सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ६।१४ § ६३६ ] षष्ठोऽध्यायः २४९
दर्शनमोहस्यास्रवहेतुः । कवलाभ्यवहारजीविनः केवलिन इत्येवमादि वचनं केवलिनामसवर्णवादः ।
मांसभक्षणाद्येनवद्याभिधानं श्रुतावर्णवादः । शूद्रत्वाशुचित्वाद्याविर्भावनं संघावर्णवादः । जिनोप-
दिष्टो धर्मो निर्गुणस्तदुपसेविनो ये ते चासुरा भविष्यन्तीत्येवमाद्यंभिधानं धर्मावर्णवादः ।
सुरामांसोपसेवाद्याघोषणं देवावर्णवादः ।
§ ६३५. द्वितीयस्य मोहस्यास्रवभेदप्रतिपादनार्थमाह—
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥ १४ ॥
§ ६३६. कषाया उक्ताः । उदयो विपाकः । कषायाणामुदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्या-
स्रवो वेदितव्यः । तत्र स्वपरकषायोत्पादनं तपस्विजनवृत्तदूषणं संक्लिष्टलिङ्गव्रतधारणादिः
कषायवेदनीयस्यास्रवः । सद्धर्मोपहसनदीनातिहासकॅन्दर्पोपहासबहुविप्रलापोपहासशीलतादिर्हास्य-
वेदनीयस्य । विचित्रक्रीडनपरताव्रतशीलारुच्यादिः रतिवेदनीयस्य । परारतिप्रादुर्भावनरतिविनाश- १०
नपापशीलसंसर्गादिः अरतिवेदनीयस्य । स्वशोकोत्पादनं परशोकप्लुताभिनन्दनादिः शोकवेदनीयस्य ।
स्वभयपरिणामपरभयोत्पादनादिर्भयवेदनीयस्य । कुशलक्रियाचारजुगुप्सापरिवादशीलत्वादिर्र्जुगुप्सा-
वेदनीयस्य । अलीकाभिधायितातिसंधानपरत्वपेररन्ध्रप्रेक्षित्त्वप्रवृद्धरागादिः स्त्रीवेदनीयस्य ।
दर्शनमोहनीयके आस्रवका कारण है । यथा केवली कवलाहारसे जीते हैं इत्यादि रूपसे कथन
करना केवलियोंका अवर्णवाद है । शास्त्रमें मांसभक्षण आदिको निर्दोष कहा है इत्यादि रूपसे कथन १५
करना श्रुतका अवर्णवाद है। ये शूद्र हैं, अशुचि हैं, इत्यादि रूपसे अपवाद करना संघका अवर्णवाद
है । जिनदेवके द्वारा उपदिष्ट धर्ममें कोई सार नहीं, जो इसका सेवन करते हैं वे असुर होंगे इस
प्रकार कथन करना धर्मका अवर्णवाद है । देव सुरा और मांस आदिका सेवन करते हैं इस
प्रकारका कथन करना देवोंका अवर्णवाद है ।
§ ६३५. अब मोहनीयका दूसरा भेद जो चारित्र मोहनीय है उसके आस्रवके भेदोंका कथन २०
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
कषायके उदयसे होनेवाला तीव्र आत्मपरिणाम चारित्रमोहनीयका आस्रव है ॥१४॥
§ ६३६. कषायोंका व्याख्यान पहले कर आये हैं । विपाकको उदय कहते हैं । कषायोंके
उदयसे जो आत्माका तीव्र परिणाम होता है वह चारित्रमोहनीयका आस्रव जानना चाहिए । स्वयं
कषाय करना, दूसरोंमें कषाय उत्पन्न करना, तपस्वीजनोंके चारित्रमें दूषण लगाना, संक्लेशको २५
पैदा करनेवाले लिंग ( वेष ) और व्रतको धारण करना आदि कषायवेदनीयके आस्रव हैं । सत्य
धर्मका उपहास करना, दीन मनुष्यकी दिल्लगी उड़ाना, कुत्सित रागको बढ़ानेवाला हँसी मजाक
करना, बहुत बकने और हँसनेकी आदत रखना आदि हास्यवेदनीयके आस्रव हैं। नाना प्रकारकी
क्रीड़ाओंमें लगे रहना, व्रत और शीलके पालन करनेमें रुचि न रखना आदि रतिवेदनीयके आस्रव
हैं । दूसरोंमें अरति उत्पन्न हो और रतिक्रा विनाश हो ऐसी प्रवृत्ति करना और पापी लोगोंकी ३०
संगति करना आदि अरतिवेदनीयके आस्रव हैं। स्वयं शोकातुर होना, दूसरोंके शोकको बढ़ाना
तथा ऐसे मनुष्योंका अभिनन्दन करना आदि शोकवेदनीयके आस्रव हैं। भयरूप अपना परिणाम
और दूसरेको भय पैदा करना आदि भयवेदनीयके आस्रवके कारण हैं। सुखकर क्रिया और सुख-
कर आचारसे घृणा करना और अपवाद करने में रुचि रखना आदि जुगुप्सावेदनीयके आस्रव हैं।
असत्य बोलनेकी आदत, अतिसन्धानपरता, दूसरेके छिद्र ढूँढ़ना और बढ़ा हुआ राग आदि ३५
१. –णाद्यभिधानं मु०, ना० । २. –त्येवमभि–मु० । ३. –नातिहासबहु-मु० । ४. –त्पादनं परशोका-
विष्करणं शोक-ता० । ५. –रत्वं पररन्ध्रापे-मु० ।–रत्वं रन्ध्रापे-आ० ।
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CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri