सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।६ § ६१९ –
ज्ञानदर्शनादिषु निकृतिर्वञ्चनं मायाक्रिया । अन्यं $^१$मिथ्यादर्शनक्रियाकरणकारणाविष्टं प्रशंसादि-
भिर्दृढयति यथा साधु करोषीति सा मिथ्यादर्शनक्रिया । संयमघातिकर्मोदयवशादनिवृत्तिरप्रत्या-
ख्यानक्रिया । ता एताः पञ्च क्रियाः । समुदिताः पञ्चविंशतिक्रियाः । एतानीन्द्रियादीनि कार्य-
कारणभेदाद्भेदमापद्यमानानि सांपरायिकस्य कर्मण आस्रवद्वाराणि भवन्ति ।
५ § ६१९. अत्राह, योगत्रयस्य सर्वात्मकार्यत्वात्सर्वेषां संसारिणां साधारणः, ततो बन्धफलानु-
भवनं प्रत्यविशेष इत्यत्रोच्यते—नैतदेवम् । यस्मात् सत्यपि प्रत्यात्मसंभवे तेषां जीवपरिणामेभ्यो-
ऽनन्तविकल्पेभ्यो विशेषोऽभ्यनुज्ञायते कथमिति चेदुच्यते—
तीव्र मन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषैस्तद्विशेषः ॥ ६ ॥
§ ६२०. बाह्याभ्यन्तरहेतूदोरणवशादुद्रिक्तः परिणामस्तीव्रः । तद्विपरीतो मन्दः । अयं $^३$प्राणी
१० मया हन्तव्य इति ज्ञात्वा प्रवृत्तिर्ज्ञातमित्युच्यते । मदात्प्रमादाद्वानवबुध्य प्रवृत्तिरज्ञातम् । अधि-
क्रियन्तेऽस्मिन्नर्था इत्यधिकरणं द्रव्यमित्यर्थः । द्रव्यस्य स्वशक्तिविशेषो वीर्यम् । भावशब्दः प्रत्येकं
परिसमाप्यते—तीव्रभावो मन्दभाव इत्यादिः । एतेभ्यस्तस्यास्रवस्य विशेषो भवति । कारणभेदाद्धि
कार्यभेद इति ।
§ ६२१. अत्राह, अधिकरणंमुक्तम्, तत्स्वरूपमनिर्ज्ञातमतस्तदुच्यतामिति । तत्र भेदप्रति-
१५ पादनद्वारेणाधिकरणस्वरूपनिर्ज्ञानार्थमाह—
रहना और दूसरेके करनेपर हर्षित होना प्रारम्भ क्रिया है । परिग्रह का नाश हो इसलिए जो
क्रिया की जाती है वह पारिग्राहिकी क्रिया है । ज्ञान, दर्शन आदिके विषयमें छल करना मायाक्रिया
है । मिथ्यादर्शनके साधनोंसे युक्त पुरुषकी प्रशंसा आदिके द्वारा दृढ़ करना कि 'तू ठीक करता है'
मिथ्यादर्शन क्रिया है । संयमका घात करनेवाले कर्मके उदयसे त्यागरूप परिणामोंका न होना
२० अप्रत्याख्यानक्रिया है । ये पांच क्रिया हैं। ये सब मिलकर पच्चीस क्रियाएँ होती हैं कार्य-कारणके
भेदसे अलग-अलग भेदको प्राप्त होकर ये इन्द्रियादिक साम्परायिक कर्मके आस्रवके द्वार हैं ।
§ ६१९ शंका—तीनो योग सब आत्माओंके कार्य हैं इसलिए वे सब संसारी जीवोंके
समान रूपसे प्राप्त होते हैं, इसलिए कर्मबन्धके फलके अनुभवके प्रति समानता प्राप्त होनी चाहिए ?
समाधान—यह बात ऐसी नहीं है, क्योंकि यद्यपि योग प्रत्येक आत्माके होता है परन्तु जीवोंके
२५ परिणामोंके अनन्त भेद हैं इसलिए कर्मबन्धके फलके अनुभवकी विशेषता माननी पड़ती है ।
शंका—किस प्रकार ? समाधान—अब अगले सूत्रद्वारा इसी बातका समाधान करते हैं—
तीव्रभाव, मन्दभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभाव, अधिकरण और वीर्यविशेषके भेदसे उसकी
( आस्रवकी ) विशेषता होती है ॥६॥
§ ६२०. बाह्य और आभ्यन्तर हेतुको उदीरणावश प्राप्त होनेके कारण जो उत्कट परिणाम
३० होता है वह तीव्र भाव है। मन्द भाव इससे उलटा है। इस प्राणीका मुझे हनन करना चाहिए इस
प्रकार जानकर प्रवृत्ति करना ज्ञात भाव है। मद या प्रमादके कारण बिना जाने प्रवृत्ति करना
अज्ञात भाव है। जिसमें पदार्थ अधिकृत किये जाते हैं वह अधिकरण है। यहाँ अधिकरणसे द्रव्यका
ग्रहण किया है। द्रव्यकी अपनी शक्तिविशेष वीर्य है। सूत्रमें जो भाव शब्द आया है वह सब
शब्दोंके साथ जोड़ लेना चाहिए। यथा—तीव्रभाव, मन्दभाव इत्यादि । इन सब कारणोंसे
३५ आस्रवमें विशेषता आ जाती है, क्योंकि कारणके भेदसे कार्यमें भेद होता है।
§ ६२१. पूर्व सूत्रमें 'अधिकरण' पद आया है पर उसका स्वरूप अज्ञात है, इसलिए वह कहना
चाहिए ? अब उसके भेदोंके कथन द्वारा उसके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. दर्शनकरण-ता०, ना०, मु० । २. -रणस्य ततो मु० । ३. प्राणी हन्त-मु०, ता०, ना० ।
४. -करणमित्युक्तम् मु० ता० ।