सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ६।१० § ६२८ ] षष्ठोऽध्यायः २४५
मात्मपरिणामसङ्गावाज्जीवाधिकरणविकल्पा एवेति विज्ञायेत। निर्वर्तनाधिकरणं द्विविधं
मूलगुणनिर्वर्तनाधिकरणमुत्तरगुणनिर्वर्तनाधिकरणं चेति। तत्र $^१$मूलगुणनिर्वर्तनं पञ्चविधम्,
शरीरवाङ्मनःप्राणापानाश्च। $^२$उत्तरगुणनिर्वर्तनं काष्ठपुस्तचित्रकर्मादि। निक्षेपश्चतुर्विधः अप्रत्यवे-
क्षितनिक्षेपाधिकरणं दुष्प्रमृष्टनिक्षेपाधिकरणं सहसानिक्षेपाधिकरणमनाभोगनिक्षेपाधिकरणं चेति ।
निसर्गस्त्रिविधः—कायनिसर्गाधिकरणं वाग्निसर्गाधिकरणं मनोनिसर्गाधिकरणं चेति । ५
§ ६२७. उक्तः सामान्येन कर्मास्रवभेदः । इदानीं कर्मविशेषास्रवभेदो वक्तव्यः । तस्मिन्
वक्तव्ये आद्ययोर्ज्ञानादर्शनवरणयोरास्रवभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः ॥ १० ॥
§ ६२८. तत्त्वज्ञानस्य मोक्षसाधनस्य कीर्तने कृते कस्यचिदनभिव्याहरतः अन्तःपैशुन्यपरि-
णामः प्रदोषः । कुतश्चित्कारणान्नास्ति न वेद्मीत्यादि ज्ञानस्य व्यपल्पनं निह्नवः । कुतश्चित्कारणाद् १०
भावितमपि विज्ञानं दानार्हमपि यतो न दीयते तन्मात्सर्यम् । ज्ञानव्यवच्छेदकरणमन्तरायः । कायेन
वाचा च परप्रकाशयज्ञानस्य वर्जनमासादनम् । प्रशस्तज्ञानदूषणमुपघातः । आसादनमेवेति चेत् ।
सतो ज्ञानस्य विनयप्रदानादिगुणकीर्तनाननुष्ठानमासादनम् । उपघातस्तु ज्ञानमज्ञानमेवेति ज्ञान-
नाशाभिप्रायः । इत्यनयोर्यं भेदः । 'तत्'शब्देन ज्ञानदर्शनयोः प्रतिनिधिर्शः क्रियते । कथं पुनर-
प्रकृतयोरनिर्दिष्टयोस्तच्छब्देन परामर्शः कर्तुं शक्यः । प्रश्नापेक्षया । ज्ञानदर्शनावरणयोः क आस्रव १५
पर शब्द न दिया जाय तो निर्वर्तना आदि आत्माके परिणाम हैं ऐसा हो जानेसे ये भी जीवाधि-
करणके भेद समझे जाँयगे । निर्वर्तनाधिकरण दो प्रकारका है—मूलगुण निर्वर्तनाधिकरण और
उत्तरगुण निर्वर्तनाधिकरण । उनमें से मूलगुण निर्वर्तनाधिकरण पांच प्रकारका है—शरीर, वचन,
मन, प्राण और अपान । तथा काष्ठकर्म, पुस्तकर्म और चित्रकर्म आदि उत्तरगुण निर्वर्तनाधिकरण
हैं। निक्षेप चार प्रकारका है—अप्रत्यवेक्षितनिक्षेपाधिकरण, दुष्प्रमृष्टनिक्षेपाधिकरण, सहसानिक्षेपा- २०
धिकरण और अनाभोगनिक्षेपाधिकरण । संयोग दो प्रकारका है—भक्तपानसंयोगाधिकरण और
उपकरणसंयोगाधिकरण । निसर्ग तीन प्रकारका है—कायनिसर्गाधिकरण, वचननिसर्गाधिकरण
और मननिसर्गाधिकरण ।
§ ६२७. सामान्यसे कर्मास्रवके भेद कहे। इस समय अलग-अलग कर्मोंके आस्रवके भेदोंका
कथन करना चाहिए। उसमें सर्वप्रथम प्रारम्भके ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रवके भेदोंका २५
कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ज्ञान और दर्शनके विषयमें प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य, अन्तराय, आसादन और उपघात ये
ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रव हैं ॥१०॥
§ ६२८. तत्त्वज्ञान मोक्षका साधन है उसका गुणगान करते समय उस समय नहीं बोलने-
वालेके जो भीतर पैशुन्यरूप परिणाम होता है वह प्रदोष है। किसी कारणसे 'ऐसा नहीं है, मैं ३०
नहीं जानता' ऐसा कहकर ज्ञानका अपलाप करना निह्नव है। विज्ञानका अभ्यास किया है वह देने
योग्य भी है तो भी जिस कारणसे वह नहीं दिया जाता है मात्सर्य है। ज्ञानका विच्छेद करना
अन्तराय है। दूसरा कोई ज्ञानका प्रकाश कर रहा हो तब शरीर या वचनसे उसका निषेध करना
आसादन है। प्रशंसनीय ज्ञानमें दूषण लगाना उपघात है। शंका-उपघातका जो लक्षण किया
है उससे वह आसादन ही ज्ञात होता है ? समाधान-प्रशस्त ज्ञानकी विनय न करना, उसकी ३५
अच्छाईकी प्रशंसा न करना आदि आसादन है। परन्तु ज्ञानको अज्ञान समझकर ज्ञानके नाशका
इरादा रखना उपघात है इस प्रकार इन दोनोंमें अन्तर है। सूत्रमें 'तत्' पद ज्ञान और दर्शनका
१. मूलं पञ्च-आ०, दि० १, दि० २ । २. उत्तरं काष्ठ-आ०, दि० १, दि० २ ।