सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 443, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 443
  • ९।१५ § ८४८ ] नवमोऽध्यायः ३३१
    § ८४६. पुनरपरयोः परिषहयोः प्रकृतिविशेषनिर्देशार्थमाह—
    दर्शनमोहान्तराययोर्दर्शनालाभौ ॥१४॥
    § ८४७. यथासंख्यमभिसंबन्धः । दर्शनमोहे अदर्शनपरिषहो, लाभान्तराये अलाभपरिषह
    इति । आह, यद्याद्ये मोहनीयभेदे एकः परिषहः, अथ द्वितीयस्मिन् कति भवन्तीत्यत्रोच्यते—
    चारित्रमोहे नाग्न्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशायाचनासत्कारपुरस्काराः ॥१५॥ ५
    § ८४८. पुंवेदोदयादिनिमित्तत्वान्नाग्न्यादिपरिषहाणां मोहोदयनिमित्तत्वं प्रतिपद्यामहे ।
    नहीं किया है। यहाँ तो अपनी अज्ञानतावश जो अल्पज्ञानको महाज्ञान माननेका विकल्प होता है
    उसीका ग्रहण किया है। इस प्रकार ज्ञानावरणके सद्भावमें प्रज्ञा और अज्ञान दो परीषह होते हैं
    यह निश्चित होता है ।
    § ८४६. पुनः अन्य दो परीषहोंकी प्रकृति विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र १०
    कहते हैं—
    दर्शनमोह और अन्तरायके सद्भावमें क्रमसे अदर्शन और अलाभ परीषह होते हैं ॥१४॥
    इस सूत्रमें 'यथासंख्य' पदका सम्बन्ध होता है। दर्शनमोहके सद्भावमें अदर्शन परीषह
    होता है और लाभान्तरायके सद्भावमें अलाभ परीषह होता है।
    विशेषार्थ—दर्शनमोहसे यहाँ सम्यक्त्वमोहनीय प्रकृति ली गयी है। इसका उदय रहते हुए १५
    चल, मल और अगाढ़ दोष उत्पन्न होते हैं। सम्यक्त्वके रहते हुए भी आप्त, आगम और पदार्थोंके
    विषयमें नाना विकल्प होना चल दोष है। जिस प्रकार जलके स्वस्थ होते हुए भी उसमें वायुके
    निमित्तसे तरंगमाला उठा करती है उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि पुरुष यद्यपि अपने स्वरूपमें स्थित
    रहता है तथापि सम्यक्त्व मोहनीयके उदयसे आप्त, आगम और पदार्थोंके विषयमें उसकी बुद्धि
    चलायमान होती रहती है। यही चल दोष है। मलका अर्थ मैल है। शंकादि दोषोंके निमित्तसे २०
    सम्यग्दर्शनका मलिन होना मल दोष है। यह भी सम्यक्त्व मोहनीयके उदयमें होता है। तथा
    अगाढका अर्थ स्थिर न रहना है। सम्यग्दृष्टि जीव लौकिक प्रयोजनवश कदाचित् तत्त्वसे चलाय-
    मान होने लगता है। उदाहरणार्थ—अन्य अन्यका कर्ता नहीं होता यह सिद्धान्त है और
    सम्यग्दृष्टि इसे भले प्रकार जानता है पर रागवश वह इस सिद्धान्त पर स्थिर नहीं रह पाता।
    वह पारमार्थिक कार्यको भी लौकिकप्रयोजनका प्रयोजक मान बैठता है। इस प्रकार सम्यक्त्व २५
    मोहनीयके उदयसे ये तीन दोष होते हैं। ये तीनों एक हैं फिर भी भिन्न-भिन्न अभिप्रायकी दृष्टिसे
    यहाँ इन्हें पृथक्-पृथक् रूपसे परिगणित किया है। प्रकृतमें इसी दोषको ध्यानमें रखकर अदर्शन
    परीषहका निर्देश किया है। यह दर्शनमोहनीयके उदयसे होता है इसलिए इसे दर्शनमोहनीयका
    कार्य कहा है। भोजनादि पदार्थोंका न प्राप्त होना अन्य बात है पर भोजनादि पदार्थोंके न मिलने
    पर जिसके 'अलाभ' परिणाम होता है उसका वह परिणाम लाभान्तराय कर्मका कार्य होनेसे ३०
    अलाभको लाभान्तराय कर्मका कार्य कहा है। परके लाभको स्वका लाभ मानना मिथ्यात्व
    दर्शनमोहनीयका कार्य है इसलिए यहाँ इसकी विवक्षा नहीं है। यहाँ तो अलाभ परिणाम किसके
    उदयमें होता है इतना ही विचार किया गया है। इस प्रकार अदर्शनभाव मोहनीय कर्मका और
    अलाभभाव लाभान्तराय कर्मका कार्य है यह निश्चित होता है।
    § ८४७. कहते हैं—यदि आदिके मोहनीयके भेदके होनेपर एक परीषह होता है तो दूसरे ३५
    भेदके होनेपर कितने परीषह होते हैं इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    चारित्रमोहके सद्भावमें नाग्न्य, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कारपुर-
    स्कार परीषह होते हैं ॥१५॥
    § ८४८. शंका—नाग्न्यादि परीषह पुंवेदोदय आदिके निमित्तसे होते हैं इसलिए मोहोदयको