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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 451, कुल 558 में से

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पृष्ठ 451

जितः साधुः । मनोज्ञो लोकसंमतः । तेषां व्याधिपरिषहमिथ्यात्वाद्युपनिपाते कायचेष्टया द्रव्यान्तरेण
वा तत्प्रतीकारो वैयावृत्यं समाध्याधानविचिकित्साभावप्रवचनवात्सल्याद्यभिव्यक्त्यर्थम्² ।
§ ८६७. स्वाध्यायविकल्पविज्ञानार्थमाह—
वाचनाप्रच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशाः ॥२५॥
§ ८६८. निरवद्यग्रन्थार्थोभयप्रदानं वाचना । संशयच्छेदाय निश्चितबलाधानाय वा परानु- ५
योगः प्रच्छना । अधिगताथंस्य मनसाभ्यासोऽनुप्रेक्षा । घोषशुद्धं परिवर्तनमाम्नायः । धर्मकथाद्य-
नुष्ठानं धर्मोपदेशः । स एष पञ्चविधः स्वाध्यायः किमर्थः । प्रज्ञातिशयः प्रशस्ताध्यवसायः परमसं-
वेगस्तपोवृद्धिरतिचारविशुद्धिरित्येवमाद्यर्थः ।
§ ८६९. व्युत्सर्गभेदनिर्ज्ञानार्थमाह—
बाह्याभ्यन्तरोपध्योः ॥२६॥ १०
§ ८७०. व्युत्सर्जनं व्युत्सर्गस्त्यागः । स द्विविधः—बाह्योपधित्यागोऽभ्यन्तरोपधित्यागश्चेति ।
अनुपात्तं वस्तुधनधान्यादि बाह्योपधिः । क्रोधादिरात्मभावोऽभ्यन्तरोपधिः । कायत्यागश्च नियत-
कालो यावज्जीवं वाभ्यन्तरोपधित्याग इत्युच्यते । स किमर्थः । निस्सङ्गत्वनिर्भयत्वजीविताशाव्यु-
दासाद्यर्थः ।
के शिष्यसमुदायको कुल कहते हैं। चार वर्णके श्रमणोंके समुदायको संघ कहते हैं। चिरकालसे १५
प्रव्रजितको साधु कहते हैं। लोकसम्मत साधुको मनोज्ञ कहते हैं। इन्हें व्याधि होनेपर, परीषहके
होनेपर व मिथ्यात्व आदिके प्राप्त होनेपर शरीरकी चेष्टा द्वारा या अन्य द्रव्यद्वारा उनका प्रतीकार
करना वैयावृत्य तप है। यह समाधिकी प्राप्ति, विचिकित्साका अभाव और प्रवचनवात्सल्यकी
अभिव्यक्तिके लिए किया जाता है।
§ ८६७. अब स्वाध्यायके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश यह पाँच प्रकारका स्वाध्याय है ॥२५॥
§ ८६८. निर्दोष ग्रन्थ, अर्थ और दोनोंका प्रदान करना वाचना है। संशयका उच्छेद
करनेके लिए अथवा निश्चित बलको पुष्ट करनेके लिए प्रश्न करना प्रच्छना है। जाने हुए अर्थका
मनमें अभ्यास करना अनुप्रेक्षा है। उच्चारणकी शुद्धिपूर्वक पाठको पुनःपुनः दुहराना आम्नाय है
और धर्मकथा आदिका अनुष्ठान करना धर्मोपदेश है। शंका—यह पूर्वोक्त पाँच प्रकारका स्वाध्याय २५
किसलिए किया जाता है। समाधान—प्रज्ञामें अतिशय लानेके लिए, अध्यवसायको प्रशस्त करनेके
लिए, परम संवेगके लिए, तपमें वृद्धि करनेके लिए और अतीचारोंमें विशुद्धि लाने आदिके लिए
किया जाता है।
§ ८६९. अब व्युत्सर्ग तपके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बाह्य और अभ्यन्तर उपधिका त्याग यह दो प्रकारका व्युत्सर्ग है ॥२६॥ ३०
§ ८७०. व्युत्सर्जन करना व्युत्सर्ग है। जिसका अर्थ त्याग होता है। वह दो प्रकारका है—
बाह्य उपधित्याग और अभ्यन्तर उपधित्याग। आत्मासे एकत्वको नहीं प्राप्त हुए ऐसे वास्तु, धन
और धान्य आदि बाह्य उपधि है और क्रोधादिरूप आत्मभाव अभ्यन्तर उपधि है। तथा नियत
काल तक या यावज्जीवन तक कायका त्याग करना भी अभ्यन्तर उपधि त्याग कहा जाता है।
यह निःसंगता, निर्भयता और जीविताशाका व्युदास आदिकरनेके लिए किया जाता है। ३५
१. -माध्यायान- मु० । २. -व्यक्तार्थम् आ०, दि० १, दि० २, ना० ।