सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 454, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें§ ८७७. तत्तार्तं चतुर्विधम् । तत्रादिविकल्पलक्षणनिर्देशार्थमाह—
आर्तममनोज्ञस्य संप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः ॥३०॥
§ ८७८. अमनोज्ञमप्रियं विषकण्टकशत्रुशस्त्रादि, तद्बाधाकारणत्वाद् 'अमनोज्ञम्' इत्युच्यते ।
तस्य संप्रयोगे, स कथं नाम मे न स्यादिति संकल्पश्चिन्ताप्रबन्धः स्मृतिसमन्वाहारः प्रथममार्त-
मित्याख्यायते ।
§ ८७९. द्वितीयस्य विकल्पस्य लक्षणनिर्देशार्थमाह—
विपरीतं मनोज्ञस्य ॥३१॥
§ ८८०. कुतो विपरीतम् । पूर्वोक्तात् । तेनैतदुक्तं भवति—मनोज्ञस्येष्टस्य स्वपुत्रदारधना-
देर्विप्रयोगे तत्संप्रयोगे संकल्पश्चिन्ताप्रबन्धो द्वितीयमार्तमवगन्तव्यम् ।
§ ८८१. तृतीयस्य विकल्पस्य लक्षणप्रतिपादनार्थमाह—
वेदनायाश्च ॥३२॥
§ ८८२. 'वेदना'शब्दः सुखे दुःखे च वर्तमानोऽपि आर्तस्य प्रकृतत्वाद् दुःखवेदनायां प्रवर्तते,
तस्या वातादिविकारजनितवेदनाया उपनिपाते तस्या अपायः कथं नाम मे स्यादिति संकल्प-
श्चिन्ताप्रबन्धस्तृतीयमार्तमुच्यते ।
§ ८८३. तुरीयस्यार्तस्य लक्षणनिर्देशार्थमाह—
निदानं च ॥३३॥
§ ८७७. आर्तध्यान चार प्रकारका है। उनमें से प्रथम भेदके लक्षणका निर्देश करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
अमनोज्ञ पदार्थके प्राप्त होनेपर उसके वियोगके लिए चिन्तासातत्यका होना प्रथम आर्त-
ध्यान है ॥३०॥
§ ८७८. विष, कण्टक, शत्रु और शस्त्र आदि जो अप्रिय पदार्थ हैं वे बाधाके कारण होनेसे
अमनोज्ञ कहे जाते हैं। उनका संयोग होनेपर वे मेरे कैसे न हों इस प्रकारका संकल्प चिन्ता प्रबन्ध
अर्थात् स्मृति समन्वाहार यह प्रथम आर्तध्यान कहलाता है ।
§ ८७९. अब दूसरे भेदके लक्षणका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मनोज्ञ वस्तुके वियोग होनेपर उसकी प्राप्तिकी सतत चिन्ता करना दूसरा आर्तध्यान
है ॥३१॥
§ ८८०. किससे विपरीत ? पूर्वमें कहे हुएसे । इससे यह तात्पर्य निकलता है कि मनोज्ञ
अर्थात् इष्ट अपने पुत्र, स्त्री और धनादिकके वियोग होनेपर उसकी प्राप्तिके लिए संकल्प अर्थात्
निरन्तर चिन्ता करना दूसरा आर्तध्यान जानना चाहिए ।
§ ८८१. अब तीसरे भेदके लक्षणका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वेदनाके होनेपर उसे दूर करनेके लिए सतत चिन्ता करना तीसरा आर्तध्यान है ॥३२॥
§ ८८२. वेदना शब्द यद्यपि सुख और दुःख दोनों अर्थोंमें विद्यमान है पर यहाँ आर्तध्यानका
प्रकरण होनेसे उससे दुःखवेदना ली गयी है। वातादि विकारजनित दुःख वेदनाके होनेपर उसका
अभाव मेरे कैसे होगा इस प्रकार विकल्प अर्थात् निरन्तर चिन्ता करना तीसरा आर्तध्यान कहा
जाता है ।
§ ८८३. अब चौथे आर्तध्यानके लक्षणका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
निदान नामका चौथा आर्तध्यान है ॥३३॥