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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 450, कुल 558 में से

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पृष्ठ 450

३३८ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।२३ § ८६३ -
§ ८६३. विनयविकल्पप्रतिपत्त्यर्थमाह—
ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः ॥२३॥
§ ८६४. 'विनयः' इत्यधिकारेणाभिसंबन्धः क्रियते। ज्ञानविनयो दर्शनविनयश्चारित्र-
विनय उपचारविनयश्चेति। सबहुमानं मोक्षार्थं ज्ञानग्रहणाभ्यासस्मरणादिर्ज्ञानविनयः। शङ्कादि-
दोषविरहितं तत्त्वार्थश्रद्धानं दर्शनविनयः। तद्वैतश्चारित्रे¹ समाहितचित्तता चारित्रविनयः। प्रत्य-
क्षेष्वाचार्यादिष्वभ्युत्थानाभिगमनाञ्जलिकरणादिरुपचारविनयः। परोक्षेष्वपि कायवाङ्मनोऽभि-
रञ्जलिक्रियागुणसङ्कीर्तनानुस्मरणादिः।
§ ८६५. वैयावृत्त्यभेदप्रतिपादनार्थमाह—
आचार्योपाध्यायतपस्विशैक्षग्लानगणकुलसंघसाधुमनोज्ञानाम् ॥२४॥
§ ८६६. वैयावृत्त्यं दशधा भिद्यते। कुतः। विषयभेदात्। आचार्यवैयावृत्त्यमुपाध्यायवैया-
वृत्त्यमित्यादि। तत्र आचरन्ति² तस्माद् व्रतानीत्याचार्यः। मोक्षार्थं शास्त्रमुपेत्य³ तस्मादधीयत
इत्युपाध्यायः। महोपवासाद्यनुष्ठायी तपस्वी। शिक्षाशीलः शैक्षः। रुजादिक्क्लिष्टशरीरो ग्लानः।
गणः स्थविरसंततिः। दीक्षाचार्यशिष्यसंस्त्यार्यैः⁴ कुलम्। चातुर्वर्णं⁵ श्रमणनिवहः संघः। चिरप्रव्र-
हैं किन्तु मूलाचारमें इसके आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, मूल,
परिहार और श्रद्धान इस प्रकार दस भेद किये हैं। टीकाकारने इनका स्पष्टीकरण करते समय
मूलका वही अर्थ किया है जो यहाँ उपस्थापनाका किया गया है। तथा मानसिक दोषके होनेपर
उसके परिमार्जनके लिए मेरा दोष मिथ्या हो ऐसा अभिव्यक्त करनेको श्रद्धान नामका प्रायश्चित्त
बतलाया है।
§ ८६३. विनयके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय और उपचारविनय यह चार प्रकारका विनय
है ॥२३॥
§ ८६४. अधिकारके अनुसार 'विनय' इस पदका सम्बन्ध होता है—ज्ञानविनय, दर्शन-
विनय, चारित्रविनय और उपचारविनय। बहुत आदरके साथ मोक्षके लिए ज्ञानका ग्रहण करना,
अभ्यास करना और स्मरण करना आदि ज्ञानविनय है। शंकादि दोषोंसे रहित तत्त्वार्थका श्रद्धान
करना दर्शनविनय है। सम्यग्दृष्टिका चारित्रमें चित्तका लगना चारित्रविनय है तथा आचार्य
आदिके समक्ष आनेपर खड़े हो जाना, उनके पीछे-पीछे चलना और नमस्कार करना आदि
उपचारविनय है तथा उनके परोक्षमें भी काय, वचन और मनसे नमस्कार करना, उनके गुणोंका
कीर्तन करना और स्मरण करना आदि उपचारविनय है।
§ ८६५. अब वैयावृत्त्यके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष, ग्लान, गण, कुल, संघ, साधु और मनोज्ञ इनकी
वैयावृत्त्यके भेदसे वैयावृत्त्य दश प्रकारका है ॥२४॥
§ ८६६. वैयावृत्त्यके दश भेद हैं, क्योंकि उसका विषय दश प्रकारका है। यथा—आचार्य-
वैयावृत्त्य और उपाध्याय-वैयावृत्त्य आदि। जिसके निमित्तसे व्रतोंका आचरण करते हैं वह आचार्य
कहलाता है। मोक्षके लिए पास जाकर जिससे शास्त्र पढ़ते हैं वह उपाध्याय कहलाता है।
महोपवास आदिका अनुष्ठान करनेवाला तपस्वी कहलाता है। शिक्षाशील शैक्ष कहलाता है। रोग
आदिसे क्लान्त शरीरवाला ग्लान कहलाता है। स्थविरोंकी सन्ततिको गण कहते हैं। दीक्षाचार्य-
१. तत्त्वतश्चा-मु० । २. -रन्ति सस्या-आ०, दि० १, दि० २, ता०, ना० । ३. 'उपेत्याधीयते तस्मादु-
पाध्यायः।' -पा० म० सा० ३, ३, ११ । ४. -संस्त्ययः मु० । ५. चातुर्वर्ण्यश्च -मु० ।