सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 455, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 455
- ९।३५ § ८८८ ] नवमोऽध्यायः ३४३
§ ८८४. भोगाकाङ्क्षातुरास्यानागतविषयप्राप्तिं प्रति मनःप्रणिधानं संकल्पश्चिन्ताप्रबन्ध-
स्तुरीयमार्तं निदानमित्युच्यते ।
§ ८८५. तदेतच्चतुर्विधमार्तं किंस्वामिकमिति चेदुच्यते—
तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् ॥३४॥
§ ८८६. अविरता असंयतसम्यग्दृष्ट्यन्ताः । देशविरताः संयतासंयताः । प्रमत्तसंयताः पञ्च-
दशप्रमादोपेताः क्रियानुष्ठायिनः । तत्राविरतदेशविरतानां चतुर्विधमप्यार्तं भवति; असंयमपरिणामो-
पेतत्त्वात् । प्रमत्तसंयतानां तु निदानवर्ज्यमन्यदार्तत्रयं प्रमादोदयोद्रेकात्कदाचित्स्यात् ।
§ ८८७. व्याख्यातमार्तं संज्ञादिभिः । द्वितीयस्य संज्ञाहेतुस्वामिनिर्द्धारणार्थमाह—
हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयोः ॥३५॥
§ ८८८. हिंसादीन्युक्तलक्षणानि । तानि रौद्रध्यानोत्पत्तेर्निमित्तीभवन्तीति हेतुनिर्देशो विज्ञा-
यते । तेन हेतुनिर्देशेनानुवर्तमानः 'स्मृतिसमन्वाहारः' अभिसंबध्यते । हिंसायाः स्मृतिसमन्वाहार
इत्यादि । तद्रौद्रध्यानमविरतदेशविरतयोर्वेदितव्यम् । अविरतस्य भवतु रौद्रध्यानं, देशविरतस्य
§ ८८४. भोगोंकी आकांक्षाके प्रति आतुर हुए व्यक्तिके आगामी विषयोंकी प्राप्तिके लिए
मनःप्रणिधानका होना अर्थात् संकल्प तथा निरन्तर चिन्ता करना निदान नामका चौथा
आर्तध्यान कहा जाता है ।
§ ८८५. इस चार प्रकारके आर्तध्यानका स्वामी कौन है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
यह आर्तध्यान अविरत, देशविरत और प्रमत्तसंयत जीवोंके होता है ॥३४॥
§ ८८६. असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान तकके जीव अविरत कहलाते हैं, संयतासंयत जीव
देशविरत कहलाते हैं और पन्द्रह प्रकारके प्रमादसे युक्त क्रिया करनेवाले जीव प्रमत्तसंयत कहलाते
हैं । इनमें से अविरत और देशविरत जीवोंके चारों ही प्रकारका आर्तध्यान होता है, क्योंकि ये
असंयमरूप परिणामसे युक्त होते हैं। प्रमत्तसंयतोंके तो निदानके सिवा बाकीके तीन प्रमादकी
तीव्रतावश कदाचित् होते हैं।
विशेषार्थ—पुराण साहित्यमें मुनियों द्वारा निदान करनेके कई उदाहरण हैं पर इन
उदाहरणोंसे प्रमत्तसंयत अवस्थामें उन साधुओंने निदान किया ऐसा अर्थ नहीं लेना चाहिए । एक
तो भावलिंगी साधुके आगामी भोगोंकी आकांक्षा होती ही नहीं और कदाचित् होती है तो उस
समयसे वह भावलिंगी नहीं रहता ऐसा अर्थ यहाँ ग्रहण करना चाहिए ।
§ ८८७. संज्ञा आदिके द्वारा आर्तध्यानका व्याख्यान किया । अब दूसरे ध्यानकी संज्ञा,
हेतु और स्वामीका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
हिंसा, असत्य, चोरी और विषयसंरक्षणके लिए सतत चिन्तन करना रौद्रध्यान है। वह
अविरत और देशविरतके होता है ॥३५॥
§ ८८८. हिंसादिकके लक्षण पहले कह आये हैं । वे रौद्रध्यानकी उत्पत्तिके निमित्त होते हैं
इसलिए हेतुनिर्देश जाना जाता है । हेतुका निर्देश करनेवाले इन हिंसादिक के साथ अनुवृत्तिको
प्राप्त होनेवाले 'स्मृतिसमन्वाहार' पदका सम्बन्ध होता है। यथा - हिंसाका स्मृतिसमन्वाहार
आदि । यह रौद्रध्यान अविरत और देशविरतके जानना चाहिए । शंका—रौद्रध्यान अविरतके
१. -विधमार्तं ता० मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri