सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।२७ § ६६१ –
द्भावनमसद्गुणोच्छादनं च। गुणोत्कृष्टेषु विनयेनावनतिर्नीचैर्वृत्तिः। विज्ञानादिभिरुत्कृष्टस्यापि
सतस्तत्कृतमदविरहोऽनहङ्कारतानुत्सेकः। तान्येतान्युत्तरस्योच्चैर्गोत्रस्यास्रवकारणानि भवन्ति ।
§ ६६१. अथ गोत्रानन्तरमुद्दिष्टस्यान्तरायस्य क आस्रव इत्युच्यते—
विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥ २७ ॥
§ ६६२. दानादीन्युक्तानि 'दानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च' इत्यत्र । तेषां विहननं विघ्नः ।
विघ्नस्य करणं विघ्नकरणमन्तरायस्यास्रवविधिवेदितव्यः । अत्र चोद्यते—तत्प्रदोषनिह्नवादयो
ज्ञानदर्शनावरणादीनां प्रतिनियता आस्रवहेतवो वर्णिताः, किं ते प्रतिनियतज्ञानावरणाद्यास्रवहेतव
एव उताविशेषेणेति । यदि प्रतिनियतज्ञानावरणाद्यास्रवहेतव एव, आगमविरोधः प्रसज्यते । आगमे
हि सप्त कर्माणि आयुर्वर्ज्यानि प्रतिक्षणं युगपदास्रवन्तीत्युक्तम् । तद्विरोधः स्यात् । अथाविशेषेण
आस्रवहेतवो १ विशेषनिर्देशो न युक्त इति । अत्रोच्यते—यद्यपि तत्प्रदोषादिभिर्ज्ञानावरणादीनां
सर्वासां कर्मप्रकृतीनां प्रदेशबन्धनियमो नास्ति, तथाप्यनुभागनियमहेतुत्वेन तत्प्रदोषनिह्नवादयो
विभज्यन्ते ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
परप्रशंसा, सद्गुणोंका उद्भावन और असद्गुणोंका उच्छादन। जो गुणोंमें उत्कृष्ट हैं उनके प्रति
विनयसे नम्र रहना नीचैर्वृत्ति है। ज्ञानादिकी अपेक्षा श्रेष्ठ होते हुए भी उसका मद न करना अर्थात्
अहंकार रहित होना अनुत्सेक है। ये उत्तर अर्थात् उच्च गोत्रके आस्रवके कारण हैं।
§ ६६१. अब गोत्रके बाद क्रम प्राप्त अन्तराय कर्मका क्या आस्रव है यह बतलानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
दानादिकमें विघ्न डालना अन्तराय कर्मका आस्रव है ॥२७॥
§ ६६२. 'दानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च' इस सूत्रकी व्याख्या करते समय दानादिकका
व्याख्यान कर आये हैं। उनका नाश करना विघ्न है। और इस विघ्नका करना अन्तराय कर्मका
आस्रव जानना चाहिए । शंका—तत्प्रदोष और निह्नव आदिक ज्ञानावरण और दर्शनावरण आदि
कर्मोंके प्रतिनियत आस्रवके कारण कहे तो क्या वे ज्ञानावरण और दर्शनावरण आदि प्रतिनियत
कर्मोंके आस्रवके कारण हैं या सामान्यसे सभी कर्मोंके आस्रवके कारण हैं ? यदि ज्ञानावरणादिक
प्रतिनियत कर्मोंके ही आस्रवके कारण हैं तो आगमसे विरोध प्राप्त होता है, क्योंकि आयुके सिवा
शेष सात कर्मोंका प्रति समय आस्रव होता है ऐसा आगममें कहा है, अतः इससे विरोध होता है।
और यदि सामान्यसे सब कर्मोंके आस्रवके कारण हैं ऐसा माना जाता है तो इस प्रकार विशेष
रूपसे कथन करना युक्त नहीं ठहरता ? समाधान—यद्यपि तत्प्रदोष आदिसे ज्ञानावरणादि सब
कर्म प्रकृतियोंका प्रदेश बन्ध होता है ऐसा नियम नहीं है तो भी वे प्रतिनियत अनुभागबन्धके हेतु
हैं इसलिए तत्प्रदोष, निह्नव आदिका अलग-अलग कथन किया है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें छठा अध्याय समाप्त हुआ ॥६॥
१. –हेतुविशेष–आ०, ता०, ना०, दि० १, दि० २ ।