञानयोरपि विरोधाद्युगपदसंभवः । श्रुतज्ञानापेक्षया प्रज्ञापरीषहः
    अवधिज्ञानाद्यभावापेक्षया अज्ञानपरीषह इति नास्ति विरोधः ।
    § ८५३. आह, उक्ता गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयाः संवरहेतवः पञ्च । संवरहेतुश्चा-
    रित्रसंज्ञो वक्तव्य इति तद्भेदप्रदर्शनार्थमुच्यते—
    सामायिकच्छेदोपस्थापनापरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययथाख्यातमिति
    चारित्रम् ॥१८॥
    § ८५४. अत्र चोद्यते - दशविधे धर्मे संयम उक्तः स एव चारित्रमिति पुनर्ग्रहणमनर्थक- १०
    मिति । नानर्थकम्; धर्मेऽन्तर्भूतमपि चारित्रमन्ते गृह्यते मोक्षप्राप्तेः साक्षात्कारणमिति ज्ञापनार्थम् ।
    सामायिकमुक्तम् । क्व । 'दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिक-' इत्यत्र । तद् द्विविधं नियतकालम-
    नियतकालं च । स्वाध्यायादि नियतकालम् । ईर्यापथाद्यनियतकालम्$^४$ । प्रमादकृतानर्थप्रबन्ध-
    विलोपे सम्यक्प्रतिक्रिया छेदोपस्थापना विकल्पनिवृत्तिर्वा । परिहरणं परिहारः प्राणिवधान्निवृत्तिः ।
    § ८५२. यहाँ 'आङ्' अभिविधि अर्थ में आया है। इससे किसी एक आत्मामें एक साथ उन्नीस १५
    भी सम्भव हैं यह ज्ञात होता है। शंका-यह कैसे ? समाधान-एक आत्मामें शीत और उष्ण
    परीषहोंमें-से कोई एक तथा शय्या, निषद्या और चर्या इनमें-से कोई एक परीषह ही होते हैं, क्योंकि
    शीत और उष्ण इन दोनोंके तथा शय्या, निषद्या और चर्या इन तीनोंके एक साथ होनेमें विरोध
    आता है। इन तीनोंके निकाल देनेपर एक साथ एक आत्मामें इतर परीषह सम्भव होनेसे वे सब
    मिलकर उन्नीस परीषह जानना चाहिए। शंका-प्रज्ञा और अज्ञान परीषहमें भी विरोध है, इस- २०
    लिए इन दोनों का एक साथ होना असम्भव है ? समाधान - एक साथ एक आत्मामें श्रुतज्ञानकी
    अपेक्षा प्रज्ञा परीषह और अवधिज्ञान आदिके अभावकी अपेक्षा अज्ञान परीषह रह सकते हैं इसलिए
    कोई विरोध नहीं है।
    § ८५३. कहते हैं, गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा और परीषहजय ये पाँच संवरके हेतु कहे ।
    अब चारित्रसंज्ञक संवरका हेतु कहना चाहिए इसलिए उसके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र २५
    कहते हैं-
    सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात यह पाँच
    प्रकारका चारित्र है ॥१८॥
    § ८५४. शंका-दश प्रकारके धर्ममें संयमका कथन कर आये हैं और वह ही चारित्र है
    इसलिए उसका फिरसे ग्रहण करना निरर्थक है ? समाधान-निरर्थक नहीं है, क्योंकि धर्ममें ३०
    अन्तर्भाव होनेपर भी चारित्र मोक्ष-प्राप्तिका साक्षात् कारण है यह दिखलानेके लिए उसका अन्तमें
    ग्रहण किया है। सामायिकका कथन पहले कर आये हैं। शंका-कहाँ पर ? समाधान- 'दिग्देशा-
    नर्थदण्डविरतिसामायिक'- इस सूत्रका व्याख्यान करते समय । वह दो प्रकारका है—नियतकाल
    और अनियतकाल । स्वाध्याय आदि नियतकाल सामायिक है और ईर्यापथ आदि अनियतकाल
    सामायिक है। प्रमादकृत अनर्थप्रबन्धका अर्थात् हिंसादि अव्रतोंके अनुष्ठानका विलोप अर्थात् सर्वथा ३५
    त्याग करनेपर जो भले प्रकार प्रतिक्रिया अर्थात् पुनः व्रतोंका ग्रहण होता है वह छेदोपस्थापना
    १. -चर्याणामन्यतम मु० । २. कल्पो बोद्धव्यो । ननु आ०, दि० १, दि० २ । ३. - ज्ञानापेक्षया मु० ।
    ४. -कालञ्च । प्रमा-ता० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri