सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 458, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंभव और भावनिमित्तक उदय और उदीरणा जान लेनी चाहिए । कालप्राप्त कर्मपरमाणुओंके
अनुभव करनेको उदय कहते हैं और उदयावलिके बाहर स्थित कर्मपरमाणुओंको कषायसहित या
कषायरहित योग संज्ञावाले वीर्यविशेषके द्वारा उदयावलिमें लाकर उनका उदयप्राप्त कर्मपरमाणुओं
के साथ अनुभवन करनेको उदीरणा कहते हैं । इस प्रकार कर्मपरमाणुओंका अनुभवन उदय और
उदीरणा दोनोंमें लिया जाता है । यदि इनमें अन्तर है तो कालप्राप्त और अकालप्राप्त परमाणुओं-
का है । उदयमें कालप्राप्त कर्मपरमाणु रहते हैं और उदीरणामें अकालप्राप्त कर्मपरमाणु रहते हैं ।
सामान्य नियम यह है कि जहाँ जिस कर्मका उदय होता है वहाँ उसकी उदीरणा अवश्य होती है ।
फिर भी इनमें जो विशेषता है उसका यहाँ निर्देश करते हैं—मिथ्यात्वका उदय और उदीरणा
मिथ्यात्व गुणस्थानमें होती है । इतनी विशेषता है कि उपशम सम्यक्त्वके अभिमुख हुए जीवके
अन्तिम आवली प्रमाण कालमें मिथ्यात्वकी उदीरणा नहीं होती वहाँ मात्र उसका उदय होता है ।
एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रिय जाति, चतुरिन्द्रियजाति, आतप, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त
और साधारण इन नौ प्रकृतियोंका मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं ।
अनन्तानुबन्धी चतुष्कका प्रारम्भके दो गुणस्थानोंमें ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं ।
सम्यङ्मिथ्यात्वका तीसरे गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है, अन्यत्र नहीं । अप्रत्याख्यान
चार, नरकगति, देवगति, वैक्रियिक शरीर, वैक्रियिक अंगोपांग, दुर्भग, अनादेय और अयशस्कीर्ति
इन ग्यारह प्रकृतियोंका चौथे गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । नरकायु
और देवायुका चौथे गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । मात्र मरणके
समय अन्तिम आवलिकालमें उदीरणा नहीं होती । चार आनुपूर्वीयोंका प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ
गुणस्थानमें ही उदय और उदीरणा होती है अन्यत्र नहीं । प्रत्याख्यानावरणचतुष्क, तिर्यंचगति,
उद्योत और नीचगोत्र इन सात प्रकृतियोंका संयतासंयत गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा
होती है आगे नहीं । तिर्यंच आयुका पाँचवें गुणस्थान तक ही उदय और उदीरणा होती है । मात्र
मरणके समय अन्तिम आवलि कालके शेष रहनेपर उदय ही होता है उदीरणा नहीं । निद्रानिद्रा,
प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, सातावेदनीय और असातावेदनीय इन पाँच प्रकृतियोंका छठे गुणस्थान
तक ही उदय और उदीरणा होती है आगे नहीं । मात्र निद्रानिद्रादि त्रिकको उदीरणा वही करता
है जिसने इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण कर ली है । ऐसा जीव यदि उत्तर शरीरकी विक्रिया करता है या
आहारकसमुद्घातको प्राप्त होता है तो इन्हें प्राप्त होनेके एक आवलि कालपूर्वसे लेकर मूल शरीरमें
प्रवेश होने तक इन तीनकी उदीरणा नहीं होती । तथा देव, नारकी और भोगभूमियाँ जीव भी
इन तीनकी उदीरणा नहीं करते । आहारक शरीर और आहारक अंगोपांगको प्रमत्तसंयतमें ही
उदीरणा और उदय होता है, आगे पीछे नहीं । मनुष्यायुकी छठे गुणस्थानतक उदीरणा और १४वें
गुणस्थान तक उदय होता है । मात्र मरणके समय अन्तिम आवलि काल शेष रहने पर उदीरणा
नहीं होती । सम्यक्त्वप्रकृतिकी उदीरणा और उदय चौथेसे लेकर सातवें गुणस्थानतक वेदकसम्य-
ग्दृष्टिके होता है । मात्र कृतकृत्यवेदकके कालमें व द्वितीयोपशम सम्यक्त्वके उत्पत्तिकालमें एक
आवलि शेष रहनेपर उदय ही होता है उदीरणा नहीं । अन्तके तीन संहननोंकी उदीरणा व उदय
सातवें गुणस्थान तक ही होता है आगे नहीं । हास्यादि छहकी उदीरणा और उदय आठवें
गुणस्थान तक होता है आगे नहीं । इतनी विशेषता है कि देवोंके उत्पत्ति समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त
काल तक हास्य और रतिकी नियमसे उदीरणा होती है आगे भजनीय है । तथा नारकियोंके
उत्पत्तिसमयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त कालतक अरति और शोककी नियमसे उदीरणा होती है आगे
भजनीय है । तीन वेद और क्रोधादि तीन संज्वलनोंकी उदीरणा व उदय नौवेंके उपान्त्य भाग तक
ही होता है आगे नहीं । इतनी विशेषता है कि जो जिस वेदके उदयसे श्रेणि चढ़ता है उसके प्रथम