सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 441
  • ९।१२ § ८४३ ] नवमोऽध्यायः ३२९
    § ८४२. आह, यदि सूक्ष्मसांपरायादिषु व्यस्ताः परिषहाः अथ समस्ताः¹ ताः क्वेति—
    ²बादरसांपराये सर्वे ॥१२॥
    § ८४३. सांपरायः कषायः । बादरः सांपरायो यस्य स बादरसांपराय इति । नेदं
    किया है । अब यहाँ यह देखना है कि जिन भगवान्के क्षुधादि ग्यारह परीषह नहीं होते यह कैसे
    समझा जाय । वे इस कालमें पाये तो जाते नहीं, इसलिए प्रत्यक्ष देखकर तो यह जाना नहीं जा
    सकता । एक मात्र आगमको पुष्ट करनेवाली युक्तियां ही शेष रहती हैं जिनके अवलम्बनसे यह
    बात समझी जा सकती है, अतः यहाँ उन्हींका निर्देश करते हैं—
    १. केवली जिनके शरीरमें निगोद और त्रस जीव नहीं रहते । उनका क्षीणमोह गुणस्थान
    में अभाव होकर वे परम औदारिक शरीरके धारी होते हैं । अतः भूख, प्यास और रोगादिकका
    कारण नहीं रहनेसे उन्हें भूख, प्यास और रोगादिककी बाधा नहीं होती । देवोंके शरीरमें इन
    जीवोंके न होनेसे जो विशेषता होती है उससे अनन्तगुणी विशेषता इनके शरीरमें उत्पन्न हो
    जाती है । २. श्रेणि आरोहण करने पर प्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्तगुणा बढ़ता
    जाता है और अप्रशस्त प्रकृतियोंका अनुभाग प्रति समय अनन्तगुणा हीन होता जाता है । इसलिए
    तेरहवें गुणस्थानमें होनेवाला असाता प्रकृतिका उदय इतना बलवान् नहीं होता जिससे उसे
    क्षुधादि कार्योंका सूचक माना जा सके । ३. असाताकी उदीरणा छठे गुणस्थान तक ही होती है,
    आगे नहीं होती, इसलिए उदीरणाके अभावमें वेदनीय कर्म क्षुधादिरूप कार्यका वेदन करानेमें
    असमर्थ है । जब कि केवली जिनके शरीरको पानी और भोजनकी ही आवश्यकता नहीं रहती
    तब इनके न मिलनेसे जो क्षुधा और तृषा होती है वह उनके हो ही कैसे सकती है । वेदनीय
    कर्मका कार्य कुछ शरीरमें पानी तत्त्व और भोजन तत्त्वका अभाव करना नहीं है । वास्तवमें
    इनका अभाव अन्य कारणोंसे होता है । हाँ, इनका अभाव होनेपर इनकी पूर्तिके लिए जो वेदना
    होती है वह वेदनीय कर्मका काम है । सो जब कि केवली जिनके शरीरको उनकी आवश्यकता
    ही नहीं रहती, तब वेदनीयके निमित्तसे तज्जनित वेदना कैसे हो सकती है ? अर्थात् नहीं हो
    सकती । ४. केवली जिनके साताका आस्रव सदाकाल होनेसे उसकी निर्जरा भी सदाकाल
    होती रहती है, इसलिए जिस कालमें असाताका उदय होता है उस कालमें केवल उसका
    ही उदय नहीं होता किन्तु अनन्तगुणी शक्तिवाले साताके साथ वह उदयमें आता है । माना
    कि उस समय उसका स्वमुखेन उदय है पर वह प्रति समय बँधनेवाले साता कर्मपरमाणुओंकी
    निर्जराके साथ ही होता है, इसलिए असाताका उदय वहाँ क्षुधादिरूप वेदनाका कारण नहीं
    हो सकता । ५. सुख दुखका वेदन वेदनीय कर्मका कार्य होने पर भी वह मोहनीयकी सहायतासे
    ही होता है। यतः केवली जिनके मोहनीयका अभाव होता है अतः वहाँ क्षुधादिरूप वेदनाओंका
    सद्भाव मानना युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता । इन प्रमाणोंसे निश्चित होता है कि केवली जिनके
    क्षुधादि ग्यारह परीषह नहीं होते ।
    § ८४२. कहते हैं—यदि सूक्ष्मसाम्पराय आदि में अलग-अलग परीषह होते हैं तो मिलकर
    वे कहाँ होते हैं, यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    बादरसाम्परायमें सब परीषह सम्भव हैं ॥१२॥
    § ८४३. साम्पराय कषायको कहते हैं । जिसके साम्पराय बादर होता है वह बादर-
    १. समस्ताः क्वेति मु० । २. 'निसेज्जा जायणाकोसो अरई इत्थिनग्गया । सक्कारो दंसणं मोहा
    बावीसा चेव रागिसु ।।' -पञ्चसं० द्वा० ४, गा० २३ ।
    ४२ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri