सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
२३२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३९ § ६०१ -
भूतः । यश्च रसादिभ्योऽर्थान्तरभूताद्रूपादनर्थान्तरभूतः समुदायः स कथं रसादिभ्योऽर्थान्तरभूतो
न भवेत् । ततश्च रूपमात्रं समुदायः प्रसक्तः । न चैकं रूपं समुदायो भवितुमर्हति । ततः समु-
दायाभावः । समुदायाभावाच्च तदनर्थान्तरभूतानां समुदायिनामप्यभाव इति सर्वाभावः । एवं
रसादिष्वपि योज्यम् । तस्मात्समुदायमिच्छता कथंचिदर्थान्तरभाव एषितव्यः ।
५ § ६०१. उक्तानां द्रव्याणां लक्षणनिर्देशात्तद्विषय एव द्रव्याध्यवसाये प्रसक्ते अनुक्तद्रव्यसं-
सूचनार्थमिदमाह—
कालश्च ॥३९॥
§ ६०२. किम् । 'द्रव्यम्' इति वाक्यशेषः । कुतः । तल्लक्षणोपेतत्वात् । द्विविधं लक्षण-
मुक्तम्—'उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्' 'गुणपर्ययवद् द्रव्यम्' इति च । तदुभयं लक्षणं कालस्य
१० रसादिक भिन्न हैं । अब यदि इनका समुदाय अभिन्न माना जाता है तो रसादिकसे भिन्न जो रूप
है और उससे अभिन्न जो समुदाय है वह रसादिकसे भिन्न कैसे नहीं होगा अर्थात् अवश्य होगा ।
और इस प्रकार समुदाय रूपमात्र प्राप्त होता है । परन्तु एक रूप गुण समुदाय हो नहीं सकता इस-
लिए समुदायका अभाव प्राप्त होता है और समुदायका अभाव हो जानेसे उससे अभिन्न समुदा-
यियोंका भी अभाव होता है इस प्रकार समुदाय और समुदायी सबका अभाव हो जाता है। जिस प्रकार
१५ रूपकी अपेक्षा कथन किया उसी प्रकार रसादिककी अपेक्षा भी कथन करना चाहिए । इसलिए
यदि समुदाय स्वीकार किया जाता है तो वह कथंचित् अभिन्न ही मानना चाहिए ।
विशेषार्थ—पहले उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त द्रव्य होता है यह कह आये हैं । यहां
प्रकारान्तरसे द्रव्यका लक्षण कहा गया है । इसमें द्रव्यको गुणपर्यायवाला बतलाया गया है । बात
यह है कि प्रत्येक द्रव्य अनन्तगुणोंका और क्रमसे होनेवाली उनकी पर्यायोंका पिण्डमात्र है । सर्वत्र
२० गुणोंको अन्वयी और पर्यायोंको व्यतिरेकी बतलाया है। इसका अर्थ यह है कि जिनसे धारामें
एकरूपता बनी रहती है वे गुण कहलाते हैं और जिनसे उसमें भेद प्रतीत होता है वे पर्याय कहलाते
हैं । जीवमें ज्ञानादिक की धाराका, पुद्गलमें रूप रसादिककी धाराका, धर्मद्रव्यमें गतिहेतुत्वकी
धाराका, अधर्मद्रव्यमें स्थितिहेतुत्वकी धाराका, आकाशमें अवगाहन हेतुत्वकी धाराका और काल
द्रव्यमें वर्तनाका कभी विच्छेद नहीं होता इसलिए वे ज्ञानादिक उस उस द्रव्यके गुण हैं किन्तु वे
२५ गुण सदाकाल एकरूप नहीं रहते । जो नित्य द्रव्योंके गुण हैं उन्हें यदि छोड़ भी दिया जाय तो भी
जीव और पुद्गलोंके गुणोंमें प्रतिसमय स्पष्टतया परिणाम लक्षित होता है । उदाहरणार्थ-जीवका
ज्ञानगुण संसार अवस्थामें कभी मतिज्ञानरूप होता है और कभी श्रुतज्ञान रूप । इसीलिए ये मति-
ज्ञानादि ज्ञानगुणकी पर्याय हैं। इसी प्रकार अन्य गुणोंमें भी जान लेना चाहिए । द्रव्य सदा इन
गुणरूप पर्यायों में रहता है इसलिए वह गुणपर्यायवाला कहा गया । फिर भी गुण और पर्यायको
३० द्रव्यसे सर्वथा भिन्न न जानना चाहिए । वे दोनों मिलकर द्रव्यकी आत्मा हैं इसका अभिप्राय यह
है कि गुण और पर्यायको छोड़कर द्रव्य कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं ।
§ ६०१. पूर्वोक्त द्रव्योंके लक्षणका निर्देश करनेसे यह प्राप्त हुआ कि जो उस लक्षणका
विषय है वही द्रव्य है, अतः अभी तक जिस द्रव्यका कथन नहीं किया उसकी सूचना करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
३५ काल भी द्रव्य है ॥३९॥
§ ६०२. शंका—क्या है ? समाधान—'द्रव्य है' इतना वाक्य शेष है । शंका—काल द्रव्य
क्यों है ? समाधान—क्योंकि इसमें द्रव्यका लक्षण पाया जाता है । जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे
युक्त है वह सत् है तथा जो गुण और पर्यायवाला है वह द्रव्य है । इस प्रकार द्रव्यका दो प्रकारसे
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विद्यते । तद्यथा—ध्रौव्यं तावत्कालस्य स्वप्रत्ययं स्वभावव्यवस्थानात् । व्ययोदयौ परप्रत्ययौ,
अगुरुलघुगुणवृद्धिहान्यपेक्षया स्वप्रत्ययौ च । तथा गुणा अपि कालस्य साधारणासाधारणरूपाः
सन्ति । तत्रासाधारणो वर्तनाहेतुत्वम्, साधारणाश्चाचेतनत्वामूर्तत्वसूक्ष्मत्वागुरुलघुत्वादयः । पर्या-
याश्च व्ययोत्पादलक्षणा योज्याः । तस्माद् द्विप्रकारलक्षणोपेतत्वादाकाशादिवत्कालस्य द्रव्यत्वं
सिद्धम् । तस्यास्तित्वलिङ्गं धर्मादिवद् व्याख्यातम् 'वर्तनालक्षणः कालः' इति¹। ननु किमर्थमयं
कालः पृथगुच्यते । यत्रैव धर्मादय उक्तास्तत्रैवायमपि वक्तव्यः 'अजीवकाया धर्माधर्माकाशकाल-
पुद्गलाः' इति । नैवं शङ्क्यम्; तत्रोद्देशे सति कायत्वमस्य स्यात् । नेष्यते च मुख्योपचारप्रदेश-
प्रचयकल्पनाभावात् । धर्मादीनां तावन्मुख्यप्रदेशप्रचय उक्तः 'असंख्येयाः प्रदेशाः' इत्येवमादिना ।
अणोरप्येकप्रदेशस्य पूर्वोत्तरभावे²प्रज्ञापननयापेक्षयोपचारकल्पनया प्रदेशप्रचय उक्तः । कालस्य
पुनर्द्वेधापि प्रदेशप्रचयकल्पना नास्तीत्यकायत्वम् । अपि च तत्र पाठे 'निष्क्रियाणि च' इत्यत्र धर्मा-
दीनामाकाशान्तानां निष्क्रियत्वे प्रतिपादिते इतरेषां जीवपुद्गलानां³ सक्रियत्वप्राप्तिकवत्कालस्यापि
सक्रियत्वं स्यात् । अथाकाशात्प्राक्काल उद्दिश्येत⁴ । तन्न; 'आ आकाशादेकद्रव्याणि' इत्येकद्रव्यत्व-
मस्य स्यात् । तस्मात्पृथगिह कालोद्देशः क्रियते । अनेकद्रव्यत्वे सति किमस्य प्रमाणम् । लोका-
काशस्य यावन्तः प्रदेशास्तावन्तः कालाणवो निष्क्रिया एकैकाकाशप्रदेशे एकैकवृत्त्या लोकं व्याप्य
व्यवस्थिताः । उक्तं च—
लक्षण कहा है। वे दोनों ही लक्षण कालमें पाये जाते हैं। खुलासा इस प्रकार है—कालमें ध्रुवता
स्वनििमत्तक है, क्योंकि वह अपने स्वभावमें सदा स्थित है। व्यय और उत्पाद परनिमित्तक हैं,
और अगुरुलघु गुणकी हानि और वृद्धिकी अपेक्षा स्वनििमत्तक भी हैं। तथा कालके साधारण और
असाधारण रूप दो प्रकारके गुण भी हैं। उनमेंसे असाधारण गुण वर्तनाहेतुत्व है और साधारण
गुण अचेतनत्व, अमूर्तत्व, सूक्ष्मत्व और अगुरुलघुत्व आदिक हैं। इसी प्रकार व्यय और उत्पादरूप
पर्याय भी घटित कर लेना चाहिए। इसलिए कालमें जब द्रव्यके दोनों लक्षण पाये जाते हैं तो वह
आकाशके समान स्वतन्त्र द्रव्य है यह सिद्ध होता है। धर्मादिक द्रव्यके समान इसके अस्तित्वके कारण
का व्याख्यान किया ही है कि कालका लक्षण वर्तना है। शंका—काल द्रव्यको अलगसे क्यों कहा ?
