सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।१३ § ८४४ –
गुणस्थानविशेषग्रहणम् । किं तर्हि । अर्थनिर्देशः । तेन प्रमत्तादीनां संयतानां ग्रहणम् । तेषु हि
अक्षीणकषायदोषत्वात्सर्वे संभवन्ति । कस्मिन् पुनश्चारित्रे सर्वेषां संभवः । सामायिकच्छेदो-
पस्थापनपरिहारविशुद्धिसंयमेषु प्रत्येकं सर्वेषां संभवः ।
§ ८४४. आह, गृहीतमेतत्परीषहाणां स्थानविशेषावधारणम्, इदं तु न विद्मः कस्याः प्रकृतेः
५ कः कार्य इत्यत्रोच्यते—
ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने ॥१३॥
§ ८४५. इदमयुक्तं वर्तते । किमत्रायुक्तम् । ज्ञानावरणे सत्यज्ञानपरीषह उपपद्यते, प्रज्ञापरी-
षहः पुनस्तदपाये भवतीति कथं ज्ञानावरणे स्यात् । इत्यत्रोच्यते—क्षायोपशमिकी प्रज्ञा अन्यस्मिन्
ज्ञानावरणे सति मदं जनयति न सकलावरणक्षये इति ज्ञानावरणे सतीत्युपपद्यते ।
१० साम्पराय कहलाता है। यह गुणस्थान विशेषका ग्रहण नहीं है। तो क्या है ? सार्थंकनिर्देश है।
इससे प्रमत्त आदिक संयतोंका ग्रहण होता है। इनमें कषाय और दोषोंके क्षीण न होनेसे सब
परीषह सम्भव हैं। शंका—तो किस चारित्रमें सब परीषह सम्भव हैं ? समाधान—सामायिक,
छेदोपस्थापना और परिहारविशुद्धिसंयम इनमेंसे प्रत्येकमें सब परीषह सम्भव हैं।
विशेषार्थ—बादरसाम्पराय अनिवृत्तिकरण नामक नौवें गुणस्थानका दूसरा नाम है। नौवे
१५ गुणस्थान तक स्थूल कषायका सद्भाव होता है, इसलिए अन्तदीपक न्यायसे इस गुणस्थानका नाम
भी बादरसम्पराय है। यहाँ 'बादरसाम्पराय' पदसे इस गुणस्थानका ग्रहण न हो इसीलिए टीकामें
इसका निषेध किया है, क्योंकि बादरसाम्परायमें तो बाईस परीषह सम्भव हैं, बादरसाम्पराय
नामक नौवें गुणस्थानमें नहीं। कारण कि इस गुणस्थानमें दर्शनमोहनीयका उदय नहीं होता।
दर्शनमोहनीयके तीन भेद हैं। उनमेंसे सम्यक्त्वमोहनीयका उदय सातवें गुणस्थान तक ही सम्भव
२० है, क्योंकि यहीं तक वेदक सम्यक्त्व होता है, इसलिए यहाँ पर बादरसाम्पराय अर्थात् स्थूल
कषायमें सब परीषह सम्भव हैं यही अर्थ लेना चाहिए।
§ ८४४. कहते हैं—इन परीषहोंके स्थानविशेषका अवधारण किया, किन्तु हम यह नहीं
जानते कि किस प्रकृतिका क्या कार्य है इसलिए यहाँपर यह कहते हैं—
ज्ञानावरणके सद्भावमें प्रज्ञा और अज्ञान परीषह होते हैं ॥१३॥
२५ § ८४५. शंका—यह अयुक्त है ? प्रतिशंका—यहाँ क्या अयुक्त है। शंका—माना कि
ज्ञानावरणके होनेपर अज्ञान परीषह उत्पन्न होता है परन्तु प्रज्ञा परीषह उसके अभावमें होता है
इसलिए वह ज्ञानावरणके सद्भावमें कैसे हो सकता है ? समाधान—यहाँ कहते हैं—क्षायोपशमिकी
प्रज्ञा अन्य ज्ञानावरणके होनेपर मदको उत्पन्न करती है, समस्त ज्ञानावरणके क्षय होनेपर नहीं,
इसलिए ज्ञानावरणके होनेपर प्रज्ञा परीषह होती है यह कथन बन जाता है ।
३० विशेषार्थ—विकल्पका अर्थ श्रुतज्ञान है, इसलिए जहाँ तक श्रुतज्ञान होता है वहाँ तक 'मैं
अधिक जानता हूँ, यह कुछ भी नहीं जानता' ऐसा विकल्प देखा जाता है। यद्यपि इस प्रकारका
विकल्प करनेवाले व्यक्तिको अधिक ज्ञानका लाभ ज्ञानावरण कर्मके प्रकृष्ट क्षयोपशमसे होता है
तथापि जबतक क्षायोपशमिक ज्ञान होता है तभी तक यह विकल्प होता है और क्षायोपशमिक
ज्ञान उदयसापेक्ष होता है इसलिए यहाँ पर इस प्रकारके विकल्पका मुख्य कारण ज्ञानावरण कर्मका
३५ उदय कहा है। बहुतसे जीवोंको मोहका उदय रहते हुए भी ऐसा भाव होता है कि 'मैं महाप्राज्ञ हूँ,
मेरी बराबरी करनेवाला अन्य कोई नहीं।' पर यहाँ मोहके उदयसे होनेवाले इस भावका ग्रहण
१. अक्षीणकषायत्वात्सर्व- आ०, दि०, मु०, ता०, वा० । २. प्रत्येकं सर्व-आ०, दि०, मु०, ता० ।