सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 446, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेन विशिष्टा शुद्धिर्यस्मिंस्तत्परिहारविशुद्धिचारित्रम् । अतिसूक्ष्मकषायत्वात्सूक्ष्मसांपरायचारित्रम् ।
मोहनीयस्य निरवशेषस्योपशामात्क्षयाच्च आत्मस्वभावावस्थापेक्षालक्षणं अथाख्यातचारित्रमित्या-
ख्यायते । पूर्वचारित्रानुष्ठायिभिराख्यातं न तत्प्राप्तं प्राङ्मोहक्षयोपशमाभ्यामित्यथाख्यातम् । अथ-
शब्दस्यानन्तर्यार्थवृत्तित्वान्निरवशेषमोहक्षयोपशमानन्तरमाविर्भवतीत्यर्थः२ । 'यथाख्यातम्' इति
५ वा; यथात्मस्वभावोऽवस्थितस्तथैवाख्यातत्वात् । 'इति'शब्दः परिसमाप्तौ द्रष्टव्यः । ततो यथा-
ख्यातचारित्रात्सकलकर्मक्षयपरिसमाप्तिर्भवतीति ज्ञायते । सामायिकादीनामानुपूर्व्यवचनमुत्तरोत्तर-
गुणप्रकर्ष३ख्यापनार्थं क्रियते ।
चारित्र है। अथवा विकल्पोंकी निवृत्तिका नाम छेदोपस्थापनाचारित्र है। प्राणिवधसे निवृत्तिको
परिहार करते हैं। इस युक्त शुद्धि जिस चारित्रमें होती है वह परिहारविशुद्धि चारित्र है। जिस
१० चारित्रमें कषाय अतिसूक्ष्म हो जाता है वह सूक्ष्मसाम्परायचारित्र है। समस्त मोहनीय कर्मके
उपशम या क्षयसे जैसा आत्माका स्वभाव है उस अवस्था रूप जो चारित्र होता है वह अथाख्यात-
चारित्र कहा जाता है। पूर्व चारित्रका अनुष्ठान करनेवालोंने जिसका कथन किया है पर मोहनीयके
क्षय या उपशम होनेके पहले जिसे प्राप्त नहीं किया इसलिए उसे अथाख्यात कहते हैं। 'अथ' शब्द
'अनन्तर' अर्थवर्ती होनेसे समस्त मोहनीय कर्मके क्षय या उपशमके अनन्तर वह आविर्भूत
१५ होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है। अथवा इस चारित्रका एक नाम यथाख्यात भी है। जिस
प्रकार आत्माका स्वभाव अवस्थित है उसी प्रकार यह कहा गया है, इसलिए इसे यथाख्यात कहते
हैं। सूत्रमें आया हुआ 'इति' शब्द परिसमाप्ति अर्थमें जानना चाहिए। इसलिए इससे यथाख्यात
चारित्रसे समस्त कर्मोंके क्षयकी परिसमाप्ति होती है यह जाना जाता है। उत्तरोत्तर गुणोंके
प्रकर्षका ख्यापन करनेके लिए सामायिक, छेदोपस्थापना इत्यादि क्रमसे इनका नामनिर्देश
२० किया है।
विशेषार्थ—चारित्र यह एक प्रकारका होकर भी उसके पांच भेद विवक्षाविशेषसे किये गये
हैं। सामायिकमें सर्वसावद्यकी निवृत्तिरूप संकल्पकी मुख्यता है। छेदोपस्थापनामें चारित्रमें लगनेवाले
दोषोंके परिमार्जनकी मुख्यता है। परिहारविशुद्धि चारित्र ऐसे संयतके होता है जो तीस वर्षतक
गृहस्थ अवस्थामें सुखपूर्वक बिताकर संयत होनेपर तीर्थंकरके पादमूलकी परिचर्या करते हुए आठ
२५ वर्ष तक प्रत्याख्यानपूर्वका अध्ययन करता है। यह जन्तुओंकी रक्षा कैसे करनी चाहिए, वे किस
द्रव्यके निमित्तसे किस क्षेत्र और किस कालमें विशेषतः उत्पन्न होते हैं, जीवोंकी योनि और जन्म
कितने प्रकारके होते हैं इत्यादि बातोंको भले प्रकार जानता है। यह प्रमादरहित, महाबलशाली,
कर्मोंकी महानिर्जरा करनेवाला और अति दुष्कर चर्याका अनुष्ठान करनेवाला होता है। तथा यह
तीनों संध्याकालोंको छोड़कर दो कोस गमन करनेवाला होता है। इन सब कारणोंसे इस संयतके
३० ऐसी सामर्थ्य उत्पन्न होती है जिसके बलसे यह अन्य जीवोंको बाधा पहुँचाये बिना चर्या करनेमें
समर्थ होता है। सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात चारित्रका अर्थ स्पष्ट ही है। इस प्रकार विवक्षाभेद-
से एक चारित्र पाँच प्रकारका कहा गया है।
इनमें से सामायिक और छेदोपस्थापनाकी जघन्य विशुद्धिलब्धि सबसे अल्प होती है।
इससे परिहारविशुद्धि चारित्रकी जघन्य विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है। इससे इसीकी उत्कृष्ट
३५ विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है। इससे सामायिक और छेदोपस्थापनाकी उत्कृष्ट विशुद्धिलब्धि
अनन्तगुणी होती है। इससे सूक्ष्मसाम्पराय चारित्रकी जघन्य विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है।
इससे इसीकी उत्कृष्ट विशुद्धिलब्धि अनन्तगुणी होती है। इससे यथाख्यात चारित्रकी विशुद्धिलब्धि
१. -नन्तरार्थवर्ति-मु०, ता० । २. -त्यर्थः । तथा-मु०, ता०, ना० । ३. -कर्षज्ञापनार्थम् मु० ।