सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 356, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुजन्तास्त्र्यादिशब्दा यथाक्रममभिसंबध्यन्ते—संरम्भसमारम्भारम्भास्त्रयः, योगास्त्रयः, कृतकारि-
तानुमतास्त्रयः, कषायाश्चत्वार इति । एतेषां गणनाभ्यावृत्तिः सुचा द्योत्यते । एकश इति
वीप्सानिर्देशः । एकैकं १त्र्यादीन् भेदान् नयेदित्यर्थः । यद्यथा—क्रोधकृतकायसंरम्भः मानकृत-
कायसंरम्भः मायाकृतकायसंरम्भः लोभकृतकायसंरम्भः क्रोधकारितकायसंरम्भः मानकारितकायसं-
रम्भः मायाकारितकायसंरम्भः लोभकारितकायसंरम्भः क्रोधानुमतकायसंरम्भः मानानुमतकाय-
संरम्भः मायानुमतकायसंरम्भः लोभानुमतकायसंरम्भश्चेति द्वादशधा कायसंरम्भः । एवं वाग्योगे
मनोयोगे च द्वादशधा संरम्भः । त एते२ संपिण्डिताः षट्त्रिंशत्, तथा समारम्भा अपि षट्त्रिंशत्,
आरम्भा अपि षट्त्रिंशत् । एते संपिण्डिता जीवाधिकरणत्वप्रभेदा अष्टोत्तरशतसंख्याः संभवन्ति ।
'च'शब्दोऽनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनकषायभेदकृतान्तर्भेदसमुच्चयार्थः ।
§ ६२५. परस्या३जीवाधिकरणस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् ॥ ९ ॥
§ ६२६. निर्वर्त्यत इति निर्वर्तना निष्पादना । निक्षिप्यत इति निक्षेपः स्थापना । संयुज्यते
इति संयोगो मिश्रीकृतम् । निसृज्यत इति निसर्गः प्रवर्तनम् । एते द्वचादिभिर्यथाक्रममभिसंबध्यन्ते—
निर्वर्तना द्विभेदा निक्षेपश्चतुर्भेदः संयोगो द्विभेदः निसर्गस्त्रिभेद इति । त एते भेदा अजीवाधि-
करणस्य वेदितव्याः । परवचनमनर्थकम्, पूर्वसूत्रे आद्यमिति वचनादिदमवशिष्टार्थं भवतीति ।
नानर्थकम् । अन्यार्थः परशब्दः । संरम्भादिभ्योऽन्यानि निर्वर्तनादीनि । इतरथा हि निर्वर्तनादीना-
'तीन' आदि शब्द क्रमसे सम्बन्धको प्राप्त होते हैं। यथा—संरम्भ, समारम्भ और आरम्भ ये
तीन; योग तीन; कृत, कारित और अनुमत ये तीन और कषाय चार। इनके गणनाकी पुनरावृत्ति
'सुच्' प्रत्यय-द्वारा प्रकट की गयी है। 'एकशः' यह वीप्सामें निर्देश है। तात्पर्य यह है कि तीन
आदि भेदोंको प्रत्येकके प्रति लगा लेना चाहिए। जैसे क्रोधकृतकायसंरम्भ, मानकृतकायसंरम्भ,
मायाकृतकायसंरम्भ, लोभकृतकायसंरम्भ, क्रोधकारितकायसंरम्भ, मानकारितकायसंरम्भ, माया-
कारितकायसंरम्भ, लोभकारितकायसंरम्भ, क्रोधानुमतकायसंरम्भ, मानानुमतकायसंरम्भ, मायानु-
मतकायसंरम्भ, लोभानुमतकायसंरम्भ । इस प्रकार कायसंरम्भ बारह प्रकारका है । इसी प्रकार
वचनयोग और मनोयोगकी अपेक्षा संरम्भ बारह-बारह प्रकारका है। ये सब मिला कर छत्तीस
भेद होते हैं। इसी प्रकार समारम्भ और आरम्भके भी छत्तीस-छत्तीस भेद होते हैं। ये सब मिल
कर जीवाधिकरणके १०८ भेद होते हैं। सूत्रमें 'च' शब्द अनन्तानुबन्धी अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान
और संज्वलनरूप कषायोंके अवान्तर भेदोंका समुच्चय करनेके लिए दिया है।
§ ६२५. अब अजीवाधिकरणके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पर अर्थात् अजीवाधिकरण क्रमसे दो, चार, दो और तीन भेदवाले निर्वर्तना, निक्षेप,
संयोग और निसर्गरूप है ॥९॥
§ ६२६. निर्वर्तनाका अर्थ निष्पादना अर्थात् रचना है। निक्षेपका अर्थ स्थापना अर्थात्
रखना है। संयोगका अर्थ मिश्रित करना अर्थात् मिलाना है और निसर्गका अर्थ प्रवर्तन है। ये
क्रमसे दो आदि शब्दोंके साथ सम्बन्धको प्राप्त होते हैं। यथा—निर्वर्तना दो प्रकारकी है। निक्षेप
चार प्रकारका है। संयोग दो प्रकारका है। निसर्ग तीन प्रकारका है। ये सब अजीवाधिकरणके
भेद हैं। शंका—सूत्रमें 'पर' वचन निरर्थक है; क्योंकि पिछले सूत्रमें 'आद्य' वचन दिया है जिससे
यह ज्ञात होता है कि यह शेषके लिए है। समाधान—अनर्थक नहीं हैं, क्योंकि यहाँ पर शब्दका
अन्य अर्थ है। जिससे यह ज्ञात होता है कि निर्वर्तना आदिक संरम्भ आदिकसे अन्य हैं। यदि
१. त्र्यादिभेदान् आ०, दि० १, दि० २ । २. ऐते पिण्डि-मु० । ३. -जीवस्याधि-मु० ।