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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 558 में से

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पृष्ठ 448

३३६ सर्वार्थसिद्धौ [ ९।२० ६ ८५७ -
वनाद्यर्थम् । परिषहस्यास्य च को विशेषः । यदृच्छयोपनिपतितः परिषहः । स्वयं कृतः कायक्लेशः ।
बाह्यत्वमस्य कुतः । बाह्यद्रव्यापेक्षत्वात्परप्रत्यक्षत्वाच्च बाह्यत्वम् ।
§ ८५७. आभ्यन्तरतपोभेदप्रदर्शनार्थमाह—
प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् ॥२०॥
५ § ८५८. कथमस्याभ्यन्तरत्वम् । मनोनियमनार्थत्वात् । प्रमाददोषपरिहारः प्रायश्चित्तम् ।
पूज्येष्वादरो विनयः । कायचेष्टया द्रव्यान्तरेण चोपासनं १वैयावृत्त्यम् । ज्ञानभावनालस्यत्यागः
स्वाध्यायः । आत्मात्मीयसंकल्पत्यागो व्युत्सर्गः । चित्तविक्षेपत्यागो ध्यानम् ।
§ ८५९. तद्भेदप्रतिपादनार्थमाह—
नवचतुर्दशपञ्चद्विभेदा यथाक्रमं प्राग्ध्यानात् ॥२१॥
१० § ८६०. 'यथाक्रमम्' इति वचनान्नवभेदं प्रायश्चित्तम्, विनयश्चतुर्विधः, वैयावृत्त्यं दश-
विधम्, स्वाध्यायः पञ्चविधः, द्विभेदो२ व्युत्सर्ग इत्यभिसंबध्यते । 'प्राग्ध्यानात्' इति वचनं ध्यानस्य
बहुवक्तव्यत्वात्पश्चाद्वक्ष्यत इति ।
§ ८६१. आद्यस्य भेदस्वरूपनिर्ज्ञानार्थमाह—
आलोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्ग तपश्छेदपरिहारोपस्थापनाः ॥२२॥
१५ करनेके लिए किया जाता है । शंका—परीषह और कायक्लेशमें क्या अन्तर है ? समाधान—अपने
आप प्राप्त हुआ परीषह और स्वयं किया गया कायक्लेश है, यही इन दोनोंमें अन्तर है। शंका—
इस तपको बाह्य क्यों कहते हैं ? समाधान—यह बाह्य-द्रव्यके आलम्बनसे होता है और दूसरोंके
देखनेमें आता है इसलिए इसे बाह्य तप कहते हैं।
§ ८५७. अब आभ्यन्तर तपके भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
२० प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान यह छह प्रकारका आभ्यन्तर
तप है ॥२०॥
§ ८५८. शंका—इसे आभ्यन्तर तप क्यों कहते हैं ? समाधान—मनका नियम करनेवाला
होनेसे इसे आभ्यन्तर तप कहते हैं। प्रमादजन्य दोषका परिहार करना प्रायश्चित्त तप है। पूज्य
पुरुषोंका आदर करना विनय तप है। शरीरकी चेष्टा या दूसरे द्रव्यद्वारा उपासना करना वैयावृत्त्य
२५ तप है। आलस्यका त्यागकर ज्ञानकी आराधना करना स्वाध्याय तप है। अहंकार और ममकार-
रूप संकल्पका त्याग करना व्युत्सर्ग तप है, तथा चित्तके विक्षेपका त्याग करना ध्यान तप है।
§ ८५९. अब इनके भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ध्यानसे पूर्वके आभ्यन्तर तपोंके अनुक्रमसे नौ, चार, दश, पाँच और दो भेद हैं ॥२१॥
§ ८६०. सूत्रमें 'यथाक्रमम्' यह वचन दिया है। इससे प्रायश्चित्त नौ प्रकारका है, विनय
३० चार प्रकारका है, वैयावृत्त्य दश प्रकारका है, स्वाध्याय पाँच प्रकारका है और व्युत्सर्ग दो प्रकारका
है ऐसा सम्बन्ध होता है। सूत्रमें—'प्राग्ध्यानात्' यह वचन दिया है, क्योंकि ध्यानके विषयमें
बहुत कुछ कहना है, इसलिए उसका आगेका कथन करेंगे।
§ ८६१. अब पहले आभ्यन्तर तपके भेदोंके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
३५ आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार और उपस्थापना यह
नव प्रकारका प्रायश्चित्त है ॥२२॥
१. –रेण वोप-ता० । २. द्विविधो व्युत्स-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri