सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ६२६ § ६६० ] षष्ठोऽध्यायः २५५
धेनुवत्सधर्मणि स्नेहः प्रवचनवत्सलत्वम् । तान्येतानि षोडशकारणानि सम्यग्भाव्यमानानि व्यस्तानि
च तीर्थकरनामकर्मार्तास्रवकारणानि प्रत्येत्तव्यानि ।
§ ६५७. इदानीं नामास्रवाभिधानानन्तरं गोत्रास्रवे वक्तव्ये सति नीचैर्गोत्रस्यास्रवविधानार्थ-
मिदमाह—
परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च नीचैर्गोत्रस्य ॥ २५ ॥ ५
§ ६५८. तथ्यस्य वातथ्यस्य वा दोषस्योद्भावनं प्रति इच्छा निन्दा । गुणोद्भावनाभिप्रायः
प्रशंसा । यथासंख्यं²मभिसंबन्धः—परनिन्दा आत्मप्रशंसेति । प्रतिबन्धकहेतुसंनिधाने सति
अनुद्भूतवृत्तिता अनाविर्भाव उच्छादनम् । प्रतिबन्धकाभावे³ प्रकाशवृत्तिता उद्भावनम् । अत्रापि
च यथाक्रममभिसंबन्धः—सद्गुणोच्छादनमसद्गुणोद्भावनमिति । तान्येतानि नीचैर्गोत्रस्यास्रव-
कारणानि वेदितव्यानि । १०
§ ६५९. अथोच्चैर्गोत्रस्य क आस्रवविधिरत्रोच्यते—
तद्विपर्ययो नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य ॥ २६ ॥
§ ६६०. 'तत्'इत्यनेन प्रत्यासत्तेर्नीचैर्गोत्रस्यास्रवः⁴ प्रतिनिधिर्दिश्यते । अन्येन⁵ प्रकारेण
वृत्तिर्विपर्ययः । तस्य विपर्ययस्तद्विपर्ययः । कः पुनरसौ विपर्ययः । आत्मनिन्दा, परप्रशंसा, सद्गुणो-
जिनपूजा इनके द्वारा धर्मका प्रकाश करना मार्गप्रभावना है । (१६) जैसे गाय बछड़ेपर स्नेह १५
रखती है उसी प्रकार साधर्मियोंपर स्नेह रखना प्रवचनवत्सलत्व है । ये सब सोलह कारण हैं ।
यदि अलग-अलग इनका भले प्रकार चिन्तन किया जाता है तो भी ये तीर्थंकर नामकर्मके आस्रवके
कारण होते हैं और समुदायरूपसे सबका भले प्रकार चिन्तन किया जाता है तो भी ये तीर्थंकर
नामकर्मके आस्रवके कारण होते हैं ।
§ ६५७. नामकर्मके आस्रवोंका कथन करनेके बाद अब गोत्रकर्मके आस्रवोंका कथन २०
क्रमप्राप्त है । उसमें भी पहले नीच गोत्रके आस्रवोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
परनिन्दा, आत्मप्रशंसा, सद्गुणों का उच्छादन और असद्गुणों का उद्भावन ये नीचगोत्रके
आस्रव हैं । ॥२५॥
§ ६५८. सच्चे या झूठे दोषको प्रकट करनेकी इच्छा निन्दा है । गुणोंके प्रकट करनेका भाव
प्रशंसा है । पर और आत्मा शब्दके साथ इनका क्रमसे सम्बन्ध होता है । यथा परनिन्दा और आत्म- २५
प्रशंसा । रोकनेवाले कारणोंके रहनेपर प्रकट नहीं करनेकी वृत्ति होना उच्छादन है और रोकनेवाले
कारणोंका अभाव होनेपर प्रकट करनेकी वृत्ति होना उद्भावन है । यहाँ भी क्रमसे सम्बन्ध होता
है । यथा—सद्गुणोच्छादन और असद्गुणोद्भावन । इन सब का नीच गोत्रके आस्रवके कारण
जानना चाहिए ।
§ ६५९. अब उच्च गोत्रके आस्रवके कारण क्या हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र ३०
कहते हैं—
उनका विपर्यय अर्थात् परप्रशंसा, आत्मनिन्दा, सद्गुणोंका उद्भावन और असद्गुणोंका
उच्छादन तथा नम्रवृत्ति और अनुत्सेक ये उच्च गोत्रके आस्रव हैं ॥२६॥
§ ६६०. इसके पहले नीच गोत्रके आस्रवोंका उल्लेख कर आये हैं, अतः 'तत्' इस पदसे
उनका ग्रहण होता है । अन्य प्रकारसे वृत्ति होना विपर्यय है । नीच गोत्रका जो आस्रव कहा है ३५
उससे विपर्यय तद्विपर्यय है । शंका—वे विपरीत कारण कौन हैं ? समाधान—आत्मनिन्दा,
१. तथ्यस्य वा दो-मु० । २. -संख्यमिति सम्ब-आ०, दि० १, दि, २ । ३. -भावेन प्रकाश-मु० ।
४. -गोत्रास्रवः आ०, दि० १, दि० १ । ५. -अनेन मु० ।