सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।१६ § ८४९ –
निषद्यापरीषहस्य कथम् । तत्रापि प्राणिपीडापरिहारार्थत्वात् । मोहोदये सति प्राणिपीडापरिणामः
संजायत इति ।
§ ८४९. अवशिष्टपरीषहप्रकृतिविशेषप्रतिपादनार्थमाह—
वेदनीये शेषाः ॥१६॥
§ ८५०. उक्ता एकादश परीषहाः । तेभ्योऽन्ये शेषाः वेदनीये सति 'भवन्ति' इति वाक्यशेषः ।
के पुनस्ते । क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकचर्याशय्यावधरोगतृणस्पर्शमलपरीषहाः ।
§ ८५१. आह, व्याख्यातनिमित्तलक्षणविकल्पाः प्रत्यात्मनि प्रादुर्भवन्तः कति युगपदवतिष्ठन्त
इत्यत्रोच्यते—
एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नैकान्नविंशतेः ॥१७॥
उनका निमित्त कहते हैं पर निषद्यापरीपह मोहोदयके निमित्तसे कैसे होता है ? समाधान—उसमें
भी प्राणिपीडाके परिहारकी मुख्यता होनेसे वह मोहोदय निमित्तक माना गया है, क्योंकि मोहोदय-
के होनेपर प्राणिपीडारूप परिणाम होता है ।
विशेषार्थ—आगे चर्या और शय्याको वेदनीयनिमित्तक कहा है और यहाँ निषद्याको
मोहनीयनिमित्तक । ये तीनों परीषह एक श्रेणीके हैं । फिर क्या कारण है कि इनमें-से निषद्याको
मोहोदय निमित्तक कहा है । यदि चर्या और शय्या परीषह वेदनीयनिमित्तक होते हैं तो इसे
वेदनीयनिमित्तक क्यों नहीं माना जाता । यह एक प्रश्न है जिसका उत्तर टीकामें दिया है । वहाँ
बतलाया है कि प्राणिपीडारूप परिणाम मोहोदयसे होता है और निषद्यापरीषहजयमें इस प्रकारके
परिणामपर विजय पानेकी मुख्यता है । यही कारण है कि निषद्याको चारित्रमोहनिमित्तक माना
है । माना कि इस विवक्षासे चर्या और शय्या परीषहको भी मोहोदयनिमित्तक मान सकते थे पर
वहाँ कण्टकादिकके निमित्तसे होनेवाली वेदनाकी मुख्यता करके उक्त दोनों परीषह वेदनीयनिमित्तक
कहे हैं । तात्पर्य यह है कि चर्या, शय्या और निषद्या इनमें प्राणिपोड़ा और कण्टकादिनिमित्तक
वेदना ये दोनों कार्य सम्भव हैं। इसलिए इन दोनों कार्योंका परिज्ञान करानेके लिए निषद्याको
मोहनिमित्तक और शेष दोको वेदनीयनिमित्तक कहा है ।
§ ८४९. अब अवशिष्ट परीषहोंकी प्रकृति विशेषका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
बाकीके सब परीषह वेदनीयके सद्भावमें होते हैं ॥१६॥
§ ८५०. ग्यारह परीषह पहले कह आये हैं । उनसे अन्य शेष परीषह हैं । वे वेदनीयके
सद्भावमें होते हैं। यहां 'भवन्ति' यह वाक्यशेष है । शंका—वे कौन-कौन हैं ? समाधान—क्षुधा,
पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या. वध, रोग, तृणस्पर्श और मलपरीषह ।
विशेषार्थ—शरीरमें भोजनका कम होना, पानीका कम होना. कण्ठका सूखना, ऋतुमें
ठण्डी या गरमीका होना, डांस-मच्छरका काटना, गमन व शयन करते समय कण्टक आदिका
चुभना, किसीके द्वारा मारना, गाली-गलौज करना, शरीरमें रोगका होना, तिनका आदिका
चुभना और शरीरमें मलका जमा होना आदि अपने-अपने कारणोंसे होते हैं। इनका कारण
वेदनीय कर्मका उदय नहीं है पर इन कामोंके होने पर भूखकी वेदना होती है, प्यास लगती है
आदि वह वेदनीय कर्मका कार्य है । ऐसा यहाँ अभिप्राय समझना चाहिए ।
§ ८५१. कहते हैं, परीषहोंके निमित्त, लक्षण और भेद कहे । प्रत्येक आत्मामें उत्पन्न होते
हुए वे एक साथ कितने हो सकते हैं, इस बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
एक साथ एक आत्मामें एकसे लेकर उन्नीस तक परीषह विकल्पसे हो सकते हैं ॥१७॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri