सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 447, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें– ९।१९ § ८५६ ] नवमोऽध्यायः ३३५
§ ८५५. आह, उक्तं चारित्रम् । तदनन्तरमुद्दिष्टं यत् 'तपसा निर्जरा च' इति तस्येदानीं
तपसो विधानं कर्तव्यमित्यत्रोच्यते । तद् द्विविधं बाह्यमाभ्यन्तरं च । तत्प्रत्येकं षड्विधम् । तत्र
बाह्यभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह ।
अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनकायक्लेशा
बाह्यं तपः ॥ १६ ॥ ५
§ ८५६. दृष्टफलानपेक्षं संयमप्रसिद्धिरागोच्छेदकर्मविनाशध्यानागमावाप्त्यर्थमनशनम् ।
संयमप्रजागेरदोषप्रशमसंतोषस्वाध्यायादिसुखसिद्धयर्थमवमौदर्यम् । भिक्षार्थिनो मुनेरेकागारा-
दिविषयः२ संकल्पः चिन्तावरोधो वृत्तिपरिसंख्यानमाशानिवृत्त्यर्थमवगन्तव्यम् । इन्द्रियदर्पनिग्रह-
निद्राविजयस्वाध्यायसुखसिद्धयर्था३ चर्थो घृतादिवृष्यरसपरित्यागश्चतुर्थं तपः । शून्यागारादिषु
विविक्तेषु जन्तुपीडाविरहितेषु संयतस्य शय्यासनमाबाधात्ययब्रह्मचर्यस्वाध्यायध्यानादिप्रसिद्ध्यर्थं १०
कर्तव्यमिति पञ्चमं तपः । आतपस्थानं वृक्षमूलनिवासो निरावरणशयनं बहुविधप्रतिमास्थान-
मित्येवमादिः कायक्लेशः४ तत् षष्ठं तपः । तत्किमर्थम् । देहदुःखतितिक्षासुखानभिष्वङ्गप्रवचनप्रभा-
एक प्रकारकी होकर भी अनन्तगुणी होती है। यही कारण है कि सूत्रमें सामायिक, छेदोपस्थापना
इत्यादि क्रमसे इन पाँचोंका नाम निर्देश किया है। पहले दस प्रकारके धर्मका निर्देश करते समय
संयमधर्म कह आये हैं, इसलिए चारित्रका अन्तर्भाव उसमें हो जानेके कारण यहाँ इसका अलगसे १५
कथन करनेकी आवश्यकता नहीं है ऐसा प्रश्न होता है, फिर भी समस्त कर्मका क्षय चारित्रसे होता
है यह दिखलानेके लिए यहाँ चारित्रका पृथक् रूपसे व्याख्यान किया है ।
§ ८५५. कहते हैं, चारित्रका कथन किया । संवरके हेतुओंका निर्देश करनेके बाद 'तपसा
निर्जरा च' यह सूत्र कहा है, इसलिए यहाँ पर तपका विधान करना चाहिए, अतः यहाँ कहते हैं—
वह दो प्रकारका है—बाह्य और आभ्यन्तर । उसमें भी यह प्रत्येक छह प्रकारका है। उनमें से २०
पहले बाह्य तपके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश यह
छह प्रकारका बाह्य तप है ॥१९॥
§ ८५६. दृष्टफल मन्त्र साधना आदिकी अपेक्षा किये बिना संयमकी सिद्धि, रागका उच्छेद,
कर्मोंका विनाश, ध्यान और आगमकी प्राप्तिके लिए अनशन तप किया जाता है। संयमको जागृत २५
रखने, दोषोंके प्रशम करने, सन्तोष और स्वाध्याय आदिकी सुखपूर्वक सिद्धिके लिए अवमौदर्य तप
किया जाता है। भिक्षाके इच्छुक मुनिका एक घर आदि विषयक संकल्प अर्थात् चिन्ताका अवरोध
करना वृत्तिपरिसंख्यान तप है। आशाकी निवृत्ति इसका फल जानना चाहिए। इन्द्रियोंके दर्पका
निग्रह करनेके लिए, निद्रापर विजय पानेके लिए और सुखपूर्वक स्वाध्यायकी सिद्धिके लिए घृतादि
गरिष्ठ रसका त्याग करना चौथा तप है। एकान्त जन्तुओंकी पीड़ासे रहित शून्य घर आदिमें ३०
निर्बाध ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय और ध्यान आदिकी सिद्धिके लिए संयतको शय्यासन लगाना चाहिए।
यह पाँचवाँ तप है। आतापनयोग, वृक्षके मूलमें निवास, निरावरण शयन और नाना प्रकारके
प्रतिमास्थान इत्यादि करना कायक्लेश है, यह छठवाँ तप है। यह किसलिए किया जाता है ? यह
देह-दुःखको सहन करनेके लिए, सुखविषयक आसक्तिको कम करनेके लिए और प्रवचनकी प्रभावना
१. –गरणदोष- आ०, दि० १, दि० २, ना०। २. –विषयसंकल्पचित्ताव-ता०, मु० । -विषयः संकल्प- ३५
चिन्ताव- दि० १, दि० २ । ३. -सिद्धयर्थो मु०, दि० २ । ४. –क्लेशः षष्ठं मु० ता० ।