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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

? Look at संचेचनानुबन्धःvsसंचेचेत...vsसचेतसंचेचनानुबन्धः: Characters: स् पृ ष्ट व्य Then:सं(with dot)? Orस? Wait, is there a dot over स? Yes, there is a dot: सं. Then: चे? Then: त? Wait, look at the letter after चे: it has a vertical line, an arch to the left... wait, it's त! Wait, is there a dot over चे? No. Wait, look at the word: संचेचे...? Let's zoom in on संचे...: सwith anusvara?सं चे Thenत! Then ना! Then नु! Then बwith anusvara:बं! Then धः! Wait! Is it संचेचनानुबन्धःorसचेतसंचेचनानुबन्धःorसचेतनानुबन्धः? Let's look at the character between चेandना: Wait, it's त! It looks just like तinकृतत्वात्`!

२४२ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।६ § ६१९ –
ज्ञानदर्शनादिषु निकृतिर्वञ्चनं मायाक्रिया । अन्यं $^१$मिथ्यादर्शनक्रियाकरणकारणाविष्टं प्रशंसादि-
भिर्दृढयति यथा साधु करोषीति सा मिथ्यादर्शनक्रिया । संयमघातिकर्मोदयवशादनिवृत्तिरप्रत्या-
ख्यानक्रिया । ता एताः पञ्च क्रियाः । समुदिताः पञ्चविंशतिक्रियाः । एतानीन्द्रियादीनि कार्य-
कारणभेदाद्भेदमापद्यमानानि सांपरायिकस्य कर्मण आस्रवद्वाराणि भवन्ति ।
५ § ६१९. अत्राह, योगत्रयस्य सर्वात्मकार्यत्वात्सर्वेषां संसारिणां साधारणः, ततो बन्धफलानु-
भवनं प्रत्यविशेष इत्यत्रोच्यते—नैतदेवम् । यस्मात् सत्यपि प्रत्यात्मसंभवे तेषां जीवपरिणामेभ्यो-
ऽनन्तविकल्पेभ्यो विशेषोऽभ्यनुज्ञायते कथमिति चेदुच्यते—
तीव्र मन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषैस्तद्विशेषः ॥ ६ ॥
§ ६२०. बाह्याभ्यन्तरहेतूदोरणवशादुद्रिक्तः परिणामस्तीव्रः । तद्विपरीतो मन्दः । अयं $^३$प्राणी
१० मया हन्तव्य इति ज्ञात्वा प्रवृत्तिर्ज्ञातमित्युच्यते । मदात्प्रमादाद्वानवबुध्य प्रवृत्तिरज्ञातम् । अधि-
क्रियन्तेऽस्मिन्नर्था इत्यधिकरणं द्रव्यमित्यर्थः । द्रव्यस्य स्वशक्तिविशेषो वीर्यम् । भावशब्दः प्रत्येकं
परिसमाप्यते—तीव्रभावो मन्दभाव इत्यादिः । एतेभ्यस्तस्यास्रवस्य विशेषो भवति । कारणभेदाद्धि
कार्यभेद इति ।
§ ६२१. अत्राह, अधिकरणंमुक्तम्, तत्स्वरूपमनिर्ज्ञातमतस्तदुच्यतामिति । तत्र भेदप्रति-
१५ पादनद्वारेणाधिकरणस्वरूपनिर्ज्ञानार्थमाह—
रहना और दूसरेके करनेपर हर्षित होना प्रारम्भ क्रिया है । परिग्रह का नाश हो इसलिए जो
क्रिया की जाती है वह पारिग्राहिकी क्रिया है । ज्ञान, दर्शन आदिके विषयमें छल करना मायाक्रिया
है । मिथ्यादर्शनके साधनोंसे युक्त पुरुषकी प्रशंसा आदिके द्वारा दृढ़ करना कि 'तू ठीक करता है'
मिथ्यादर्शन क्रिया है । संयमका घात करनेवाले कर्मके उदयसे त्यागरूप परिणामोंका न होना
२० अप्रत्याख्यानक्रिया है । ये पांच क्रिया हैं। ये सब मिलकर पच्चीस क्रियाएँ होती हैं कार्य-कारणके
भेदसे अलग-अलग भेदको प्राप्त होकर ये इन्द्रियादिक साम्परायिक कर्मके आस्रवके द्वार हैं ।
§ ६१९ शंका—तीनो योग सब आत्माओंके कार्य हैं इसलिए वे सब संसारी जीवोंके
समान रूपसे प्राप्त होते हैं, इसलिए कर्मबन्धके फलके अनुभवके प्रति समानता प्राप्त होनी चाहिए ?
समाधान—यह बात ऐसी नहीं है, क्योंकि यद्यपि योग प्रत्येक आत्माके होता है परन्तु जीवोंके
२५ परिणामोंके अनन्त भेद हैं इसलिए कर्मबन्धके फलके अनुभवकी विशेषता माननी पड़ती है ।
शंका—किस प्रकार ? समाधान—अब अगले सूत्रद्वारा इसी बातका समाधान करते हैं—
तीव्रभाव, मन्दभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभाव, अधिकरण और वीर्यविशेषके भेदसे उसकी
( आस्रवकी ) विशेषता होती है ॥६॥
§ ६२०. बाह्य और आभ्यन्तर हेतुको उदीरणावश प्राप्त होनेके कारण जो उत्कट परिणाम
३० होता है वह तीव्र भाव है। मन्द भाव इससे उलटा है। इस प्राणीका मुझे हनन करना चाहिए इस
प्रकार जानकर प्रवृत्ति करना ज्ञात भाव है। मद या प्रमादके कारण बिना जाने प्रवृत्ति करना
अज्ञात भाव है। जिसमें पदार्थ अधिकृत किये जाते हैं वह अधिकरण है। यहाँ अधिकरणसे द्रव्यका
ग्रहण किया है। द्रव्यकी अपनी शक्तिविशेष वीर्य है। सूत्रमें जो भाव शब्द आया है वह सब
शब्दोंके साथ जोड़ लेना चाहिए। यथा—तीव्रभाव, मन्दभाव इत्यादि । इन सब कारणोंसे
३५ आस्रवमें विशेषता आ जाती है, क्योंकि कारणके भेदसे कार्यमें भेद होता है।
§ ६२१. पूर्व सूत्रमें 'अधिकरण' पद आया है पर उसका स्वरूप अज्ञात है, इसलिए वह कहना
चाहिए ? अब उसके भेदोंके कथन द्वारा उसके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. दर्शनकरण-ता०, ना०, मु० । २. -रणस्य ततो मु० । ३. प्राणी हन्त-मु०, ता०, ना० ।
४. -करणमित्युक्तम् मु० ता० ।

  • ६१८ § ६२४ ] षष्ठोऽध्यायः २४३

अधिकरणं जीवाजीवाः ॥ ७ ॥
§ ६२२. उक्तलक्षणा जीवाजीवाः । यद्युक्तलक्षणाः पुनर्वचनं किमर्थम् । अधिकरणविशेषज्ञा-
पनार्थं पुनर्वचनम् । जीवाजीवा अधिकरणमित्ययं विशेषो ज्ञापयितव्ये¹ इति । कः पुनरसौ ।
हिंसाद्युपकरणभाव इति । स्यादेतन्मूलपदार्थयोर्द्वित्वाज्जीवाजीवाविति² द्विवचनं न्यायप्राप्तमिति ।
तन्न, पर्यायाणामधिकरणत्वात् । येन केनचित्पर्यायेण विशिष्टं द्रव्यमधिकरणम्, न सामान्यमिति ५
बहुवचनं कृतम् । जीवाजीवा अधिकरणं कस्य । आस्रवस्येति । अर्थवशादभिसंबन्धो भवति ।
§ ६२३. तत्र जीवाधिकरणभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
आद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषाय-
विशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥८॥
§ ६२४. प्राणव्यपरोपणादिषु प्रमादवतः प्रयत्नावेशः संरम्भः । साधनसमभ्यासीकरणं समा- १०
रम्भः । प्रक्रम आरम्भः । 'योग'शब्दो व्याख्यातार्थः । कृतवचनं स्वातन्त्र्यप्रतिपत्त्यर्थम् । कारिता-
भिधानं परप्रयोगापेक्षम् । अनुमतशब्दः प्रयोजकस्य मानसपरिणामप्रदर्शनार्थः । अभिहितलक्षणाः
कषायाः क्रोधादयः । विशिष्यतेऽर्थोऽर्थान्तरादिति विशेषः । स प्रत्येकमभिसंबध्यते—संरम्भविशेषः
समारम्भविशेष इत्यादि । आद्यं जीवाधिकरणमेतैर्विशेषैः 'भिद्यते' इति वाक्यशेषः । एते चत्वारः
अधिकरण जीव और अजीवरूप हैं ॥७॥ १५
§ ६२२. जीव और अजीवके लक्षण पहले कह आये हैं । शंका—यदि इनके लक्षण पहले
कह आये हैं तो फिरसे इनका उल्लेख किस लिए किया ? समाधान—अधिकरण विशेषका ज्ञान
करानेके लिए फिरसे इनका उल्लेख किया है जिससे जीव और अजीव अधिकरण हैं यह विशेष
जताया जा सके । शंका—वह कौन है ? समाधान—हिंसादि उपकरणभाव । शंका—मूल पदार्थ
दो हैं इसलिए 'जीवाजीवौ' इस प्रकार सूत्रमें द्विवचन रखना न्यायप्राप्त है ? समाधान—यह २०
कहना ठीक नहीं हैं, क्योंकि उनकी पर्यायोंको अधिकरण माना है । तात्पर्य यह है कि किसी एक
पर्यायसे युक्त द्रव्य अधिकरण होता है, केवल द्रव्य नहीं, इसलिए सूत्रमें बहुवचन रखा है । जीव
और अजीव किसके अधिकरण हैं ? आस्रवके । इस प्रकार प्रयोजनके अनुसार यहाँ आस्रव पदका
सम्बन्ध होता है ।
§ ६२३. अब जीवाधिकरणके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २५
पहला जीवाधिकरण संरम्भ, समारम्भ और आरम्भके भेदसे तीन प्रकारका, योगोंके भेद-
से तीन प्रकारका, कृत, कारित और अनुमतके भेदसे तीन प्रकारका तथा कषायोंके भेदसे चार
प्रकारका होता हुआ परस्पर मिलानेसे १०८ प्रकारका है ॥८॥
§ ६२४. प्रमादी जीवका प्राणोंकी हिंसा आदिकार्यमें प्रयत्नशील होना संरम्भ है। साधनों-
का जुटाना समारम्भ है । कार्य करने लगना आरम्भ है । योग शब्दका व्याख्यान पहले कर आये ३०
हैं । कर्ताको कार्यविषयक स्वतन्त्रता दिखलानेके लिए सूत्रमें 'कृत' वचन रखा है । कार्यमें दूसरेके
प्रयोगकी अपेक्षा दिखलानेके लिए 'कारित' वचन रखा है । तथा प्रयोजकके मानस परिणामको
दिखलानेके लिए अनुमत शब्द रखा है । क्रोधादि कषायोंके लक्षण कहे जा चुके हैं । जिससे एक
अर्थ दूसरे अर्थसे विशेषताको प्राप्त हो वह विशेष है । इसे प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए

सुजन्तास्त्र्यादिशब्दा यथाक्रममभिसंबध्यन्ते—संरम्भसमारम्भारम्भास्त्रयः, योगास्त्रयः, कृतकारि-
तानुमतास्त्रयः, कषायाश्चत्वार इति । एतेषां गणनाभ्यावृत्तिः सुचा द्योत्यते । एकश इति
वीप्सानिर्देशः । एकैकं १त्र्यादीन् भेदान् नयेदित्यर्थः । यद्यथा—क्रोधकृतकायसंरम्भः मानकृत-
कायसंरम्भः मायाकृतकायसंरम्भः लोभकृतकायसंरम्भः क्रोधकारितकायसंरम्भः मानकारितकायसं-
रम्भः मायाकारितकायसंरम्भः लोभकारितकायसंरम्भः क्रोधानुमतकायसंरम्भः मानानुमतकाय-
संरम्भः मायानुमतकायसंरम्भः लोभानुमतकायसंरम्भश्चेति द्वादशधा कायसंरम्भः । एवं वाग्योगे
मनोयोगे च द्वादशधा संरम्भः । त एते२ संपिण्डिताः षट्त्रिंशत्, तथा समारम्भा अपि षट्त्रिंशत्,
आरम्भा अपि षट्त्रिंशत् । एते संपिण्डिता जीवाधिकरणत्वप्रभेदा अष्टोत्तरशतसंख्याः संभवन्ति ।
'च'शब्दोऽनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनकषायभेदकृतान्तर्भेदसमुच्चयार्थः ।
§ ६२५. परस्या३जीवाधिकरणस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् ॥ ९ ॥
§ ६२६. निर्वर्त्यत इति निर्वर्तना निष्पादना । निक्षिप्यत इति निक्षेपः स्थापना । संयुज्यते
इति संयोगो मिश्रीकृतम् । निसृज्यत इति निसर्गः प्रवर्तनम् । एते द्वचादिभिर्यथाक्रममभिसंबध्यन्ते—
निर्वर्तना द्विभेदा निक्षेपश्चतुर्भेदः संयोगो द्विभेदः निसर्गस्त्रिभेद इति । त एते भेदा अजीवाधि-
करणस्य वेदितव्याः । परवचनमनर्थकम्, पूर्वसूत्रे आद्यमिति वचनादिदमवशिष्टार्थं भवतीति ।
नानर्थकम् । अन्यार्थः परशब्दः । संरम्भादिभ्योऽन्यानि निर्वर्तनादीनि । इतरथा हि निर्वर्तनादीना-
'तीन' आदि शब्द क्रमसे सम्बन्धको प्राप्त होते हैं। यथा—संरम्भ, समारम्भ और आरम्भ ये
तीन; योग तीन; कृत, कारित और अनुमत ये तीन और कषाय चार। इनके गणनाकी पुनरावृत्ति
'सुच्' प्रत्यय-द्वारा प्रकट की गयी है। 'एकशः' यह वीप्सामें निर्देश है। तात्पर्य यह है कि तीन
आदि भेदोंको प्रत्येकके प्रति लगा लेना चाहिए। जैसे क्रोधकृतकायसंरम्भ, मानकृतकायसंरम्भ,
मायाकृतकायसंरम्भ, लोभकृतकायसंरम्भ, क्रोधकारितकायसंरम्भ, मानकारितकायसंरम्भ, माया-
कारितकायसंरम्भ, लोभकारितकायसंरम्भ, क्रोधानुमतकायसंरम्भ, मानानुमतकायसंरम्भ, मायानु-
मतकायसंरम्भ, लोभानुमतकायसंरम्भ । इस प्रकार कायसंरम्भ बारह प्रकारका है । इसी प्रकार
वचनयोग और मनोयोगकी अपेक्षा संरम्भ बारह-बारह प्रकारका है। ये सब मिला कर छत्तीस
भेद होते हैं। इसी प्रकार समारम्भ और आरम्भके भी छत्तीस-छत्तीस भेद होते हैं। ये सब मिल
कर जीवाधिकरणके १०८ भेद होते हैं। सूत्रमें 'च' शब्द अनन्तानुबन्धी अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान
और संज्वलनरूप कषायोंके अवान्तर भेदोंका समुच्चय करनेके लिए दिया है।
§ ६२५. अब अजीवाधिकरणके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पर अर्थात् अजीवाधिकरण क्रमसे दो, चार, दो और तीन भेदवाले निर्वर्तना, निक्षेप,
संयोग और निसर्गरूप है ॥९॥
§ ६२६. निर्वर्तनाका अर्थ निष्पादना अर्थात् रचना है। निक्षेपका अर्थ स्थापना अर्थात्
रखना है। संयोगका अर्थ मिश्रित करना अर्थात् मिलाना है और निसर्गका अर्थ प्रवर्तन है। ये
क्रमसे दो आदि शब्दोंके साथ सम्बन्धको प्राप्त होते हैं। यथा—निर्वर्तना दो प्रकारकी है। निक्षेप
चार प्रकारका है। संयोग दो प्रकारका है। निसर्ग तीन प्रकारका है। ये सब अजीवाधिकरणके
भेद हैं। शंका—सूत्रमें 'पर' वचन निरर्थक है; क्योंकि पिछले सूत्रमें 'आद्य' वचन दिया है जिससे
यह ज्ञात होता है कि यह शेषके लिए है। समाधान—अनर्थक नहीं हैं, क्योंकि यहाँ पर शब्दका
अन्य अर्थ है। जिससे यह ज्ञात होता है कि निर्वर्तना आदिक संरम्भ आदिकसे अन्य हैं। यदि
१. त्र्यादिभेदान् आ०, दि० १, दि० २ । २. ऐते पिण्डि-मु० । ३. -जीवस्याधि-मु० ।

– ६।१० § ६२८ ] षष्ठोऽध्यायः २४५
मात्मपरिणामसङ्गावाज्जीवाधिकरणविकल्पा एवेति विज्ञायेत। निर्वर्तनाधिकरणं द्विविधं
मूलगुणनिर्वर्तनाधिकरणमुत्तरगुणनिर्वर्तनाधिकरणं चेति। तत्र $^१$मूलगुणनिर्वर्तनं पञ्चविधम्,
शरीरवाङ्मनःप्राणापानाश्च। $^२$उत्तरगुणनिर्वर्तनं काष्ठपुस्तचित्रकर्मादि। निक्षेपश्चतुर्विधः अप्रत्यवे-
क्षितनिक्षेपाधिकरणं दुष्प्रमृष्टनिक्षेपाधिकरणं सहसानिक्षेपाधिकरणमनाभोगनिक्षेपाधिकरणं चेति ।
निसर्गस्त्रिविधः—कायनिसर्गाधिकरणं वाग्निसर्गाधिकरणं मनोनिसर्गाधिकरणं चेति । ५
§ ६२७. उक्तः सामान्येन कर्मास्रवभेदः । इदानीं कर्मविशेषास्रवभेदो वक्तव्यः । तस्मिन्
वक्तव्ये आद्ययोर्ज्ञानादर्शनवरणयोरास्रवभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः ॥ १० ॥
§ ६२८. तत्त्वज्ञानस्य मोक्षसाधनस्य कीर्तने कृते कस्यचिदनभिव्याहरतः अन्तःपैशुन्यपरि-
णामः प्रदोषः । कुतश्चित्कारणान्नास्ति न वेद्मीत्यादि ज्ञानस्य व्यपल्पनं निह्नवः । कुतश्चित्कारणाद् १०
भावितमपि विज्ञानं दानार्हमपि यतो न दीयते तन्मात्सर्यम् । ज्ञानव्यवच्छेदकरणमन्तरायः । कायेन
वाचा च परप्रकाशयज्ञानस्य वर्जनमासादनम् । प्रशस्तज्ञानदूषणमुपघातः । आसादनमेवेति चेत् ।
सतो ज्ञानस्य विनयप्रदानादिगुणकीर्तनाननुष्ठानमासादनम् । उपघातस्तु ज्ञानमज्ञानमेवेति ज्ञान-
नाशाभिप्रायः । इत्यनयोर्यं भेदः । 'तत्'शब्देन ज्ञानदर्शनयोः प्रतिनिधिर्शः क्रियते । कथं पुनर-
प्रकृतयोरनिर्दिष्टयोस्तच्छब्देन परामर्शः कर्तुं शक्यः । प्रश्नापेक्षया । ज्ञानदर्शनावरणयोः क आस्रव १५
पर शब्द न दिया जाय तो निर्वर्तना आदि आत्माके परिणाम हैं ऐसा हो जानेसे ये भी जीवाधि-
करणके भेद समझे जाँयगे । निर्वर्तनाधिकरण दो प्रकारका है—मूलगुण निर्वर्तनाधिकरण और
उत्तरगुण निर्वर्तनाधिकरण । उनमें से मूलगुण निर्वर्तनाधिकरण पांच प्रकारका है—शरीर, वचन,
मन, प्राण और अपान । तथा काष्ठकर्म, पुस्तकर्म और चित्रकर्म आदि उत्तरगुण निर्वर्तनाधिकरण
हैं। निक्षेप चार प्रकारका है—अप्रत्यवेक्षितनिक्षेपाधिकरण, दुष्प्रमृष्टनिक्षेपाधिकरण, सहसानिक्षेपा- २०
धिकरण और अनाभोगनिक्षेपाधिकरण । संयोग दो प्रकारका है—भक्तपानसंयोगाधिकरण और
उपकरणसंयोगाधिकरण । निसर्ग तीन प्रकारका है—कायनिसर्गाधिकरण, वचननिसर्गाधिकरण
और मननिसर्गाधिकरण ।
§ ६२७. सामान्यसे कर्मास्रवके भेद कहे। इस समय अलग-अलग कर्मोंके आस्रवके भेदोंका
कथन करना चाहिए। उसमें सर्वप्रथम प्रारम्भके ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रवके भेदोंका २५
कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ज्ञान और दर्शनके विषयमें प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य, अन्तराय, आसादन और उपघात ये
ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रव हैं ॥१०॥
§ ६२८. तत्त्वज्ञान मोक्षका साधन है उसका गुणगान करते समय उस समय नहीं बोलने-
वालेके जो भीतर पैशुन्यरूप परिणाम होता है वह प्रदोष है। किसी कारणसे 'ऐसा नहीं है, मैं ३०
नहीं जानता' ऐसा कहकर ज्ञानका अपलाप करना निह्नव है। विज्ञानका अभ्यास किया है वह देने
योग्य भी है तो भी जिस कारणसे वह नहीं दिया जाता है मात्सर्य है। ज्ञानका विच्छेद करना
अन्तराय है। दूसरा कोई ज्ञानका प्रकाश कर रहा हो तब शरीर या वचनसे उसका निषेध करना
आसादन है। प्रशंसनीय ज्ञानमें दूषण लगाना उपघात है। शंका-उपघातका जो लक्षण किया
है उससे वह आसादन ही ज्ञात होता है ? समाधान-प्रशस्त ज्ञानकी विनय न करना, उसकी ३५
अच्छाईकी प्रशंसा न करना आदि आसादन है। परन्तु ज्ञानको अज्ञान समझकर ज्ञानके नाशका
इरादा रखना उपघात है इस प्रकार इन दोनोंमें अन्तर है। सूत्रमें 'तत्' पद ज्ञान और दर्शनका
१. मूलं पञ्च-आ०, दि० १, दि० २ । २. उत्तरं काष्ठ-आ०, दि० १, दि० २ ।

२४६ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।११ § ६२९-
इति प्रश्ने कृते तदपेक्षया तच्छब्दो ज्ञानदर्शने प्रतिनिर्दिशति । एतेन ज्ञानदर्शनवत्सु तत्साधनेषु च
प्रदोषादयो योज्याः; तन्निमित्तत्वात् । त एते ज्ञानदर्शनावरणयोरास्रवहेतवः । एककारणसाध्यस्य
कार्यस्यानेकस्य दर्शनात् तुल्येऽपि प्रदोषादौ ज्ञानदर्शनावरणास्रवसिद्धिः । अथवा विषयभेदादास्रव-
भेदः । ज्ञानविषयाः प्रदोषादयो ज्ञानावरणस्य । दर्शनविषयाः प्रदोषादयो दर्शनावरणस्येति ।
§ ६२९. यथानयोः कर्मप्रकृत्योरास्रवभेदस्तथा—
दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यत्मपरोभयस्थान्यसद्वेद्यस्य ॥ ११ ॥
§ ६३०. पीडालक्षणः परिणामो दुःखम् । अनुग्राहकसंबंधविच्छेदे वैक्लव्यविशेषः शोकः ।
परिवादादिनिमित्तादाविलान्तःकरणस्य तीव्रानुशयस्तापः । परितापजाताश्रुपातप्रचुरविप्रलापा-
दिभिर्व्यक्तक्रन्दनमाक्रन्दनम् । आयुरिन्द्रियबलप्राणवियोगकरणं वधः । संक्लेशपरिणामावलम्बनं¹
गुणस्मरणानुकीर्तनपूर्वकं स्वपरानुग्रहाभिलाषविषयमनुकम्पाप्रचुरं रोदनं परिवेदनम् । ननु च
शोकादीनां दुःखविशेषत्वाद् दुःखग्रहणमेवास्तु । सत्यमेवम्; तथापि कतिपयविशेषप्रतिपादनेन
दुःखजात्य²नुविधानं क्रियते । यथा गौरित्युक्ते अनिर्ज्ञाते विशेषे तत्प्रतिपादनार्थं खण्डमुण्डकृष्ण-
शुक्लाद्युपादानं क्रियते तथा दुःखविषयास्रवासंख्येयलोकभेदसंभवाद् दुःखमित्युक्ते विशेषाऽनिर्ज्ञा-
नात्कतिपयविशेषनिर्देशेन तद्विशेषप्रतिपत्तिः क्रियते । तान्येतानि दुःखादीनि ³क्रोधाद्यावेशादात्म-
निर्देश करनेके लिए दिया है । शंका—ज्ञान और दर्शन अप्रकृत हैं, तथा उनका निर्देश भी नहीं
किया है, फिर यहां 'तत्' शब्दके द्वारा उनका ज्ञान कैसे हो सकता है ? समाधान—प्रश्नकी
अपेक्षा अर्थात् ज्ञानावरण और दर्शनावरणका क्या आस्रव है ऐसा प्रश्न करनेपर उसकी अपेक्षा
'तत्' शब्द ज्ञान और दर्शनका निर्देश करता है । इससे यह अभिप्राय निकला कि ज्ञान और दर्शन-
वालोंके विषयमें तथा उनके साधनोंके विषयमें प्रदोषादिककी योजना करनी चाहिए, क्योंकि ये
उनके निमित्तसे होते हैं । ये प्रदोषादिक ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मके आस्रवके कारण हैं ।
एक कारणसे भी अनेक कार्य होते हुए देखे जाते हैं, इसलिए प्रदोषादिकके एक समान रहते हुए
भी इनसे ज्ञानावरण और दर्शनावरण दोनोंका आस्रव सिद्ध होता है । अथवा विषयके भेदसे
आस्रवमें भेद होता है । ज्ञानसम्बन्धी प्रदोषादिक ज्ञानावरणके आस्रव हैं और दर्शनसम्बन्धी प्रदो-
षादिक दर्शनावरणके आस्रव है ।
§ ६२९. जिस प्रकार इन दोनों कर्मोंका आस्रव अनेक प्रकारका है उसी प्रकार—
अपनेमें, दूसरेमें या दोनोंमें विद्यमान दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन
ये असाता वेदनीय कर्मके आस्रव हैं ॥११॥
§ ६३०. पीड़ारूप आत्माका परिणाम दुःख है । उपकार करनेवालेसे सम्बन्धके टूट जानेपर
जो विकलता होती है वह शोक है । अपवाद आदिके निमित्तसे मनके खिन्न होनेपर जो तीव्र
अनुशय-संताप होता है वह ताप है । परितापके कारण जो आंसू गिरनेके साथ विलाप आदि होता
है, उससे खुलकर रोना आक्रन्दन है । आयु, इन्द्रिय, बल और श्वासोच्छ्वासका जुदा कर देना
वध है । संक्लेशरूप परिणामोंके होनेपर गुणोंका स्मरण और प्रशंसा करते हुए अपने और दूसरेके
उपकारकी अभिलाषासे करुणाजनक रोना परिवेदन है । शंका—शोकादिक दुःखके भेद हैं इसलिए
दुःखका ग्रहण करना पर्याप्त है ? समाधान—यह कहना सही है तो भी यहां कुछ भेदोंका कथन
करके दुःखकी जातियां दिखलायी हैं। जैसे गौ ऐसा कहनेपर अवान्तर भेदोंका ज्ञान नहीं होता,
इसलिए खांडी, मुंड़ी, काली, सफेद आदि विशेषण दिये जाते हैं उसी प्रकार दुःखविषयक आस्रव
असंख्यात लोकप्रमाण संभव हैं। परन्तु दुःख इतना कहनेपर उन सब भेदोंका ज्ञान नहीं होता
१. –लम्बनं स्वपरा-आ०, दि० १, दि० २ । २. –जात्यन्तरविधा-मु० । ३. क्रोधावेशा-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

स्थानि भवन्ति परस्थान्युभयस्थानि च । एतानि सर्वाण्यसद्वेद्यास्रवकारणानि वेदितव्यानि । अत्र
चोद्यते—यदि दुःखादीन्यात्मपरोभयस्थान्यसद्वेद्यास्रवनिमित्तानि, किमर्थमार्हतैः केशलोञ्चनान-
शनातपस्थानादीनि दुःखनिमित्तान्यास्थीयन्ते परेषु च प्रतिपाद्यन्ते इति । नैष दोषः—अन्तरङ्ग-
क्रोधाद्यावेशपूर्वकाणि दुःखादीन्यसद्वेद्यास्रवनिमित्तानीति विशेष्योक्तत्वात् । यथा कस्यचिद् भिषजः
परमकरुणाशयस्य निःशल्यस्य संयतस्योपरि गण्डं पाटयतो दुःखहेतुत्वे सत्यपि न पापबन्धो ५
बाह्यनिमित्तमात्रादेव भवति । एवं संसारविषयमहादुःखादुद्विग्नस्य भिक्षोस्तन्निवृत्त्युपायं प्रति
समाहितमनस्कस्य शास्त्रविहिते कर्मणि प्रवर्तमानस्य संक्लेशपरिणामाभावाद् दुःखनिमित्तत्वे
सत्यपि न पापबन्धः । उक्तं च—
“न दुःखं न सुखं यद्वद्धेतुर्दृष्टश्चिकित्सिते ।
चिकित्सायां तु युक्तस्य स्याद् दुःखमथवा सुखम् ॥ १०
न दुःखं न सुखं तद्वद्धेतुर्मोक्षस्य साधने ।
मोक्षोपाये तु युक्तस्य स्याद् दुःखमथवा सुखम् ॥”
§ ६३१. उक्ता असद्वेद्यास्रवहेतवः । सद्वेद्यस्य पुनः के इत्यत्रोच्यते—
भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः क्षान्तिः शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥ १२ ॥
§ ६३२. तासु तासु गतिषु कर्मोदयवशाद्भवन्तीति भूतानि प्राणिन इत्यर्थः । व्रतान्यहिंसादीनि १५
वक्ष्यन्ते, तद्वन्तो व्रतिनः । ते द्विविधाः । अगारं प्रति निवृत्तौत्सुक्याः संयताः गृहिणश्च संयतासंयताः ।


अतएव कुछ भेदोंका उल्लेख करके उनको पृथक्-पृथक् जान लिया जाता है। क्रोधादिकके आवेश-
वश ये दुःखादिक कभी अपनेमें होते हैं, कभी दूसरोंमें होते हैं और कभी दोनोंमें होते हैं । ये सब
असाता वेदनीयके आस्रवके कारण जानने चाहिए। शंका—यदि अपनेमें, परमें या दोनोंमें स्थित
दुःखादिक असातावेदनीयके आस्रवके कारण हैं तो अरिहंतके मतको माननेवाले मनुष्य दुःखको २०
पैदा करनेवाले केशलोंच, अनशन और आतपस्थान ( आतापनयोग ) आदिमें क्यों विश्वास करते
हैं और दूसरोंको इनका उपदेश क्यों देते हैं ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि अन्तरंगमें
क्रोधादिकके आवेशसे जो दुःखादिक पैदा होते हैं वे असातावेदनीयके आस्रवके कारण हैं इतना
यहाँ विशेष कहा है। जैसे अत्यन्त दयालु किसो वैद्यके फोड़ेकी चीर-फाड़ और मरहमपट्टी करते
समय निःशल्य संयतको दुःख देनेमें निमित्त होनेपर भी केवल बाह्य निमित्त मात्रसे पापबन्ध नहीं २५
होता उसी प्रकार जो भिक्षु संसार-सम्बन्धी दुःखसे उद्विग्न है और जिसका मन उसके दूर करनेके
उपायोंमें लगा हुआ है उसके शास्त्रविहित कर्ममें प्रवृत्ति करते समय संक्लेशरूप परिणामोंके नहीं
होनेसे पापबन्ध नहीं होता । कहा भी है— “जिस प्रकार चिकित्साके साधन न स्वयं दुःखरूप हैं
और न सुखरूप हैं किन्तु जो चिकित्सामें लग रहा है उसे दुःख भी होता है और सुख भी । उसी
प्रकार मोक्ष-साधनके जो हेतु हैं वे स्वयं न दुःखरूप हैं और न सुखरूप किन्तु जो मोक्षमार्गपर ३०
आरूढ़ है उसे दुःख भी होता है और सुख भी ।”
§ ६३१. असातावेदनीयके आस्रवके कारण कहे परन्तु सातावेदनीयके आस्रवके कारण
कौन हैं ? इसी बातको बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
भूत-अनुकम्पा, व्रती-अनुकम्पा, दान और सरागसंयम आदि का योग तथा क्षान्ति और
शौच ये सातावेदनीय कर्मके आस्रव हैं ॥१२॥ ३५
§ ६३२. जो कर्मोदयके कारण विविध गतियोंमें होते हैं वे भूत कहलाते हैं। भूत यह
प्राणीका पर्यायवाची शब्द है । अहिंसादिक व्रतोंका वर्णन आगे करेंगे । जो उनसे युक्त हैं वे व्रती
कहलाते हैं। वे दो प्रकारके हैं—पहले वे जो घरसे निवृत्त होकर संयत हो गये हैं और दूसरे

...
Line 4: संयमः सरागसंयमः । 'आदि'-शब्देन...
Line 5: ५ सम्यक्प्रणिधानमित्यर्थः । भूतव्रत्यनुकम्पादान... -> exactly line 5!
Line 6: संयमादियोगः । क्रोधादिनिवृत्तिः...
Line 7: प्रकारार्थः । के पुनस्ते प्रकाराः । अर्हत्पूजाकरणैतत्परता...
Line 8: ग्रहणात् सिद्धे 'व्रति'ग्रहणं...
Line 9: § ६३३. अथ तदनन्तरोद्देशभाजो...
Line 10: १० प्रतिपादनार्थमिदमुच्यते— -> exactly line 10!
Line 11: केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥ १३ ॥
Line 12: § ६३४. निरावरणज्ञानाः केवलिनः । तदुपदिष्टं...
Line 13: रचनं श्रुतं भवति । रत्नत्रयोपेतः श्रमणगणः...
Line 14: देवाश्चतुर्निकाया उक्ताः । गुणवत्सु महत्सु...
Line 15: १५ गृहस्थ संयतासंयत । अनुग्रहसे दयार्द्र... -> exactly line 15!
Line 16: होता है उसे अनुकम्पा कहते हैं। सब प्राणियोंपर...
Line 17: अनुकम्पा रखना वृत्यनुकम्पा है। दूसरे

– ६।१४ § ६३६ ] षष्ठोऽध्यायः २४९
दर्शनमोहस्यास्रवहेतुः । कवलाभ्यवहारजीविनः केवलिन इत्येवमादि वचनं केवलिनामसवर्णवादः ।
मांसभक्षणाद्येनवद्याभिधानं श्रुतावर्णवादः । शूद्रत्वाशुचित्वाद्याविर्भावनं संघावर्णवादः । जिनोप-
दिष्टो धर्मो निर्गुणस्तदुपसेविनो ये ते चासुरा भविष्यन्तीत्येवमाद्यंभिधानं धर्मावर्णवादः ।
सुरामांसोपसेवाद्याघोषणं देवावर्णवादः ।
§ ६३५. द्वितीयस्य मोहस्यास्रवभेदप्रतिपादनार्थमाह—
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥ १४ ॥
§ ६३६. कषाया उक्ताः । उदयो विपाकः । कषायाणामुदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्या-
स्रवो वेदितव्यः । तत्र स्वपरकषायोत्पादनं तपस्विजनवृत्तदूषणं संक्लिष्टलिङ्गव्रतधारणादिः
कषायवेदनीयस्यास्रवः । सद्धर्मोपहसनदीनातिहासकॅन्दर्पोपहासबहुविप्रलापोपहासशीलतादिर्हास्य-
वेदनीयस्य । विचित्रक्रीडनपरताव्रतशीलारुच्यादिः रतिवेदनीयस्य । परारतिप्रादुर्भावनरतिविनाश- १०
नपापशीलसंसर्गादिः अरतिवेदनीयस्य । स्वशोकोत्पादनं परशोकप्लुताभिनन्दनादिः शोकवेदनीयस्य ।
स्वभयपरिणामपरभयोत्पादनादिर्भयवेदनीयस्य । कुशलक्रियाचारजुगुप्सापरिवादशीलत्वादिर्र्जुगुप्सा-
वेदनीयस्य । अलीकाभिधायितातिसंधानपरत्वपेररन्ध्रप्रेक्षित्त्वप्रवृद्धरागादिः स्त्रीवेदनीयस्य ।
दर्शनमोहनीयके आस्रवका कारण है । यथा केवली कवलाहारसे जीते हैं इत्यादि रूपसे कथन
करना केवलियोंका अवर्णवाद है । शास्त्रमें मांसभक्षण आदिको निर्दोष कहा है इत्यादि रूपसे कथन १५
करना श्रुतका अवर्णवाद है। ये शूद्र हैं, अशुचि हैं, इत्यादि रूपसे अपवाद करना संघका अवर्णवाद
है । जिनदेवके द्वारा उपदिष्ट धर्ममें कोई सार नहीं, जो इसका सेवन करते हैं वे असुर होंगे इस
प्रकार कथन करना धर्मका अवर्णवाद है । देव सुरा और मांस आदिका सेवन करते हैं इस
प्रकारका कथन करना देवोंका अवर्णवाद है ।
§ ६३५. अब मोहनीयका दूसरा भेद जो चारित्र मोहनीय है उसके आस्रवके भेदोंका कथन २०
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
कषायके उदयसे होनेवाला तीव्र आत्मपरिणाम चारित्रमोहनीयका आस्रव है ॥१४॥
§ ६३६. कषायोंका व्याख्यान पहले कर आये हैं । विपाकको उदय कहते हैं । कषायोंके
उदयसे जो आत्माका तीव्र परिणाम होता है वह चारित्रमोहनीयका आस्रव जानना चाहिए । स्वयं
कषाय करना, दूसरोंमें कषाय उत्पन्न करना, तपस्वीजनोंके चारित्रमें दूषण लगाना, संक्लेशको २५
पैदा करनेवाले लिंग ( वेष ) और व्रतको धारण करना आदि कषायवेदनीयके आस्रव हैं । सत्य
धर्मका उपहास करना, दीन मनुष्यकी दिल्लगी उड़ाना, कुत्सित रागको बढ़ानेवाला हँसी मजाक
करना, बहुत बकने और हँसनेकी आदत रखना आदि हास्यवेदनीयके आस्रव हैं। नाना प्रकारकी
क्रीड़ाओंमें लगे रहना, व्रत और शीलके पालन करनेमें रुचि न रखना आदि रतिवेदनीयके आस्रव
हैं । दूसरोंमें अरति उत्पन्न हो और रतिक्रा विनाश हो ऐसी प्रवृत्ति करना और पापी लोगोंकी ३०
संगति करना आदि अरतिवेदनीयके आस्रव हैं। स्वयं शोकातुर होना, दूसरोंके शोकको बढ़ाना
तथा ऐसे मनुष्योंका अभिनन्दन करना आदि शोकवेदनीयके आस्रव हैं। भयरूप अपना परिणाम
और दूसरेको भय पैदा करना आदि भयवेदनीयके आस्रवके कारण हैं। सुखकर क्रिया और सुख-
कर आचारसे घृणा करना और अपवाद करने में रुचि रखना आदि जुगुप्सावेदनीयके आस्रव हैं।
असत्य बोलनेकी आदत, अतिसन्धानपरता, दूसरेके छिद्र ढूँढ़ना और बढ़ा हुआ राग आदि ३५
१. –णाद्यभिधानं मु०, ना० । २. –त्येवमभि–मु० । ३. –नातिहासबहु-मु० । ४. –त्पादनं परशोका-
विष्करणं शोक-ता० । ५. –रत्वं पररन्ध्रापे-मु० ।–रत्वं रन्ध्रापे-आ० ।
३२
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२५० सर्वार्थसिद्धौ [ ६।१५ § ६३७ -
स्तोकक्रोधानुत्सुकत्वस्वदारसंतोषादिः पुंवेदनोयस्य । प्रचुरकषायगुह्येन्द्रियव्यपरोपणपराङ्गनावस्क¹-
न्दादिर्नपुंसकवेदनीयस्य ।
§ ६३७. निर्दिष्टो मोहनीयस्यास्रवभेदः । इदानीं तदनन्तरनिर्दिष्टस्यायुष² आस्रवहेतौ वक्तव्ये
आद्यस्य नियतकालपरिपाकस्यायुषः कारणप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते—
बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः ॥ १५ ॥
§ ६३८. आरम्भः प्राणिपीडाहेतुर्व्यापारः । ममेदंबुद्धिलक्षणः परिग्रहः । आरम्भाश्च परि-
ग्रहाश्च आरम्भपरिग्रहाः । बहव आरम्भपरिग्रहा यस्य स बह्वारम्भपरिग्रहः । तस्य भावो
बह्वारम्भपरिग्रहत्वम् । हिंसादिक्रूरकर्माजस्रप्रवर्तनपरस्वहरणविषयातिगृद्धिकृष्णलेश्याभिजातरौद्र-
ध्यानमरणकालतादिलक्षणो नारकस्यायुष आस्रवो भवति

  • ६४१ ९ § ६४६ ] षष्ठोऽध्यायः २५१
    § ६४१. आह, व्याख्यातस्तैर्यग्योनस्यायुष आस्रवः । इदानीं मानुषस्यायुषः को हेतुरित्य-
    त्रोच्यते—
    अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥ १७ ॥
    § ६४२. नारकआयुरास्रवो व्याख्यातः । तद्विपरीतो मानुषस्यायुष इति संक्षेपः । तद्व्यासः—
    विनीतस्वभावः प्रकृतिभद्रता प्रगुणव्यवहारता तनुकषायत्वं मरणकालसंक्लेशाभावादिः । ५
    § ६४३. किमेतावानेव मानुषस्यायुष आस्रव इत्यत्रोच्यते—
    स्वभावमार्दवं च ॥ १८ ॥
    § ६४४. मृदोर्भावो मार्दवम् । स्वभावेन मार्दवं स्वभावमार्दवम् । उपदेशानपेक्षमित्यर्थः ।
    एतदपि मानुषस्यायुष आस्रवः । पृथग्योगकरणं किमर्थम् । उत्तरार्थम्, देवायुष आस्रवोऽयमपि¹
    यथा स्यात् । १०
    § ६४५. किमेतदेव द्वितीयं² मानुषस्यास्रवः । न; इत्युच्यते—
    निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषाम् ॥ १६ ॥
    § ६४६. ‘च’शब्दोऽधिकृतसमुच्चयार्थः । अल्पारम्भपरिग्रहत्वं च निःशीलव्रतत्वं च ।
    शीलानि च व्रतानि च शीलव्रतानि³ तानि वक्ष्यन्ते । निष्क्रान्तः शीलव्रतेभ्यो निःशीलव्रतः । तस्य
    § ६४१. तिर्यंचायुके आस्रव कहे । अब मनुष्यायुका क्या आस्रव है यह बतलानेके लिए १५
    आगेका सूत्र कहते हैं—
    अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रहवालेका भाव मनुष्यायुका आस्रव हैं ॥१७॥
    § ६४२. नरकायुका आस्रव पहले कह आये हैं । उससे विपरीत भाव मनुष्यायुका आस्रव
    है । संक्षेपमें यह इस सूत्रका अभिप्राय है । उसका विस्तारसे खुलासा—स्वभावका विनम्र होना,
    भद्र प्रकृतिका होना, सरल व्यवहार करना, अल्प कषायका होना तथा मरणके समय संक्लेशरूप २०
    परिणतिका नहीं होना आदि मनुष्यायुके आस्रव हैं ।
    § ६४३. क्या मनुष्यायुका आस्रव इतना ही है या और भी है । इसी बातको बतलानेके
    लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    स्वभावकी मृदुता भी मनुष्यायुका आस्रव है ॥१८॥
    § ६४४. मृदुका भाव मार्दव है। स्वभावसे मार्दव स्वभाव मार्दव है। आशय यह है कि बिना २५
    किसीके समझाये-बुझाये मृदुता अपने जीवनमें उतरी हुई हो इसमें किसीके उपदेशकी आवश्यकता
    न पड़े । यह भी मनुष्यायुका आस्रव है । शंका—इस सूत्रको अलगसे क्यों बनाया ? समाधान—
    स्वभावकी मृदुता देवायुका भी आस्रव है इस बातके बतलानेके लिए इस सूत्रको अलगसे
    बनाया है ।
    § ६४५. क्या ये दो ही मनुष्यायुके आस्रव हैं ? नहीं, किन्तु और भी हैं । इसी बातको बत- ३०
    लानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
    शीलरहित और व्रतरहित होना सब आयुओंका आस्रव है ॥१९॥
    § ६४६. सूत्रमें जो 'च' शब्द है वह अधिकार प्राप्त आस्रवोंके समुच्चय करनेके लिए है ।
    जिससे यह अर्थ निकलता है कि अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रहरूप भाव तथा शील और व्रत-
    रहित होना सब आयुओंके आस्रव हैं । शील और व्रतोंका स्वरूप आगे कहनेवाले हैं। इनसे रहित ३५
    १. आस्रवोऽपि मु० । २. द्वितीयं मु० । ३. व्रतानि वक्ष्य-मु० ।
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भावो निःशीलव्रतत्वम् । 'सर्वेषां'ग्रहणं सकलायुरास्रवप्रतिपत्त्यर्थम् । किं देवायुषोऽपि भवति ।
सत्यम्, भवति भोगभूमिजापेक्षया ।
§ ६४७. अथ चतुर्थस्यायुषः क आस्रव इत्यत्रोच्यते—
सरागासंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि दैवस्य ॥ २० ॥
§ ६४८. सरागसंयमः संयमासंयमश्च व्याख्यातौ । अकामनिर्जरा अकामश्चारकनिरोध-
बन्धनबद्धेषु क्षुत्तृष्णानिरोधब्रह्मचर्यभूशय्यामलगधारणपरितापादिः । अकामेन निर्जरा अकामनिर्जरा ।
बालतपो मिथ्यादर्शनोपेतमनुपायकायक्लेशप्रचुरं निकृतिबहुलव्रतधारणम् । तान्येतानि दैवस्यायुष
आस्रवहेतवो वेदितव्याः ।
§ ६४९. किमेतावानेव दैवस्यायुष आस्रवः । नेत्याह—
सम्यक्त्वं च ॥ २१ ॥
§ ६५०. किम् । दैवस्यायुष आस्रव इत्यनुवर्तते । अविशेषाभिधानेऽपि सौधर्मादिविशेषगतिः ।
कुतः । पृथक्करणात् । यद्येवम्, पूर्वसूत्रे, उक्त आस्रवविधिरविशेषेण प्रसक्तः तेन सरागसंय-
मसंयमासंयमावपि भवनवास्याद्यायुष आस्रवौ प्राप्नुतः । नैष दोषः; सम्यक्त्वाभावे सति तद्वच-
पदेशाभावात्तदुभयमप्यत्रान्तर्भवति ।
जीवका जो भाव होता है उससे सब आयुओंका आस्रव होता है यह इस सूत्रका भाव है । यहाँ
सब आयुओंका आस्रव इष्ट है यह दिखलानेके लिए सूत्रमें 'सर्वेषाम्' पदको ग्रहण किया है ।
शंका—क्या शील और व्रतरहितपना देवायुका भी आस्रव है ? समाधान—हां, भोगभूमियाँ
प्राणियोंकी अपेक्षा शील और व्रतरहितपना देवायुका भी आस्रव है ।
§ ६४७. अब चौथी आयुका क्या आस्रव है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सरागसंयम, संयमासंयम, अकामनिर्जरा और बालतप ये देवायुके आस्रव हैं ॥२०॥
§ ६४८. सरागसंयम और संयमासंयमका व्याख्यान पहले कर आये हैं। चारकमें रोक
रखनेपर या रस्सी आदिसे बांध रखनेपर जो भूख प्यास सहनी पड़ती है, ब्रह्मचर्य पालना पड़ता
है, भूमिपर सोना पड़ता है, मल मूत्रको रोकना पड़ता है और संताप आदि होता है ये सब अकाम
है और इससे जो निर्जरा होती है वह अकामनिर्जरा है । मिथ्यात्वके कारण मोक्षमार्गमें उपयोगी
न पड़नेवाले कायक्लेशबहुल मायासे व्रतोंका धारण करना बालतप है । ये सब देवायुके आस्रवके
कारण जानने चाहिए ।
§ ६४९. क्या देवायुका आस्रव इतना ही है या और भी है ? अब इसी बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सम्यक्त्व भी देवायुका आस्रव है ॥२१॥
§ ६५०. शंका—किस कारणसे । समाधान—अलग सूत्र बनानेसे । शंका—यदि ऐसा है
तो पूर्व सूत्रमें जो विधान किया है वह सामान्यरूपसे प्राप्त होता है और इससे सरागसंयम और
संयमासंयम ये भवनवासी आदिकी आयुके भी आस्रव हैं यह प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई
दोष नहीं है; क्योंकि सम्यक्त्वके अभावमें सरागसंयम और संयमासंयम नहीं होते, इसलिए उन
दोनोंका यहाँ अन्तर्भाव होता है । अर्थात् ये भी सौधर्मादि देवायुके आस्रव हैं; क्योंकि ये सम्यक्त्वके
होनेपर ही होते हैं ।
१. -पेतमनुकम्पाकाय-ता०, ना० ।

– ६।२३ § ६५५ ] षष्ठोऽध्यायः २५३
§ ६५१. आयुषोऽनन्तरमुद्दिष्टस्य नाम्न आस्रवविधौ वक्तव्ये, तत्राशुभनाम्न आस्रवप्रति-
पत्त्यर्थमाह—
योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥ २२ ॥
§ ६५२. योगस्त्रिप्रकारो व्याख्यातः । तस्य वक्रता कौटिल्यम् । विसंवादनमन्यथाप्रवर्तनम् ।
ननु च नार्थभेदः । योगवक्रतैवान्यथाप्रवर्तनम् । सत्यमेवैतत्—स्वगता योगवक्रतेत्युच्यते । परगतं ५
विसंवादनम् । सम्यगभ्युदयनिःश्रेयसार्थासु क्रियासु प्रवर्तमानमन्यं तद्विपरीतकायवाङ्मनोभिर्वि-
संवादयति मैवं कार्षीरेवं कुर्विति । एतदुभयमशुभनामकर्मास्रवकारणं वेदितव्यम् । 'च'शब्देन
मिथ्यादर्शनपैशुन्यास्थिरचित्तताकूटमानतुलाकरणपरनिन्दात्मप्रशंसादिः समुच्चीयते ।
§ ६५३. अथ शुभनामकर्मणः क आस्रव इत्यत्रोच्यते—
तद्विपरीतं शुभस्य ॥ २३ ॥ १०
§ ६५४. कायवाङ्मनसामृजुत्वमविसंवादनं च तद्विपरीतम् । 'च'शब्देन समुच्चितस्य च
विपरीतं ग्राह्यम् । धार्मिकदर्शनसंभ्रमसद्भावोपनयनसंसरणभीरुताप्रमादवर्जनादिः । तदेतच्छु-
भनामकर्मास्रवकारणं वेदितव्यम् ।
§ ६५५. आह किमेतावानेव शुभनाम्न आस्रवविधिरुत कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
यदिदं तीर्थकरनामकर्मानन्तानुपमप्रभावमचिन्त्यविभूतिविशेषकारणं त्रैलोक्यविजयकरं तस्यास्रव- १५
विधिविशेषोऽस्तीति । यद्येवमुच्यतां के तस्यास्रवाः । इत्यत इदमारभ्यते—


§ ६५१. आयुके बाद नामके आस्रवका कथन क्रमप्राप्त है । उसमें भी पहले अशुभ नामके
आस्रवका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं ।
योगवक्रता और विसंवाद ये अशुभ नाम कर्मके आस्रव हैं ॥२२॥
§ ६५२. तीन प्रकारके योगका व्याख्यान पहले कर आये हैं। इसकी कुटिलता योगवक्रता २०
है । अन्यथा प्रवृत्ति करना विसंवाद है । शंका—इस तरह इनमें अर्थभेद नहीं प्राप्त होता; क्योंकि
योगवक्रता और अन्यथा प्रवृत्ति करना एक ही बात है ? समाधान—यह कहना सही है तब भी
योगवक्रता स्वगत है और विसंवादन परगत । जो स्वर्ग और मोक्षके योग्य समीचीन क्रियाओंका
आचरण कर रहा है उसे उसके विपरीत मन, वचन और कायकी प्रवृत्ति द्वारा रोकना कि ऐसा
मत करो ऐसा करो विसंवादन है । इस प्रकार ये दोनों एक नहीं हैं किन्तु अलग-अलग हैं । ये २५
दोनों अशुभ नामकर्मके आस्रवके कारण जानने चाहिए । सूत्रमें आये हुए 'च' पदसे मिथ्यादर्शन,
चुगलखोरी, चित्तका स्थिर न रहना, मापने और तौलनेके बाँट घट बढ़ रखना, दूसरोंकी निन्दा
करना और अपनी प्रशंसा करना आदि आस्रवोंका समुच्चय होता है ।
§ ६५३. अब शुभ नामकर्मका आस्रव क्या है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं।
उससे विपरीत अर्थात् योगकी सरलता और अविसंवाद ये शुभनामकर्मके आस्रव हैं ॥२३॥ ३०
§ ६५४. काय, वचन और मनकी सरलता तथा अविसंवाद ये उससे विपरीत हैं । उसी
प्रकार पूर्व सूत्रकी व्यवस्था करते हुए 'च' शब्दसे जिनका समुच्चय किया गया है उनके विपरीत
आस्रवोंका ग्रहण करना चाहिए । जैसे—धार्मिक पुरुषों व स्थानोंका दर्शन करना, आदर सत्कार
करना, सद्भाव रखना, उपनयन, संसारसे डरना और प्रमादका त्याग करना आदि । ये सब शुभ
नामकर्मके आस्रवके कारण हैं। ३५
§ ६५५. शंका—क्या इतने ही शुभ नामकर्मके आस्रव हैं या और भी कोई विशेषता है ?
समाधान—जो यह अनन्त और अनुपम प्रभाववाला, अचिन्त्य विभूति विशेषका कारण और तीन
लोककी विजय करनेवाला तीर्थंकर नामकर्म है उसके आस्रवमें विशेषता है, अतः अगले सूत्र द्वारा
उसीका कथन करते हैं—

२४४ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।२४ ६ ६५६ –
दर्शनविशुद्धिर्विनयसंपन्नता शीलव्रतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ भक्तितस्त्याग-
तपसी साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहा-
णिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥ २४ ॥
६ ६५६. जिनेन भगवताहंत्परमेष्ठिनोपदिष्टे निर्ग्रन्थक्षणे मोक्षमत्र्त्मनि रुचिर्दर्शनविशुद्धिः
५ प्रागुक्तलक्षणा । तस्या अष्टावङ्गानि निःशङ्कितत्वं निःकाङ्क्षितं विचिकित्साविरहता अमूढदृष्टिता
उपबृंहणं स्थितीकरणं वात्सल्यं प्रभावनां चेति । सम्यग्ज्ञानादिषु मोक्षमार्गेषु तत्साधनेषु च गुर्वादिषु
स्वयोग्यवृत्त्या सत्कार आदरो विनयस्तेन संपन्नता विनयसंपन्नता । अहिंसादिषु व्रतेषु तत्प्रतिपाल-
नार्थेषु च क्रोधवर्जनादिषु शीलेषु निरवद्या वृत्तिः शीलव्रतेष्वनतीचारः । जीवादिपदार्थस्वतत्त्वविषये
सम्यग्ज्ञाने नित्यं युक्तता अभीक्ष्णज्ञानोपयोगः । संसारदुःखान्नित्यभीरुता संवेगः । त्यागो दानम् ।
१० तत्रिविधम्-आहारदानमभयदानं ज्ञानदानं चेति । तच्छक्तितो यथाविधि प्रयुज्यमानं त्याग
इत्युच्यते । अनिग्रहितवीर्यस्य मार्गाविरोधि कायक्लेशस्तपः । यथा भाण्डागारे दहने समुत्थिते
तत्प्रशमनमनुष्ठीयते बहूपकारत्वात्तथानेकव्रतशीलसमृद्धस्य मुनेस्तपसः कुतश्चित्प्रत्यूहे समुपस्थिते
तत्संधारणं समाधिः । गुणवद्दुःखोपनिपाते निरवद्येन विधिना तदपहरणं वैयावृत्त्यम् । अर्हदा-
चार्येषु बहुश्रुतेषु प्रवचने च भावविशुद्धियुक्तोऽनुरागो भक्तिः । षण्णामावश्यकक्रियाणां यथाकालं
१५ प्रवर्तनमावश्यकापरिहाणिः । ज्ञानतपोदानजिनपूजाविधिना धर्मप्रकाशनं मार्गप्रभावना । वत्से

दर्शनविशुद्धि, विनयसंपन्नता, शील और व्रतोंका अतिचार रहित पालन करना, ज्ञानमें
सतत उपयोग, सतत संवेग, शक्तिके अनुसार त्याग, शक्तिके अनुसार तप, साधु-समाधि, वैयावृत्त्य
करना, अरिहंतभक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, आवश्यक क्रियाओंको न छोड़ना,
मोक्षमार्गकी प्रभावना और प्रवचनवात्सल्य ये तीर्थंकर नामकर्मके आस्रव हैं ॥२४॥

२० ६ ६५६. (१) जिन भगवान् अरिहंत परमेष्ठी द्वारा कहे हुए निर्ग्रन्थ स्वरूप मोक्षमार्गपर
रुचि रखना दर्शनविशुद्धि है। इसका विशेष लक्षण पहले कह आये हैं। उसके आठ अंग हैं?
निःशंकित्त्व, निःकांक्षिता. निर्विचिकित्सतत्व, अमूढदृष्टिता, उपबृंहण, स्थितीकरण, वात्सल्य और
प्रभावना । (२) सम्यग्ज्ञानादि मोक्षमार्ग और उनके साधन गुरु आदिके प्रति अपने योग्य आचरण-
द्वारा आदर सत्कार करना विनय है और इससे युक्त होना विनयसम्पन्नता है। (३) अहिंसादिक
२५ व्रत हैं और इनके पालन करनेके लिए क्रोधादिकका त्याग करना शील है। इन दोनोंके पालन
करनेमें निर्दोष प्रवृत्ति रखना शीलव्रतानतिचार है। (४) जीवादि पदार्थरूप स्वतत्त्वविषयक
सम्यग्ज्ञानमें निरन्तर लगे रहना अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग है। (५) संसारके दुःखोंसे निरन्तर डरते
रहना संवेग है । (६) त्याग दान है। वह तीन प्रकारका है-आहारदान, अभयदान और ज्ञान-
दान । उसे शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक देना यथाशक्ति त्याग है। (७) शक्तिको न छिपाकर
३० मोक्षमार्गके अनुकूल शरीरको क्लेश देना यथाशक्ति तप है। (८) जैसे भांडारमें आग लग जानेपर
बहुत उपकारी होनेसे आगको शान्त किया जाता है उसी प्रकार अनेक प्रकारके व्रत और शीलोंसे
समृद्ध मुनिके तप करते हुए किसी कारणसे विघ्नके उत्पन्न होनेपर उसका संधारण करना-शान्त
करना साधुसमाधि है। (९) गुणी पुरुषके दुःखमें आ पड़नेपर निर्दोष विधिसे उसका दुःख दूर
करना वैयावृत्त्य है। (१०-१३) अरिहंत, आचार्य, बहुश्रुत और प्रवचन इनमें भावोंकी विशुद्धिके
३५ साथ अनुराग रखना अरिहंतभक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति और प्रवचनभक्ति है। (१४) छह
आवश्यक क्रियाओंका यथा समय करना आवश्यकापरिहाणि है। (१५) ज्ञान, तप, दान और

१. -मोक्षसाधनेषु तत्-मु० । २. -चार्यबहु-मु० । ३. -तपोजिन-मु० ।

  • ६२६ § ६६० ] षष्ठोऽध्यायः २५५

धेनुवत्सधर्मणि स्नेहः प्रवचनवत्सलत्वम् । तान्येतानि षोडशकारणानि सम्यग्भाव्यमानानि व्यस्तानि
च तीर्थकरनामकर्मार्तास्रवकारणानि प्रत्येत्तव्यानि ।
§ ६५७. इदानीं नामास्रवाभिधानानन्तरं गोत्रास्रवे वक्तव्ये सति नीचैर्गोत्रस्यास्रवविधानार्थ-
मिदमाह—
परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्रस्य ॥ २५ ॥ ५
§ ६५८. तथ्यस्य वातथ्यस्य वा दोषस्योद्भावनं प्रति इच्छा निन्दा । गुणोद्भावनाभिप्रायः
प्रशंसा । यथासंख्यं²मभिसंबन्धः—परनिन्दा आत्मप्रशंसेति । प्रतिबन्धकहेतुसंनिधाने सति
अनुद्भूतवृत्तिता अनाविर्भाव उच्छादनम् । प्रतिबन्धकाभावे³ प्रकाशवृत्तिता उद्भावनम् । अत्रापि
च यथाक्रममभिसंबन्धः—सद्गुणोच्छादनमसद्गुणोद्भावनमिति । तान्येतानि नीचैर्गोत्रस्यास्रव-
कारणानि वेदितव्यानि । १०
§ ६५९. अथोच्चैर्गोत्रस्य क आस्रवविधिरत्रोच्यते—
तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य ॥ २६ ॥
§ ६६०. 'तत्'इत्यनेन प्रत्यासत्तेर्नीचैर्गोत्रस्यास्रवः⁴ प्रतिनिधिर्दिश्यते । अन्येन⁵ प्रकारेण
वृत्तिर्विपर्ययः । तस्य विपर्ययस्तद्विपर्ययः । कः पुनरसौ विपर्ययः । आत्मनिन्दा, परप्रशंसा, सद्गुणो-
जिनपूजा इनके द्वारा धर्मका प्रकाश करना मार्गप्रभावना है । (१६) जैसे गाय बछड़ेपर स्नेह १५
रखती है उसी प्रकार साधर्मियोंपर स्नेह रखना प्रवचनवत्सलत्व है । ये सब सोलह कारण हैं ।
यदि अलग-अलग इनका भले प्रकार चिन्तन किया जाता है तो भी ये तीर्थंकर नामकर्मके आस्रवके
कारण होते हैं और समुदायरूपसे सबका भले प्रकार चिन्तन किया जाता है तो भी ये तीर्थंकर
नामकर्मके आस्रवके कारण होते हैं ।
§ ६५७. नामकर्मके आस्रवोंका कथन करनेके बाद अब गोत्रकर्मके आस्रवोंका कथन २०
क्रमप्राप्त है । उसमें भी पहले नीच गोत्रके आस्रवोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
परनिन्दा, आत्मप्रशंसा, सद्गुणों का उच्छादन और असद्गुणों का उद्भावन ये नीचगोत्रके
आस्रव हैं । ॥२५॥
§ ६५८. सच्चे या झूठे दोषको प्रकट करनेकी इच्छा निन्दा है । गुणोंके प्रकट करनेका भाव
प्रशंसा है । पर और आत्मा शब्दके साथ इनका क्रमसे सम्बन्ध होता है । यथा परनिन्दा और आत्म- २५
प्रशंसा । रोकनेवाले कारणोंके रहनेपर प्रकट नहीं करनेकी वृत्ति होना उच्छादन है और रोकनेवाले
कारणोंका अभाव होनेपर प्रकट करनेकी वृत्ति होना उद्भावन है । यहाँ भी क्रमसे सम्बन्ध होता
है । यथा—सद्गुणोच्छादन और असद्गुणोद्भावन । इन सब का नीच गोत्रके आस्रवके कारण
जानना चाहिए ।
§ ६५९. अब उच्च गोत्रके आस्रवके कारण क्या हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र ३०
कहते हैं—
उनका विपर्यय अर्थात् परप्रशंसा, आत्मनिन्दा, सद्गुणोंका उद्भावन और असद्गुणोंका
उच्छादन तथा नम्रवृत्ति और अनुत्सेक ये उच्च गोत्रके आस्रव हैं ॥२६॥
§ ६६०. इसके पहले नीच गोत्रके आस्रवोंका उल्लेख कर आये हैं, अतः 'तत्' इस पदसे
उनका ग्रहण होता है । अन्य प्रकारसे वृत्ति होना विपर्यय है । नीच गोत्रका जो आस्रव कहा है ३५
उससे विपर्यय तद्विपर्यय है । शंका—वे विपरीत कारण कौन हैं ? समाधान—आत्मनिन्दा,


१. तथ्यस्य वा दो-मु० । २. -संख्यमिति सम्ब-आ०, दि० १, दि, २ । ३. -भावेन प्रकाश-मु० ।
४. -गोत्रास्रवः आ०, दि० १, दि० १ । ५. -अनेन मु० ।

२५६ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।२७ § ६६१ –
द्भावनमसद्गुणोच्छादनं च। गुणोत्कृष्टेषु विनयेनावनतिर्नीचैर्वृत्तिः। विज्ञानादिभिरुत्कृष्टस्यापि
सतस्तत्कृतमदविरहोऽनहङ्कारतानुत्सेकः। तान्येतान्युत्तरस्योच्चैर्गोत्रस्यास्रवकारणानि भवन्ति ।
§ ६६१. अथ गोत्रानन्तरमुद्दिष्टस्यान्तरायस्य क आस्रव इत्युच्यते—
विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥ २७ ॥
§ ६६२. दानादीन्युक्तानि 'दानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च' इत्यत्र । तेषां विहननं विघ्नः ।
विघ्नस्य करणं विघ्नकरणमन्तरायस्यास्रवविधिवेदितव्यः । अत्र चोद्यते—तत्प्रदोषनिह्नवादयो
ज्ञानदर्शनावरणादीनां प्रतिनियता आस्रवहेतवो वर्णिताः, किं ते प्रतिनियतज्ञानावरणाद्यास्रवहेतव
एव उताविशेषेणेति । यदि प्रतिनियतज्ञानावरणाद्यास्रवहेतव एव, आगमविरोधः प्रसज्यते । आगमे
हि सप्त कर्माणि आयुर्वर्ज्यानि प्रतिक्षणं युगपदास्रवन्तीत्युक्तम् । तद्विरोधः स्यात् । अथाविशेषेण
आस्रवहेतवो १ विशेषनिर्देशो न युक्त इति । अत्रोच्यते—यद्यपि तत्प्रदोषादिभिर्ज्ञानावरणादीनां
सर्वासां कर्मप्रकृतीनां प्रदेशबन्धनियमो नास्ति, तथाप्यनुभागनियमहेतुत्वेन तत्प्रदोषनिह्नवादयो
विभज्यन्ते ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
परप्रशंसा, सद्गुणोंका उद्भावन और असद्गुणोंका उच्छादन। जो गुणोंमें उत्कृष्ट हैं उनके प्रति
विनयसे नम्र रहना नीचैर्वृत्ति है। ज्ञानादिकी अपेक्षा श्रेष्ठ होते हुए भी उसका मद न करना अर्थात्
अहंकार रहित होना अनुत्सेक है। ये उत्तर अर्थात् उच्च गोत्रके आस्रवके कारण हैं।
§ ६६१. अब गोत्रके बाद क्रम प्राप्त अन्तराय कर्मका क्या आस्रव है यह बतलानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
दानादिकमें विघ्न डालना अन्तराय कर्मका आस्रव है ॥२७॥
§ ६६२. 'दानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च' इस सूत्रकी व्याख्या करते समय दानादिकका
व्याख्यान कर आये हैं। उनका नाश करना विघ्न है। और इस विघ्नका करना अन्तराय कर्मका
आस्रव जानना चाहिए । शंका—तत्प्रदोष और निह्नव आदिक ज्ञानावरण और दर्शनावरण आदि
कर्मोंके प्रतिनियत आस्रवके कारण कहे तो क्या वे ज्ञानावरण और दर्शनावरण आदि प्रतिनियत
कर्मोंके आस्रवके कारण हैं या सामान्यसे सभी कर्मोंके आस्रवके कारण हैं ? यदि ज्ञानावरणादिक
प्रतिनियत कर्मोंके ही आस्रवके कारण हैं तो आगमसे विरोध प्राप्त होता है, क्योंकि आयुके सिवा
शेष सात कर्मोंका प्रति समय आस्रव होता है ऐसा आगममें कहा है, अतः इससे विरोध होता है।
और यदि सामान्यसे सब कर्मोंके आस्रवके कारण हैं ऐसा माना जाता है तो इस प्रकार विशेष
रूपसे कथन करना युक्त नहीं ठहरता ? समाधान—यद्यपि तत्प्रदोष आदिसे ज्ञानावरणादि सब
कर्म प्रकृतियोंका प्रदेश बन्ध होता है ऐसा नियम नहीं है तो भी वे प्रतिनियत अनुभागबन्धके हेतु
हैं इसलिए तत्प्रदोष, निह्नव आदिका अलग-अलग कथन किया है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें छठा अध्याय समाप्त हुआ ॥६॥
१. –हेतुविशेष–आ०, ता०, ना०, दि० १, दि० २ ।

अथ सप्तमोऽध्यायः
§ ६६३. आस्रवपदार्थो व्याख्यातः । तत्प्रारम्भकाल एवोक्तं 'शुभः पुण्यस्य' इति तत्सामान्ये-
नोक्तम् । तद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थं कः पुनः शुभ इत्युक्ते इदमुच्यते—
हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् ॥ १ ॥
§ ६६४. 'प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्येवमादिभिः सूत्रैर्हिंसादयो निर्देक्ष्यन्ते । तेभ्यो ५
विरमणं विरतिर्व्रतमित्युच्यते । २व्रतमभिसन्धिकृतो नियमः, इदं कर्तव्यमिदं न कर्तव्यमिति
वा । ननु च हिंसादयः परिणामविशेषा अध्रुवाः, कथं तेषाम³पादानत्वमुच्यते । बुद्धयपाये
ध्रुवत्वविवक्षोपपत्तेः । यथा धर्माद्विरमतीत्यत्र य एष मनुष्यः संभिन्नबुद्धिः स पश्यति—दुष्करो धर्मः,
फलं चास्य श्रद्धामात्रगम्यमिति स⁵ बुद्ध्या संप्राप्य निवर्तते । एवमिहापि य⁶ एव मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी
स पश्यति—य एते हिंसादयः परिणामास्ते पापहेतवः । पापकर्माणं प्रवर्त्तमानान् जनानिहैव १०
राजानो दण्डयन्ति परत्र च दुःखमाप्नुवन्तीति स⁷ बुद्ध्या संप्राप्य निवर्तते । ततो बुद्ध्या
ध्रुवत्वविवक्षोपपत्तेरपादानत्वं युक्तम् । 'विरति'शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते हिंसाया विरतिः
§ ६६३. आस्रव पदार्थका व्याख्यान करते समय उसके आरम्भ में 'शुभः पुण्यस्य' यह कहा
है पर वह सामान्य रूपसे ही कहा है, अतः विशेष रूपसे उसका ज्ञान करानेके लिए शुभ क्या है
ऐसा पूछने पर आगेका सूत्र कहते हैं— १५
हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रहसे निवृत्त होना व्रत है ॥१॥
§ ६६४. 'प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्यादि सूत्रों द्वारा हिंसादिका जो स्वरूप
आगे कहेंगे उनसे विरत होना व्रत कहलाता है । प्रतिज्ञा करके जो नियम लिया जाता है वह
व्रत है । या 'यह करने योग्य है और यह नहीं करने योग्य है' इस प्रकार नियम करना व्रत है ।
शंका—हिंसा आदिक परिणाम विशेष ध्रुव अर्थात् सदा काल स्थिर नहीं रहते इसलिए उनका २०
अपादान कारकमें प्रयोग कैसे बन सकता है ? समाधान—बुद्धिपूर्वक त्यागमें ध्रुवपनेकी विवक्षा
बन जानेसे अपादान कारकका प्रयोग बन जाता है । जैसे 'धर्मसे विरत होता है' यहाँ जो यह
धर्मसे विमुख बुद्धिवाला मनुष्य है वह विचार करता है कि 'धर्म दुष्कर है और उसका फल
श्रद्धामात्रगम्य है' इस प्रकार वह बुद्धिसे समझ कर धर्मसे विरत हो जाता है । इसी प्रकार यहाँ
भी जो यह मनुष्य विचारपूर्वक काम करनेवाला है वह विचार करता है कि जो ये हिंसादिक २५
परिणाम हैं वे पापके कारण हैं और जो पाप कार्यमें प्रवृत्त होते हैं उन्हें इसी भवमें राजा लोग दण्ड
देते हैं और वे पापाचारी परलोकमें दुःख उठाते हैं, इस प्रकार वह बुद्धिसे समझ कर हिंसादिकसे
विरत हो जाता है । इसलिए बुद्धिसे ध्रुवत्वपनेकी विवक्षा बन जानेसे अपादान कारकका प्रयोग
करना उचित है । विरति शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा हिंसासे विरति,
१. 'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यपरिग्रहा यमाः ।'—पा० यो० सू० २, ३० । २. 'अभिसन्धिकृता विरतिर्वि- ३०
षयाद्योध्याद्व्रतं भवति ।'—रत्न० ३, ४० । ३. 'ध्रुवमपायेऽपादानम् ।'—पा० १, ४, २४ । ४. 'धर्माद्विरमति
× × य एष मनुष्यः संभिन्नबुद्धिर्भवति स पश्यति ।'—पा० म० भा० १, ४, ३, २४ । ५. स्वबुद्ध्या
मु० । 'स बुद्ध्या निवर्तते'—पा० म० भा० १, ४, ३, २४ । ६. 'य एष मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी भवति स
पश्यति ।'—पा० म० भा० १, ४, ३, २४ । ७. –वन्तीति स्वबुद्ध्या मु०, ता० ना० ।
३३

अनृताद्विरितिरित्येवमादि । तत्र अहिंसाव्रतमादौ क्रियते प्रधानत्वात् । सत्यादीनि हि तत्परिपाल-
नार्थानि सस्यस्य वृतिपरिक्षेपवत् । सर्वसावद्यनिवृत्तिलक्षणसामायिकापेक्षया एकं व्रतं, तदेव
छेदोपस्थापनापेक्षया पञ्चविधमिहोच्यते । ननु च अस्य व्रतस्यास्रवहेतुत्वमनुपपन्नं संवरहेतुष्वन्त-
र्भावात् । संवरहेतवो वक्ष्यन्ते गुप्तिसमित्यादयः । तत्र दशविधे धर्मे संयमे वा व्रतानामन्तर्भाव इति ।
नैष दोषः; तत्र संवरो निवृत्तिलक्षणो वक्ष्यते । प्रवृत्तिश्चात्र दृश्यते'; हिंसानृतादत्तादानादिपरित्यागे
अहिंसासत्यवचनदत्तादानादिक्रियाप्रतीतेः गुप्त्यादिसंवरपरिकर्मत्वाच्च । व्रतेषु हि कृतपरिकर्मा
साधुः सुखेन संवरं करोतीति ततः पृथक्त्वेनोपदेशः क्रियते । ननु च षष्ठमणुव्रतमस्ति रात्रिभोजन-
विरमणं तदिहोपसंख्यातव्यम् । न; भावनास्वन्तर्भावात् । अहिंसाव्रतभावना हि वक्ष्यन्ते² । तत्र
आलोकितपानभोजनभावना कार्येति ।
§ ६६५. तस्य पञ्चतयस्य व्रतस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह -
देशसर्वतोऽणुमहती³ ॥ २ ॥
§ ६६६. देश एकदेशः । सर्वः सकलः । देशश्च सर्वंश्च देशसर्वौ ताभ्यां देशसर्वतः । 'विरतिः'
इत्यनुवर्तते । अणु च महच्चाणुमहती । व्रताभिसंबन्धान्नपुंसकलिङ्गनिर्देशः । यथासंख्यमभि-
असत्यसे विरति आदि । इन पाँच व्रतोंमें अहिंसा व्रतको प्रारम्भमें रखा है क्योंकि वह सबमें मुख्य
है। धान्यके खेतके लिए जैसे उसके चारों ओर कांटोंका घेरा होता है उसी प्रकार सत्यादिक सभी
व्रत उसकी रक्षाके लिए हैं। सब पापोंसे निवृत्त होनेरूप सामायिककी अपेक्षा एक व्रत है। वही
व्रत छेदोपस्थापनाकी अपेक्षा पाँच प्रकारका है और उन्हींका यहाँ कथन किया है। शंका-यह
व्रत आस्रवका कारण है यह बात नहीं बनती, क्योंकि संवरके कारणोंमें इनका अन्तर्भाव होता है।
आगे गुप्ति, समिति इत्यादि संवरके कारण कहनेवाले हैं। वहाँ दस प्रकारके धर्मोंमें एक संयम
नामका धर्म बतलाया है उसमें व्रतोंका अन्तर्भाव होता है ? समाधान-यह कोई दोष नहीं है,
क्योंकि वहाँ निवृत्तिरूप संवरका कथन करेंगे और यहाँ प्रवृत्ति देखी जाती है, क्योंकि हिंसा,
असत्य और अदत्तादान आदिका त्याग करने पर अहिंसा, सत्यवचन और दी हुई वस्तुका ग्रहण
आदि रूप क्रिया देखी जाती है। दूसरे ये व्रत गुप्ति आदि रूप संवरके अंग हैं। जिस साधुने व्रतोंकी
मर्यादा कर ली है वह सुखपूर्वक संवर करता है इसलिए व्रतोंका अलगसे उपदेश दिया है।
शंका-रात्रिभोजनविरमण नाम छठा अणुव्रत है उसकी यहाँ परिगणना करनी थी ? समाधान -
नहीं, क्योंकि उसका भावनाओंमें अन्तर्भाव हो जाता है। आगे अहिंसा व्रतकी भावनाएँ कहेंगे ।
उनमें एक आलोकितपानभोजन नामकी भावना है उसमें रात्रिभोजनविरमण नामक व्रतका
अन्तर्भाव हो जाता है।
§ ६६५. उस पाँच प्रकारके व्रतके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
हिंसादिकसे एकदेश निवृत्त होना अणुव्रत है और सब प्रकारसे निवृत्त होना महाव्रत
है ॥२॥
§ ६६६. देश शब्दका अर्थ एकदेश है और सर्व शब्दका अर्थ सकल है। सूत्रमें देश और
सर्व शब्दका द्वन्द्व समास करके तसि प्रत्यय करके 'देशसर्वतः' पद बनाया है। इस सूत्रमें विरति
शब्दकी अनुवृत्ति पूर्व सूत्रसे होती है । यहाँ अणु और महत् शब्दका द्वन्द्व समास होकर अणुमहती
पद बना है। व्रत शब्द नपुंसक लिंग है इसलिए 'अणुमहती' यह नपुंसक लिंगपरक निर्देश किया
है। इनका सम्बन्ध क्रमसे होता है। यथा-एकदेश निवृत्त होना अणुव्रत है और सब प्रकारसे
१. दृश्यते हिंसानृतादत्तादानादिक्रिया-मु० । २. -क्ष्यन्ते । आलो- आ०, दि० १, दि०, २ । ३. 'एते
जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ।'-पा० यो० सू० २, ३१ ।

संबध्यते । देशतो विरतिरणुव्रतं सर्वतो विरतिर्महाव्रतमिति द्विधा भिद्यते प्रत्येकं व्रतम् । एतानि
व्रतानि भावितानि वरौषधवद्यत्नवते¹ दुःखनिवृत्तिनिमित्तानि भवन्ति ।
§ ६६७. किमर्थं कथं वा भावनं तेषामित्यत्रोच्यते—
तत्स्थैर्यार्थं भावनाः पञ्च पञ्च ॥ ३ ॥
§ ६६८. तेषां व्रतानां स्थिरीकरणायैकैकस्य व्रतस्य पञ्च पञ्च भावना वेदितव्याः । ५
यद्येवमाद्यस्याहिंसाव्रतस्य भावनाः का इत्यत्रोच्यते—
वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पञ्च ॥ ४ ॥
§ ६६९. वाग्गुप्तिः मनोगुप्तिः ईर्यासमितिः आदाननिक्षेपणसमितिः आलोकितपानभोजन-
मित्येताः पञ्चाहिंसाव्रतस्य भावनाः ।
§ ६७०. अथ द्वितीयस्य व्रतस्य का इत्यत्रोच्यते— १०
क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचीभाषणं च पञ्च ॥ ५ ॥
§ ६७१. क्रोधप्रत्याख्यानं लोभप्रत्याख्यानं भीरुत्वप्रत्याख्यानं हास्यप्रत्याख्यानम् अनुवीची-
भाषणं चेत्येताः पञ्च भावनाः सत्यव्रतस्य ज्ञेयाः । अनुवीचीभाषणं निरवद्यानुभाषणमित्यर्थः ।
§ ६७२. इदानीं तृतीयस्य व्रतस्य का भावना इत्यत्राह—
शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्षशुद्धिसधर्माविसंवादाः पञ्च ॥ ६ ॥ १५
निवृत्त होना महाव्रत है इस प्रकार अहिंसादि प्रत्येक व्रत दो प्रकारके हैं। प्रयत्नशील जो पुरुष
उत्तम ओषधिके समान इन व्रतोंका सेवन करता है उसके दुःखोंका नाश होता है।
§ ६६७. इन व्रतोंकी किसलिए और किस प्रकार भावना करनी चाहिए, अब इसी बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन व्रतोंको स्थिर करनेके लिए प्रत्येक व्रतकी पाँच पाँच भावनाएँ हैं ॥३॥ २०
§ ६६८. उन व्रतोंको स्थिर करनेके लिए एक एक व्रतकी पाँच पाँच भावनाएँ जाननी
चाहिए। यदि ऐसा है तो प्रथम अहिंसा व्रतकी भावनाएँ कौन-सी हैं? अब इस बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वचनगुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्यासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति और आलोकितपान-भोजन ये
अहिंसाव्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥४॥ २५
§ ६६९. वचनगुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्यासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति और आलोकितपान-
भोजन ये अहिंसा व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं।
§ ६७०. अब दूसरे व्रतकी भावनाएँ कौनसी हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
क्रोधप्रत्याख्यान, लोभप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान और अनुवीचीभाषण
ये सत्य व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥५॥ ३०
§ ६७१. क्रोधप्रत्याख्यान, लोभप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान और अनु-
वीचीभाषण ये सत्य व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं। अनुवीचीभाषणका अर्थ निर्दोष भाषण है।
§ ६७२. अब तीसरे व्रतकी कौनसी भावनाएँ हैं, यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
शून्यागारावास, विमोचितावास, परोपरोधाकरण, भैक्षशुद्धि और सधर्माविसंवाद ये अचौर्य ३५
व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥६॥
१. वरौषधवत् दुःख-भा० ।

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२६० सर्वार्थसिद्धौ [ ७।७ § ६७३ -
§ ६७३. शून्यागारेषु गिरिगुहातरुकोटरादिष्वावासः । परकीयेषु च विमोचितेष्वावासः ।
परेषामुपरोधाकरणम् । आचारशास्त्रमार्गेण भैक्षशुद्धिः । ममेदं तवेदमिति सधर्मभिरविसंवादः ।
इत्येताः पञ्चादत्तादानविरमणव्रतस्य भावनाः ।
§ ६७४. अथेदानीं ब्रह्मचर्यव्रतस्य भावना वक्तव्या इत्यत्राह—
५ स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कार-
त्यागाः पञ्च ॥ ७ ॥
§ ६७५. त्यागशब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । स्त्रीरागकथाश्रवणत्यागः तन्मनोहराङ्गनिरी-
क्षणत्यागः पूर्वरतानुस्मरणत्यागः वृष्येष्टरसत्यागः स्वशरीरसंस्कारत्यागश्चेति चतुर्थव्रतस्य भावनाः
पञ्च विज्ञेयाः ।
१० § ६७६. अथ पञ्चमव्रतस्य भावनाः का इत्यत्रोच्यते—
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च ॥ ८ ॥
§ ६७७. पञ्चानामिन्द्रियाणां स्पर्शनादीनामिष्टानिष्टेषु विषयेषूपैनिपत्तितेषु स्पर्शादिषु राग-
वर्जनानि पञ्च आकिंचन्यस्य व्रतस्य भावनाः प्रत्येप्तव्याः ।
§ ६७८. किंचान्यद्यथामीषां व्रतानां द्रढिमार्थं भावनाः प्रतीयन्ते तद्विपश्चिद्द्भिरिति
१५ भावनोपदेशः, तथा तदर्थं तद्विरोधिष्वपीत्याह—
§ ६७३. पर्वतकी गुफा और वृक्षका कोटर आदि शून्यागार हैं इनमें रहना शून्यागारावास
है । दूसरों द्वारा छोड़े हुए मकान आदिमें रहना विमोचितावास है । दूसरोंको ठहरनेसे नहीं रोकना
परोपरोधाकरण है । आचार शास्त्रमें बतलायी हुई विधिके अनुसार भिक्षा लेना भैक्षशुद्धि है । यह
मेरा है यह तेरा है इस प्रकार सधर्मियोंसे विसंवाद नहीं करना सधर्माविसंवाद है । ये अदत्तादान-
२० विरमण व्रतकी पांच भावनाएँ हैं ।
§ ६७४. अब इस समय ब्रह्मचर्य व्रतकी पांच भावनाओंका कथन करना चाहिए; इसलिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
स्त्रियोंमें रागको पैदा करनेवाली कथाके सुननेका त्याग, स्त्रियोंके मनोहर अंगोंको देखने-
का त्याग, पूर्व भोगोंके स्मरणका त्याग, गरिष्ठ और इष्ट रसका त्याग तथा अपने शरीरके
२५ संस्कारका त्याग ये ब्रह्मचर्य व्रतकी पांच भावनाएँ हैं ॥७॥
§ ६७५. त्याग शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा-स्त्रीरागकथाश्रवण-
त्याग, तन्मनोहरांगनिरीक्षणत्याग, पूर्वरतानुस्मरणत्याग, वृष्येष्टरसत्याग और स्वशरीरसंस्कारत्याग
ये ब्रह्मचर्य व्रतकी भावनाएँ हैं ।
§ ६:६. अब पाँचवें व्रतकी कौनसी भावनाएँ हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
३० मनोज्ञ और अमनोज्ञ इन्द्रियोंके विषयोंमें क्रमसे राग और द्वेषका त्याग करना ये अपरि-
ग्रहव्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥८॥
§ ६७७. स्पर्श न आदि पाँच इन्द्रियोंके इष्ट और अनिष्ट स्पर्श आदिक पाँच विषयोंके प्राप्त
होने पर राग और द्वेषका त्याग करना ये आकिंचन्य व्रतकी पाँच भावनाएँ जाननी चाहिए ।
§ ६७८. जिस प्रकार इन व्रतोंकी दृढ़ताके लिए भावनाएँ हैं इसलिए भावनाओंका उपदेश
३५ दिया है उसी प्रकार विद्वान् पुरुषोंको व्रतोंकी दृढ़ताके लिए विरोधी भावोंके विषयमें क्या करना
चाहिए ? यह बतलानेके लिए अब आगे का सूत्र कहते हैं—
१. -येषूपरिनिपतितेषु आ०, दि० १, दि० २ ।