सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ६४१ ९ § ६४६ ] षष्ठोऽध्यायः २५१
§ ६४१. आह, व्याख्यातस्तैर्यग्योनस्यायुष आस्रवः । इदानीं मानुषस्यायुषः को हेतुरित्य-
त्रोच्यते—
अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥ १७ ॥
§ ६४२. नारकआयुरास्रवो व्याख्यातः । तद्विपरीतो मानुषस्यायुष इति संक्षेपः । तद्व्यासः—
विनीतस्वभावः प्रकृतिभद्रता प्रगुणव्यवहारता तनुकषायत्वं मरणकालसंक्लेशाभावादिः । ५
§ ६४३. किमेतावानेव मानुषस्यायुष आस्रव इत्यत्रोच्यते—
स्वभावमार्दवं च ॥ १८ ॥
§ ६४४. मृदोर्भावो मार्दवम् । स्वभावेन मार्दवं स्वभावमार्दवम् । उपदेशानपेक्षमित्यर्थः ।
एतदपि मानुषस्यायुष आस्रवः । पृथग्योगकरणं किमर्थम् । उत्तरार्थम्, देवायुष आस्रवोऽयमपि¹
यथा स्यात् । १०
§ ६४५. किमेतदेव द्वितीयं² मानुषस्यास्रवः । न; इत्युच्यते—
निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषाम् ॥ १६ ॥
§ ६४६. ‘च’शब्दोऽधिकृतसमुच्चयार्थः । अल्पारम्भपरिग्रहत्वं च निःशीलव्रतत्वं च ।
शीलानि च व्रतानि च शीलव्रतानि³ तानि वक्ष्यन्ते । निष्क्रान्तः शीलव्रतेभ्यो निःशीलव्रतः । तस्य
§ ६४१. तिर्यंचायुके आस्रव कहे । अब मनुष्यायुका क्या आस्रव है यह बतलानेके लिए १५
आगेका सूत्र कहते हैं—
अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रहवालेका भाव मनुष्यायुका आस्रव हैं ॥१७॥
§ ६४२. नरकायुका आस्रव पहले कह आये हैं । उससे विपरीत भाव मनुष्यायुका आस्रव
है । संक्षेपमें यह इस सूत्रका अभिप्राय है । उसका विस्तारसे खुलासा—स्वभावका विनम्र होना,
भद्र प्रकृतिका होना, सरल व्यवहार करना, अल्प कषायका होना तथा मरणके समय संक्लेशरूप २०
परिणतिका नहीं होना आदि मनुष्यायुके आस्रव हैं ।
§ ६४३. क्या मनुष्यायुका आस्रव इतना ही है या और भी है । इसी बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
स्वभावकी मृदुता भी मनुष्यायुका आस्रव है ॥१८॥
§ ६४४. मृदुका भाव मार्दव है। स्वभावसे मार्दव स्वभाव मार्दव है। आशय यह है कि बिना २५
किसीके समझाये-बुझाये मृदुता अपने जीवनमें उतरी हुई हो इसमें किसीके उपदेशकी आवश्यकता
न पड़े । यह भी मनुष्यायुका आस्रव है । शंका—इस सूत्रको अलगसे क्यों बनाया ? समाधान—
स्वभावकी मृदुता देवायुका भी आस्रव है इस बातके बतलानेके लिए इस सूत्रको अलगसे
बनाया है ।
§ ६४५. क्या ये दो ही मनुष्यायुके आस्रव हैं ? नहीं, किन्तु और भी हैं । इसी बातको बत- ३०
लानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
शीलरहित और व्रतरहित होना सब आयुओंका आस्रव है ॥१९॥
§ ६४६. सूत्रमें जो 'च' शब्द है वह अधिकार प्राप्त आस्रवोंके समुच्चय करनेके लिए है ।
जिससे यह अर्थ निकलता है कि अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रहरूप भाव तथा शील और व्रत-
रहित होना सब आयुओंके आस्रव हैं । शील और व्रतोंका स्वरूप आगे कहनेवाले हैं। इनसे रहित ३५
१. आस्रवोऽपि मु० । २. द्वितीयं मु० । ३. व्रतानि वक्ष्य-मु० ।
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