सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ६।२३ § ६५५ ] षष्ठोऽध्यायः २५३
§ ६५१. आयुषोऽनन्तरमुद्दिष्टस्य नाम्न आस्रवविधौ वक्तव्ये, तत्राशुभनाम्न आस्रवप्रति-
पत्त्यर्थमाह—
योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥ २२ ॥
§ ६५२. योगस्त्रिप्रकारो व्याख्यातः । तस्य वक्रता कौटिल्यम् । विसंवादनमन्यथाप्रवर्तनम् ।
ननु च नार्थभेदः । योगवक्रतैवान्यथाप्रवर्तनम् । सत्यमेवैतत्—स्वगता योगवक्रतेत्युच्यते । परगतं ५
विसंवादनम् । सम्यगभ्युदयनिःश्रेयसार्थासु क्रियासु प्रवर्तमानमन्यं तद्विपरीतकायवाङ्मनोभिर्वि-
संवादयति मैवं कार्षीरेवं कुर्विति । एतदुभयमशुभनामकर्मास्रवकारणं वेदितव्यम् । 'च'शब्देन
मिथ्यादर्शनपैशुन्यास्थिरचित्तताकूटमानतुलाकरणपरनिन्दात्मप्रशंसादिः समुच्चीयते ।
§ ६५३. अथ शुभनामकर्मणः क आस्रव इत्यत्रोच्यते—
तद्विपरीतं शुभस्य ॥ २३ ॥ १०
§ ६५४. कायवाङ्मनसामृजुत्वमविसंवादनं च तद्विपरीतम् । 'च'शब्देन समुच्चितस्य च
विपरीतं ग्राह्यम् । धार्मिकदर्शनसंभ्रमसद्भावोपनयनसंसरणभीरुताप्रमादवर्जनादिः । तदेतच्छु-
भनामकर्मास्रवकारणं वेदितव्यम् ।
§ ६५५. आह किमेतावानेव शुभनाम्न आस्रवविधिरुत कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
यदिदं तीर्थकरनामकर्मानन्तानुपमप्रभावमचिन्त्यविभूतिविशेषकारणं त्रैलोक्यविजयकरं तस्यास्रव- १५
विधिविशेषोऽस्तीति । यद्येवमुच्यतां के तस्यास्रवाः । इत्यत इदमारभ्यते—
§ ६५१. आयुके बाद नामके आस्रवका कथन क्रमप्राप्त है । उसमें भी पहले अशुभ नामके
आस्रवका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं ।
योगवक्रता और विसंवाद ये अशुभ नाम कर्मके आस्रव हैं ॥२२॥
§ ६५२. तीन प्रकारके योगका व्याख्यान पहले कर आये हैं। इसकी कुटिलता योगवक्रता २०
है । अन्यथा प्रवृत्ति करना विसंवाद है । शंका—इस तरह इनमें अर्थभेद नहीं प्राप्त होता; क्योंकि
योगवक्रता और अन्यथा प्रवृत्ति करना एक ही बात है ? समाधान—यह कहना सही है तब भी
योगवक्रता स्वगत है और विसंवादन परगत । जो स्वर्ग और मोक्षके योग्य समीचीन क्रियाओंका
आचरण कर रहा है उसे उसके विपरीत मन, वचन और कायकी प्रवृत्ति द्वारा रोकना कि ऐसा
मत करो ऐसा करो विसंवादन है । इस प्रकार ये दोनों एक नहीं हैं किन्तु अलग-अलग हैं । ये २५
दोनों अशुभ नामकर्मके आस्रवके कारण जानने चाहिए । सूत्रमें आये हुए 'च' पदसे मिथ्यादर्शन,
चुगलखोरी, चित्तका स्थिर न रहना, मापने और तौलनेके बाँट घट बढ़ रखना, दूसरोंकी निन्दा
करना और अपनी प्रशंसा करना आदि आस्रवोंका समुच्चय होता है ।
§ ६५३. अब शुभ नामकर्मका आस्रव क्या है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं।
उससे विपरीत अर्थात् योगकी सरलता और अविसंवाद ये शुभनामकर्मके आस्रव हैं ॥२३॥ ३०
§ ६५४. काय, वचन और मनकी सरलता तथा अविसंवाद ये उससे विपरीत हैं । उसी
प्रकार पूर्व सूत्रकी व्यवस्था करते हुए 'च' शब्दसे जिनका समुच्चय किया गया है उनके विपरीत
आस्रवोंका ग्रहण करना चाहिए । जैसे—धार्मिक पुरुषों व स्थानोंका दर्शन करना, आदर सत्कार
करना, सद्भाव रखना, उपनयन, संसारसे डरना और प्रमादका त्याग करना आदि । ये सब शुभ
नामकर्मके आस्रवके कारण हैं। ३५
§ ६५५. शंका—क्या इतने ही शुभ नामकर्मके आस्रव हैं या और भी कोई विशेषता है ?
समाधान—जो यह अनन्त और अनुपम प्रभाववाला, अचिन्त्य विभूति विशेषका कारण और तीन
लोककी विजय करनेवाला तीर्थंकर नामकर्म है उसके आस्रवमें विशेषता है, अतः अगले सूत्र द्वारा
उसीका कथन करते हैं—