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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 558 में से

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पृष्ठ 364

भावो निःशीलव्रतत्वम् । 'सर्वेषां'ग्रहणं सकलायुरास्रवप्रतिपत्त्यर्थम् । किं देवायुषोऽपि भवति ।
सत्यम्, भवति भोगभूमिजापेक्षया ।
§ ६४७. अथ चतुर्थस्यायुषः क आस्रव इत्यत्रोच्यते—
सरागासंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि दैवस्य ॥ २० ॥
§ ६४८. सरागसंयमः संयमासंयमश्च व्याख्यातौ । अकामनिर्जरा अकामश्चारकनिरोध-
बन्धनबद्धेषु क्षुत्तृष्णानिरोधब्रह्मचर्यभूशय्यामलगधारणपरितापादिः । अकामेन निर्जरा अकामनिर्जरा ।
बालतपो मिथ्यादर्शनोपेतमनुपायकायक्लेशप्रचुरं निकृतिबहुलव्रतधारणम् । तान्येतानि दैवस्यायुष
आस्रवहेतवो वेदितव्याः ।
§ ६४९. किमेतावानेव दैवस्यायुष आस्रवः । नेत्याह—
सम्यक्त्वं च ॥ २१ ॥
§ ६५०. किम् । दैवस्यायुष आस्रव इत्यनुवर्तते । अविशेषाभिधानेऽपि सौधर्मादिविशेषगतिः ।
कुतः । पृथक्करणात् । यद्येवम्, पूर्वसूत्रे, उक्त आस्रवविधिरविशेषेण प्रसक्तः तेन सरागसंय-
मसंयमासंयमावपि भवनवास्याद्यायुष आस्रवौ प्राप्नुतः । नैष दोषः; सम्यक्त्वाभावे सति तद्वच-
पदेशाभावात्तदुभयमप्यत्रान्तर्भवति ।
जीवका जो भाव होता है उससे सब आयुओंका आस्रव होता है यह इस सूत्रका भाव है । यहाँ
सब आयुओंका आस्रव इष्ट है यह दिखलानेके लिए सूत्रमें 'सर्वेषाम्' पदको ग्रहण किया है ।
शंका—क्या शील और व्रतरहितपना देवायुका भी आस्रव है ? समाधान—हां, भोगभूमियाँ
प्राणियोंकी अपेक्षा शील और व्रतरहितपना देवायुका भी आस्रव है ।
§ ६४७. अब चौथी आयुका क्या आस्रव है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सरागसंयम, संयमासंयम, अकामनिर्जरा और बालतप ये देवायुके आस्रव हैं ॥२०॥
§ ६४८. सरागसंयम और संयमासंयमका व्याख्यान पहले कर आये हैं। चारकमें रोक
रखनेपर या रस्सी आदिसे बांध रखनेपर जो भूख प्यास सहनी पड़ती है, ब्रह्मचर्य पालना पड़ता
है, भूमिपर सोना पड़ता है, मल मूत्रको रोकना पड़ता है और संताप आदि होता है ये सब अकाम
है और इससे जो निर्जरा होती है वह अकामनिर्जरा है । मिथ्यात्वके कारण मोक्षमार्गमें उपयोगी
न पड़नेवाले कायक्लेशबहुल मायासे व्रतोंका धारण करना बालतप है । ये सब देवायुके आस्रवके
कारण जानने चाहिए ।
§ ६४९. क्या देवायुका आस्रव इतना ही है या और भी है ? अब इसी बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सम्यक्त्व भी देवायुका आस्रव है ॥२१॥
§ ६५०. शंका—किस कारणसे । समाधान—अलग सूत्र बनानेसे । शंका—यदि ऐसा है
तो पूर्व सूत्रमें जो विधान किया है वह सामान्यरूपसे प्राप्त होता है और इससे सरागसंयम और
संयमासंयम ये भवनवासी आदिकी आयुके भी आस्रव हैं यह प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई
दोष नहीं है; क्योंकि सम्यक्त्वके अभावमें सरागसंयम और संयमासंयम नहीं होते, इसलिए उन
दोनोंका यहाँ अन्तर्भाव होता है । अर्थात् ये भी सौधर्मादि देवायुके आस्रव हैं; क्योंकि ये सम्यक्त्वके
होनेपर ही होते हैं ।
१. -पेतमनुकम्पाकाय-ता०, ना० ।