सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें§ ८९५. यथासंख्यं तद्विकल्पप्रतिपादनार्थमिदमुच्यते—
पृथक्त्वैकत्ववितर्कसूक्ष्मक्रियाप्रतिपातिव्युपरतक्रियानिवर्तीनि ॥३९॥
§ ८९६. पृथक्त्ववितर्कमेकत्ववितर्कं सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति व्युपरतक्रियानिवर्ति चेति चतुर्विधं
शुक्लध्यानम् । वक्ष्यमाणलक्षणमपेक्ष्य¹ सर्वेषामन्वर्थत्व²मवसेयम् ।
§ ८९७. तस्यालम्बनविशेषनिर्धारणार्थमाह—
त्र्येकयोगकाययोगायोगानाम् ॥४०॥
§ ८९८. 'योग' शब्दो व्याख्यातार्थः 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इत्यत्र । उक्तैश्चतुर्भिः
शुक्लध्यानविकल्पैस्त्रियोगादीनां चतुर्णां यथासंख्येन नाभिसंबन्धो वेदितव्यः । त्रियोगस्य पृथक्त्व-
वितर्कम्, त्रिषु योगेष्वेकयोगस्यैकत्ववितर्कम्, काययोगस्य सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति, अयोगस्य व्युपरत-
क्रियानिवर्ति ।
§ ८९९. तत्राद्ययोर्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
एकाश्रये सवितर्कवीचारे पूर्वे ॥४१॥
§ ९००. एक आश्रयो ययोस्ते एकाश्रये । ³उभेऽपि परिप्राप्तश्रुतज्ञाननिष्ठेनारभ्येते, इत्यर्थः ।
वितर्कश्च वीचारश्च वितर्कवीचारौ, सह वितर्कवीचाराभ्यां वर्तेत इति सवितर्कवीचारे । पूर्वे
पृथक्त्वैकत्ववितर्के इत्यर्थः ।
§ ८९५. अब क्रमसे शुक्लध्यानके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति ये चार शुक्ल-
ध्यान हैं ॥३९॥
§ ८९६. पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति ये
चार शुक्लध्यान हैं। आगे कहे जानेवाले लक्षणकी अपेक्षा सबका सार्थक नाम जानना चाहिए।
§ ८९७. अब उसके आलम्बन विशेषका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वे चार ध्यान क्रमसे तीन योगवाले, एक योगवाले, काययोगवाले और अयोगके होते
हैं ॥४०॥
§ ८९८. 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इस सूत्रमें योग शब्दका व्याख्यान कर आये हैं। पूर्वमें
कहे गये शुक्लध्यानके चार भेदोंके साथ त्रियोग आदि चार पदोंका क्रमसे सम्बन्ध जान लेना
चाहिए। तीन योगवालेके पृथक्त्ववितर्क होता है। तीन योगोंमें-से एक योगवालेके एकत्ववितर्क
होता है। काययोगवालेके सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यान होता है और अयोगीके व्युपरतक्रियानिवर्ति
ध्यान होता है।
§ ८९९. अब इन चार भेदोंमें-से आदिके दो भेदोंके सम्बन्धमें विशेष ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
पहलेके दो ध्यान एक आश्रयवाले, सवितर्क और सवीचार होते हैं ॥४१॥
§ ९००. जिन दो ध्यानोंका एक आश्रय होता है वे एक आश्रयवाले कहलाते हैं। जिसने
सम्पूर्ण श्रुतज्ञान प्राप्त कर लिया है उसके द्वारा ही ये दो ध्यान आरम्भ किये जाते हैं। यह उक्त
कथनका तात्पर्य है। जो वितर्क और वीचारके साथ रहते हैं वे सवितर्कवीचार ध्यान कहलाते हैं।
सूत्रमें आये हुए पूर्व पदसे पृथक्त्ववितर्क और एकत्ववितर्क ये दो ध्यान लिये गये हैं।
१. -क्षणमुपेत्य सर्वे-मु० । २. -मन्वर्थमव-मु० । ३. उभयेऽपि आ०, दि० १, दि० २, ना० ।