सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।११ § ६२९-
इति प्रश्ने कृते तदपेक्षया तच्छब्दो ज्ञानदर्शने प्रतिनिर्दिशति । एतेन ज्ञानदर्शनवत्सु तत्साधनेषु च
प्रदोषादयो योज्याः; तन्निमित्तत्वात् । त एते ज्ञानदर्शनावरणयोरास्रवहेतवः । एककारणसाध्यस्य
कार्यस्यानेकस्य दर्शनात् तुल्येऽपि प्रदोषादौ ज्ञानदर्शनावरणास्रवसिद्धिः । अथवा विषयभेदादास्रव-
भेदः । ज्ञानविषयाः प्रदोषादयो ज्ञानावरणस्य । दर्शनविषयाः प्रदोषादयो दर्शनावरणस्येति ।
§ ६२९. यथानयोः कर्मप्रकृत्योरास्रवभेदस्तथा—
दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यत्मपरोभयस्थान्यसद्वेद्यस्य ॥ ११ ॥
§ ६३०. पीडालक्षणः परिणामो दुःखम् । अनुग्राहकसंबंधविच्छेदे वैक्लव्यविशेषः शोकः ।
परिवादादिनिमित्तादाविलान्तःकरणस्य तीव्रानुशयस्तापः । परितापजाताश्रुपातप्रचुरविप्रलापा-
दिभिर्व्यक्तक्रन्दनमाक्रन्दनम् । आयुरिन्द्रियबलप्राणवियोगकरणं वधः । संक्लेशपरिणामावलम्बनं¹
गुणस्मरणानुकीर्तनपूर्वकं स्वपरानुग्रहाभिलाषविषयमनुकम्पाप्रचुरं रोदनं परिवेदनम् । ननु च
शोकादीनां दुःखविशेषत्वाद् दुःखग्रहणमेवास्तु । सत्यमेवम्; तथापि कतिपयविशेषप्रतिपादनेन
दुःखजात्य²नुविधानं क्रियते । यथा गौरित्युक्ते अनिर्ज्ञाते विशेषे तत्प्रतिपादनार्थं खण्डमुण्डकृष्ण-
शुक्लाद्युपादानं क्रियते तथा दुःखविषयास्रवासंख्येयलोकभेदसंभवाद् दुःखमित्युक्ते विशेषाऽनिर्ज्ञा-
नात्कतिपयविशेषनिर्देशेन तद्विशेषप्रतिपत्तिः क्रियते । तान्येतानि दुःखादीनि ³क्रोधाद्यावेशादात्म-
निर्देश करनेके लिए दिया है । शंका—ज्ञान और दर्शन अप्रकृत हैं, तथा उनका निर्देश भी नहीं
किया है, फिर यहां 'तत्' शब्दके द्वारा उनका ज्ञान कैसे हो सकता है ? समाधान—प्रश्नकी
अपेक्षा अर्थात् ज्ञानावरण और दर्शनावरणका क्या आस्रव है ऐसा प्रश्न करनेपर उसकी अपेक्षा
'तत्' शब्द ज्ञान और दर्शनका निर्देश करता है । इससे यह अभिप्राय निकला कि ज्ञान और दर्शन-
वालोंके विषयमें तथा उनके साधनोंके विषयमें प्रदोषादिककी योजना करनी चाहिए, क्योंकि ये
उनके निमित्तसे होते हैं । ये प्रदोषादिक ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मके आस्रवके कारण हैं ।
एक कारणसे भी अनेक कार्य होते हुए देखे जाते हैं, इसलिए प्रदोषादिकके एक समान रहते हुए
भी इनसे ज्ञानावरण और दर्शनावरण दोनोंका आस्रव सिद्ध होता है । अथवा विषयके भेदसे
आस्रवमें भेद होता है । ज्ञानसम्बन्धी प्रदोषादिक ज्ञानावरणके आस्रव हैं और दर्शनसम्बन्धी प्रदो-
षादिक दर्शनावरणके आस्रव है ।
§ ६२९. जिस प्रकार इन दोनों कर्मोंका आस्रव अनेक प्रकारका है उसी प्रकार—
अपनेमें, दूसरेमें या दोनोंमें विद्यमान दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन
ये असाता वेदनीय कर्मके आस्रव हैं ॥११॥
§ ६३०. पीड़ारूप आत्माका परिणाम दुःख है । उपकार करनेवालेसे सम्बन्धके टूट जानेपर
जो विकलता होती है वह शोक है । अपवाद आदिके निमित्तसे मनके खिन्न होनेपर जो तीव्र
अनुशय-संताप होता है वह ताप है । परितापके कारण जो आंसू गिरनेके साथ विलाप आदि होता
है, उससे खुलकर रोना आक्रन्दन है । आयु, इन्द्रिय, बल और श्वासोच्छ्वासका जुदा कर देना
वध है । संक्लेशरूप परिणामोंके होनेपर गुणोंका स्मरण और प्रशंसा करते हुए अपने और दूसरेके
उपकारकी अभिलाषासे करुणाजनक रोना परिवेदन है । शंका—शोकादिक दुःखके भेद हैं इसलिए
दुःखका ग्रहण करना पर्याप्त है ? समाधान—यह कहना सही है तो भी यहां कुछ भेदोंका कथन
करके दुःखकी जातियां दिखलायी हैं। जैसे गौ ऐसा कहनेपर अवान्तर भेदोंका ज्ञान नहीं होता,
इसलिए खांडी, मुंड़ी, काली, सफेद आदि विशेषण दिये जाते हैं उसी प्रकार दुःखविषयक आस्रव
असंख्यात लोकप्रमाण संभव हैं। परन्तु दुःख इतना कहनेपर उन सब भेदोंका ज्ञान नहीं होता
१. –लम्बनं स्वपरा-आ०, दि० १, दि० २ । २. –जात्यन्तरविधा-मु० । ३. क्रोधावेशा-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri