सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 449, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें– ९।२२ § ८६२ ] नवमोऽध्यायः ३३७
§ ८६२. तत्र गुरवे प्रमादनिवेदनं दशदोषविवर्जितमालोचनम्¹ । मिथ्यादुष्कृताभिधानादभि-
व्यक्तप्रतिक्रियं प्रतिक्रमणम् । [ तदुभय ] संसर्गे सति विशोधनात्तदुभयम् । संसक्तान्नपानोपकरणा-
दिविभजनं विवेकः । कायोत्सर्गादिकरणं व्युत्सर्गः । अनशनावमौदर्यादिलक्षणं तपः । दिवसपक्ष-
मासादिना² प्रव्रज्याहापनं छेदः । पक्षमासादिविभागेन दूरतः परिवर्जनं³ परिहारः । पुनर्दीक्षा- ५
प्रापणमुपस्थापना ।
§ ८६२. गुरुके समक्ष दश दोषोंको टालकर अपने प्रमादका निवेदन करना आलोचना है।
‘मेरा दोष मिथ्या हो’ गुरुसे ऐसा निवेदन करके अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना प्रतिक्रमण है ।
आलोचना और प्रतिक्रमण इन दोनोंका संसर्ग होनेपर दोषोंका शोधन होनेसे तदुभय प्रायश्चित्त
है । संसक्त हुए अन्न, पान और उपकरण आदिका विभाग करना विवेक प्रायश्चित्त है । कायोत्सर्ग १०
आदि करना व्युत्सर्ग प्रायश्चित्त है, अनशन, अवमौदर्य आदि करना तप प्रायश्चित्त है । दिवस,
पक्ष और महीना आदिकी प्रव्रज्याका छेद करना छेदप्रायश्चित्त है। पक्ष, महीना आदिके विभागसे
संघसे दूर रखकर त्याग करना परिहारप्रायश्चित्त है । पुनः दीक्षा देना उपस्थापना प्रायश्चित्त है ।
विशेषार्थ—यहाँ प्रायश्चित्तके नौ भेद गिनाये हैं । प्रायः शब्दका अर्थ साधुलोक है । उसका
जिस कर्ममें चित्त होता है वह प्रायश्चित्त कहलाता है । अथवा प्रायः शब्दका अर्थ अपराध है और १५
चित्त शब्दका अर्थ शुद्धि है, इसलिए प्रायश्चित्तका अर्थ अपराधोंका शोधन करना होता है । ये ही
वे नौ भेद हैं जिनके द्वारा साधु दोषोंका परिमार्जन करता है । पहला भेद आलोचना है । आलोचना
इन दश दोषोंसे रहित होकर की जाती है । दश दोष यथा—उपकरण देनेपर मुझे लघु प्रायश्चित्त
देंगे ऐसा विचारकर उपकरण प्रदान करना यह प्रथम आलोचना दोष है । मैं प्रकृतिसे दुर्बल हूँ,
ग्लान हूँ, उपवास आदि नहीं कर सकता । यदि लघु प्रायश्चित्त दें तो दोष कहूँगा ऐसा कहना २०
दूसरा दोष है । अन्य अदृष्ट (गुप्त) दोषोंको छिपा कर प्रकाशमें आये हुए दोषका निवेदन करना
तीसरा मायाचार दोष है । आलस्यवश या प्रमादवश अपने अपराधोंकी जानकारी प्राप्त करनेमें
निरुत्सुक होनेपर स्थूल दोष कहना चौथा दोष है । महा दुश्चर प्रायश्चित्तके भयसे महादोष
छिपा कर उससे हलके दोषका ज्ञान कराना पाँचवां दोष है । व्रतमें इस प्रकार दोष लगनेपर हमें
क्या प्रायश्चित्त करना पड़ेगा इस विधिसे गुरुकी उपासना करना छठा दोष है । पाक्षिक और २५
चातुर्मासिक आदि क्रिया कर्मके समय बहुत साधुओं द्वारा की जानेवाली आलोचनाजन्य शब्दोंसे
प्रदेशके व्यास होनेपर पूर्व दोष कहना सातवां दोष है । गुरुद्वारा दिया हुआ प्रायश्चित्त क्या युक्त
है, आगममें इसका विधान है या नहीं इस प्रकारकी शंका अन्य साधुके समक्ष प्रकट करना आठवां
दोष है । किसी प्रयोजनवश अपने समान साधुके समक्ष दोष कह कर प्रायश्चित्त लेना नौवां दोष
है । इस विधिसे लिया हुआ बड़ासे बड़ा प्रायश्चित्त भी फलदायक नहीं होता । मेरा दोष इसके ३०
अपराधके समान है । इसे यह भी जानता है । इसे जो प्रायश्चित्त मिलेगा वह मुझे भी युक्त है इस
प्रकार अपने दोषको छिपाना दसवाँ दोष है ।
अन्यत्र इन दश दोषोंके आकंपित, अनुमानित, दृष्ट, बादर, सूक्ष्म, छन्न, शब्दाकुलित,
बहुजन, अव्यक्त और तत्सेवी ये नाम आये हैं । प्रायश्चित्तका दूसरा भेद प्रतिक्रमण है । मेरा दोष
मिथ्या हो ऐसा निवेदन करना प्रतिक्रमण है । यह शिष्य करता है और गुरुके द्वारा जो आलोचना-
पूर्वक प्रतिक्रमण किया जाता है वह तदुभय कहलाता है । यह प्रायश्चित्तका तीसरा भेद है । आगे ३५
के प्रायश्चित्तोंके जिनके जो नाम हैं तदनुसार उनका स्वरूप है । यहाँ प्रायश्चित्तके ये नौ भेद कहे
१. –लोचनम् । आकंपिय अणुमाणिय जं दिट्ठं बादरं च सुहुमं च । छण्णं सद्दाउलियं बहुजण अव्वत्त
सस्सेवि ।। इति दश दोषाः । मिथ्या–मु० । २. –मासादीनां प्रत्र–मु० । ३. परिवर्जनीयं परि–आ० ।
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