सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ६१८ § ६२४ ] षष्ठोऽध्यायः २४३
अधिकरणं जीवाजीवाः ॥ ७ ॥
§ ६२२. उक्तलक्षणा जीवाजीवाः । यद्युक्तलक्षणाः पुनर्वचनं किमर्थम् । अधिकरणविशेषज्ञा-
पनार्थं पुनर्वचनम् । जीवाजीवा अधिकरणमित्ययं विशेषो ज्ञापयितव्ये¹ इति । कः पुनरसौ ।
हिंसाद्युपकरणभाव इति । स्यादेतन्मूलपदार्थयोर्द्वित्वाज्जीवाजीवाविति² द्विवचनं न्यायप्राप्तमिति ।
तन्न, पर्यायाणामधिकरणत्वात् । येन केनचित्पर्यायेण विशिष्टं द्रव्यमधिकरणम्, न सामान्यमिति ५
बहुवचनं कृतम् । जीवाजीवा अधिकरणं कस्य । आस्रवस्येति । अर्थवशादभिसंबन्धो भवति ।
§ ६२३. तत्र जीवाधिकरणभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
आद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषाय-
विशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥८॥
§ ६२४. प्राणव्यपरोपणादिषु प्रमादवतः प्रयत्नावेशः संरम्भः । साधनसमभ्यासीकरणं समा- १०
रम्भः । प्रक्रम आरम्भः । 'योग'शब्दो व्याख्यातार्थः । कृतवचनं स्वातन्त्र्यप्रतिपत्त्यर्थम् । कारिता-
भिधानं परप्रयोगापेक्षम् । अनुमतशब्दः प्रयोजकस्य मानसपरिणामप्रदर्शनार्थः । अभिहितलक्षणाः
कषायाः क्रोधादयः । विशिष्यतेऽर्थोऽर्थान्तरादिति विशेषः । स प्रत्येकमभिसंबध्यते—संरम्भविशेषः
समारम्भविशेष इत्यादि । आद्यं जीवाधिकरणमेतैर्विशेषैः 'भिद्यते' इति वाक्यशेषः । एते चत्वारः
अधिकरण जीव और अजीवरूप हैं ॥७॥ १५
§ ६२२. जीव और अजीवके लक्षण पहले कह आये हैं । शंका—यदि इनके लक्षण पहले
कह आये हैं तो फिरसे इनका उल्लेख किस लिए किया ? समाधान—अधिकरण विशेषका ज्ञान
करानेके लिए फिरसे इनका उल्लेख किया है जिससे जीव और अजीव अधिकरण हैं यह विशेष
जताया जा सके । शंका—वह कौन है ? समाधान—हिंसादि उपकरणभाव । शंका—मूल पदार्थ
दो हैं इसलिए 'जीवाजीवौ' इस प्रकार सूत्रमें द्विवचन रखना न्यायप्राप्त है ? समाधान—यह २०
कहना ठीक नहीं हैं, क्योंकि उनकी पर्यायोंको अधिकरण माना है । तात्पर्य यह है कि किसी एक
पर्यायसे युक्त द्रव्य अधिकरण होता है, केवल द्रव्य नहीं, इसलिए सूत्रमें बहुवचन रखा है । जीव
और अजीव किसके अधिकरण हैं ? आस्रवके । इस प्रकार प्रयोजनके अनुसार यहाँ आस्रव पदका
सम्बन्ध होता है ।
§ ६२३. अब जीवाधिकरणके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २५
पहला जीवाधिकरण संरम्भ, समारम्भ और आरम्भके भेदसे तीन प्रकारका, योगोंके भेद-
से तीन प्रकारका, कृत, कारित और अनुमतके भेदसे तीन प्रकारका तथा कषायोंके भेदसे चार
प्रकारका होता हुआ परस्पर मिलानेसे १०८ प्रकारका है ॥८॥
§ ६२४. प्रमादी जीवका प्राणोंकी हिंसा आदिकार्यमें प्रयत्नशील होना संरम्भ है। साधनों-
का जुटाना समारम्भ है । कार्य करने लगना आरम्भ है । योग शब्दका व्याख्यान पहले कर आये ३०
हैं । कर्ताको कार्यविषयक स्वतन्त्रता दिखलानेके लिए सूत्रमें 'कृत' वचन रखा है । कार्यमें दूसरेके
प्रयोगकी अपेक्षा दिखलानेके लिए 'कारित' वचन रखा है । तथा प्रयोजकके मानस परिणामको
दिखलानेके लिए अनुमत शब्द रखा है । क्रोधादि कषायोंके लक्षण कहे जा चुके हैं । जिससे एक
अर्थ दूसरे अर्थसे विशेषताको प्राप्त हो वह विशेष है । इसे प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए