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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 558 में से

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पृष्ठ 366

२४४ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।२४ ६ ६५६ –
दर्शनविशुद्धिर्विनयसंपन्नता शीलव्रतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ भक्तितस्त्याग-
तपसी साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहा-
णिर्मार्गप्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥ २४ ॥
६ ६५६. जिनेन भगवताहंत्परमेष्ठिनोपदिष्टे निर्ग्रन्थक्षणे मोक्षमत्र्त्मनि रुचिर्दर्शनविशुद्धिः
५ प्रागुक्तलक्षणा । तस्या अष्टावङ्गानि निःशङ्कितत्वं निःकाङ्क्षितं विचिकित्साविरहता अमूढदृष्टिता
उपबृंहणं स्थितीकरणं वात्सल्यं प्रभावनां चेति । सम्यग्ज्ञानादिषु मोक्षमार्गेषु तत्साधनेषु च गुर्वादिषु
स्वयोग्यवृत्त्या सत्कार आदरो विनयस्तेन संपन्नता विनयसंपन्नता । अहिंसादिषु व्रतेषु तत्प्रतिपाल-
नार्थेषु च क्रोधवर्जनादिषु शीलेषु निरवद्या वृत्तिः शीलव्रतेष्वनतीचारः । जीवादिपदार्थस्वतत्त्वविषये
सम्यग्ज्ञाने नित्यं युक्तता अभीक्ष्णज्ञानोपयोगः । संसारदुःखान्नित्यभीरुता संवेगः । त्यागो दानम् ।
१० तत्रिविधम्-आहारदानमभयदानं ज्ञानदानं चेति । तच्छक्तितो यथाविधि प्रयुज्यमानं त्याग
इत्युच्यते । अनिग्रहितवीर्यस्य मार्गाविरोधि कायक्लेशस्तपः । यथा भाण्डागारे दहने समुत्थिते
तत्प्रशमनमनुष्ठीयते बहूपकारत्वात्तथानेकव्रतशीलसमृद्धस्य मुनेस्तपसः कुतश्चित्प्रत्यूहे समुपस्थिते
तत्संधारणं समाधिः । गुणवद्दुःखोपनिपाते निरवद्येन विधिना तदपहरणं वैयावृत्त्यम् । अर्हदा-
चार्येषु बहुश्रुतेषु प्रवचने च भावविशुद्धियुक्तोऽनुरागो भक्तिः । षण्णामावश्यकक्रियाणां यथाकालं
१५ प्रवर्तनमावश्यकापरिहाणिः । ज्ञानतपोदानजिनपूजाविधिना धर्मप्रकाशनं मार्गप्रभावना । वत्से

दर्शनविशुद्धि, विनयसंपन्नता, शील और व्रतोंका अतिचार रहित पालन करना, ज्ञानमें
सतत उपयोग, सतत संवेग, शक्तिके अनुसार त्याग, शक्तिके अनुसार तप, साधु-समाधि, वैयावृत्त्य
करना, अरिहंतभक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, आवश्यक क्रियाओंको न छोड़ना,
मोक्षमार्गकी प्रभावना और प्रवचनवात्सल्य ये तीर्थंकर नामकर्मके आस्रव हैं ॥२४॥

२० ६ ६५६. (१) जिन भगवान् अरिहंत परमेष्ठी द्वारा कहे हुए निर्ग्रन्थ स्वरूप मोक्षमार्गपर
रुचि रखना दर्शनविशुद्धि है। इसका विशेष लक्षण पहले कह आये हैं। उसके आठ अंग हैं?
निःशंकित्त्व, निःकांक्षिता. निर्विचिकित्सतत्व, अमूढदृष्टिता, उपबृंहण, स्थितीकरण, वात्सल्य और
प्रभावना । (२) सम्यग्ज्ञानादि मोक्षमार्ग और उनके साधन गुरु आदिके प्रति अपने योग्य आचरण-
द्वारा आदर सत्कार करना विनय है और इससे युक्त होना विनयसम्पन्नता है। (३) अहिंसादिक
२५ व्रत हैं और इनके पालन करनेके लिए क्रोधादिकका त्याग करना शील है। इन दोनोंके पालन
करनेमें निर्दोष प्रवृत्ति रखना शीलव्रतानतिचार है। (४) जीवादि पदार्थरूप स्वतत्त्वविषयक
सम्यग्ज्ञानमें निरन्तर लगे रहना अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग है। (५) संसारके दुःखोंसे निरन्तर डरते
रहना संवेग है । (६) त्याग दान है। वह तीन प्रकारका है-आहारदान, अभयदान और ज्ञान-
दान । उसे शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक देना यथाशक्ति त्याग है। (७) शक्तिको न छिपाकर
३० मोक्षमार्गके अनुकूल शरीरको क्लेश देना यथाशक्ति तप है। (८) जैसे भांडारमें आग लग जानेपर
बहुत उपकारी होनेसे आगको शान्त किया जाता है उसी प्रकार अनेक प्रकारके व्रत और शीलोंसे
समृद्ध मुनिके तप करते हुए किसी कारणसे विघ्नके उत्पन्न होनेपर उसका संधारण करना-शान्त
करना साधुसमाधि है। (९) गुणी पुरुषके दुःखमें आ पड़नेपर निर्दोष विधिसे उसका दुःख दूर
करना वैयावृत्त्य है। (१०-१३) अरिहंत, आचार्य, बहुश्रुत और प्रवचन इनमें भावोंकी विशुद्धिके
३५ साथ अनुराग रखना अरिहंतभक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति और प्रवचनभक्ति है। (१४) छह
आवश्यक क्रियाओंका यथा समय करना आवश्यकापरिहाणि है। (१५) ज्ञान, तप, दान और

१. -मोक्षसाधनेषु तत्-मु० । २. -चार्यबहु-मु० । ३. -तपोजिन-मु० ।