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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 558 में से

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पृष्ठ 359

स्थानि भवन्ति परस्थान्युभयस्थानि च । एतानि सर्वाण्यसद्वेद्यास्रवकारणानि वेदितव्यानि । अत्र
चोद्यते—यदि दुःखादीन्यात्मपरोभयस्थान्यसद्वेद्यास्रवनिमित्तानि, किमर्थमार्हतैः केशलोञ्चनान-
शनातपस्थानादीनि दुःखनिमित्तान्यास्थीयन्ते परेषु च प्रतिपाद्यन्ते इति । नैष दोषः—अन्तरङ्ग-
क्रोधाद्यावेशपूर्वकाणि दुःखादीन्यसद्वेद्यास्रवनिमित्तानीति विशेष्योक्तत्वात् । यथा कस्यचिद् भिषजः
परमकरुणाशयस्य निःशल्यस्य संयतस्योपरि गण्डं पाटयतो दुःखहेतुत्वे सत्यपि न पापबन्धो ५
बाह्यनिमित्तमात्रादेव भवति । एवं संसारविषयमहादुःखादुद्विग्नस्य भिक्षोस्तन्निवृत्त्युपायं प्रति
समाहितमनस्कस्य शास्त्रविहिते कर्मणि प्रवर्तमानस्य संक्लेशपरिणामाभावाद् दुःखनिमित्तत्वे
सत्यपि न पापबन्धः । उक्तं च—
“न दुःखं न सुखं यद्वद्धेतुर्दृष्टश्चिकित्सिते ।
चिकित्सायां तु युक्तस्य स्याद् दुःखमथवा सुखम् ॥ १०
न दुःखं न सुखं तद्वद्धेतुर्मोक्षस्य साधने ।
मोक्षोपाये तु युक्तस्य स्याद् दुःखमथवा सुखम् ॥”
§ ६३१. उक्ता असद्वेद्यास्रवहेतवः । सद्वेद्यस्य पुनः के इत्यत्रोच्यते—
भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः क्षान्तिः शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥ १२ ॥
§ ६३२. तासु तासु गतिषु कर्मोदयवशाद्भवन्तीति भूतानि प्राणिन इत्यर्थः । व्रतान्यहिंसादीनि १५
वक्ष्यन्ते, तद्वन्तो व्रतिनः । ते द्विविधाः । अगारं प्रति निवृत्तौत्सुक्याः संयताः गृहिणश्च संयतासंयताः ।


अतएव कुछ भेदोंका उल्लेख करके उनको पृथक्-पृथक् जान लिया जाता है। क्रोधादिकके आवेश-
वश ये दुःखादिक कभी अपनेमें होते हैं, कभी दूसरोंमें होते हैं और कभी दोनोंमें होते हैं । ये सब
असाता वेदनीयके आस्रवके कारण जानने चाहिए। शंका—यदि अपनेमें, परमें या दोनोंमें स्थित
दुःखादिक असातावेदनीयके आस्रवके कारण हैं तो अरिहंतके मतको माननेवाले मनुष्य दुःखको २०
पैदा करनेवाले केशलोंच, अनशन और आतपस्थान ( आतापनयोग ) आदिमें क्यों विश्वास करते
हैं और दूसरोंको इनका उपदेश क्यों देते हैं ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि अन्तरंगमें
क्रोधादिकके आवेशसे जो दुःखादिक पैदा होते हैं वे असातावेदनीयके आस्रवके कारण हैं इतना
यहाँ विशेष कहा है। जैसे अत्यन्त दयालु किसो वैद्यके फोड़ेकी चीर-फाड़ और मरहमपट्टी करते
समय निःशल्य संयतको दुःख देनेमें निमित्त होनेपर भी केवल बाह्य निमित्त मात्रसे पापबन्ध नहीं २५
होता उसी प्रकार जो भिक्षु संसार-सम्बन्धी दुःखसे उद्विग्न है और जिसका मन उसके दूर करनेके
उपायोंमें लगा हुआ है उसके शास्त्रविहित कर्ममें प्रवृत्ति करते समय संक्लेशरूप परिणामोंके नहीं
होनेसे पापबन्ध नहीं होता । कहा भी है— “जिस प्रकार चिकित्साके साधन न स्वयं दुःखरूप हैं
और न सुखरूप हैं किन्तु जो चिकित्सामें लग रहा है उसे दुःख भी होता है और सुख भी । उसी
प्रकार मोक्ष-साधनके जो हेतु हैं वे स्वयं न दुःखरूप हैं और न सुखरूप किन्तु जो मोक्षमार्गपर ३०
आरूढ़ है उसे दुःख भी होता है और सुख भी ।”
§ ६३१. असातावेदनीयके आस्रवके कारण कहे परन्तु सातावेदनीयके आस्रवके कारण
कौन हैं ? इसी बातको बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
भूत-अनुकम्पा, व्रती-अनुकम्पा, दान और सरागसंयम आदि का योग तथा क्षान्ति और
शौच ये सातावेदनीय कर्मके आस्रव हैं ॥१२॥ ३५
§ ६३२. जो कर्मोदयके कारण विविध गतियोंमें होते हैं वे भूत कहलाते हैं। भूत यह
प्राणीका पर्यायवाची शब्द है । अहिंसादिक व्रतोंका वर्णन आगे करेंगे । जो उनसे युक्त हैं वे व्रती
कहलाते हैं। वे दो प्रकारके हैं—पहले वे जो घरसे निवृत्त होकर संयत हो गये हैं और दूसरे