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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 558 में से

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पृष्ठ 459
  • ९।३८ § ८९४ ] नवमोऽध्यायः ३४७
    § ८९१. त्रयाणां ध्यानानां निरूपणं कृतम् । इदानीं शुक्लध्यानं निरूपयितव्यम् । तल्लक्ष्य-
    माणचतुर्विकल्पम् । तत्राद्ययोः स्वामिनिर्देशार्थमिदमुच्यते—
    शुक्ले चाद्ये पूर्वविदः ॥३७॥
    § ८९२. वक्ष्यमाणेषु शुक्लध्यानविकल्पेषु आद्ये शुक्लध्याने पूर्वविदो भवतः श्रुतकेवलिन
    इत्यर्थः । 'च'शब्देन धर्म्यमपि समुच्चीयते । तत्र "व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिः" इति श्रेण्या- ५
    रोहणात्प्राग्धर्म्यं, श्रेण्योः शुक्ले इति व्याख्यायते ।
    § ८९३. अवशिष्टे कस्य भवत इत्यत्रोच्यते—
    परे केवलिनः ॥३८॥
    § ८९४. प्रक्षीणसकलज्ञानावरणस्य केवलिनः सयोगस्यायोगस्य च परे उत्तरे शुक्लध्याने
    भवतः । १०
    स्थितिमें एक आवलिकाल शेष रहनेपर उदीरणा नहीं होती । लोभसंज्वलनकी दसवें गुणस्थान तक
    उदीरणा व उदय होता है । मात्र दसवें गुणस्थानके अन्तिम आवलि कालके शेष रहनेपर उदीरणा
    नहीं होती, उदय होता है । वज्रनाराच और नाराच संहननकी ग्यारहवें गुणस्थान तक उदीरणा
    और उदय होता है । निद्रा और प्रचलाकी बारहवें गुणस्थानमें एक समय अधिक एक आवलि
    काल शेष रहने तक उदय व उदीरणा दोनों होते हैं, आगे बारहवें गुणस्थानके उपान्त्य समय १५
    तक इनका उदय ही होता है । पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय इन चौदह
    प्रकृतियोंका उदय तो बारहवें गुणस्थानके अन्तिम समय तक होता है और उदीरणा बारहवें
    गुणस्थानमें एक आवलि काल शेष रहने तक होती है । मनुष्यगति, पंचेन्द्रिय जाति, औदारिक,
    तैजस और कार्मण शरीर, छह संस्थान, औदारिक अंगोपांग, वज्रवृषभनाराच संहनन, वर्णादिक
    चार, अगुरुलघु, उपघात, उच्छ्वास, दोनों विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, २०
    अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, दुःस्वर, आदेय, यशकीर्ति, निर्माण और उच्चगोत्र इन
    अड़तीस प्रकृतियोंकी तेरहवें गुणस्थान तक उदीरणा व उदय होता है आगे नहीं । तथा तीर्थंकर
    प्रकृतिकी तेरहवें गुणस्थानमें ही उदीरणा व उदय होता है । इस प्रकार आज्ञा आदिके निमित्तसे
    सतत चिन्तन करना धर्म्यध्यान है यह उक्त कथनका तात्पर्य है !
    § ८९१. तीन ध्यानोंका कथन किया, इस समय शुक्लध्यानका कथन करना चाहिए, उसके २५
    आगे चार भेद कहनेवाले हैं उनमें-से आदिके दो भेदोंके स्वामीका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
    कहते हैं—
    आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्के होते हैं ॥३७॥
    § ८९२. आगे कहे जानेवाले शुक्लध्यानके भेदोंमें-से आदिके दो शुक्लध्यान पूर्वविद्
    अर्थात् श्रुतकेवलीके होते हैं । सूत्रमें 'च' शब्द आया है उससे धर्म्यध्यानका समुच्चय होता है । ३०
    'व्याख्यानसे विशेष ज्ञान होता है' इस नियमके अनुसार श्रेणि चढ़नेसे पूर्व धर्म्यध्यान होता है और
    दोनों श्रेणियोंमें आदिके दो शुक्लध्यान होते हैं ऐसा व्याख्यान करना चाहिए ।
    § ८९३. शेषके दो शुक्लध्यान किसके होते हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    शेषके दो शुक्लध्यान केवलीके होते हैं ॥३८॥
    § ८९४. जिसके समस्त ज्ञानावरणका नाश हो गया है ऐसे सयोगकेवली और अयोगकेवलीके ३५
    पर अर्थात् अन्तके दो शुक्लध्यान होते हैं ।
    १. 'व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षणम् ।'—परि० शे०, पृ० ८ । पा० म० मा०; पृ० ५७,
    १३०, १५४ । वक्खाणओ विसेसो न हि संदेहादलक्खणया ।।'—वि० भा० गा०, ३४७ ।