जहां धर्मादिक द्रव्योंका कथन किया है वहीं पर इसका कथन करना था जिससे प्रथम सूत्रका रूप
निम्न होता—'अजीवकाया धर्माधर्माकाशकालपुद्गलाः' । समाधान—इस प्रकार शंका करना ठीक
नहीं है; क्योंकि वहां पर यदि इसका कथन करते तो इसे कायपना प्राप्त होता । परन्तु काल द्रव्य
कायवान् नहीं कहा है, क्योंकि इसमें मुख्य और उपचार दोनों प्रकारसे प्रदेशप्रचयकी कल्पनाका
अभाव है । धर्मादिक द्रव्योंका तो 'असंख्येयाः प्रदेशाः' इत्यादिक सूत्र-द्वारा मुख्यरूपसे प्रदेशप्रचय
कहा है । उसी प्रकार एक प्रदेशवाले अणुका भी पूर्वोत्तरभाव प्रज्ञापन नयकी अपेक्षा उपचार-
कल्पनासे प्रदेशप्रचय कहा है परन्तु कालके दोनों प्रकारसे प्रदेशप्रचयकी कल्पना नहीं बनती
इसलिए वह अकाय है । दूसरे यदि प्रथम सूत्र में कालका पाठ रखते हैं तो 'निष्क्रियाणि च'
यहाँपर धर्मसे लेकर आकाश तक के द्रव्योंको निष्क्रिय कहनेपर जैसे जीव और पुद्गलोंको
सक्रियत्व प्राप्त होता है वैसे ही काल द्रव्यको भी सक्रियत्व प्राप्त होता है । शंका—इस दोषको दूर
करनेके लिए आकाशसे पहले कालको रख दिया जाय ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं है
क्योंकि 'आकाश तक एक द्रव्य है' इस सूत्र वचनके अनुसार यदि कालको आकाशके पहले रखते
हैं तो उसे एक द्रव्यत्व प्राप्त होता है । ये सब दोष न रहें इसलिए कालका अलगसे कथन किया
है । शंका—काल अनेक द्रव्य हैं इसमें क्या प्रमाण है ? समाधान—लोकाकाशके जितने प्रदेश हैं
१. इति । किमर्थ-मु० । २. -त्तरप्रज्ञा-मु० । ३. -पुद्गलादीनां मु० । ४. -श्यते । आ आका-आ०,
दि० १, दि० २, ता० ।
३०
२३४ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३९ § ६०२ –
“लोगागासपदेसे एक्केक्के जे द्विया हु एक्कक्का ।
रयणाणं रासीविव ते कालाणू मुणेयव्वा ॥”
रूपादिगुणविरहादमूर्ताः ।
उतने कालाणु हैं और वे निष्क्रिय हैं। तात्पर्य यह है कि लोकाकाशके एक-एक प्रदेशपर एक-एक
कालाणु अवस्थित है। कहा भी है—'लोकाकाशके एक-एक प्रदेश पर जो रत्नोंकी राशिके समान
अवस्थित हैं उन्हें कालाणु जानो।' ये कालाणु रूपादि गुणोंसे रहित होनेके कारण अमूर्त हैं।
**विशेषार्थ—**पहले पांच द्रव्योंके अस्तित्वकी चर्चा कर आये हैं। यहाँ छठा द्रव्य काल है
इसका विचार किया जा रहा है। काल द्रव्य है या नहीं इस विषयमें श्वेताम्बर परम्परामें दो मत
मिलते हैं। एक मत तो कालको द्रव्यरूपसे स्वीकार करता है और दूसरा मत कालको स्वतन्त्र
द्रव्य नहीं मानता। इस दूसरे मतके अनुसार सूर्यादिके निमित्तसे जो दिन-रात, घड़ी-घण्टा, पल-
विपल आदि रूप काल अनुभवमें आता है वह सब पुद्गल द्रव्यकी पर्याय है। किन्तु विचारणीय
प्रश्न यह है कि इन जीव पुद्गल आदि द्रव्योंका परिणमन किसके निमित्तसे होता है ? यदि कहा
जाय कि उत्पन्न होना, व्यय होना और ध्रुव रहना यह प्रत्येक द्रव्यका स्वभाव है। इसके लिए
अन्य निमित्तके माननेकी क्या आवश्यकता ? तो इस प्रश्नपर यह तर्क होता है कि यदि इस तरह
सर्वथा स्वभावसे ही प्रत्येक द्रव्यका परिणमन माना जाता है तो गति, स्थिति और अवगाहको भी
सर्वथा स्वभावसे मान लेनेमें क्या आपत्ति है। और ऐसी हालतमें केवल जीव और पुद्गल ये दो
द्रव्य ही अवशिष्ट रहते हैं, शेष द्रव्योंका अभाव प्राप्त होता है, इतना ही क्यों, जीव और पुद्गल-
का तथा पुद्गल और पुद्गलका बन्ध भी सर्वथा स्वाभाविक मानना पड़ता है। निमित्त-नैमित्तिक
भावके माननेकी कोई आवश्यकता ही नहीं रहती और ऐसी अवस्थामें मुक्त जीव भी स्वभावसे
बँधने लगेगा तथा संसारी जीव भी बिना प्रयत्नके कभी भी मुक्त हो जायगा। यदि कहा जाय कि
गति, स्थिति आदि कार्य हैं और जितने भी कार्य होते हैं वे निमित्त और उपादान इन दो के
मिलने पर ही होते हैं, इसलिए गति, स्थिति और अवगाहन रूप कार्योंके निमित्तरूपसे धर्म, अधर्म
और आकाश द्रव्यका अस्तित्व स्वीकार किया जाता है तो प्रत्येक द्रव्यके परिणमनरूपसे काल
द्रव्यके अस्तित्वके स्वीकार करनेमें क्या हानि है अर्थात् कुछ भी नहीं। इस प्रकार विचार करनेपर
काल द्रव्यका अस्तित्व सिद्ध होता है।
फिर भी यह काल द्रव्य जीव आदि अन्य द्रव्योंके समान न तो असंख्यातप्रदेशी है और न
अनन्तप्रदेशी है किन्तु लोकाकाशके जितने प्रदेश हैं उतने काल द्रव्य हैं और प्रत्येक कालद्रव्य
लोकाकाशके एक-एक प्रदेश पर अवस्थित है। खुलासा इस प्रकार है—
प्रचय दो प्रकारका है—तिर्यक्प्रचय और ऊर्ध्वप्रचय। प्रदेशोंके प्रचयको तिर्यक्प्रचय कहते
हैं और कालनिमित्तक पर्यायप्रचयको ऊर्ध्वप्रचय कहते हैं। आकाश अवस्थित अनन्तप्रदेशवाला
होनेसे, धर्म और अधर्म अवस्थित असंख्यात प्रदेशवाला होनेसे, जीव असंख्यात प्रदेशवाला होनेसे
और पुद्गल बन्धकी अपेक्षा अनेक प्रदेशरूप शक्तिसे युक्त होनेके कारण इनका प्रदेशप्रचय बन
जाता है, किन्तु कालद्रव्य शक्ति और व्यक्ति दोनों रूपसे एक प्रदेशरूप होनेके कारण उसमें प्रदेश-
प्रचय नहीं बनता। ऊर्ध्वप्रचय सब द्रव्योंका होता है किन्तु इतनी विशेषता है कि अन्य पांच
द्रव्योंमें समयनिमित्तक पर्यायप्रचयरूप ऊर्ध्वप्रचय होता है और कालद्रव्यमें मात्र समयप्रचयरूप
ऊर्ध्वप्रचय होता है, क्योंकि अन्य द्रव्योंके परिणमनमें काल द्रव्य निमित्त है और काल द्रव्यके
अपने परिणमनमें अन्य कोई निमित्त नहीं है। वही निमित्त है और वही उपादान है। जिस प्रकार
वह अन्य द्रव्योंके परिणमनमें निमित्त होता है उसी प्रकार अपने परिणमनमें भी निमित्त होता
- ५।४० § ६०४ ] पञ्चमोऽध्यायः - २३५
§ ६०३. वर्तनालक्षणस्य मुख्यस्य कालस्य प्रमाणमुक्तम् । परिणामादिगम्यस्य व्यवहार-
कालस्य किं प्रमाणमित्यत इदमुच्यते—
सोऽनन्तसमयः ॥४०॥
§ ६०४. साम्प्रतिकस्यैकसमयिकत्वेऽपि अतीता अनागताश्च समया अनन्ता इति कृत्वा
'अनन्तसमयः' इत्युच्यते । अथवा मुख्यस्यैव कालस्य प्रमाणावधारणार्थमिदमुच्यते । अनन्तपर्याय-
वर्तनाहेतुत्वादेकोऽपि कालाणुरनन्त इत्युपचर्यते । समयः पुनः परमनिरुद्धः कालांशस्तत्प्रचयविशेष
आवलिकादिरवगन्तव्यः ।
है । किन्तु जिस प्रकार अन्य द्रव्य अपने-अपने उपादानके अनुसार परिणमन करते हैं उसी प्रकार
काल द्रव्य भी अपने उपादान के अनुसार परिणमन करता है ।
इस प्रकार यद्यपि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यरूपसे तथा गुण और पर्यायरूपसे काल द्रव्यके
अस्तित्वकी सिद्धि हो जाती है पर वह अखण्ड एकप्रदेशी है यह सिद्ध नहीं होता, इसलिए आगे
इसी बातका विचार करते हैं—
एक पुद्गल परमाणु मन्दगतिसे एक आकाश प्रदेशसे दूसरे आकाश प्रदेश पर जाता है
और इसमें कुछ समय भी लगता है । यदि विचार कर देखा जाय तो ज्ञात होगा कि यह समय ही
काल द्रव्यकी पर्याय है जो कि अतिसूक्ष्म होनेसे निरंश है। यदि कालद्रव्यको लोकाकाशके बराबर
अखण्ड और एक माना जाता है तो इस अखण्ड समय पर्यायकी निष्पत्ति नहीं होती, क्योंकि
पुद्गल परमाणु जब एक कालाणुको छोड़कर दूसरे कालाणुके प्रति गमन करता है तब वहाँ दोनों
कालाणु पृथक्-पृथक् होनेसे समयका भेद बन जाता है। और यदि एक अखण्ड लोकके बराबर
कालद्रव्य होवे तो समय पर्यायकी सिद्धि किस तरह हो सकती है? यदि कहा जाय कि कालद्रव्य
लोकप्रमाण असंख्यात प्रदेशी है, उसके एक प्रदेशसे दूसरे प्रदेशके प्रति जानेपर समय पर्यायकी
सिद्धि हो जायगी तो इसका समाधान यह है कि ऐसा मानने पर एक अखण्डद्रव्यके एक प्रदेशसे
दूसरे प्रदेशपर जाने पर समय पर्यायका भेद नहीं बनता । इसलिए समय पर्यायमें भेद सिद्ध करने-
के लिए काल द्रव्यको अणुरूपमें स्वीकार कर लिया गया है। इस प्रकार काल द्रव्य क्या है और
वह एक प्रदेशी कैसे है इस बातका विचार किया ।
§ ६०३. वर्तना लक्षणवाले मुख्य कालका प्रमाण कहा। परन्तु परिणाम आदिके द्वारा
जानने योग्य व्यवहार कालका क्या प्रमाण है ? इस बातका ज्ञान करानेके लिए अब आगेका सूत्र
कहते हैं—
वह अनन्त समयवाला है ॥४०॥
§ ६०४. यद्यपि वर्तमान काल एक समय वाला है तो भी अतीत और अनागत अनन्त
समय हैं ऐसा मानकर कालको अनन्त समयवाला कहा है। अथवा मुख्य कालका निश्चय करनेके
लिए यह सूत्र कहा है । तात्पर्य यह है कि अनन्त पर्यायें वर्तना गुणके निमित्तसे होती हैं इसलिए
एक कालाणुको भी उपचारसे अनन्त कहा है। परन्तु समय अत्यन्त सूक्ष्म कालांश है और उसके
समुदायको आवलि आदि जानना चाहिए ।
विशेषार्थ—समय शब्द द्रव्य और पर्याय दोनों अर्थोंमें व्यवहृत होता है । यहाँ पर्यायरूप
अर्थ लिया गया है। इससे व्यवहार काल और निश्चय काल दोनोंकी सिद्धि होती है। एक-एक
समयका समुच्चय होकर जो आवलि, पल आदि कालका व्यवहार होता है वह व्यवहारकाल है
और यह समय-पर्याय बिना पर्यायीके नहीं हो सकती, इससे निश्चय कालका ज्ञान होता है यह
उक्त कथनका तात्पर्य है।
१. -निकृष्टः कालां-दि० १ ।
२३६ | सर्वार्थसिद्धौ | [ ५।४१ § ६०५ -
§ ६०५. आह गुणपर्ययवद् द्रव्यमित्युक्तं तत्र के गुणा इत्यत्रोच्यते—
द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ॥४१॥
§ ६०६. द्रव्यमाश्रयो येषां ते द्रव्याश्रयाः । निष्क्रान्ता गुणेभ्यो निर्गुणाः । एवमुभयलक्षणो-
पेता गुणा इति । ‘निर्गुणाः' इति विशेषणं द्व्यणुकादिनिवृत्त्यर्थम् । तान्यपि हि कारणभूतपरमाणु-
द्रव्याश्रयाणि गुणवन्ति तु तस्मात् ‘निर्गुणाः' इति विशेषणात्तानि निर्वर्त्तितानि भवन्ति । ननु
पर्याया अपि घटसंस्थानादयो द्रव्याश्रया निर्गुणाश्च, तेषामपि गुणत्वं प्राप्नोति । 'द्रव्याश्रयाः' इति
वचनात् ‘नित्यं द्रव्यमाश्रित्य वर्तन्ते¹ ये' ते गुणा इति ²विशेषात्पर्याया निर्वर्तिता भवन्ति । ते हि
कादाचित्का इति ।
§ ६०५. 'गुण और पर्यायवाला द्रव्य है' यह पहले कह आये हैं। अब गुण क्या है यह
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जो निरन्तर द्रव्यमें रहते हैं और गुणरहित हैं वे गुण हैं ॥४१॥
§ ६०६. जिनके रहनेका आश्रय द्रव्य है वे द्रव्याश्रय कहलाते हैं और जो गुणोंसे रहित हैं
वे निर्गुण कहे जाते हैं। इस प्रकार इन दोनों लक्षणोंसे युक्त गुण होते हैं। सूत्रमें 'निर्गुणाः' यह
विशेषण द्व्यणुक आदिके निराकरण करनेके लिए दिया है। वे भी अपने कारणभूत परमाणु द्रव्य-
के आश्रयसे रहते हैं और गुणवाले हैं, इसलिए 'निर्गुणाः' इस विशेषणसे उनका निषेध किया गया
है। शंका—घटसंस्थान आदि जितनी पर्याय हैं वे सब द्रव्यके आश्रयसे रहती हैं और निर्गुण होती
हैं अतः गुणके उक्त लक्षणके अनुसार उन्हें भी गुणत्व प्राप्त होता है ? समाधान—सूत्रमें जो
'द्रव्याश्रयाः' विशेषण है उसका यह अभिप्राय है कि जो सदा द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं वे गुण हैं।
इस प्रकार 'सदा' विशेषण लगानेसे पर्यायोंका निषेध हो जाता है अर्थात् गुणका लक्षण पर्यायोंमें
नहीं जाता है; क्योंकि पर्याय कादाचित्क होती हैं।
विशेषार्थ—पहले गुण और पर्यायवाला द्रव्य है यह कह आये हैं। यहाँ गुणके स्वरूपका
विचार किया गया है। जब कि द्रव्यको गुण और पर्यायवाला बतलाया है तब इसीसे स्पष्ट है कि
गुण द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं अर्थात् द्रव्य आधार है और गुण आधेय है। पर इससे आधार और
आधेयमें दही और कुण्डके समान सर्वथा भेदपक्षका ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि गुण द्रव्यके
आश्रयसे रहते हुए भी वे उससे कथंचित् अभिन्न हैं जैसे-तैल तिलके सब अवयवोंमें व्याप्त होकर
रहता है वैसे ही प्रत्येक गुण द्रव्यके सभी अवयवोंमें समान रूपसे व्याप्त होकर रहता है, पर इससे
द्व्यणुक आदिमें भी यह लक्षण घटित हो जाता है क्योंकि द्व्यणुक आदि भी अपने आधारभूत
परमाणु द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं। अतएव जो स्वयं विशेष रहित हों वे गुण हैं यह कहा है। ऐसा
नियम है कि जैसे द्रव्यमें गुण पाये जाते हैं वैसे गुणमें अन्य गुण नहीं रहते। अतएव गुण स्वयं
विशेष रहित रहते हैं, इस प्रकार यद्यपि जो द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं और स्वयं विशेष रहित हैं
वे गुण हैं, गुणका इतना लक्षण फलित हो जाता है पर यह पर्यायोंमें भी पाया जाता है। क्योंकि
वे भी द्रव्यके आश्रयसे रहती हैं और स्वयं विशेषरहित होती हैं। इसलिए इस अतिव्याप्ति दोषका
निराकरण करनेके लिए जो द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं इसका अर्थ-जो द्रव्यके आश्रयसे सदा रहते
हैं, इतना समझना चाहिए। इस प्रकार गुणोंके स्वरूपका विचार किया। गुणका एक नाम विशेष
भी है। जिनके निमित्तसे एक द्रव्य अन्य द्रव्यसे भेद को प्राप्त हों वे विशेष अर्थात् गुण हैं यह उक्त
कथनका तात्पर्य है। ऐसे गुण प्रत्येक द्रव्यमें अनन्त होते हैं। उनमें कुछ सामान्य होते हैं और कुछ
विशेष। जो एकाधिक द्रव्योंमें उपलब्ध होते हैं वे सामान्यगुण कहलाते हैं और जो प्रत्येक द्रव्यकी
विशेषताको व्यक्त करते हैं वे विशेषगुण कहलाते हैं।
१. -र्तन्ते गुणा मु० । २. विशेषणत्वात्पर्यायाश्च निव-मु० ।
- ५।४२ § ६०८ ] पञ्चमोऽध्यायः २३७
§ ६०७. असकृत् 'परिणाम' शब्द उक्तः । तस्य कोऽर्थ इति प्रश्ने उत्तरमाह—
तद्भावः परिणामः ॥४२॥
§ ६०८. अथवा गुणा द्रव्यादर्थान्तरभूता इति केषांचिद्दर्शनं तत्किं भवतोऽभिमतम् । न;
इत्याह—यद्यपि कथंचिद् व्यपदेशादिभेदहेत्वपेक्षया द्रव्यादन्ये, तथापि तदव्यतिरेकात्तत्परिणामाच्च
नान्ये । यद्येवं स उच्यतां कः परिणाम इति । तन्निश्चयार्थमिदमुच्यते—धर्मादीनि द्रव्याणि येना- ५
त्मना भवन्ति स तद्भावस्तत्त्वं परिणाम इति आख्यायते । स द्विविधोऽनादिरादिमांश्च । तत्रा-
नादिर्धर्मादीनां गत्युपग्रहादिः सामान्यापेक्षया । स एवादिमांश्च भवति विशेषापेक्षया इति ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां पञ्चमोऽध्यायः ।
§ ६०७. परिणाम शब्दका अनेक बार उल्लेख किया; परन्तु उसका क्या तात्पर्य है ऐसा
प्रश्न होनेपर अगले सूत्र द्वारा इसीका उत्तर देते हैं— १०
उसका होना अर्थात् प्रति समय बदलते रहना परिणाम है ॥४२॥
§ ६०८. अथवा गुण द्रव्यसे अलग हैं यह किन्हींका मत है । वह क्या आपके (जैन) मतमें
स्वीकार है ? नहीं, इसलिए कहते हैं कि संज्ञा आदिके निमित्तसे प्राप्त होनेवाले भेदके कारण गुण
द्रव्यसे कथंचित् भिन्न हैं तो भी वे द्रव्यसे भिन्न नहीं पाये जाते हैं और द्रव्यके परिणाम हैं इसलिए
भिन्न नहीं भी हैं। यदि ऐसा है तो वह बात कहिए जिससे परिणामका स्वरूप ज्ञात हो । बस १५
इसी बातका निश्चय करनेके लिए कहते हैं—धर्मादिक द्रव्य जिस रूपसे होते हैं वह तद्भाव या
तत्त्व है और इसे ही परिणाम कहते हैं । वह दो प्रकारका है—अनादि और सादि । उनमें-से
धर्मादिक द्रव्यके जो गत्युपग्रहादिक होते हैं वे सामान्यकी अपेक्षा अनादि हैं और विशेषकी अपेक्षा
सादि हैं।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ । २०
१. हेतुत्वापेक्ष-मु० ।
अथ षष्ठोऽध्यायः
§ ६०९. आहे, अजीवपदार्थो व्याख्यातः । इदानीं तदनन्तरोद्देशभागास्रवपदार्थो व्याख्येय
इति तत्तत्प्रसिद्ध्यर्थमिदमुच्यते—
कायवाङ्मनःकर्म योगः ॥१॥
५ § ६१०. कायादयः शब्दा व्याख्यातार्थाः । कर्म क्रिया इत्यनर्थान्तरम् । कायवाङ्मनसां
कर्म कायवाङ्मनःकर्म योग इत्याख्यायते । आत्मप्रदेशपरिस्पन्दो योगः । स निमित्तभेदात्त्रिधा
भिद्यते । काययोगो वाग्योगो मनोयोग इति । तद्यथा—वीर्यान्तरायक्षयोपशमसद्भावे सति
औदारिकादिसप्तविधकायवर्गणान्यतमालम्बनापेक्ष आत्मप्रदेशपरिस्पन्दः काययोगः । शरीरनाम-
कर्मोदयापादितवाग्वर्गणालम्बने सति वीर्यान्तरायमत्यक्षराद्यावरणक्षयोपशमापादिताभ्यन्तर-
१० वाग्लब्धिसंनिधौ वाक्परिणामाभिमुख्यस्यात्मनः प्रदेशपरिस्पन्दो वाग्योगः । अभ्यन्तरवीर्यान्तरायनो-
इन्द्रियावरणक्षयोपशमात्मकमनोलब्धिसंनिधाने बाह्यनिमित्तमनोवर्गणालम्बने च सति मनःपरि-
णामाभिमुख्यस्यात्मप्रदेशपरिस्पन्दो मनोयोगः । क्षयेऽपि त्रिविधवर्गणापेक्षः सयोगकेवलिन
आत्मप्रदेशपरिस्पन्दो योगो वेदितव्यः ।
§ ६०९. जीव और अजीवका व्याख्यान किया । अब उसके बाद आस्रव पदार्थका
१५ व्याख्यान क्रम प्राप्त है । अतः उसे स्पष्ट करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
काय, वचन और मनकी क्रिया योग है ॥१॥
§ ६१०. काय आदि शब्दोंका व्याख्यान पहले कर आये हैं। कर्म और क्रिया ये एकार्थवाची
नाम हैं । काय, वचन और मनकी क्रियाको योग कहते हैं यह इसका तात्पर्य है । आत्माके
प्रदेशोंका परिस्पन्द-हलन चलन योग है । वह निमित्तोंके भेदसे तीन प्रकारका है-काययोग,
२० वचनयोग और मनोयोग । खुलासा इस प्रकार है-वीर्यान्तराय कर्मके क्षयोपशमके होनेपर
औदारिक आदि सात प्रकारकी कायवर्गणाओंमें-से किसो एक प्रकारकी वर्गणाओंके आलम्बनसे
होनेवाला आत्मप्रदेश परिस्पन्द काययोग कहलाता है । शरीर नामकर्मके उदयसे प्राप्त
हुई वचन-वर्गणाओंका आलम्बन होनेपर तथा वीर्यान्तराय और मत्यक्षरादि आवरणके
क्षयोपशमसे प्राप्त हुई भीतरी वचनलब्धिके मिलनेपर वचनरूप पर्यायके सन्मुख हुए आत्माके
२५ होनेवाला प्रदेश-परिस्पन्द वचनयोग कहलाता है । वीर्यान्तराय और नो इन्द्रियावरणके
क्षयोपशमरूप आन्तरिक मनोलब्धिके होनेपर तथा बाहरी निमित्तभूत मनोवर्गणाओंका
आलम्बन मिलनेपर मनरूप पर्यायके सन्मुख हुए आत्माके होनेवाला प्रदेश-परिस्पन्द मनोयोग
कहलाता है । वीर्यान्तराय और ज्ञानावरण कर्मके क्षय हो जानेपर भी सयोगकेवलीके जो
तीन प्रकारकी वर्गणाओंकी अपेक्षा आत्मप्रदेश-परिस्पन्द होता है वह भी योग है ऐसा जानना
३० चाहिए ।
१. अथाजीवप- मु० । आह जीवाजीवप-ता०, ना० । इत्यजीवप-दि० २ । २. आत्मनः प्रदे-आ०,
दि० १, दि. २ ।
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अध्याय ७-८: अणुव्रत, महाव्रत एवं अष्टविध कर्म-प्रकृति बन्ध विचार
- ६१३ § ६१४ ] षष्ठोऽध्यायः २३९
§ ६११. आह, १अभ्युपेतः आहितत्रैविध्यक्रियो योग इति । प्रकृत इदानीं निर्दिश्यतां
किंलक्षण आस्रव इत्युच्यते । योऽयं योगशब्दाभिधेयः संसारिणः पुरुषस्य—
स आस्रवः ॥ २ ॥
§ ६१२. यथा सरस्सलिलावाहिद्वारं तदास्रवकारणत्वाद् आस्रव इत्याख्यायते तथा योग-
प्रणालिकया आत्मनः कर्म आस्रवतीति योग आस्रव इति व्यपदेशमर्हति ।
§ ६१३. आह कर्म द्विविधं पुण्यं पापं चेति । तस्य किमविशेषेण योग आस्रवहेतुराहोस्विदस्ति
कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य ॥ ३ ॥
§ ६१४. कः शुभो योगः को वा अशुभः । प्राणातिपातादत्तादानमैथुनादिरशुभः काययोगः ।
अनृतभाषणपरुषासभ्यवचनादिरशुभो वाग्योगः । वधचिन्तनेर्ष्यासूयादिरशुभो मनोयोगः । ततो
विपरीतः शुभः । कथं योगस्य शुभाशुभत्वम् । शुभपरिणामनिर्वृत्तो योगः शुभः । अशुभपरिणामनि-
वृंत्तश्चाशुभः । न पुनः शुभाशुभकर्मकारणत्वेन । यद्येवमुच्यते शुभयोग एव न स्यात् शुभयोगस्यापि
ज्ञानावरणादिबन्धहेतुत्वाभ्युपगमात् । पुनात्यात्मानं पूयतेऽनेनेति वा पुण्यम् । तत्तद्भेद्यादि । पाति
रक्षति आत्मानं शुभादिति पापम्³ । तदसद्भेद्यादि ।
§ ६११. यह तो जाना कि तीन प्रकारकी क्रिया योग है। अब यह बतलाइए कि आस्रवका
क्या लक्षण है ? संसारी जीवके जो यह योग शब्दका वाच्य कहा है—
वही आस्रव है ॥ २ ॥
§ ६१२. जिस प्रकार तालाबमें जल लानेका दरवाजा जलके आनेका कारण होनेसे आस्रव
कहलाता है उसी प्रकार आत्माके साथ बँधनेके लिए कर्म योगरूपी नालीके द्वारा आते हैं इसलिए
योग आस्रव संज्ञाको प्राप्त होता है ।
§ ६१३. कर्म दो प्रकारका है—पुण्य और पाप, इसलिए क्या योग सामान्यरूपसे उनके
आस्रवका कारण है या कोई विशेषता है ? इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शुभयोग पुण्यका और अशुभयोग पापका आस्रव है ॥ ३ ॥
§ ६१४. शंका—शुभ योग क्या है और अशुभ योग क्या है ? समाधान—हिंसा, चोरी.
और मैथुन आदिक अशुभ काययोग है। असत्य वचन, कठोर वचन और असभ्य वचन आदि
अशुभ वचनयोग है। मारनेका विचार, ईर्ष्या और डाह आदि अशुभ मनोयोग है। तथा इनसे
विपरीत शुभकाय योग, शुभ वचनयोग और शुभ मनोयोग है। शंका—योगके शुभ और अशुभ ये भेद
किस कारणसे हैं ? समाधान—जो योग शुभ परिणामोंके निमित्तसे होता है वह शुभ योग है और जो
योग अशुभ परिणामोंके निमित्तसे होता है वह अशुभ योग है। शायद कोई यह माने कि शुभ और
अशुभ कर्मका कारण होनेसे शुभ और अशुभ योग होता है सो बात नहीं है; क्योंकि यदि इस
प्रकार इनका लक्षण कहा जाता है तो शुभयोग ही नहीं हो सकता, क्योंकि शुभयोगको भी
ज्ञानावरणादि कर्मोंके बन्धका कारण माना है। इसलिए शुभ और अशुभ योगका जो लक्षण यहाँ
पर किया है वही सही है। जो आत्माको पवित्र करता है या जिससे आत्मा पवित्र होता है वह
पुण्य है। जैसे सातावेदनीय आदि तथा जो आत्माको शुभसे बचाता है वह पाप है; जैसे असाता
वेदनीय आदि ।
१. अभ्युपगत आहि-मु० । २. आस्रवणहेतु-मु०, ता०, ना० । ३. पापम् । असद्भे-मु० ।
२४० सर्वार्थसिद्धौ [ ६।४ § ६१५ -
§ ६१५. आह किमयम्र्मास्रवः सर्वसंसारिणां¹ समानफलारम्भहेतुराहोस्वित्कश्चिदस्ति प्रति-
विशेष इत्यत्रोच्यते—
सकषायाकषाययोः सांपरायिकेर्यापथयोः ॥ ४ ॥
§ ६१६. स्वामिभेदादास्रवभेदः । स्वामिनौ द्वौ सकषायोऽकषायश्चेति । कषायः क्रोधादिः ।
५ कषाय इव कषायः । कः उपमार्थः । यथा कषायो नैयग्रोधादिः श्लेषहेतुस्तथा क्रोधादिरप्यात्मनः
कर्मश्लेषहेतुत्वात् कषाय इव कषाय इत्युच्यते । सह कषायेण वर्तत इति सकषायः । न विद्यते
कषायो यस्येत्यकषायः । सकषायश्चाकषायश्च सकषायाकषायौ तयोः सकषायाकषाययोः ।
संपरायः संसारः तत्प्रयोजनं कर्म सांपरायिकम् । ईरणमीर्या योगो गतिरित्यर्थः
? Look at संचेचनानुबन्धःvsसंचेचेत...vsसचेतसंचेचनानुबन्धः: Characters: स् पृ ष्ट व्य Then:सं(with dot)? Orस? Wait, is there a dot over स? Yes, there is a dot: सं. Then: चे? Then: त? Wait, look at the letter after चे: it has a vertical line, an arch to the left... wait, it's त! Wait, is there a dot over चे? No. Wait, look at the word: संचेचे...? Let's zoom in on संचे...: सwith anusvara?सं चे Thenत! Then ना! Then नु! Then बwith anusvara:बं! Then धः! Wait! Is it संचेचनानुबन्धःorसचेतसंचेचनानुबन्धःorसचेतनानुबन्धः? Let's look at the character between चेandना: Wait, it's त! It looks just like तinकृतत्वात्`!
२४२ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।६ § ६१९ –
ज्ञानदर्शनादिषु निकृतिर्वञ्चनं मायाक्रिया । अन्यं $^१$मिथ्यादर्शनक्रियाकरणकारणाविष्टं प्रशंसादि-
भिर्दृढयति यथा साधु करोषीति सा मिथ्यादर्शनक्रिया । संयमघातिकर्मोदयवशादनिवृत्तिरप्रत्या-
ख्यानक्रिया । ता एताः पञ्च क्रियाः । समुदिताः पञ्चविंशतिक्रियाः । एतानीन्द्रियादीनि कार्य-
कारणभेदाद्भेदमापद्यमानानि सांपरायिकस्य कर्मण आस्रवद्वाराणि भवन्ति ।
५ § ६१९. अत्राह, योगत्रयस्य सर्वात्मकार्यत्वात्सर्वेषां संसारिणां साधारणः, ततो बन्धफलानु-
भवनं प्रत्यविशेष इत्यत्रोच्यते—नैतदेवम् । यस्मात् सत्यपि प्रत्यात्मसंभवे तेषां जीवपरिणामेभ्यो-
ऽनन्तविकल्पेभ्यो विशेषोऽभ्यनुज्ञायते कथमिति चेदुच्यते—
तीव्र मन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषैस्तद्विशेषः ॥ ६ ॥
§ ६२०. बाह्याभ्यन्तरहेतूदोरणवशादुद्रिक्तः परिणामस्तीव्रः । तद्विपरीतो मन्दः । अयं $^३$प्राणी
१० मया हन्तव्य इति ज्ञात्वा प्रवृत्तिर्ज्ञातमित्युच्यते । मदात्प्रमादाद्वानवबुध्य प्रवृत्तिरज्ञातम् । अधि-
क्रियन्तेऽस्मिन्नर्था इत्यधिकरणं द्रव्यमित्यर्थः । द्रव्यस्य स्वशक्तिविशेषो वीर्यम् । भावशब्दः प्रत्येकं
परिसमाप्यते—तीव्रभावो मन्दभाव इत्यादिः । एतेभ्यस्तस्यास्रवस्य विशेषो भवति । कारणभेदाद्धि
कार्यभेद इति ।
§ ६२१. अत्राह, अधिकरणंमुक्तम्, तत्स्वरूपमनिर्ज्ञातमतस्तदुच्यतामिति । तत्र भेदप्रति-
१५ पादनद्वारेणाधिकरणस्वरूपनिर्ज्ञानार्थमाह—
रहना और दूसरेके करनेपर हर्षित होना प्रारम्भ क्रिया है । परिग्रह का नाश हो इसलिए जो
क्रिया की जाती है वह पारिग्राहिकी क्रिया है । ज्ञान, दर्शन आदिके विषयमें छल करना मायाक्रिया
है । मिथ्यादर्शनके साधनोंसे युक्त पुरुषकी प्रशंसा आदिके द्वारा दृढ़ करना कि 'तू ठीक करता है'
मिथ्यादर्शन क्रिया है । संयमका घात करनेवाले कर्मके उदयसे त्यागरूप परिणामोंका न होना
२० अप्रत्याख्यानक्रिया है । ये पांच क्रिया हैं। ये सब मिलकर पच्चीस क्रियाएँ होती हैं कार्य-कारणके
भेदसे अलग-अलग भेदको प्राप्त होकर ये इन्द्रियादिक साम्परायिक कर्मके आस्रवके द्वार हैं ।
§ ६१९ शंका—तीनो योग सब आत्माओंके कार्य हैं इसलिए वे सब संसारी जीवोंके
समान रूपसे प्राप्त होते हैं, इसलिए कर्मबन्धके फलके अनुभवके प्रति समानता प्राप्त होनी चाहिए ?
समाधान—यह बात ऐसी नहीं है, क्योंकि यद्यपि योग प्रत्येक आत्माके होता है परन्तु जीवोंके
२५ परिणामोंके अनन्त भेद हैं इसलिए कर्मबन्धके फलके अनुभवकी विशेषता माननी पड़ती है ।
शंका—किस प्रकार ? समाधान—अब अगले सूत्रद्वारा इसी बातका समाधान करते हैं—
तीव्रभाव, मन्दभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभाव, अधिकरण और वीर्यविशेषके भेदसे उसकी
( आस्रवकी ) विशेषता होती है ॥६॥
§ ६२०. बाह्य और आभ्यन्तर हेतुको उदीरणावश प्राप्त होनेके कारण जो उत्कट परिणाम
३० होता है वह तीव्र भाव है। मन्द भाव इससे उलटा है। इस प्राणीका मुझे हनन करना चाहिए इस
प्रकार जानकर प्रवृत्ति करना ज्ञात भाव है। मद या प्रमादके कारण बिना जाने प्रवृत्ति करना
अज्ञात भाव है। जिसमें पदार्थ अधिकृत किये जाते हैं वह अधिकरण है। यहाँ अधिकरणसे द्रव्यका
ग्रहण किया है। द्रव्यकी अपनी शक्तिविशेष वीर्य है। सूत्रमें जो भाव शब्द आया है वह सब
शब्दोंके साथ जोड़ लेना चाहिए। यथा—तीव्रभाव, मन्दभाव इत्यादि । इन सब कारणोंसे
३५ आस्रवमें विशेषता आ जाती है, क्योंकि कारणके भेदसे कार्यमें भेद होता है।
§ ६२१. पूर्व सूत्रमें 'अधिकरण' पद आया है पर उसका स्वरूप अज्ञात है, इसलिए वह कहना
चाहिए ? अब उसके भेदोंके कथन द्वारा उसके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. दर्शनकरण-ता०, ना०, मु० । २. -रणस्य ततो मु० । ३. प्राणी हन्त-मु०, ता०, ना० ।
४. -करणमित्युक्तम् मु० ता० ।
- ६१८ § ६२४ ] षष्ठोऽध्यायः २४३
अधिकरणं जीवाजीवाः ॥ ७ ॥
§ ६२२. उक्तलक्षणा जीवाजीवाः । यद्युक्तलक्षणाः पुनर्वचनं किमर्थम् । अधिकरणविशेषज्ञा-
पनार्थं पुनर्वचनम् । जीवाजीवा अधिकरणमित्ययं विशेषो ज्ञापयितव्ये¹ इति । कः पुनरसौ ।
हिंसाद्युपकरणभाव इति । स्यादेतन्मूलपदार्थयोर्द्वित्वाज्जीवाजीवाविति² द्विवचनं न्यायप्राप्तमिति ।
तन्न, पर्यायाणामधिकरणत्वात् । येन केनचित्पर्यायेण विशिष्टं द्रव्यमधिकरणम्, न सामान्यमिति ५
बहुवचनं कृतम् । जीवाजीवा अधिकरणं कस्य । आस्रवस्येति । अर्थवशादभिसंबन्धो भवति ।
§ ६२३. तत्र जीवाधिकरणभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
आद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषाय-
विशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥८॥
§ ६२४. प्राणव्यपरोपणादिषु प्रमादवतः प्रयत्नावेशः संरम्भः । साधनसमभ्यासीकरणं समा- १०
रम्भः । प्रक्रम आरम्भः । 'योग'शब्दो व्याख्यातार्थः । कृतवचनं स्वातन्त्र्यप्रतिपत्त्यर्थम् । कारिता-
भिधानं परप्रयोगापेक्षम् । अनुमतशब्दः प्रयोजकस्य मानसपरिणामप्रदर्शनार्थः । अभिहितलक्षणाः
कषायाः क्रोधादयः । विशिष्यतेऽर्थोऽर्थान्तरादिति विशेषः । स प्रत्येकमभिसंबध्यते—संरम्भविशेषः
समारम्भविशेष इत्यादि । आद्यं जीवाधिकरणमेतैर्विशेषैः 'भिद्यते' इति वाक्यशेषः । एते चत्वारः
अधिकरण जीव और अजीवरूप हैं ॥७॥ १५
§ ६२२. जीव और अजीवके लक्षण पहले कह आये हैं । शंका—यदि इनके लक्षण पहले
कह आये हैं तो फिरसे इनका उल्लेख किस लिए किया ? समाधान—अधिकरण विशेषका ज्ञान
करानेके लिए फिरसे इनका उल्लेख किया है जिससे जीव और अजीव अधिकरण हैं यह विशेष
जताया जा सके । शंका—वह कौन है ? समाधान—हिंसादि उपकरणभाव । शंका—मूल पदार्थ
दो हैं इसलिए 'जीवाजीवौ' इस प्रकार सूत्रमें द्विवचन रखना न्यायप्राप्त है ? समाधान—यह २०
कहना ठीक नहीं हैं, क्योंकि उनकी पर्यायोंको अधिकरण माना है । तात्पर्य यह है कि किसी एक
पर्यायसे युक्त द्रव्य अधिकरण होता है, केवल द्रव्य नहीं, इसलिए सूत्रमें बहुवचन रखा है । जीव
और अजीव किसके अधिकरण हैं ? आस्रवके । इस प्रकार प्रयोजनके अनुसार यहाँ आस्रव पदका
सम्बन्ध होता है ।
§ ६२३. अब जीवाधिकरणके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २५
पहला जीवाधिकरण संरम्भ, समारम्भ और आरम्भके भेदसे तीन प्रकारका, योगोंके भेद-
से तीन प्रकारका, कृत, कारित और अनुमतके भेदसे तीन प्रकारका तथा कषायोंके भेदसे चार
प्रकारका होता हुआ परस्पर मिलानेसे १०८ प्रकारका है ॥८॥
§ ६२४. प्रमादी जीवका प्राणोंकी हिंसा आदिकार्यमें प्रयत्नशील होना संरम्भ है। साधनों-
का जुटाना समारम्भ है । कार्य करने लगना आरम्भ है । योग शब्दका व्याख्यान पहले कर आये ३०
हैं । कर्ताको कार्यविषयक स्वतन्त्रता दिखलानेके लिए सूत्रमें 'कृत' वचन रखा है । कार्यमें दूसरेके
प्रयोगकी अपेक्षा दिखलानेके लिए 'कारित' वचन रखा है । तथा प्रयोजकके मानस परिणामको
दिखलानेके लिए अनुमत शब्द रखा है । क्रोधादि कषायोंके लक्षण कहे जा चुके हैं । जिससे एक
अर्थ दूसरे अर्थसे विशेषताको प्राप्त हो वह विशेष है । इसे प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए
सुजन्तास्त्र्यादिशब्दा यथाक्रममभिसंबध्यन्ते—संरम्भसमारम्भारम्भास्त्रयः, योगास्त्रयः, कृतकारि-
तानुमतास्त्रयः, कषायाश्चत्वार इति । एतेषां गणनाभ्यावृत्तिः सुचा द्योत्यते । एकश इति
वीप्सानिर्देशः । एकैकं १त्र्यादीन् भेदान् नयेदित्यर्थः । यद्यथा—क्रोधकृतकायसंरम्भः मानकृत-
कायसंरम्भः मायाकृतकायसंरम्भः लोभकृतकायसंरम्भः क्रोधकारितकायसंरम्भः मानकारितकायसं-
रम्भः मायाकारितकायसंरम्भः लोभकारितकायसंरम्भः क्रोधानुमतकायसंरम्भः मानानुमतकाय-
संरम्भः मायानुमतकायसंरम्भः लोभानुमतकायसंरम्भश्चेति द्वादशधा कायसंरम्भः । एवं वाग्योगे
मनोयोगे च द्वादशधा संरम्भः । त एते२ संपिण्डिताः षट्त्रिंशत्, तथा समारम्भा अपि षट्त्रिंशत्,
आरम्भा अपि षट्त्रिंशत् । एते संपिण्डिता जीवाधिकरणत्वप्रभेदा अष्टोत्तरशतसंख्याः संभवन्ति ।
'च'शब्दोऽनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनकषायभेदकृतान्तर्भेदसमुच्चयार्थः ।
§ ६२५. परस्या३जीवाधिकरणस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् ॥ ९ ॥
§ ६२६. निर्वर्त्यत इति निर्वर्तना निष्पादना । निक्षिप्यत इति निक्षेपः स्थापना । संयुज्यते
इति संयोगो मिश्रीकृतम् । निसृज्यत इति निसर्गः प्रवर्तनम् । एते द्वचादिभिर्यथाक्रममभिसंबध्यन्ते—
निर्वर्तना द्विभेदा निक्षेपश्चतुर्भेदः संयोगो द्विभेदः निसर्गस्त्रिभेद इति । त एते भेदा अजीवाधि-
करणस्य वेदितव्याः । परवचनमनर्थकम्, पूर्वसूत्रे आद्यमिति वचनादिदमवशिष्टार्थं भवतीति ।
नानर्थकम् । अन्यार्थः परशब्दः । संरम्भादिभ्योऽन्यानि निर्वर्तनादीनि । इतरथा हि निर्वर्तनादीना-
'तीन' आदि शब्द क्रमसे सम्बन्धको प्राप्त होते हैं। यथा—संरम्भ, समारम्भ और आरम्भ ये
तीन; योग तीन; कृत, कारित और अनुमत ये तीन और कषाय चार। इनके गणनाकी पुनरावृत्ति
'सुच्' प्रत्यय-द्वारा प्रकट की गयी है। 'एकशः' यह वीप्सामें निर्देश है। तात्पर्य यह है कि तीन
आदि भेदोंको प्रत्येकके प्रति लगा लेना चाहिए। जैसे क्रोधकृतकायसंरम्भ, मानकृतकायसंरम्भ,
मायाकृतकायसंरम्भ, लोभकृतकायसंरम्भ, क्रोधकारितकायसंरम्भ, मानकारितकायसंरम्भ, माया-
कारितकायसंरम्भ, लोभकारितकायसंरम्भ, क्रोधानुमतकायसंरम्भ, मानानुमतकायसंरम्भ, मायानु-
मतकायसंरम्भ, लोभानुमतकायसंरम्भ । इस प्रकार कायसंरम्भ बारह प्रकारका है । इसी प्रकार
वचनयोग और मनोयोगकी अपेक्षा संरम्भ बारह-बारह प्रकारका है। ये सब मिला कर छत्तीस
भेद होते हैं। इसी प्रकार समारम्भ और आरम्भके भी छत्तीस-छत्तीस भेद होते हैं। ये सब मिल
कर जीवाधिकरणके १०८ भेद होते हैं। सूत्रमें 'च' शब्द अनन्तानुबन्धी अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान
और संज्वलनरूप कषायोंके अवान्तर भेदोंका समुच्चय करनेके लिए दिया है।
§ ६२५. अब अजीवाधिकरणके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पर अर्थात् अजीवाधिकरण क्रमसे दो, चार, दो और तीन भेदवाले निर्वर्तना, निक्षेप,
संयोग और निसर्गरूप है ॥९॥
§ ६२६. निर्वर्तनाका अर्थ निष्पादना अर्थात् रचना है। निक्षेपका अर्थ स्थापना अर्थात्
रखना है। संयोगका अर्थ मिश्रित करना अर्थात् मिलाना है और निसर्गका अर्थ प्रवर्तन है। ये
क्रमसे दो आदि शब्दोंके साथ सम्बन्धको प्राप्त होते हैं। यथा—निर्वर्तना दो प्रकारकी है। निक्षेप
चार प्रकारका है। संयोग दो प्रकारका है। निसर्ग तीन प्रकारका है। ये सब अजीवाधिकरणके
भेद हैं। शंका—सूत्रमें 'पर' वचन निरर्थक है; क्योंकि पिछले सूत्रमें 'आद्य' वचन दिया है जिससे
यह ज्ञात होता है कि यह शेषके लिए है। समाधान—अनर्थक नहीं हैं, क्योंकि यहाँ पर शब्दका
अन्य अर्थ है। जिससे यह ज्ञात होता है कि निर्वर्तना आदिक संरम्भ आदिकसे अन्य हैं। यदि
१. त्र्यादिभेदान् आ०, दि० १, दि० २ । २. ऐते पिण्डि-मु० । ३. -जीवस्याधि-मु० ।
– ६।१० § ६२८ ] षष्ठोऽध्यायः २४५
मात्मपरिणामसङ्गावाज्जीवाधिकरणविकल्पा एवेति विज्ञायेत। निर्वर्तनाधिकरणं द्विविधं
मूलगुणनिर्वर्तनाधिकरणमुत्तरगुणनिर्वर्तनाधिकरणं चेति। तत्र $^१$मूलगुणनिर्वर्तनं पञ्चविधम्,
शरीरवाङ्मनःप्राणापानाश्च। $^२$उत्तरगुणनिर्वर्तनं काष्ठपुस्तचित्रकर्मादि। निक्षेपश्चतुर्विधः अप्रत्यवे-
क्षितनिक्षेपाधिकरणं दुष्प्रमृष्टनिक्षेपाधिकरणं सहसानिक्षेपाधिकरणमनाभोगनिक्षेपाधिकरणं चेति ।
निसर्गस्त्रिविधः—कायनिसर्गाधिकरणं वाग्निसर्गाधिकरणं मनोनिसर्गाधिकरणं चेति । ५
§ ६२७. उक्तः सामान्येन कर्मास्रवभेदः । इदानीं कर्मविशेषास्रवभेदो वक्तव्यः । तस्मिन्
वक्तव्ये आद्ययोर्ज्ञानादर्शनवरणयोरास्रवभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः ॥ १० ॥
§ ६२८. तत्त्वज्ञानस्य मोक्षसाधनस्य कीर्तने कृते कस्यचिदनभिव्याहरतः अन्तःपैशुन्यपरि-
णामः प्रदोषः । कुतश्चित्कारणान्नास्ति न वेद्मीत्यादि ज्ञानस्य व्यपल्पनं निह्नवः । कुतश्चित्कारणाद् १०
भावितमपि विज्ञानं दानार्हमपि यतो न दीयते तन्मात्सर्यम् । ज्ञानव्यवच्छेदकरणमन्तरायः । कायेन
वाचा च परप्रकाशयज्ञानस्य वर्जनमासादनम् । प्रशस्तज्ञानदूषणमुपघातः । आसादनमेवेति चेत् ।
सतो ज्ञानस्य विनयप्रदानादिगुणकीर्तनाननुष्ठानमासादनम् । उपघातस्तु ज्ञानमज्ञानमेवेति ज्ञान-
नाशाभिप्रायः । इत्यनयोर्यं भेदः । 'तत्'शब्देन ज्ञानदर्शनयोः प्रतिनिधिर्शः क्रियते । कथं पुनर-
प्रकृतयोरनिर्दिष्टयोस्तच्छब्देन परामर्शः कर्तुं शक्यः । प्रश्नापेक्षया । ज्ञानदर्शनावरणयोः क आस्रव १५
पर शब्द न दिया जाय तो निर्वर्तना आदि आत्माके परिणाम हैं ऐसा हो जानेसे ये भी जीवाधि-
करणके भेद समझे जाँयगे । निर्वर्तनाधिकरण दो प्रकारका है—मूलगुण निर्वर्तनाधिकरण और
उत्तरगुण निर्वर्तनाधिकरण । उनमें से मूलगुण निर्वर्तनाधिकरण पांच प्रकारका है—शरीर, वचन,
मन, प्राण और अपान । तथा काष्ठकर्म, पुस्तकर्म और चित्रकर्म आदि उत्तरगुण निर्वर्तनाधिकरण
हैं। निक्षेप चार प्रकारका है—अप्रत्यवेक्षितनिक्षेपाधिकरण, दुष्प्रमृष्टनिक्षेपाधिकरण, सहसानिक्षेपा- २०
धिकरण और अनाभोगनिक्षेपाधिकरण । संयोग दो प्रकारका है—भक्तपानसंयोगाधिकरण और
उपकरणसंयोगाधिकरण । निसर्ग तीन प्रकारका है—कायनिसर्गाधिकरण, वचननिसर्गाधिकरण
और मननिसर्गाधिकरण ।
§ ६२७. सामान्यसे कर्मास्रवके भेद कहे। इस समय अलग-अलग कर्मोंके आस्रवके भेदोंका
कथन करना चाहिए। उसमें सर्वप्रथम प्रारम्भके ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रवके भेदोंका २५
कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ज्ञान और दर्शनके विषयमें प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य, अन्तराय, आसादन और उपघात ये
ज्ञानावरण और दर्शनावरणके आस्रव हैं ॥१०॥
§ ६२८. तत्त्वज्ञान मोक्षका साधन है उसका गुणगान करते समय उस समय नहीं बोलने-
वालेके जो भीतर पैशुन्यरूप परिणाम होता है वह प्रदोष है। किसी कारणसे 'ऐसा नहीं है, मैं ३०
नहीं जानता' ऐसा कहकर ज्ञानका अपलाप करना निह्नव है। विज्ञानका अभ्यास किया है वह देने
योग्य भी है तो भी जिस कारणसे वह नहीं दिया जाता है मात्सर्य है। ज्ञानका विच्छेद करना
अन्तराय है। दूसरा कोई ज्ञानका प्रकाश कर रहा हो तब शरीर या वचनसे उसका निषेध करना
आसादन है। प्रशंसनीय ज्ञानमें दूषण लगाना उपघात है। शंका-उपघातका जो लक्षण किया
है उससे वह आसादन ही ज्ञात होता है ? समाधान-प्रशस्त ज्ञानकी विनय न करना, उसकी ३५
अच्छाईकी प्रशंसा न करना आदि आसादन है। परन्तु ज्ञानको अज्ञान समझकर ज्ञानके नाशका
इरादा रखना उपघात है इस प्रकार इन दोनोंमें अन्तर है। सूत्रमें 'तत्' पद ज्ञान और दर्शनका
१. मूलं पञ्च-आ०, दि० १, दि० २ । २. उत्तरं काष्ठ-आ०, दि० १, दि० २ ।
२४६ सर्वार्थसिद्धौ [ ६।११ § ६२९-
इति प्रश्ने कृते तदपेक्षया तच्छब्दो ज्ञानदर्शने प्रतिनिर्दिशति । एतेन ज्ञानदर्शनवत्सु तत्साधनेषु च
प्रदोषादयो योज्याः; तन्निमित्तत्वात् । त एते ज्ञानदर्शनावरणयोरास्रवहेतवः । एककारणसाध्यस्य
कार्यस्यानेकस्य दर्शनात् तुल्येऽपि प्रदोषादौ ज्ञानदर्शनावरणास्रवसिद्धिः । अथवा विषयभेदादास्रव-
भेदः । ज्ञानविषयाः प्रदोषादयो ज्ञानावरणस्य । दर्शनविषयाः प्रदोषादयो दर्शनावरणस्येति ।
§ ६२९. यथानयोः कर्मप्रकृत्योरास्रवभेदस्तथा—
दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यत्मपरोभयस्थान्यसद्वेद्यस्य ॥ ११ ॥
§ ६३०. पीडालक्षणः परिणामो दुःखम् । अनुग्राहकसंबंधविच्छेदे वैक्लव्यविशेषः शोकः ।
परिवादादिनिमित्तादाविलान्तःकरणस्य तीव्रानुशयस्तापः । परितापजाताश्रुपातप्रचुरविप्रलापा-
दिभिर्व्यक्तक्रन्दनमाक्रन्दनम् । आयुरिन्द्रियबलप्राणवियोगकरणं वधः । संक्लेशपरिणामावलम्बनं¹
गुणस्मरणानुकीर्तनपूर्वकं स्वपरानुग्रहाभिलाषविषयमनुकम्पाप्रचुरं रोदनं परिवेदनम् । ननु च
शोकादीनां दुःखविशेषत्वाद् दुःखग्रहणमेवास्तु । सत्यमेवम्; तथापि कतिपयविशेषप्रतिपादनेन
दुःखजात्य²नुविधानं क्रियते । यथा गौरित्युक्ते अनिर्ज्ञाते विशेषे तत्प्रतिपादनार्थं खण्डमुण्डकृष्ण-
शुक्लाद्युपादानं क्रियते तथा दुःखविषयास्रवासंख्येयलोकभेदसंभवाद् दुःखमित्युक्ते विशेषाऽनिर्ज्ञा-
नात्कतिपयविशेषनिर्देशेन तद्विशेषप्रतिपत्तिः क्रियते । तान्येतानि दुःखादीनि ³क्रोधाद्यावेशादात्म-
निर्देश करनेके लिए दिया है । शंका—ज्ञान और दर्शन अप्रकृत हैं, तथा उनका निर्देश भी नहीं
किया है, फिर यहां 'तत्' शब्दके द्वारा उनका ज्ञान कैसे हो सकता है ? समाधान—प्रश्नकी
अपेक्षा अर्थात् ज्ञानावरण और दर्शनावरणका क्या आस्रव है ऐसा प्रश्न करनेपर उसकी अपेक्षा
'तत्' शब्द ज्ञान और दर्शनका निर्देश करता है । इससे यह अभिप्राय निकला कि ज्ञान और दर्शन-
वालोंके विषयमें तथा उनके साधनोंके विषयमें प्रदोषादिककी योजना करनी चाहिए, क्योंकि ये
उनके निमित्तसे होते हैं । ये प्रदोषादिक ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मके आस्रवके कारण हैं ।
एक कारणसे भी अनेक कार्य होते हुए देखे जाते हैं, इसलिए प्रदोषादिकके एक समान रहते हुए
भी इनसे ज्ञानावरण और दर्शनावरण दोनोंका आस्रव सिद्ध होता है । अथवा विषयके भेदसे
आस्रवमें भेद होता है । ज्ञानसम्बन्धी प्रदोषादिक ज्ञानावरणके आस्रव हैं और दर्शनसम्बन्धी प्रदो-
षादिक दर्शनावरणके आस्रव है ।
§ ६२९. जिस प्रकार इन दोनों कर्मोंका आस्रव अनेक प्रकारका है उसी प्रकार—
अपनेमें, दूसरेमें या दोनोंमें विद्यमान दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन
ये असाता वेदनीय कर्मके आस्रव हैं ॥११॥
§ ६३०. पीड़ारूप आत्माका परिणाम दुःख है । उपकार करनेवालेसे सम्बन्धके टूट जानेपर
जो विकलता होती है वह शोक है । अपवाद आदिके निमित्तसे मनके खिन्न होनेपर जो तीव्र
अनुशय-संताप होता है वह ताप है । परितापके कारण जो आंसू गिरनेके साथ विलाप आदि होता
है, उससे खुलकर रोना आक्रन्दन है । आयु, इन्द्रिय, बल और श्वासोच्छ्वासका जुदा कर देना
वध है । संक्लेशरूप परिणामोंके होनेपर गुणोंका स्मरण और प्रशंसा करते हुए अपने और दूसरेके
उपकारकी अभिलाषासे करुणाजनक रोना परिवेदन है । शंका—शोकादिक दुःखके भेद हैं इसलिए
दुःखका ग्रहण करना पर्याप्त है ? समाधान—यह कहना सही है तो भी यहां कुछ भेदोंका कथन
करके दुःखकी जातियां दिखलायी हैं। जैसे गौ ऐसा कहनेपर अवान्तर भेदोंका ज्ञान नहीं होता,
इसलिए खांडी, मुंड़ी, काली, सफेद आदि विशेषण दिये जाते हैं उसी प्रकार दुःखविषयक आस्रव
असंख्यात लोकप्रमाण संभव हैं। परन्तु दुःख इतना कहनेपर उन सब भेदोंका ज्ञान नहीं होता
१. –लम्बनं स्वपरा-आ०, दि० १, दि० २ । २. –जात्यन्तरविधा-मु० । ३. क्रोधावेशा-मु० ।
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स्थानि भवन्ति परस्थान्युभयस्थानि च । एतानि सर्वाण्यसद्वेद्यास्रवकारणानि वेदितव्यानि । अत्र
चोद्यते—यदि दुःखादीन्यात्मपरोभयस्थान्यसद्वेद्यास्रवनिमित्तानि, किमर्थमार्हतैः केशलोञ्चनान-
शनातपस्थानादीनि दुःखनिमित्तान्यास्थीयन्ते परेषु च प्रतिपाद्यन्ते इति । नैष दोषः—अन्तरङ्ग-
क्रोधाद्यावेशपूर्वकाणि दुःखादीन्यसद्वेद्यास्रवनिमित्तानीति विशेष्योक्तत्वात् । यथा कस्यचिद् भिषजः
परमकरुणाशयस्य निःशल्यस्य संयतस्योपरि गण्डं पाटयतो दुःखहेतुत्वे सत्यपि न पापबन्धो ५
बाह्यनिमित्तमात्रादेव भवति । एवं संसारविषयमहादुःखादुद्विग्नस्य भिक्षोस्तन्निवृत्त्युपायं प्रति
समाहितमनस्कस्य शास्त्रविहिते कर्मणि प्रवर्तमानस्य संक्लेशपरिणामाभावाद् दुःखनिमित्तत्वे
सत्यपि न पापबन्धः । उक्तं च—
“न दुःखं न सुखं यद्वद्धेतुर्दृष्टश्चिकित्सिते ।
चिकित्सायां तु युक्तस्य स्याद् दुःखमथवा सुखम् ॥ १०
न दुःखं न सुखं तद्वद्धेतुर्मोक्षस्य साधने ।
मोक्षोपाये तु युक्तस्य स्याद् दुःखमथवा सुखम् ॥”
§ ६३१. उक्ता असद्वेद्यास्रवहेतवः । सद्वेद्यस्य पुनः के इत्यत्रोच्यते—
भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः क्षान्तिः शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥ १२ ॥
§ ६३२. तासु तासु गतिषु कर्मोदयवशाद्भवन्तीति भूतानि प्राणिन इत्यर्थः । व्रतान्यहिंसादीनि १५
वक्ष्यन्ते, तद्वन्तो व्रतिनः । ते द्विविधाः । अगारं प्रति निवृत्तौत्सुक्याः संयताः गृहिणश्च संयतासंयताः ।
अतएव कुछ भेदोंका उल्लेख करके उनको पृथक्-पृथक् जान लिया जाता है। क्रोधादिकके आवेश-
वश ये दुःखादिक कभी अपनेमें होते हैं, कभी दूसरोंमें होते हैं और कभी दोनोंमें होते हैं । ये सब
असाता वेदनीयके आस्रवके कारण जानने चाहिए। शंका—यदि अपनेमें, परमें या दोनोंमें स्थित
दुःखादिक असातावेदनीयके आस्रवके कारण हैं तो अरिहंतके मतको माननेवाले मनुष्य दुःखको २०
पैदा करनेवाले केशलोंच, अनशन और आतपस्थान ( आतापनयोग ) आदिमें क्यों विश्वास करते
हैं और दूसरोंको इनका उपदेश क्यों देते हैं ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि अन्तरंगमें
क्रोधादिकके आवेशसे जो दुःखादिक पैदा होते हैं वे असातावेदनीयके आस्रवके कारण हैं इतना
यहाँ विशेष कहा है। जैसे अत्यन्त दयालु किसो वैद्यके फोड़ेकी चीर-फाड़ और मरहमपट्टी करते
समय निःशल्य संयतको दुःख देनेमें निमित्त होनेपर भी केवल बाह्य निमित्त मात्रसे पापबन्ध नहीं २५
होता उसी प्रकार जो भिक्षु संसार-सम्बन्धी दुःखसे उद्विग्न है और जिसका मन उसके दूर करनेके
उपायोंमें लगा हुआ है उसके शास्त्रविहित कर्ममें प्रवृत्ति करते समय संक्लेशरूप परिणामोंके नहीं
होनेसे पापबन्ध नहीं होता । कहा भी है— “जिस प्रकार चिकित्साके साधन न स्वयं दुःखरूप हैं
और न सुखरूप हैं किन्तु जो चिकित्सामें लग रहा है उसे दुःख भी होता है और सुख भी । उसी
प्रकार मोक्ष-साधनके जो हेतु हैं वे स्वयं न दुःखरूप हैं और न सुखरूप किन्तु जो मोक्षमार्गपर ३०
आरूढ़ है उसे दुःख भी होता है और सुख भी ।”
§ ६३१. असातावेदनीयके आस्रवके कारण कहे परन्तु सातावेदनीयके आस्रवके कारण
कौन हैं ? इसी बातको बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
भूत-अनुकम्पा, व्रती-अनुकम्पा, दान और सरागसंयम आदि का योग तथा क्षान्ति और
शौच ये सातावेदनीय कर्मके आस्रव हैं ॥१२॥ ३५
§ ६३२. जो कर्मोदयके कारण विविध गतियोंमें होते हैं वे भूत कहलाते हैं। भूत यह
प्राणीका पर्यायवाची शब्द है । अहिंसादिक व्रतोंका वर्णन आगे करेंगे । जो उनसे युक्त हैं वे व्रती
कहलाते हैं। वे दो प्रकारके हैं—पहले वे जो घरसे निवृत्त होकर संयत हो गये हैं और दूसरे
...
Line 4: संयमः सरागसंयमः । 'आदि'-शब्देन...
Line 5: ५ सम्यक्प्रणिधानमित्यर्थः । भूतव्रत्यनुकम्पादान... -> exactly line 5!
Line 6: संयमादियोगः । क्रोधादिनिवृत्तिः...
Line 7: प्रकारार्थः । के पुनस्ते प्रकाराः । अर्हत्पूजाकरणैतत्परता...
Line 8: ग्रहणात् सिद्धे 'व्रति'ग्रहणं...
Line 9: § ६३३. अथ तदनन्तरोद्देशभाजो...
Line 10: १० प्रतिपादनार्थमिदमुच्यते— -> exactly line 10!
Line 11: केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥ १३ ॥
Line 12: § ६३४. निरावरणज्ञानाः केवलिनः । तदुपदिष्टं...
Line 13: रचनं श्रुतं भवति । रत्नत्रयोपेतः श्रमणगणः...
Line 14: देवाश्चतुर्निकाया उक्ताः । गुणवत्सु महत्सु...
Line 15: १५ गृहस्थ संयतासंयत । अनुग्रहसे दयार्द्र... -> exactly line 15!
Line 16: होता है उसे अनुकम्पा कहते हैं। सब प्राणियोंपर...
Line 17: अनुकम्पा रखना वृत्यनुकम्पा है। दूसरे
– ६।१४ § ६३६ ] षष्ठोऽध्यायः २४९
दर्शनमोहस्यास्रवहेतुः । कवलाभ्यवहारजीविनः केवलिन इत्येवमादि वचनं केवलिनामसवर्णवादः ।
मांसभक्षणाद्येनवद्याभिधानं श्रुतावर्णवादः । शूद्रत्वाशुचित्वाद्याविर्भावनं संघावर्णवादः । जिनोप-
दिष्टो धर्मो निर्गुणस्तदुपसेविनो ये ते चासुरा भविष्यन्तीत्येवमाद्यंभिधानं धर्मावर्णवादः ।
सुरामांसोपसेवाद्याघोषणं देवावर्णवादः ।
§ ६३५. द्वितीयस्य मोहस्यास्रवभेदप्रतिपादनार्थमाह—
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥ १४ ॥
§ ६३६. कषाया उक्ताः । उदयो विपाकः । कषायाणामुदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्या-
स्रवो वेदितव्यः । तत्र स्वपरकषायोत्पादनं तपस्विजनवृत्तदूषणं संक्लिष्टलिङ्गव्रतधारणादिः
कषायवेदनीयस्यास्रवः । सद्धर्मोपहसनदीनातिहासकॅन्दर्पोपहासबहुविप्रलापोपहासशीलतादिर्हास्य-
वेदनीयस्य । विचित्रक्रीडनपरताव्रतशीलारुच्यादिः रतिवेदनीयस्य । परारतिप्रादुर्भावनरतिविनाश- १०
नपापशीलसंसर्गादिः अरतिवेदनीयस्य । स्वशोकोत्पादनं परशोकप्लुताभिनन्दनादिः शोकवेदनीयस्य ।
स्वभयपरिणामपरभयोत्पादनादिर्भयवेदनीयस्य । कुशलक्रियाचारजुगुप्सापरिवादशीलत्वादिर्र्जुगुप्सा-
वेदनीयस्य । अलीकाभिधायितातिसंधानपरत्वपेररन्ध्रप्रेक्षित्त्वप्रवृद्धरागादिः स्त्रीवेदनीयस्य ।
दर्शनमोहनीयके आस्रवका कारण है । यथा केवली कवलाहारसे जीते हैं इत्यादि रूपसे कथन
करना केवलियोंका अवर्णवाद है । शास्त्रमें मांसभक्षण आदिको निर्दोष कहा है इत्यादि रूपसे कथन १५
करना श्रुतका अवर्णवाद है। ये शूद्र हैं, अशुचि हैं, इत्यादि रूपसे अपवाद करना संघका अवर्णवाद
है । जिनदेवके द्वारा उपदिष्ट धर्ममें कोई सार नहीं, जो इसका सेवन करते हैं वे असुर होंगे इस
प्रकार कथन करना धर्मका अवर्णवाद है । देव सुरा और मांस आदिका सेवन करते हैं इस
प्रकारका कथन करना देवोंका अवर्णवाद है ।
§ ६३५. अब मोहनीयका दूसरा भेद जो चारित्र मोहनीय है उसके आस्रवके भेदोंका कथन २०
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
कषायके उदयसे होनेवाला तीव्र आत्मपरिणाम चारित्रमोहनीयका आस्रव है ॥१४॥
§ ६३६. कषायोंका व्याख्यान पहले कर आये हैं । विपाकको उदय कहते हैं । कषायोंके
उदयसे जो आत्माका तीव्र परिणाम होता है वह चारित्रमोहनीयका आस्रव जानना चाहिए । स्वयं
कषाय करना, दूसरोंमें कषाय उत्पन्न करना, तपस्वीजनोंके चारित्रमें दूषण लगाना, संक्लेशको २५
पैदा करनेवाले लिंग ( वेष ) और व्रतको धारण करना आदि कषायवेदनीयके आस्रव हैं । सत्य
धर्मका उपहास करना, दीन मनुष्यकी दिल्लगी उड़ाना, कुत्सित रागको बढ़ानेवाला हँसी मजाक
करना, बहुत बकने और हँसनेकी आदत रखना आदि हास्यवेदनीयके आस्रव हैं। नाना प्रकारकी
क्रीड़ाओंमें लगे रहना, व्रत और शीलके पालन करनेमें रुचि न रखना आदि रतिवेदनीयके आस्रव
हैं । दूसरोंमें अरति उत्पन्न हो और रतिक्रा विनाश हो ऐसी प्रवृत्ति करना और पापी लोगोंकी ३०
संगति करना आदि अरतिवेदनीयके आस्रव हैं। स्वयं शोकातुर होना, दूसरोंके शोकको बढ़ाना
तथा ऐसे मनुष्योंका अभिनन्दन करना आदि शोकवेदनीयके आस्रव हैं। भयरूप अपना परिणाम
और दूसरेको भय पैदा करना आदि भयवेदनीयके आस्रवके कारण हैं। सुखकर क्रिया और सुख-
कर आचारसे घृणा करना और अपवाद करने में रुचि रखना आदि जुगुप्सावेदनीयके आस्रव हैं।
असत्य बोलनेकी आदत, अतिसन्धानपरता, दूसरेके छिद्र ढूँढ़ना और बढ़ा हुआ राग आदि ३५
१. –णाद्यभिधानं मु०, ना० । २. –त्येवमभि–मु० । ३. –नातिहासबहु-मु० । ४. –त्पादनं परशोका-
विष्करणं शोक-ता० । ५. –रत्वं पररन्ध्रापे-मु० ।–रत्वं रन्ध्रापे-आ० ।
३२
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२५० सर्वार्थसिद्धौ [ ६।१५ § ६३७ -
स्तोकक्रोधानुत्सुकत्वस्वदारसंतोषादिः पुंवेदनोयस्य । प्रचुरकषायगुह्येन्द्रियव्यपरोपणपराङ्गनावस्क¹-
न्दादिर्नपुंसकवेदनीयस्य ।
§ ६३७. निर्दिष्टो मोहनीयस्यास्रवभेदः । इदानीं तदनन्तरनिर्दिष्टस्यायुष² आस्रवहेतौ वक्तव्ये
आद्यस्य नियतकालपरिपाकस्यायुषः कारणप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते—
बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः ॥ १५ ॥
§ ६३८. आरम्भः प्राणिपीडाहेतुर्व्यापारः । ममेदंबुद्धिलक्षणः परिग्रहः । आरम्भाश्च परि-
ग्रहाश्च आरम्भपरिग्रहाः । बहव आरम्भपरिग्रहा यस्य स बह्वारम्भपरिग्रहः । तस्य भावो
बह्वारम्भपरिग्रहत्वम् । हिंसादिक्रूरकर्माजस्रप्रवर्तनपरस्वहरणविषयातिगृद्धिकृष्णलेश्याभिजातरौद्र-
ध्यानमरणकालतादिलक्षणो नारकस्यायुष आस्रवो भवति
- ६४१ ९ § ६४६ ] षष्ठोऽध्यायः २५१
§ ६४१. आह, व्याख्यातस्तैर्यग्योनस्यायुष आस्रवः । इदानीं मानुषस्यायुषः को हेतुरित्य-
त्रोच्यते—
अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥ १७ ॥
§ ६४२. नारकआयुरास्रवो व्याख्यातः । तद्विपरीतो मानुषस्यायुष इति संक्षेपः । तद्व्यासः—
विनीतस्वभावः प्रकृतिभद्रता प्रगुणव्यवहारता तनुकषायत्वं मरणकालसंक्लेशाभावादिः । ५
§ ६४३. किमेतावानेव मानुषस्यायुष आस्रव इत्यत्रोच्यते—
स्वभावमार्दवं च ॥ १८ ॥
§ ६४४. मृदोर्भावो मार्दवम् । स्वभावेन मार्दवं स्वभावमार्दवम् । उपदेशानपेक्षमित्यर्थः ।
एतदपि मानुषस्यायुष आस्रवः । पृथग्योगकरणं किमर्थम् । उत्तरार्थम्, देवायुष आस्रवोऽयमपि¹
यथा स्यात् । १०
§ ६४५. किमेतदेव द्वितीयं² मानुषस्यास्रवः । न; इत्युच्यते—
निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषाम् ॥ १६ ॥
§ ६४६. ‘च’शब्दोऽधिकृतसमुच्चयार्थः । अल्पारम्भपरिग्रहत्वं च निःशीलव्रतत्वं च ।
शीलानि च व्रतानि च शीलव्रतानि³ तानि वक्ष्यन्ते । निष्क्रान्तः शीलव्रतेभ्यो निःशीलव्रतः । तस्य
§ ६४१. तिर्यंचायुके आस्रव कहे । अब मनुष्यायुका क्या आस्रव है यह बतलानेके लिए १५
आगेका सूत्र कहते हैं—
अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रहवालेका भाव मनुष्यायुका आस्रव हैं ॥१७॥
§ ६४२. नरकायुका आस्रव पहले कह आये हैं । उससे विपरीत भाव मनुष्यायुका आस्रव
है । संक्षेपमें यह इस सूत्रका अभिप्राय है । उसका विस्तारसे खुलासा—स्वभावका विनम्र होना,
भद्र प्रकृतिका होना, सरल व्यवहार करना, अल्प कषायका होना तथा मरणके समय संक्लेशरूप २०
परिणतिका नहीं होना आदि मनुष्यायुके आस्रव हैं ।
§ ६४३. क्या मनुष्यायुका आस्रव इतना ही है या और भी है । इसी बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
स्वभावकी मृदुता भी मनुष्यायुका आस्रव है ॥१८॥
§ ६४४. मृदुका भाव मार्दव है। स्वभावसे मार्दव स्वभाव मार्दव है। आशय यह है कि बिना २५
किसीके समझाये-बुझाये मृदुता अपने जीवनमें उतरी हुई हो इसमें किसीके उपदेशकी आवश्यकता
न पड़े । यह भी मनुष्यायुका आस्रव है । शंका—इस सूत्रको अलगसे क्यों बनाया ? समाधान—
स्वभावकी मृदुता देवायुका भी आस्रव है इस बातके बतलानेके लिए इस सूत्रको अलगसे
बनाया है ।
§ ६४५. क्या ये दो ही मनुष्यायुके आस्रव हैं ? नहीं, किन्तु और भी हैं । इसी बातको बत- ३०
लानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
शीलरहित और व्रतरहित होना सब आयुओंका आस्रव है ॥१९॥
§ ६४६. सूत्रमें जो 'च' शब्द है वह अधिकार प्राप्त आस्रवोंके समुच्चय करनेके लिए है ।
जिससे यह अर्थ निकलता है कि अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रहरूप भाव तथा शील और व्रत-
रहित होना सब आयुओंके आस्रव हैं । शील और व्रतोंका स्वरूप आगे कहनेवाले हैं। इनसे रहित ३५
१. आस्रवोऽपि मु० । २. द्वितीयं मु० । ३. व्रतानि वक्ष्य-मु० ।
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