सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४० सर्वार्थसिद्धौ [ ९।२७ § ८७१ -
§ ८७१. यद् बहुवक्तव्यं ध्यानमिति पृथग्व्यवस्थापितं तस्येदानीं भेदाभिधानं प्राप्तकालम् ।
तदुल्लङ्घ्य तस्य प्रयोक्तृस्वरूपकालनिर्धारणार्थमुच्यते—
उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ॥२७॥
§ ८७२. आद्यं त्रितयं संहननमुत्तमं वज्रर्षभनाराचसंहननं वज्रनाराचसंहननं नाराच-
संहननमिति । तत्तितयमपि ध्यानस्य साधनं भवति । मोक्षस्य तु आद्यमेव । तदुत्तमं संहननं यस्य
सोऽयमुत्तमसंहननः, तस्योत्तमसंहननस्येति । अनेन प्रयोक्तृनिर्देशः कृतः । अग्रं मुखम् । एकमग्रम-
स्येत्येकाग्रः । नानार्थालम्बनेन चिन्ता परिस्पन्दवती, तस्या अन्याशेषमुखेभ्यो व्यावत्र्य एकस्मिन्नग्रे
नियम एकाग्रचिन्तानिरोध इत्युच्यते । अनेन ध्यानस्वरूपमुक्तं भवति । मुहूर्तं इति कालपरिमाणम् ।
अन्तर्गंतो मुहूर्तादन्तर्मुहूर्तः । 'आ अन्तर्मुहूर्तात्' इत्यनेन कालावधिः कृतः । ततः परं २दुर्धरत्वादेकाग्र-
चिन्तायाः । चिन्ताया निरोधो यदि ध्यानं, निरोधश्चाभावः, तेन ध्यानमसत्खरविषाणवत्स्यात् ।
नैष दोषः; अन्यचिन्तानिवृत्त्यपेक्षयासदिति चोच्यते, स्वविषयाकारप्रवृत्तेः सदिति च; अभावस्य
भावान्तरत्वाद् हेत्वङ्गत्वादिभिरभावस्य वस्तुधर्मत्वसिद्धेश्च । अथवा नायं भावसाधनः, निरोधनं
विशेषार्थ—यहाँ यह प्रश्न होता है कि जब कि पाँच महाव्रतोंमें परिग्रहत्यागका उपदेश
दिया है, दश धर्मोंमें त्याग धर्मका उपदेश दिया है तथा नौ प्रकारके प्रायश्चित्तोंमें व्युत्सर्ग नामका
प्रायश्चित्त अलगसे कहा है ऐसी अवस्थामें पुनः व्युत्सर्ग तपका अलगसे कथन करना कोई मायने
नहीं रखता, क्योंकि इस प्रकार एक ही तत्त्वका पुनः-पुनः कथन करनेसे पुनरुक्त दोष आता है ।
समाधान यह है कि पाँच महाव्रतोंमें जो परिग्रह त्याग महाव्रत है उसमें गृहस्थसम्बन्धी उपधिके
त्यागकी मुख्यता है । त्यागधर्ममें आहारादि विषयक आसक्तिके कम करनेकी मुख्यता है, व्युत्सर्ग
प्रायश्चित्तमें परिग्रह त्याग धर्ममें लगनेवाले दोषके परिमार्जनकी मुख्यता है, और व्युत्सर्ग तपमें
वसतिकाम आदि बाह्य व मनोविकार तथा शरीर आदि अभ्यन्तर उपधिमें आसक्तिके त्यागकी
मुख्यता है, इसलिए पुनरुक्त दोष नहीं आता ।
§ ८७१. जो बहुवक्तव्य ध्यान पृथक् स्थापित कर आये हैं उसके भेदोंका कथन करना इस
समय प्राप्तकाल है तथापि उसे उल्लंघन करके इस समय ध्यानके प्रयोक्ता, स्वरूप और कालका
निर्धारण करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उत्तम संहननवालेका एक विषयमें चित्तवृत्तिका रोकना ध्यान है जो अन्तर्मुहूर्त काल तक
होता है ॥२७॥
§ ८७२. आदिके वज्रर्षभनाराचसंहनन, वज्रनाराचसंहनन और नाराचसंहनन ये तीन
संहनन उत्तम हैं । ये तीनों ही ध्यानके साधन हैं । मोक्षका साधन तो प्रथम ही है । जिसके ये
उत्तम संहनन होते हैं वह उत्तम संहननवाला कहलाता है उस उत्तम संहननवाले के । यहाँ इस
पदद्वारा प्रयोक्ताका निर्देश किया है । 'अग्र' पदका अर्थ मुख है । जिसका एक अग्र होता है वह
एकाग्र कहलाता है । नाना पदार्थोंका अवलम्बन लेनेसे चिन्ता परिस्पन्दवती होती है । उसे अन्य
अशेष मुखोंसे लौटाकर एक अग्र अर्थात् एक विषयमें नियमित करना एकाग्रचिन्तानिरोध कहलाता
है । इस द्वारा ध्यानका स्वरूप कहा गया है । मुहूर्त यह कालका विवक्षित परिमाण है । जो मुहूर्तके
भीतर होता है वह अन्तर्मुहूर्त कहलाता है । 'अन्तर्मुहूर्त काल तक' इस पद द्वारा कालकी अवधि
की गयी है । इतने कालके बाद एकाग्रचिन्ता दुर्धर होती है । शंका—यदि चिन्ताके निरोधका
नाम ध्यान है और निरोध अभावरूप होता है इसलिए गधेके सींगके समान ध्यान असत् ठहरता
१. 'ध्यानं निर्विषयं मनः ।' - सां० सू० ६, २५ । २.-दुर्धरत्वात् । चिन्ताया नि- ता०, ना० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri