सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
- २५३ § ३६५ ] द्वितीयोऽध्यायः १४५
§ ३६४. य इमे जन्मयोनिशरीरलिङ्गसंबन्धाहितविशेषाः प्राणिनो निर्दिश्यन्ते देवादयो
विचित्रधर्माधर्मवशोपकृताश्चतसृषु गतिषु शरीराणि धारयन्तस्ते किं यथाकालमुपभुक्तायुषो मृत्यन्तर-
राण्यास्कन्दन्ति उतायथाकालमपीत्यत आह—
औपपादिकचरमोत्तमदेहा संख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥५३॥
§ ३६५. औपपादिका व्याख्याता देवनारका इति । चरमशब्दोऽन्त्यवाची । उत्तम उत्कृष्टः ।
चरम उत्तमो देहो येषां ते चरमोत्तमदेहाः । १परीतसंसारास्तज्जन्मनिर्वाणार्हा २इत्यर्थः । असंख्येय-
मतीतसंख्यानमुपमाप्रमाणेण पल्यादिना गम्यमायुर्येषां त इमे असंख्येयवर्षायुषस्तिर्यङ्मनुष्या
उत्तरकुर्वादिषु प्रसूताः । औपपादिकाश्च चरमोत्तमदेहाश्च असंख्येयवर्षायुषश्च औपपादिकचरमो-
त्तमदेहा संख्येयवर्षायुषः । बाह्यस्योपघातनिमित्तस्य विषशस्त्रादेः सति संनिधाने ह्रस्वं भवतीत्य-
पवत्र्यंम् । अपवर्त्यमायुर्येषां त इमे अपवर्त्यायुषः । न अपवर्त्यायुषः अनपवर्त्यायुषः । न ह्येषामौप-
क्रियाका अभाव होनेसे स्त्री आदि संज्ञा नहीं बन सकती.है। ये तीनों वेद शेष जीवोंके अर्थात्
गर्भजोंके होते हैं।
विशेषार्थ—इसी अध्यायमें औदयिक भावोंका निर्देश करते समय उनमें तीन लिंग भी
गिनाये हैं। ये तीनों लिंग वेदके पर्यायवाची हैं जो वेदनाकषायके उदयसे होते हैं। यहाँ किन
जीवोंके कौन लिंग होता है इसका विचार हो रहा है। इसी प्रसंगसे आचार्य पूज्यपादने लिंगके दो
भेद बतलाये हैं—द्रव्यलिंग और भावलिंग। प्रश्न यह है कि लिंगके ये दो भेद सूत्रोंसे फलित होते
हैं या विशेष जानकारीके लिए मात्र टीकाकारने इनका निर्देश किया है। उत्तर स्पष्ट है कि मूल
सूत्रोंमें मात्र वेद नोकषायके उदयसे होनेवाले वेदोंका ही निर्देश किया है जैसा कि इसी अध्यायके
६वें सूत्रसे ज्ञात होता है।
§ ३६४. जो ये देवादिक प्राणी जन्म, योनि, शरीर और लिंगके सम्बन्धसे अनेक प्रकारके
बतलाये हैं वे विचित्र पुण्य और पापके वशीभूत होकर चारों गतियोंमें शरीरको धारण करते हुए
यथाकाल आयुको भोगकर अन्य शरीरको धारण करते हैं या आयुको पूरा न करके भी अन्य
शरीरको धारण करते हैं? अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उपपादजन्मवाले, चरमोत्तमदेहवाले और असंख्यात वर्षकी आयुवाले जीव अनपवर्त्य
आयुवाले होते हैं ॥ ५३ ॥
§ ३६५. उपपादजन्मवाले देव और नारकी हैं यह व्याख्यान कर आये । चरम शब्द अन्त्य-
वाची है। उत्तम शब्दका अर्थ उत्कृष्ट है। जिनका शरीर चरम और उत्तम है वे चरमोत्तम
देहवाले कहे जाते हैं। जिनका संसार निकट है अर्थात् उसी भवसे मोक्षको प्राप्त होनेवाले जीव
चरमोत्तम देहवाले कहलाते हैं। असंख्येय परिमाण विशेष है जो संख्यातसे परे है। तात्पर्य यह है
कि पल्य आदि उपमा प्रमाणके द्वारा जिनकी आयु जानी जाती है वे उत्तरकुरु आदिमें उत्पन्न हुए
तिर्यंच और मनुष्य असंख्यात वर्षकी आयुवाले कहलाते हैं। उपघातके निमित्त विष शस्त्रादिक
बाह्य निमित्तोंके मिलनेपर जो आयु घट जाती है वह अपवर्त्य आयु कहलाती है। इस प्रकार
जिनकी आयु घट जातो है वे अपवर्त्य आयुवाले कहलाते हैं और जिनकी आयु नहीं घटती वे
अनपवर्त्य आयुवाले कहलाते हैं। इन औपपादिक आदि जीवोंकी आयु बाह्य निमित्तसे नहीं घटती
यह नियम है तथा इनसे अतिरिक्त शेष जीवोंका ऐसा कोई नियम नहीं है। सूत्रमें जो उत्तम
विशेषण दिया है वह चरम शरोरके उत्कृष्टपनको दिखलानेके लिए दिया है। यहाँ इसका और कोई
विशेष अर्थ नहीं है। अथवा 'चरमोत्तमदेहा' पाठके स्थानमें 'चरमदेह' यह पाठ भी मिलता है।
१. -देहाः । विपरीत-मु० । २. इत्यर्थः । अतीतसंख्यान-ता० ना० ।
१९
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
पादिकादीनां बाह्यनिमित्तवशादायुरपवर्त्यते, इत्ययं नियमः । इतरेषामनियमः । चरमस्य देहस्यो-
त्कृष्टत्वप्रदर्शनार्थमुत्तमग्रहणं नार्थान्तरविशेषोऽस्ति । चरमदेहा इति वा पाठः¹ ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञाकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
विशेषार्थ—भुज्यमान आयुका उत्कर्षण नहीं होता केवल उदीरणा होकर आयु घट सकती
है, इसलिए प्रश्न होता है कि क्या सब संसारी जीवोंकी आयुका ह्रास होता है या इसका भी कोई
अपवाद है। इसी प्रश्नके उत्तर स्वरूप प्रकृत सूत्रकी रचना हुई है। इसमें बतलाया है कि उपपाद-
जन्मवाले देव ओर नारकी, तद्भवमोक्षगामी मनुष्य और असंख्यात वर्षकी आयुवाले तिर्यंच और
मनुष्य इनकी आयुका ह्रास नहीं होता। इन्हें जो आयु प्राप्त होती है उसका पूरा भोग होकर ही
उस पर्यायका अन्त होता है। यह विशेष नियम करनेका कारण यह है कि कर्मशास्त्रके अनुसार
कोई भी अधिक स्थितिवाला कर्म कारणविशेषके मिलनेपर अल्पकालमें भोगा जा सकता है।
भुज्यमान आयुपर भी यह नियम लागू होता है, इसलिए इस सूत्र-द्वारा यह व्यवस्था दी
अथ तृतीयोऽध्यायः
§ ३६६. 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इत्यादिषु नारकाः श्रुतास्ततः पृच्छति के ते
नारका इति । तत्प्रतिपादनार्थं तदधिकरणनिर्देशः क्रियते—
रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतममोमहातमःप्रभा भूमयो
घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोधः ॥१॥ ५
§ ३६७. रत्नं च शर्करा च वालुका च पङ्कश्च धूमश्च तमश्च महातमश्च रत्नशर्करावालु-
कापङ्कधूमतममोमहातमांसि । 'प्रभा' शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । साहचर्यात्ताच्छब्द्यम् । चित्रादि-
रत्नप्रभासहचरिता भूमिः रत्नप्रभा, शर्कराप्रभासहचरिता भूमिः शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभासह-
चरिता भूमिर्वालुकाप्रभा, पङ्कप्रभासहचरिता भूमिः पङ्कप्रभा, धूमप्रभासहचरिता भूमिर्धूमप्रभा,
तमःप्रभासहचरिता भूमिस्तमःप्रभा, महातमःप्रभासहचरिता भूमिर्महातमःप्रभा इति । एताः संज्ञा १०
अनेनोपायेन व्युत्पाद्यन्ते । 'भूमि'ग्रहणमधिकरणविशेषप्रतिपत्त्यर्थम् । यथा स्वर्गपटलानि भूमिमना-
श्रित्य व्यवस्थितानि न तथा नारकावासाः । किं र्तहि। भूमिमाश्रिता इति¹ । आसां भूमीनामा-
लम्बननिर्ज्ञानार्थं घनाम्बुवातादिग्रहणं क्रियते । घनाम्बु च वातश्च आकाशं च घनाम्बुवाता-
काशानि । तानि प्रतिष्ठा आश्रयो यासां ता घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः² । सर्वा एता भूमयो घनो-
§ ३६६. 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इत्यादिक सूत्रोंमें नारक शब्द सुना है इसलिए १५
पूछते हैं कि वे नारकी कौन हैं ? अतः नारकियोंका कथन करनेके लिए उनकी आधारभूत पृथि-
वियोंका निर्देश करते हैं—
रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा और महातमःप्रभा ये
सात भूमियाँ घनाम्बु, वात और आकाशके सहारे स्थित हैं तथा क्रमसे नीचे-नीचे हैं ॥१॥
§ ३६७. 'रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतममोमहातमाः' इसमें सब पदोंका परस्पर द्वन्द्व समास २०
है । प्रभा शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । पृथिवियोंकी प्रभा क्रमसे रत्न आदिके
समान होनेसे इनके रत्नप्रभा आदि नाम पड़े हैं । यथा—जिसकी प्रभा चित्र आदि रत्नोंकी प्रभाके
समान है वह रत्नप्रभा भूमि है। जिसकी प्रभा शर्कराके समान है वह शर्कराप्रभा भूमि है । जिसकी
प्रभा बालुकाकी प्रभाके समान है वह वालुकाप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा कीचड़के समान है वह
पंकप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा धुँवाके समान है वह धूमप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा अन्धकारके २५
समान है वह तमःप्रभा भूमि है और जिसकी प्रभा गाढ अन्धकारके समान है वह महातमःप्रभा
भूमि है । इस प्रकार इन नामोंकी व्युत्पत्ति कर लेनी चाहिए । सूत्रमें भूमि पदका ग्रहण अधिकरण
विशेषका ज्ञान करानेके लिए किया है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्वर्गपटल भूमिके बिना
स्थित है उस प्रकार नारकियोंके निवासस्थान नहीं हैं । किन्तु वे भूमिके आश्रयसे अवस्थित हैं ।
इन भूमियोंके आलम्बनका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें 'घनाम्बुवात' आदि पदका ग्रहण किया है । ३०
अभिप्राय यह है कि ये भूमियाँ क्रमसे घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुवातवलय और आकाश-
के आश्रयसे स्थित हैं इस बातके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः' पद दिया है ।
१. -इति । तासां भूमी-मु०, ता०, ना० । २. प्रतिष्ठाः । घनं च घनो मन्दो महान् आयत, इत्यर्थः । अम्बु
च जलम् उदकमित्यर्थः । वात-शब्दोऽन्त्यदीपकः । तत एवं संबन्धनीयः । घनो घनवातः । अम्बु अम्बुवातः ।
वातस्तनुवातः । इति महदपेक्षया तनुरिति सामर्थ्यगम्यः । अन्यः पाठः । सिद्धान्तपाठस्तु घनाम्बु च वातश्चेति । ३५
वातशब्दः सोपस्क्रियते । वातस्तनुवात इति वा । सर्वा एता मु०, ता०, ना० ।
दधिवलयप्रतिष्ठाः । घनोदधिवलयं घनवातवलयप्रतिष्ठम् । घनवातवलयं तनुवातवलयप्रतिष्ठम् ।
तनुवातवलयमाकाशप्रतिष्ठम् । आकाशमात्मप्रतिष्ठं, तस्यैवाधाराधेयत्वात् । त्रीण्यप्येतानि वलयानि
प्रत्येकं विंशतियोजनसहस्रबाहुल्यानि । 'सप्त'ग्रहणं संख्यान्तरनिवृत्त्यर्थम् । सप्त भूमयो नाष्टौ न नव
चेति 'अधोऽधः'वचनं तिर्यक्प्रचयनिवृत्त्यर्थम् ।
§ ३६८. किं ता भूमयो नारकाणां सर्वत्रावासा आहोस्वित्क्वचित्क्वचिदिति तन्निर्धार-
णार्थमाह—
तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि
पञ्च चैव यथाक्रमम् ॥२॥
य सब भूमियाँ घनोदधिवातवलयके आश्रयसे स्थित हैं । घनोदधिवातवलय घनवातवलयके आधार-
से स्थित है। घनवातवलय तनुवातवलयके आश्रयसे स्थित है। तनुवातवलय आकाशके आश्रयसे
स्थित है और आकाश स्वयं अपने आधारसे स्थित है; क्योंकि वह आधार और आधेय दोनों है ।
ये तीनों वातवलय प्रत्येक बीस-बीस हजार योजन मोटे हैं । सूत्रमें 'सप्त' पदका ग्रहण दूसरी
संख्याके निराकरण करनेके लिए किया है। भूमियाँ सात ही हैं, न आठ हैं और न नौ । ये भूमियाँ
तिर्यक् रूपसे अवस्थित नहीं हैं। इस बातको दिखानेके लिए सूत्रमें 'अधोऽधः' यह वचन दिया है।
विशेषार्थ—आकाशके दो भेद हैं—अलोकाकाश और लोकाकाश । लोकाकाश अलोका-
काशके बीचोबीच अवस्थित है । यह अकृत्रिम, अनादिनिधन स्वभावसे निर्मित और छह द्रव्योंसे
व्यास है। यह उत्तर-दक्षिण अधोभागसे लेकर ऊर्ध्वभाग तक विस्तारकी अपेक्षा सर्वत्र सात राजु
है। पूर्व पश्चिम नीचे सात राजु चौड़ा है। फिर दोनों ओरसे घटते-घटते सात राजुकी ऊँचाईपर
एक राजु चौड़ा है। फिर दोनों ओर बढ़ते-बढ़ते साढ़े दस राजुकी ऊँचाईपर पाँच राजु चौड़ा है।
फिर दोनों ओर घटते-घटते चौदह राजुकी ऊँचाईपर एक राजु चौड़ा है। पूर्व पश्चिमकी ओरसे
लोकका आकार कटिपर दोनों हाथ रखकर और पैरोंको फैलाकर खड़े हुए मनुष्यके आकारका
प्रतीत होता है । इससे अधोभाग वेतके आसनके समान, मध्यभाग झालरके समान और ऊर्ध्वभाग
मृदंगके समान दिखाई देता है। इसके तीन भाग हैं—अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक ।
मध्यलोकके बीचोबीच मेरु पर्वत है जो एक लाख चालीस योजन ऊँचा है । उसके नीचेका भाग
अधोलोक, ऊपरका भाग ऊर्ध्वलोक और बराबर रेखामें तिरछा फैला हुआ मध्यलोक है। मध्य-
लोकका तिरछा विस्तार अधिक होनेसे इसे तिर्यग्लोक भी कहते हैं। प्रकृत सूत्रमें अधोलोकका
विचार किया गया है। इसमें सात भूमियाँ हैं जो उत्तरोत्तर नीचे-नीचे हैं पर आपसमें
भिड़कर नहीं हैं। किन्तु एक दूसरी भूमिके बीचमें असंख्य योजनोंका अन्तर है। इन भूमियोंके
नाम सूत्रमें क्रमसे दिये ही हैं। ये इनके गुणनाम हैं । घम्मा, वंशा, मेघा, अंजना, अरिष्टा,
मघवा और माधवी ये इनके रौढिक नाम हैं। पहली पृथिवी एक लाख अस्सी हजार योजन
मोटी है। दूसरी बत्तीस हजार योजन मोटी है, तीसरी अट्ठाईस हजार योजन मोटी है, चौथी
चौबीस हजार योजन मोटी है, पाँचवीं बीस हजार योजन मोटो है, छठी सोलह हजार
योजन मोटी है, और सातवीं आठ हजार योजन मोटी है । ये सातों भूमियाँ घनोदधि, घनवात,
तनुवात और आकाशके आधारसे स्थित हैं। अर्थात् प्रत्येक पृथिवी घनोदधिके आधारसे स्थित है,
घनोदधि घनवातके आधारसे स्थित है, घनवात तनुवातके आधारसे स्थित है, तनुवात आकाशके
आधारसे स्थित है और आकाश अपने आधारसे स्थित है ।
§ ३६८. क्या इन भूमियोंमें सर्वत्र नारकियोंके निवास-स्थान हैं या कहीं-कहीं, इस बातका
निश्चय करनेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
उन भूमियोंमें क्रमसे तीस लाख, पचीस लाख, पन्द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पाँच
कम एक लाख और पाँच नरक हैं ॥२॥
§ ३६९. तासु रत्नप्रभादिषु भूमिषु नरकाण्यनेन संख्यायन्ते यथाक्रमम् । रत्नप्रभायां
त्रिंशन्नरकशतसहस्राणि, शर्कराप्रभायां पञ्चविंशतिर्नरकतसहस्राणि, वालुकाप्रभायां पञ्चदश
नरकशतसहस्राणि, पङ्कप्रभायां दश नरकशतसहस्राणि, धूमप्रभायां त्रीणि नरकशतसहस्राणि,
तमःप्रभायां पञ्चोनमेकं नरकशतसहस्रं, महातमःप्रभायां पञ्च नरकाणि । रत्नप्रभायां नरकप्रस्ता-
रास्त्रयोदश । ततोऽध आ सप्तम्या द्वौ¹ द्वौ नरकप्रस्तारौ² हीनौ । इतरो विशेषो लोकानुयोगतो
वेदितव्यः ।
§ ३७०. अथ तासु भूमिषु नारकाणां कः प्रतिविशेष इत्यत आह—
नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥३॥
§ ३७१. लेश्यादयो व्याख्यातार्थाः । अशुभतरा इति प्रकर्षनिर्देशः तिर्यग्गतिविषयाशुभ-
लेश्याद्यपेक्षया, अधोऽधः स्वगत्यपेक्षया च वेदितव्यः । 'नित्य'शब्द³ आभीक्ष्ण्यवचनः । नित्य-
§ ३६९. उन रत्नप्रभा आदि भूमियोंमें, इस सूत्र-द्वारा क्रमसे नरकोंकी संख्या बतलायी
गयी है । रत्नप्रभामें तीस लाख नरक हैं। शर्कराप्रभामें पचीस लाख नरक हैं । वालुकाप्रभामें
पन्द्रह लाख नरक हैं। पंकप्रभामें दश लाख नरक हैं। धूमप्रभामें तीन लाख नरक हैं। तमःप्रभामें
पाँच कम एक लाख नरक हैं और महातमःप्रभामें पाँच नरक हैं। रत्नप्रभामें तेरह नरक पटल हैं ।
इससे आगे सातवीं भूमि तक दो-दो नरक पटल कम हैं। इसके अतिरिक्त और विशेषता लोकानु-
योगसे जान लेनी चाहिए।
विशेषाथ—पहले सात पृथिवियोंका निर्देश किया ही है। उनमेंसे पहली पृथिवीके तीन
भाग हैं—खरभाग, पंकभाग और अब्बहुल भाग । खर भाग सबसे ऊपर है। इसमें रत्नोंकी
बहुतायत है और यह सोलह हजार योजन मोटा है। दूसरा पंकभाग है, इसकी मोटाई चौरासी
हजार योजन है। तथा तीसरा अब्बहुल भाग है। इसकी मोटाई अस्सी हजार योजन है।
नारकियोंके रहनेके आवासको नरक कहते हैं। रत्नप्रभा भूमिके प्रथम भाग और दूसरे भाग
में नरक नहीं हैं। तीसरे भागमें हैं। इस प्रकार प्रथम भूमिके तीसरे भागकी और शेष छह भूमियों
को जितनी-जितनी मोटाई बतलायी है उसमें से ऊपर और नीचे एक-एक हजार योजन भूमिको
छोड़कर सातों भूमियोंके बाकीके मध्य भागमें नरक हैं। इनका आकार विविध प्रकारका है। कोई
गोल हैं, कोई त्रिकोण हैं, कोई चौकोण हैं और कोई अनिश्चित आकारवाले हैं। ये सब नरकपटल
क्रमसे अवस्थित हैं। जिस प्रकार पत्थर या मिट्टीके एक थरपर दूसरा थर अवस्थित होता है उसी
प्रकार ये पटल हैं। पहली भूमिमें ये पटल तेरह हैं और आगेकी भूमियोंमें दो-दो पटल कम होते
गये हैं। एक पटल दूसरे पटलसे सटा हुआ है। इनमें नरक हैं। नरक जमीनके भीतर कुएँके
समान पोलका नाम है। यह ऊपर, नीचे, चारों ओर जमीनसे घिरी रहती है। इन्हीं नरकोंमें
नारकी जीव अपनी आयुके अन्तिम समय तक रहते हैं और वहां नाना प्रकारके दुःख भोगते हैं।
§ ३७०. उन भूमियोंमें रहनेवाले नारकियोंमें क्या विशेषता है इस बातको बतलानेके लिए
अब आगे का सूत्र कहते हैं—
नारकी निरन्तर अशुभतर लेश्या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रियावाले हैं ॥३॥
§ ३७१. लेश्यादिकका पहले व्याख्यान कर आये हैं। 'अशुभतर' इस पद के द्वारा तिर्यंचगति-
में प्राप्त होनेवाली अशुभ लेश्या आदिककी अपेक्षा और नीचे-नीचे अपनी गतिकी अपेक्षा लेश्यादिक-
१. –सप्तम्या द्वं द्वं नरक-आ० दि० १, दि० २ । २. -प्रस्तारा हीनाः । इतरो आ०, दि० १, दि० २ ।
२. लोकनियोगतो दि० १, दि० २। ३. 'अर्थ खलु नित्यशब्दो नावश्यं कूटस्थेष्वविचालिषु भावेषु वर्तते ।
किं तर्हि ? आभीक्ष्ण्येऽपि वर्तते । तद्यथा-नित्यप्रहसितो नित्यप्रजल्पित इति ।' पा० म० भा०, पृ० ५७ ।
१५० सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३ § ३७१ -
मशुभतरा लेश्यादयो येषां ते नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रिया नारकाः । प्रथमा-
द्वितीययोः कापोती लेश्या, तृतीयायामुपरिष्टात्कापोती अधो नीला, चतुर्थ्यां नीला, पञ्चम्यामुपरि
नीला अधः कृष्णा, षष्ठ्यां कृष्णा, सप्तम्यां परमकृष्णा । स्वायुः१प्रमाणावधृता२ द्रव्यलेश्या उक्ताः ।
भावलेश्यास्तु अन्तर्मुहूर्तपरिवर्तिन्यः । परिणामाः स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दाः क्षेत्रविशेषनिमित्तवशादति-
दुःखहेतवोऽशुभतराः । देहाश्च तेषामशुभनामकर्मोदयादत्यन्ताशुभतरा विकृताकृतयो हुण्डसंस्थाना४
दुर्दर्शनाः । तेषामुत्सेधः प्रथमायां सप्त धनूंषि त्रयो हस्ताः षडङ्गुलयः । अधोऽधो—द्विगुणद्विगुणं ५
उत्सेधः । अभ्यन्तरासद्वेद्योदये सति अनादिपारिणामिकशीतोष्णबाह्यनिमित्तजनिता६ अतितीव्रा
वेदना भवन्ति नारकाणाम् । प्रथमाद्वितीयातृतीयाचतुर्थीषु उष्णवेदनान्येव नरकाणि । पञ्चम्यामू-
परि उष्णवेदने द्वे नरकशतसहस्रे । अधः शीतवेदनेमेकं७ शतसहस्रम् । षष्ठीसप्तम्योः शीतवेदनान्येव ।
शुभं८ विकरिष्याम इति अशुभतरमेव विकुर्वन्ति, सुखहेतूनुत्पादयाम इति दुःखहेतूनेवोत्पादयन्ति ।
त एते भावा अधोऽधोऽशुभतरा वेदितव्याः ।
की प्रकर्षता बतलायी गयी है। अर्थात् तिर्यंचोंमें जो लेश्यादिक हैं उनसे प्रथम नरकके नारकियोंके
अधिक अशुभ हैं आदि । नित्य शब्द आभीक्ष्ण्य अर्थात् निरन्तरवाची है । तात्पर्य यह है कि नार-
कियोंकी लेश्या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रिया निरन्तर अशुभ होती है। यथा, प्रथम और
दूसरी पृथिवीमें कापोत लेश्या है। तीसरी पृथिवीमें ऊपरके भागमें कापोत लेश्या है और नीचेके
भागमें नील लेश्या है। चौथी पृथिवीमें नील लेश्या है। पांचवीं पृथिवीमें ऊपरके भागमें नील
लेश्या है और नीचेके भागमें कृष्ण लेश्या है। छठी पृथिवीमें कृष्ण लेश्या है। और सातवीं पृथिवी
में परम कृष्ण लेश्या है। द्रव्य लेश्याएँ अपनी आयु तक एक सी कही गयी हैं। किन्तु भावलेश्याएँ
अन्तर्मुहूर्तमें बदलती रहती हैं। परिणामसे यहाँ स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द लिये गये हैं।
ये क्षेत्रविशेषके निमित्तसे अत्यन्त दुःखके कारण अशुभतर हैं। नारकियोंके शरीर अशुभ नामकर्मके
उदयसे होनेके कारण उत्तरोत्तर अशुभ हैं। उनकी विकृत आकृति है, हुंड संस्थान है और देखनेमें
बुरे लगते हैं। उनकी ऊँचाई प्रथम पृथिवीमें सात धनुष, तीन हाथ और छह अंगुल है। तथा
नीचे-नीचे प्रत्येक पृथिवीमें वह दूनी-दूनी है। नारकियोंके अभ्यन्तर कारण असाता वेदनीयका
उदय रहते हुए अनादिकालीन शीत और उष्णरूप बाह्य निमित्तसे उत्पन्न हुई अति तीव्र वेदना
होती है। पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी पृथिवीमें मात्र उष्ण वेदनावाले नरक हैं। पाँचवीं
पृथिवीमें ऊपरके दो लाख नरक उष्ण वेदनावाले हैं। और नीचेके एक लाख नरक शीत वेदनावाले
हैं। तथा छठी और सातवीं पृथिवीके नरक शीत वेदनावाले ही हैं। नारकी 'शुभ विक्रिया करेंगे'
ऐसा विचार करते हैं पर उत्तरोत्तर अशुभ विक्रियाको ही करते हैं। 'सुखकर हेतुओंको उत्पन्न
करेंगे' ऐसा विचार करते हैं परन्तु वे दुःखकर हेतुओंको ही उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार ये भाव
नीचे-नीचे अशुभतर जानने चाहिए।
विशेषार्थ—यहाँ टीकामें लेश्याके दो भेद करके भावलेश्या अन्तर्मुहूर्तमें बदलती रहती है
यह कहा है। सो इसका तात्पर्य यह है कि जहाँ जो भावलेश्या कही है उसमें परिवर्तन नहीं होता।
मात्र उसमें योग और कषायके अनुसार तरतमभाव होता रहता है; क्योंकि प्रत्येक नारकीके वही
योग और वही कषाय रहनी चाहिए ऐसा नियम नहीं है। किन्तु अपने-अपने जघन्य, मध्यम या
उत्कृष्ट कालके अनुसार योग और कषायका परिवर्तन नियमसे होता है। यतः कषायानुरंजित
१. स्वायुधः प्रभा-मु०, ता०, ना० । २.-माणेऽववृता आ०, दि० १, दि० २। ३. नामोदया-आ०, दि०१,
दि० २ । ४. संस्थापना । तेषां० आ०, दि० १, दि० २ । ५. द्विगुणो द्विगुण आ०, दि० १, दि० २ । ६.
जनिताः सुतीव्रा मु०, दि० १, दि० २, आ०, ता० । ७. -वेदनानामेकं आ०, दि० १, दि० २ । ८. शुभं
करि-मु०, आ०, दि० १, दि० २ ।
- ३५५ § ३७५ ] तृतीयोऽध्यायः १५१
§ ३७२. किमेतेषां नारकाणां शीतोष्णजनितमेव दुःखमुतान्यथापि भवतीत्यत आह—
परस्परोदीरितदुःखाः ॥४॥
§ ३७३. कथं परस्परोदीरितदुःखत्वम् । नारकाः¹ भवप्रत्ययेनावधिना मिथ्यादर्शनोदयाद्वि-
भङ्गव्यपदेशभाजा च दूरादेव दुःखहेतूनवगम्योत्पन्नदुःखाः प्रत्यासत्तौ परस्परालोकनाच्च प्रज्वलित-
कोपाग्नयः पूर्वभवानुस्मरणाच्चातितीव्रानुबद्धवैराश्च श्वशृगालादिवत्स्वाभिघाते प्रवर्तमानाः ५
स्वविक्रियाकृतासिवासीपरशुभिण्डिमालशक्तितोमरकुन्तायोधनादिभिरायुधैः स्वकरचरणदशनैश्च
छेदनभेदनतक्षणदंशनादिभिः परस्परस्यातितीव्रं दुःखमुत्पादयन्ति ।
§ ३७४. किमेतावानेव दुःखोत्पत्तिकारणप्रकार उतान्योऽपि कश्चिदस्तीत्यत आह—
संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः ॥५॥
§ ३७५. देवगतिनामकर्मविकल्पस्यासुरत्वसंवर्तकस्य कर्मण उदयादस्यन्ति परानित्यसुराः । १०
पूर्वजन्मनि² भावितेनातितीव्रेण संक्लेशपरिणामेन यदुपार्जितं पापकर्म तस्योदयात्सततं क्लिष्टाः³
संक्लिष्टाः, संक्लिष्टा असुराः, संक्लिष्टासुराः । संक्लिष्टा इति विशेषणान्न सर्वे असुरा नारकाणां
दुःखमुत्पादयन्ति । किं तर्हि । अम्बावरीषादय एव केचनेति । अवधिप्रदर्शनार्थं 'प्राक्चतुर्थ्याः' इति
योगप्रवृत्तिका नाम लेश्या है अतः योग और कषायके बदलनेसे वह भी बदल जाती है । मात्र जहाँ
कापोत लेश्याका जघन्य अंश कहां है वहाँ वही रहता है वह बदलकर कापोत लेश्याका मध्यम १५
और उत्कृष्ट अंश नहीं होता या जहाँ परम कृष्ण लेश्या कही है वहाँ वही रहती है वह बदल कर
अन्य लेश्या नहीं होती । शेष कथन सुगम है ।
§ ३७२. क्या इन नारकियोंके शीतोष्णजनित ही दुःख है या दूसरे प्रकारका भी दुःख है, इस
बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा वे परस्पर उत्पन्न किये गये दुःखवाले होते हैं ॥ ४ ॥ २०
§ ३७३. शंका—नारकी परस्पर एक-दूसरेको कैसे दुःख उत्पन्न करते हैं ? समाधान—नार-
कियोंके भवप्रत्यय अवधिज्ञान है जिसे मिथ्यादर्शनके उदयसे विभंगज्ञान कहते हैं । इस ज्ञानके कारण
दूरसे ही दुःखके कारणोंको जानकर उनको दुःख उत्पन्न हो जाता है और समीपमें आनेपर एक-
दूसरेको देखनेसे उनकी क्रोधाग्नि भभक उठती है । तथा पूर्वभवका स्मरण होनेसे उनकी वैरकी गांठ
और दृढ़तर हो जाती है । जिससे वे कुत्ता और गीदड़के समान एक-दूसरे का घात करनेके लिए २५
प्रवृत्त होते हैं। वे अपनी विक्रियासे तलवार, बसूला, फरसा, हाथसे चलानेका तीर, बर्छी, तोमर
नामका अस्त्र विशेष, बरछा और हथोड़ा आदि अस्त्र-शस्त्र बनाकर उनसे तथा अपने हाथ, पांव
और दांतोंसे छेदना, भेदना, छीलना और काटना आदिके द्वारा परस्पर अतितीव्र दुःखको उत्पन्न
करते हैं ।
§ ३७४. जिन कारणोंसे दुःख उत्पन्न होता है वे इतने ही हैं या और भी हैं ? अब इस बात- ३०
का ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
और चौथी भूमिसे पहले तक वे संक्लिष्ट असुरोंके द्वारा उत्पन्न किये गये दुःखवाले भी
होते हैं ॥५॥
§ ३७५. देवगति नामक नामकर्मके भेदोंमें एक असुर नामकर्म है जिसके उदयसे 'परान्
अस्यन्ति' जो दूसरोंको फेंकते हैं उन्हें असुर कहते हैं। पूर्व जन्ममें किये गये अतितीव्र संक्लेशरूप ३५
परिणामोंसे इन्होंने जो पापकर्म उपार्जित किया उसके उदयसे ये निरन्तर क्लिष्ट रहते हैं इसलिए
संक्लिष्ट असुर कहलाते हैं। सूत्रमें यद्यपि असुरोंको संक्लिष्ट विशेषण दिया है पर इसका यह अर्थ
१. नारकाणाम् ? भव-मु०, ता०, ना० । २. जन्मनि संभावि-मु० । ३. क्लिष्टाः संक्लिष्टा असुराः मु० ।
१५२ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।६ § ३७६ –
विशेषणम्। उपरि तिसृषु पृथिवीषु संक्लिष्टासुरा बाधाहेतवो नातः परमिति प्रदर्शनार्थम्। ‘च’-
शब्दः पूर्वोक्तदुःखहेतुसमुच्चयार्थः। सुतप्तायोरसपायननिष्ठप्तायस्तम्भालिङ्गनकूटशाल्मल्यारोहणाव-
तरणायोधनाभिघातवासीक्षुरतक्षणक्षारतप्ततैलावसेचनायःकुम्भीपाकाम्बरीषभर्जनवैतरणीमज्जन -
यन्त्रनिष्पीडनादिभिर्नारकाणां दुःखमुत्पादयन्ति। एवं छेदनभेदनादिभिः शकलीकृतमूर्तीनामपि तेषां
न मरणमकाले भवति। कुतः। अनपवर्त्यायुष्कत्वात् १।
§ ३७६. यद्येवं, तदेव तावदुच्यतां नारकाणामायुःपरिमाणमित्यत आह—
तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां
परा स्थितिः ॥६॥
§ ३७७. यथाक्रममित्यनुवर्तते । तेषु नरकेषु भूमिक्रमेण यथासंख्यमेकादयः स्थितयोऽभि-
संबध्यन्ते। रत्नप्रभायामुत्कृष्टा स्थितिरेकसागरोपमा। शर्कराप्रभायां त्रिसागरोपमा। वालुका-
प्रभायां सप्तसागरोपमा। पङ्कप्रभायां दशसागरोपमा। धूमप्रभायां सप्तदशसागरोपमा। तमःप्रभायां
नहीं कि सब असुर नारकियोंको दुःख उत्पन्न कराते हैं। किन्तु अम्बावरीष आदि कुछ असुर ही
दुःख उत्पन्न कराते हैं। मर्यादाके दिखलानेके लिए सूत्रमें ‘प्राक् चतुर्थ्याः' यह विशेषण दिया है।
इससे यह दिखलाया है कि ऊपरकी तीन पृथिवियोंमें ही संक्लिष्ट असुर बाधाके कारण हैं इससे
आगे नहीं। सूत्रमें ‘च’ शब्द पूर्वोक्त दुःखके कारणोंका समुच्चय करनेके लिए दिया है। परस्पर
खूब तपाया हुआ लोहेका रस पिलाना, अत्यन्त तपाये गये लौहस्तम्भका आलिंगन, कूट और
सेमरके वृक्षपर चढ़ाना-उतारना, लोहेके घनसे मारना, वसूला और छुरासे तरासना, तपाये गये
खारे तेलसे सींचना, तेलकी कढ़ाईमें पकाना, भाड़में भूंजना, वैतरणीमें डुबाना, यन्त्रसे पेलना
आदिके द्वारा नारकियोंके परस्पर दुःख उत्पन्न कराते हैं। इस प्रकार छेदन, भेदन आदिके द्वारा
उनका शरीर खण्ड-खण्ड हो जाता है तो भी उनका अकालमें मरण नहीं होता है, क्योंकि उनको
आयु घटती नहीं।
विशेषार्थ—नारक जीव स्वभावसे क्रूर स्वभाववाले होते हैं। एक-दूसरेको देखते ही उनका
क्रोध भभक उठता है और वे एक-दूसरेको मारने काटने लगते हैं। उनका शरीर वैक्रियिक होता है
इसलिए उससे वे नाना प्रकारके आयुध आदिका आकार धारण कर उनसे दूसरे नारकियोंको पीड़ा
पहुँचाते हैं। तीसरे नरक तक देवोंका भी गमन होता है, इसलिए ये भी कुतूहल वश उन्हें आपसमें
भिड़ा देते हैं और उनका घात-प्रत्याघात देखकर मजा लूटते हैं। पर यह काम सब देव नहीं करते
किन्तु अम्बावरीष आदि जातिके कुछ ही असुर कुमार देव करते हैं। इतना सब होते हुए भी उन
नारकियोंका अकाल मरण नहीं होता इतना यहाँ विशेष जानना चाहिए।
§ ३७६. यदि ऐसा है तो यह कहिए कि उन नारकियोंकी कितनी आयु है ? इसी बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन नरकोंमें जीवोंकी उत्कृष्ट स्थिति क्रमसे एक, तीन, सात, दस, सत्रह, बाईस और
तैंतीस सागर है ॥६॥
§ ३७७. इस सूत्रमें ‘यथाक्रमम्’ इस पदकी अनुवृत्ति होती है। जिससे उन नरकोंमें भूमिके क्रमसे
एक सागर आदि स्थितियोंका क्रमसे सम्बन्ध हो जाता है। रत्नप्रभामें एक सागर उत्कृष्ट स्थिति
है। शर्कराप्रभामें तीन सागर उत्कृष्ट स्थिति है। वालुकाप्रभामें सात सागर उत्कृष्ट स्थिति है।
पंकप्रभामें दस सागर उत्कृष्ट स्थिति है। धूमप्रभामें सत्रह सागर उत्कृष्ट स्थिति है। तमःप्रभामें
१. –युषत्वात् आ० दि० १, दि० २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
द्वाविंशतिसागरोपमा । महातमःप्रभायां त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा इति । परा उत्कृष्टेत्यर्थः । 'सत्त्वानाम्'
इति वचनं भूमिनिवृत्त्यर्थम् । भूमिषु सत्त्वानामिदं स्थितिः, न भूमीनामिति ।
§ ३७८. उक्तः सप्तभूमिविस्तीर्णोऽधोलोकः । इदानीं तिर्यग्लोको वक्तव्यः । कथं पुनस्तिर्य-
ग्लोकः । यतोऽसंख्येयाः स्वयंभूरमणपर्यन्तास्तिर्यक्प्रचयविशेषेणावस्थिता द्वीपसमुद्रास्ततस्तिर्यग्लोक
इति । के¹ पुनस्तिर्यग्व्यवस्थिता इत्यत आह—
जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥
§ ३७९. जम्बूद्वीपादयो द्वीपाः । लवणोदादयः समुद्राः । यानि लोके शुभानि नामानि
तन्नामानस्ते । तद्यथा—जम्बूद्वीपो द्वीपः । लवणोदः समुद्रः । घातकीखण्डो द्वीपः । कालोदः समुद्रः ।
पुष्करवरो द्वीपः । पुष्करवरः समुद्रः । ' वारुणीवरो द्वीपः । वारुणीवरः समुद्रः । क्षीरवरो द्वीपः ।
क्षीरवरः समुद्रः । घृतवरो द्वीपः । घृतवरः समुद्रः । इक्षुवरो द्वीपः । इक्षुवरः समुद्रः । नन्दीश्वरवरो
द्वीपः । नन्दीश्वरवरः समुद्रः । ' अरुणवरो द्वीपः । अरुणवरः समुद्रः । इत्येवमसंख्येया द्वीपसमुद्राः
स्वयंभूरमणपर्यन्ता वेदितव्याः ।
§ ३८०. अमीषां विष्कम्भसंनिवेशसंस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः ॥८॥
§ ३८१. द्विर्द्विरिति ²वीप्साभ्यावृत्तिवचनं विष्कम्भद्विगुणत्वव्याप्त्यर्थम् । आद्यस्य द्वीपस्य
यो विष्कम्भः तद्द्विगुणविष्कम्भो लवणजलधिः । तद्द्विगुणविष्कम्भो द्वितीयो द्वीपः । तद्द्विगुण-
बाईस सागर उत्कृष्ट स्थिति है और महातमःप्रभामें तैंतीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । 'परा' शब्द-
का अर्थ 'उत्कृष्ट' है । और 'सत्त्वानाम्' पद भूमियोंके निराकरण करनेके लिए दिया है । अभिप्राय
यह है कि भूमियोंमें जीवोंकी यह स्थिति है भूमियोंकी नहीं ।
§ ३७८. सात भूमियोंमें बंटे हुए अधोलोकका वर्णन किया । अब तिर्यग्लोकका कथन
करना चाहिए । शंका—तिर्यग्लोक यह संज्ञा क्यों है ? समाधान—चूँकि स्वयम्भूरमण समुद्र पर्यन्त
असंख्यात द्वीप-समुद्र तिर्यक् प्रचयविशेषरूपसे अवस्थित हैं इसलिए तिर्यग्लोक संज्ञा है । वे तिर्यक्
रूपसे अवस्थित क्या हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जम्बूद्वीप आदि शुभ नामवाले द्वीप और लवणोद आदि शुभ नामवाले समुद्र हैं ॥७॥
§ ३७९. जम्बूद्वीप आदिक द्वीप हैं और लवणोद आदिक समुद्र हैं। तात्पर्य यह है कि
लोकमें जितने शुभ नाम हैं उन नामवाले वे द्वीप समुद्र हैं। यथा-जम्बूद्वीप नामक द्वीप, लवणोद
समुद्र, घातकीखण्ड द्वीप, कालोद समुद्र, पुष्करवर द्वीप, पुष्करवर समुद्र, वारुणोवर द्वीप, वारुणी-
वर समुद्र, क्षीरवर द्वीप, क्षीरवर समुद्र, घृतवर द्वीप, घृतवर समुद्र, इक्षुवर द्वीप, इक्षुवर समुद्र,
नन्दीश्वरवर द्वीप, नन्दीश्वरवर समुद्र, अरुणवर द्वीप और अरुणवर समुद्र, इस प्रकार स्वयंभूरमण
पर्यन्त असंख्यात द्वीप-समुद्र जानने चाहिए ।
§ ३८०. अब इन द्वीप-समुद्रोंके विस्तार, रचना और आकारविशेषका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
वे सभी द्वीप और समुद्र दूने-दूने व्यासवाले, पूर्व-पूर्व द्वीप और समुद्रको वेष्टित करनेवाले
और चूड़ीके आकारवाले हैं ॥ ८ ॥
§ ३८१. द्वीप-समुद्रोंका विस्तार दूना-दूना है इस बातको दिखलानेके लिए सूत्रमें 'द्विर्द्विः'
इस प्रकार वीप्सा अर्थमें अभ्यावृत्ति वचन है । प्रथम द्वीपका जो विस्तार है लवणसमुद्रका विस्तार
१. के पुनस्ते तिर्य-आ०, दि० १ । २. वीप्सायां वृत्तिवचनं आ०, दि० १, दि० २, मु० ।
२०
विष्कम्भो द्वितीयो जलधिरिति । द्विद्विविष्कम्भो येषां ते द्विद्विविष्कम्भाः । पूर्वपूर्वपरिक्षेपिवचनं
ग्रामनगरादिवद्विनिवेशो मा विज्ञायीति । वलयाकृतिवचनं चतुरस्रादिसंस्थानान्तरनिवृत्त्यर्थम् ।
§ ३८२. अत्राह, जम्बूद्वीपस्य प्रदेशसंस्थानविष्कम्भा वक्तव्यास्तन्मूलत्वादितरविष्कम्भा-
दिविज्ञानस्येत्युच्यते—
तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥६॥
§ ३८३. तेषां मध्ये तन्मध्ये । केषाम् । पूर्वोक्तानां द्वीपसमुद्राणाम् । नाभिरिव नाभिः२ ।
मेरुर्नाभिर्यस्य स मेरुनाभिः । वृत्त आदित्यमण्डलोपमानः । शतानां सहस्रं शतसहस्रम् । योजनानां
शतसहस्रं, योजनशतसहस्रम् । योजनशतसहस्रं विष्कम्भो यस्य सोऽयं योजनशतसहस्रविष्कम्भः ।
कोऽसौ । जम्बूद्वीपः । कथं जम्बूद्वीपः । जम्बूवृक्षोपलक्षितत्वात् । उत्तरकुरूणां मध्ये जम्बूवृक्षोऽना-
दिनिधनः पृथिवीपरिणामो ३ऽकृत्रिमः सपरिवारस्तदुपलक्षितोऽयं द्वीपः ।
उससे दूना है । तथा दूसरे द्वीपका विस्तार इससे दूना है और दूसरे समुद्रका इससे दूना है । इस
प्रकार उत्तरोत्तर दूना-दूना विस्तार है । तात्पर्य यह है कि इन द्वीप-समुद्रोंका विस्तार दूना-दूना
है इसलिए सूत्रमें उन्हें दूने-दूने विस्तारवाला कहा है । ग्राम और नगरादिकके समान इन द्वीप-
समुद्रोंकी रचना न समझी जाये इस बातके बतलानेके लिए सूत्रमें ‘पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणः’ यह वचन
दिया है । अर्थात् वे द्वीप और समुद्र उत्तरोत्तर एक दूसरेको घेरे हुए हैं । सूत्रमें जो ‘वलयाकृतयः’
वचन दिया है वह चौकोर आदि आकारोंके निराकरण करनेके लिए दिया है ।
§ ३८२. अब पहले जम्बू द्वीपका आकार और विस्तार कहना चाहिए, क्योंकि दूसरे द्वीप
समुद्रोंका विस्तार आदि तन्मूलक है, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन सबके बीचमें गोल और एक लाख योजन विष्कम्भवाला जम्बूद्वीप है । जिसके मध्य-
में मेरु पर्वत है ॥ ९ ॥
§ ३८३. ‘तन्मध्ये’ पदका अर्थ है ‘उनके बीचमें’ । शंका—किनके बीचमें ? समाधान—
पूर्वोक्त द्वीप समुद्रोंके बीचमें । नाभिस्थानीय होनेसे नाभि कहा है । जिसका अर्थ मध्य है । अभि-
प्राय यह है कि जिसके मध्यमें मेरु पर्वत है, जो सूर्यके मण्डलके समान गोल है और जिसका एक
लाख योजन विस्तार है ऐसा यह जम्बूद्वीप है । शंका—इसे जम्बूद्वीप क्यों कहते हैं ? समाधान—
जम्बूवृक्षसे उपलक्षित होनेके कारण इसे जम्बूद्वीप कहते हैं । उत्तरकुरुमें अनादिनिधन, पृथिवी
से बना हुआ, अकृत्रिम और परिवार वृक्षोंसे युक्त जम्बूवृक्ष है जिसके कारण यह जम्बूद्वीप
कहलाता है ।
विशेषार्थ—अधोलोकका विवेचन कर आये हैं इसके बाद मध्यलोक है । यह रत्नप्रभा
पृथिवीके ऊपरी भागपर अवस्थित है । इसमें गोल आकारको लिये हुए और एकके बाद एकको
घेरे हुए असंख्यात द्वीप और समुद्र हैं । इन सबके बीचमें जम्बूद्वीप है । इसके बीचमें और दूसरा
द्वीप समुद्र नहीं है । यद्यपि गोल तो सब द्वीप और समुद्र हैं पर वे सब चूड़ीके समान गोल हैं और
यह थालीके समान गोल है । इसका व्यास एक लाख योजन है । इसके ठीक बीचमें मेरु पर्वत है ।
यह एक लाख चालीस योजन ऊँचा है । इसमेंसे एक हजार योजन जमीनमें है । चालीस योजनकी
आखीरमें चोटी है और शेष निन्यानबे हजार योजनका समतलसे चूलिका तक है । प्रारम्भमें
जमीनपर मेरु पर्वतका व्यास दस हजार योजन है । ऊपर क्रमसे घटता गया है । जिस हिसाबसे
ऊपर घटा है उसी हिसाबसे जमीनमें उसका व्यास बढ़ा है । मेरु पर्वतके तीन काण्ड हैं । पहला
काण्ड जमीनसे पाँच सौ योजनका, दूसरा साढ़े बासठ हजार योजनका और तीसरा छत्तीस हजार
१. पूर्वोक्तद्वीप—आ०, दि० १, दि० २, मु० । २. नाभिर्मध्यम । मेरु-आ०, दि० १, दि० २, मु० ।
३. परिणामोऽकृ-मु० ।
- ३।१० § ३८६ ] तृतीयोऽध्यायः १५५
§ ३८४. तत्र जम्बूद्वीपे षड्भिः कुलपर्वतैर्विभक्तानि सप्त क्षेत्राणि कानि तानीत्यत आह—
भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि १॥१०॥
§ ३८५. भरतादयः संज्ञा अनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्ताः । तत्र भरतवर्षः क्व संनिविष्टः ।
दक्षिणदिग्भागे हिमवतोऽद्रेस्त्रयाणां २ समुद्राणां मध्ये आरोपितचापाकारो भरतवर्षः । विजयार्द्धेन
गङ्गासिन्धुभ्यां च विभक्तः ३ स षट्खण्डः । क्षुद्रहिमवन्तमुत्तरेण दक्षिणेन महाहिमवन्तं पूर्वापर- ५
समुद्रयोर्मध्ये हैमवतवर्षः । निषधस्य दक्षिणतो महाहिमवत उत्तरतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तराले
हरिवर्षः । निषधस्योत्तरान्नीलतो दक्षिणतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तरे विदेहस्य संनिवेशो द्रष्टव्यः ।
नीलत ४ उत्तरात् ५ (द्) रुक्मिणो दक्षिणात् पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये रम्यकवर्षः । रुक्मिण उत्तराच्छिख-
रिणो दक्षिणात्पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये संनिवेशी ६ हैरण्यवतवर्षः । शिखरिण उत्तरतस्त्रयाणां समुद्राणां
मध्ये ऐरावतवर्षः। विजयार्द्धेन रक्तारक्तोदाभ्यां च विभक्तः ७ स षट्खण्डः । १०
§ ३८६. षट् कुलपर्वता इत्युक्तं के पुनस्ते कथं वा व्यवस्थिता इत्यत आह—
योजनका है। प्रत्येक काण्डके अन्तमें एक-एक कटनी है। जिसका एक ओरका व्यास पाँचसौ
योजन है। अन्तिम कटनीका व्यास मात्र छह योजन कम है। एक जमीनपर और तीन इन तीन
कटनियोंपर इस प्रकार यह चार वनोंसे सुशोभित है। इनके क्रमसे भद्रसाल, नन्दन, सौमनस और
पाण्डुक ये नाम हैं। पहली और दूसरी कटनीके बाद मेरु पर्वत सीधा गया है फिर क्रमसे घटने १५
लगता है। इसके चारों वनोंमें चारों दिशाओंमें एक-एक वनमें चार-चार इस हिसाबसे सोलह
चैत्यालय हैं। पाण्डुक वनमें चारों दिशाओंमें चार पाण्डुक शिलाएँ हैं। जिनपर उस-उस दिशाके
क्षेत्रोंमें उत्पन्न हुए तीर्थंकरोंका अभिषेक होता है। इसका रंग पीला है।
§ ३८४. इस जम्बूद्वीप में छह कुलपर्वतोंसे विभाजित होकर जो सात क्षेत्र हैं वे कौन-से हैं?
इसी बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
भरतवर्ष, हैमवतवर्ष, हरिवर्ष, विदेहवर्ष, रम्यकवर्ष, हैरण्यवतवर्ष और ऐरावतवर्ष ये
सात क्षेत्र हैं ॥ १० ॥
§ ३८५. क्षेत्रोंकी भरत आदि संज्ञाएँ अनादि कालसे चली आ रही हैं और अनिमित्त हैं।
इनमें-से भरत क्षेत्र कहाँ स्थित है ? हिमवान् पर्वतके दक्षिणमें और तीन समुद्रोंके बीचमें चढ़े हुए
धनुषके आकारवाला भरत क्षेत्र है जो विजयार्ध और गंगा सिन्धुसे विभाजित होकर छह खण्डोंमें २५
बँटा हुआ है। क्षुद्र हिमवान्के उत्तरमें और महाहिमवान्के दक्षिणमें तथा पूर्व पश्चिम समुद्रके बीच-
में हैमवत क्षेत्र है। निषधके दक्षिणमें और महाहिमवान्के उत्तरमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके
बीचमें हरिक्षेत्र है। निषधके उत्तरमें और नीलके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीचमें
विदेह क्षेत्रकी रचना है। नीलके उत्तरमें और रुक्मीके दक्षिणमें तथा पूर्व पश्चिम समुद्रके बीचमें
रम्यक क्षेत्र है। रुक्मीके उत्तरमें और शिखरीके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीचमें ३०
हैरण्यवत क्षेत्र है। शिखरीके उत्तरमें और तीन समुद्रोंके बीचमें ऐरावत क्षेत्र है। जो विजयार्ध
और रक्ता रक्तोदासे विभाजित होकर छह खण्डोंमें बँटा हुआ है।
§ ३८६. कुलपर्वत छह हैं यह पहले कह आये हैं परन्तु वे कौन हैं और कहाँ स्थित हैं यह
बतलाना शेष है अतः आगेका सूत्र कहते हैं—
१. क्षेत्राणि ।।१०।। भिन्न-भिन्नानि भरता-। आ० । २. -याणां च समु-मु० । ३. विभक्तः षट्-मु० । ४. ३५
नीलवत उत्त-आ०, दि० १, दि० २ । ५. उत्तरः रुक्मिणो दक्षिणः मु० । ६. संनिवेशो हैर-मु० ।
७. -विभक्तः षट्- मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
१५६ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।११ § ३८७ –
तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनील-
रुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः ॥११॥
§ ३८७. तानि क्षेत्राणि विभजन्ति इत्येवंशीलास्तद्विभाजिनः । पूर्वापरायता इति पूर्वा-
परकोटिभ्यां लवणजलधिस्पर्शिन इत्यर्थः । हिमवदादयोऽनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्तसंज्ञा वर्षविभाग-
हेतुत्वाद्वर्षधरपर्वता इत्युच्यन्ते । तत्र क्व हिमवान् । भरतस्य हैमवतस्य च सीमनि¹ व्यवस्थितः ।
क्षुद्रहिमवान् योजनशतोच्छ्रायः । हैमवतस्य हरिवर्षस्य² च विभागकरो महाहिमवान् द्वियोजन-
शतोच्छ्रायः³ । विदेहस्य दक्षिणतो हरिवर्षस्योत्तरतो निषधो नाम पर्वतश्चतुर्योजनशतोच्छ्रायः ।
उत्तरे त्रयोऽपि पर्वताः स्ववर्षविभाजिनो व्याख्याताः । उच्छ्रायश्च तेषां चत्वारि द्वे एकं च योजन-
शतं वेदितव्यम्⁴ । सर्वेषां पर्वतानामुच्छ्रायस्य चतुर्थांशोऽवगाहः ।
§ ३८८. तेषां वर्णविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः ॥१२॥
§ ३८९. त एते हिमवदादयः पर्वता हेमादिमया वेदितव्या यथाक्रमम् । हेममयो हिमवान्
चीनपट्टवर्णः । अर्जुनमयो महाहिमवान् शुक्लवर्णः । तपनीयमयो निषधस्तरुणादित्यवर्णः । वैडूर्य-
मयो नीलो मयूरग्रीवाभः । रजतमयो रुक्मी शुक्लः । हेममयः शिखरी चीनपट्टवर्णः ।
उन क्षेत्रोंको विभाजित करनेवाले और पूर्व-पश्चिम लम्बे ऐसे हिमवान्, महाहिमवान्,
निषध, नील, रुक्मी और शिखरिण ये छह वर्षधर पर्वत हैं ॥ ११ ॥
§ ३८७. इन पर्वतोंका स्वभाव उन क्षेत्रोंका विभाग करना है इसलिए इन्हें उनका विभाग
करनेवाला कहा है । ये पूर्वसे पश्चिम तक लम्बे हैं । इसका यह भाव है कि इन्होंने अपने पूर्व और
पश्चिम सिरेसे लवण समुद्रको स्पर्श किया है । ये हिमवान् आदि संज्ञाएँ अनादि कालसे चली आ
रही हैं और बिना निमित्तकी हैं । इन पर्वतोंके कारण क्षेत्रोंका विभाग होता है इसलिए इन्हें
वर्षधर पर्वत कहते हैं । हिमवान् पर्वत कहाँ है अब इसे बतलाते हैं-भरत और हैमवत क्षेत्रकी
सीमापर हिमवान् पर्वत स्थित है । इसे क्षुद्र हिमवान् भी कहते हैं। यह सौ योजन ऊँचा है ।
हैमवत और हरिवर्षका विभाग करनेवाला महाहिमवान् है। यह दो सो योजन ऊँचा है। विदेहके
दक्षिणमें और हरिवर्षके उत्तरमें निषध पर्वत है । यह चार सो योजन ऊँचा है । इसी प्रकार आगे-
के तीन पर्वत भी अपने-अपने क्षेत्रोंका विभाग करनेवाले जानने चाहिए । उनकी ऊँचाई क्रमशः
चार सौ, दो सौ और सौ योजन जाननी चाहिए । इन सब पर्वतोंकी जड़ अपनी ऊँचाईका एक
बटे चार भाग है ।
§ ३८८. अब इन पर्वतोंके वर्णविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ये छहों पर्वत क्रमसे सोना, चाँदी, तपाया हुआ सोना, वैडूर्यमणि, चाँदी और सोना इनके
समान रंगवाले हैं ॥ १२ ॥
§ ३८९. वे पर्वत क्रमसे हेम आदि वर्णवाले जानने चाहिए । हिमवान् पर्वतका रंग हेममय
अर्थात् चीनी रेशमके समान है । महाहिमवान्का रंग अर्जुनमय अर्थात् सफेद है । निषध पर्वतका
रंग तपाये गये सोनेके समान अर्थात् उगते हुए सूर्यके रंगके समान है । नील पर्वतका रंग वैडूर्यमय
अर्थात् मोरके गलेकी आभावाला है । रुक्मी पर्वतका रंग रजतमय अर्थात् सफेद है और शिखरी
पर्वतका रंग हेममय अर्थात् चीनी रेशमके समान है ।
१. सीमन्यव-आ०, दि० १, दि० २ । २. हरिवंशस्य च विभा-आ०, दि० १, दि० २ । ३. -च्छ्रायः । महा-
विदेहस्य आ०, दि० १, दि० २ । ४. -तव्यम् । पर्वता-मु० ।
– ३।१६ § ३९६ ] तृतीयाऽध्यायः १५७
§ ३९०. पुनरपि ¹तद्विशेषणार्थमाह—
मणिविचित्रपाश्र्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः ॥१३॥
§ ३९१. नानावर्णप्रभादिगुणोपेतैर्मणिभिर्विचित्राणि पाश्र्वाणि येषां ते मणिविचित्रपाश्र्वाः ।
अनिष्ट²संस्थानस्य निवृत्त्यर्थमुपर्यादिवचनं क्रियते । 'च'शब्दो मध्यसमुच्चयार्थः । य एषां मूले ५
विस्तारः स उपरि मध्ये च तुल्यः ।
§ ३९२. तेषां मध्ये लब्धास्पदा ह्रदा उच्यन्ते—
पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरीका ह्रदास्तेषामुपरि ॥१४॥
§ ३९३. पद्मो महापद्मस्तिगिञ्छः केसरी महापुण्डरीकः पुण्डरीक इति तेषां हिमवदादीना-
मुपरि यथाक्रममेते ह्रदा वेदितव्याः । १०
§ ३९४. तत्राद्यस्य संस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्द्धविष्कम्भो ह्रदः ॥१५॥
§ ३९५. प्राक्प्रत्यग् योजनसहस्रायाम उदग्वाक् पञ्चयोजनशतविस्तारो वज्रमयतलो
विविधमणिकनकविचित्रिततटः पद्मनामा ह्रदः ।
§ ३९६. तस्यावगाहप्रक्लृप्त्यर्थमिदमुच्यते— १५
दशयोजनावगाहः ॥१६॥
§ ३९०. इन पर्वतोंकी और विशेषताका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
इनके पार्श्व मणियोंसे चित्र-विचित्र हैं तथा वे ऊपर, मध्य और मूलमें समान विस्तार-
वाले हैं ॥ १३ ॥
§ ३९१. इन पर्वतोंके पार्श्व भाग नाना रंग और नाना प्रकारकी प्रभा आदि गुणोंसे युक्त
मणियोंसे विचित्र हैं इसलिए सूत्रमें इन्हें मणियोंसे विचित्र पार्श्ववाले कहा है । अनिष्ट आकारके २०
निराकरण करनेके लिए सूत्रमें 'उपरि' आदि पद रखे हैं। 'च' शब्द समुच्चयवाची है। तात्पर्य
यह है कि इनका मूलमें जो विस्तार है वही ऊपर और मध्यमें है ।
§ ३९२. इन पर्वतोंके मध्यमें जो तालाब हैं उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
इन पर्वतोंके ऊपर क्रमसे पद्म, महापद्म, तिगिंछ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ये २५
तालाब हैं ॥ १४ ॥
§ ३९३. पद्म, महापद्म, तिगिञ्छ, केसरी, महापुण्डरीक और पुण्डरीक ये छह तालाब हैं जो
उन हिमवान् आदि पर्वतोंपर क्रमसे जानना चाहिए ।
§ ३९४. इनमें-से पहले तालाबके आकार-विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं— ३०
पहला तालाब एक हजार योजन लम्बा और इससे आधा चौड़ा हैं ॥ १५ ॥
§ ३९५. पद्म नामक तालाब पूर्व और पश्चिम एक हजार योजन लम्बा है और पांच सौ
योजन चौड़ा है । इसका तलभाग वज्रसे बना हुआ है। तथा इसका तट भाग नाना प्रकारके मणि
और सोनेसे चित्रविचित्र है ।
§ ३९६. अब इसकी गहराई दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— ३५
दस योजन गहरा है ॥ १६ ॥
१. तद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह मु० । २. -ष्टस्य संस्था-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
§ ३९७. अवगाहोऽधःप्रवेशो निम्नता । दशयोजनान्यवगाहोऽस्य दशयोजनावगाहः ।
§ ३९८. १तन्मध्ये किम्—
तन्मध्ये योजनं पुष्करम् ॥१७॥
§ ३९९. योजनप्रमाणं योजनम्, क्रोशायामपत्रत्वात्क्रोशद्वयविष्कम्भकर्णिकत्वाच्च योजना-
यामविष्कम्भम् । जलतलात्क्रोशद्वयोच्छ्रायनालं तावद्बहुलपत्रप्रचयं पुष्करमवगन्तव्यम् ।
§ ४००. इतरेषां ह्रदानां पुष्कराणां चायामादिनिर्ज्ञानार्थमाह—
तद्द्विगुणद्विगुणा ह्रदाः पुष्कराणि च ॥१८॥
§ ४०१. स च तच्च ते, तयोर्द्विगुणा२ द्विगुणास्तद्विगुणद्विगुणा इति द्वित्वं व्याप्ति३ज्ञाप-
नार्थम् । केन द्विगुणाः । आयामादिना । पद्मह्रदस्य द्विगुणायामविष्कम्भावगाहो महापद्मो४ ह्रदः ।
तस्य द्विगुणायामविष्कम्भावगाहस्तिगिञ्छो५ ह्रद
- ३।२१ § ४०६ ] तृतीयोऽध्यायः १५९
§ ४०३. तेषु पुष्करेषु कर्णिकामध्यदेशनिवेशिनः शरद्विमलपूर्णचन्द्रद्युतिहराः क्रोशायामाः
क्रोशार्द्धविष्कम्भा देशोनक्रोशोत्सेधाः प्रासादाः । तेषु निवसन्तत्येवंशीलास्तन्निवासिन्यः, देव्यः
श्रीह्रीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्मीसंज्ञिकास्तेषु पद्मादिषु यथाक्रमं वेदितव्याः । 'पल्योपमस्थितयः' इत्यने-
नायुषः प्रमाणमुक्तम् । समाने स्थाने भवाः सामानिकाः । सामानिकाश्च परिषदश्च सामानिक-
परिषदः । सह सामानिकपरिषदभिर्वर्त्तन्त इति ससामानिकपरिषत्काः । तस्य पद्मस्य परिवार- ५
पद्मेषु प्रासादानामुपरि सामानिकाः परिषदश्च वसन्ति ।
§ ४०४. यकाभिः सरिद्भिस्तानि क्षेत्राणि प्रविभक्तानि ता उच्यन्ते—
गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्ता-
सुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः ॥२०॥
§ ४०५. सरितो न वाप्यः । ताः किमन्र्तरा उत समीपाः । इत्यत आह तन्मध्यगाः । तेषां १०
क्षेत्राणां मध्यं, तन्मध्यम् । तन्मध्यं तन्मध्येन वा गच्छन्तीति तन्मध्यगाः। एकत्र सर्वासाम्
प्रसंगनिवृत्त्यर्थं दिग्विषेशप्रतिपत्त्यर्थं चाह—
द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः ॥२१॥
§ ४०६. द्वयोर्द्वयोः सरितोरेकैकं क्षेत्रं विषय इति वाक्यशेषाभिसंबन्धादेकत्र सर्वासाम्
प्रसंगनिवृत्तिः कृता । 'पूर्वाः पूर्वगाः' इति वचनं दिग्विषेशप्रतिपत्त्यर्थम् । तत्र पूर्वा याः सरितस्ताः १५
पूर्वगाः । ^१पूर्वजलधिं गच्छन्तीति पूर्वगाः । किमपेक्षं पूर्वत्वम् । सूत्रनिर्देशापेक्षम् । यद्येवं गङ्गा-
§ ४०३. इन कमलोंकी कर्णिकाके मध्यमें शरत्कालीन निर्मल पूर्ण चन्द्रमाकी कान्तिको
हरनेवाले एक कोस लम्बे, आधा कोस चौड़े और पौन कोस ऊँचे महल हैं । उनमें निवास करने-
वाली श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नामवाली देवियाँ क्रमसे पद्म आदि छह कमलोंमें
जानना चाहिए। 'उनकी स्थिति एक पल्यकी है' इस पदके द्वारा उनकी आयुका प्रमाण कहा है। २०
समान स्थानमें जो होते हैं वे सामानिक कहलाते हैं। सामानिक और परिषत्क ये देव हैं । वे
देवियां इनके साथ रहती हैं। तात्पर्य यह है कि मुख्य कमलके जो परिवार कमल हैं उनके महलों-
में सामानिक और परिषद् जातिके देव रहते हैं ।
§ ४०४. जिन नदियोंसे क्षेत्रोंका विभाग हुआ है अब उन नदियोंका कथन करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं— २५
इन भरत आदि क्षेत्रोंमेंसे गंगा, सिन्धु, रोहित, रोहितास्या, हरित, हरिकान्ता, सीता,
सीतोदा, नारी, नरकान्ता, सुवर्णकूला, रूप्यंकूला, रक्ता और रक्तोदा नदियाँ बही हैं ॥ २० ॥
§ ४०५. ये नदियाँ हैं तालाब नहीं। वे नदियां अन्तरालसे हैं या पास-पास इस बातका
खुलासा करनेके लिए सूत्रमें 'तन्मध्यगाः' पद दिया है। इसका यह भाव है कि उन क्षेत्रोंमें या उन
क्षेत्रोंमें-से होकर वे नदियां बही हैं। एक स्थानमें सबका प्रसंग प्राप्त होता है अतः इसका ३०
निराकरण करके दिशा विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
दो-दो नदियोंमें-से पहली-पहली नदी पूर्व समुद्रको जाती है ॥ २१ ॥
§ ४०६. इस सूत्रमें 'दो-दो नदियां एक-एक क्षेत्रमें हैं' इस प्रकार वाक्यविशेषका सम्बन्ध
कर लेनेसे एक क्षेत्रमें सब नदियोंके प्रसंग होनेका निराकरण हो जाता है। 'पूर्वाः पूर्वगाः' यह
वचन दिशाविशेषका ज्ञान करानेके लिए दिया है । इन नदियोंमें जो प्रथम नदियां हैं वे पूर्व समुद्र- ३५
में जाकर मिली हैं । सूत्रमें जो 'पूर्वगाः' पद है उसका अर्थ 'पूर्व समुद्रको जाती हैं' यह है ।
१. मध्यं तन्मध्यं तन्मध्येन मु० । मध्यं तन्मध्येन आ०, दि० १, दि० २ । २. -पूर्वं जलंधि मु० ।
सिन्ध्वादयः सप्त पूर्वगा इति प्राप्तम् । नैष दोषः; द्वयोर्द्वयोरित्यभिसंबन्धात् । द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः
पूर्वगा इति वेदितव्याः ।
§ ४०७. इतरासां दिग्भागप्रतिपत्त्यर्थमाह—
शेषास्त्वपरगाः ॥२२॥
§ ४०८. द्वयोर्द्वयोर्या अवशिष्टास्ता अपरगाः प्रत्येतव्याः । अपरसमुद्रं गच्छन्तीत्यपरगाः ।
तत्र पद्मह्रदप्रभवा पूर्वतोरणद्वारनिर्गता गङ्गा । अपरतोरणद्वारनिर्गता सिन्धुः । उदीच्यतोरणद्वार-
निर्गता रोहितास्या । महापद्मह्रदप्रभवा १अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता रोहित् । उदीच्यतोरणद्वार-
निर्गता हरिकान्ता । तिगिञ्छह्रदप्रभवा दक्षिणतोरणद्वारनिर्गता हरित् । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता
सीतोदा । केसरिह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सीता । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता नरकान्ता ।
महापुण्डरीकह्रदप्रभवा दक्षिणद्वारनिर्गता नारी । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता रूप्यकूला । पुण्डरीक-
ह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सुवर्णकूला । पूर्वतोरणद्वारनिर्गता रक्ता । २प्रतीच्यतोरणद्वार-
निर्गता रक्तोदा ।
§ ४०९. तासां परिवारप्रतिपादनार्थमाह—
चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृत्ता गङ्गासिन्ध्वादयो नद्यः ॥२३॥
§ ४१०. किमर्थं 'गङ्गासिन्ध्वादि' ग्रहणं क्रियते । नदीग्रहणार्थम् । प्रकृतास्ता अभिसंब-
शंका—पूर्वत्व किस अपेक्षासे है ? समाधान—सूत्रमें किये गये निर्देशकी अपेक्षा । शंका—यदि
ऐसा है तो गंगा, सिन्धु आदि सात नदियां पूर्व समुद्रको जानेवाली प्राप्त होती हैं ? समाधान—यह
कोई दोष नहीं, क्योंकि 'द्वयोः द्वयोः' इन पदोंका सम्बन्ध है । तात्पर्य यह है कि दो-दो नदियोंमें-से
प्रथम-प्रथम नदी बहकर पूर्व समुद्रमें मिली है ।
§ ४०७. अब इतर नदियोंके दिशाविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
किन्तु शेष नदियाँ पश्चिम समुद्रको जाती हैं ॥ २२ ॥
§ ४०८. दो-दो नदियोंमें जो शेष नदियाँ हैं वे बहकर पश्चिम समुद्रमें मिली हैं । 'अपरगाः'
पदका अर्थ अपर समुद्रको जाती हैं यह है । उनमें-से पद्म तालाबसे उत्पन्न हुई और पूर्व तोरण
द्वारसे निकली हुई गंगा नदी है । पश्चिम तोरण द्वारसे निकली हुई सिन्धु नदी है तथा उत्तर
तोरण द्वारसे निकली हुई रोहितास्या नदी है । महापद्म तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरण-
द्वारसे निकली हुई रोहित नदी है तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई हरिकान्ता नदी है। तिगिञ्छ
तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई हरित नदी है और उत्तर तोरण द्वारसे
निकली हुई सीतोदा नदी है । केसरी तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई
सीता नदी है तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई नरकान्ता नदी है । महापुण्डरीक तालाबसे
उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई नारी नदी है । तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली
हुई रूप्यकूला नदी है । पुण्डरीक तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई
सुवर्णकूला नदी है । पूर्व तोरणद्वारसे निकली हुई रक्ता नदी है और पश्चिम तोरणद्वारसे निकली
हुई रक्तोदा नदी है ।
§ ४०९. अब इनकी परिवार-नदियोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
गंगा और सिन्धु आदि नदियोंको चौदह-चौदह हजार परिवार नदियाँ हैं ॥ २३ ॥
§ ४१०. शंका—'गंगा सिन्धु आदि' पदका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान—नदियों-
१. अपाच्यतोरण-आ० २, दि० १, दि० २, ता०, ना० । २. अपरतोरण-मु० ।
- ३।२५ § ४१४ ] तृतीयोऽध्यायः १६१
ध्यन्ते । नैवं शङ्क्यम्; 'अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा' इति अपरगाणामेव ग्रहणं स्यात् ।
गङ्गादिग्रहणमेवास्तीति चेत् । पूर्वगाणामेव ग्रहणं स्यात् । अत उभयीनां ग्रहणार्थं 'गङ्गासिन्ध्वादि'
ग्रहणं क्रियते । 'नदी'ग्रहणं द्विगुणा द्विगुणा इत्यभिसंबन्धार्थम् । गङ्गा चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता ।
सिन्धुरपि । एवमुत्तरा अपि नद्यः प्रतिक्षेत्रं तद्द्विगुणद्विगुणा² भवन्ति; आ विदेहान्तात् । तत उत्तरा
अर्द्धार्द्धहीनाः ।
§ ४११. उक्तानां क्षेत्राणां विष्कम्भप्रतिपत्त्यर्थमाह—
भरतः षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारः षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥२४॥
§ ४१२. षडधिका विंशतिः षड्विंशतिः । षड्विंशतिरधिका³ येषु तानि षड्विंशानि ।
षड्विंशानि पञ्चयोजनशतानि विस्तारो यस्य षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारो भरतः । किमेता-
वानेव । न; इत्याह षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य विस्तारोऽस्येत्यभिसंबध्यते ।
§ ४१३. इतरेषां विष्कम्भविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
तद्द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः ॥२५॥
§ ४१४. ⁴ततो भरताद् द्विगुणो द्विगुणो विस्तारो येषां त इमे तद्द्विगुणद्विगुणविस्ताराः। के
ते वर्षधरवर्षाः । किं सर्वे । न; इत्याह विदेहान्ता इति ।
का ग्रहण करनेके लिए। शंका—उनका तो प्रकरण है ही, अतः 'गंगासिन्ध्वादि' पदके बिना ग्रहण
किये ही उनका सम्बन्ध हो जाता है ? समाधान—ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'अनन्तर-
का विधान होता है या प्रतिषेध' इस नियमके अनुसार पश्चिमकी ओर बहनेवाली नदियोंका ही
ग्रहण होता जो कि इष्ट नहीं अतः सूत्रमें 'गंगासिन्ध्वादि' पद दिया है। शंका—तो सूत्रमें 'गंगादि'
इतने पदका ही ग्रहण रहे ? समाधान—यदि 'गंगादि' इतना पदका ही ग्रहण किया जाये तो पूर्व-
की ओर बहनेवाली नदियोंका ही ग्रहण होवे जो भी इष्ट नहीं। अतः दोनों प्रकारकी नदियोंका
ग्रहण करनेके लिए 'गंगासिन्ध्वादि' पदका ग्रहण किया है। यद्यपि 'गंगासिन्ध्वादि' इतने पदके
ग्रहण करनेसे ही यह बोध हो जाता है कि ये नदियां हैं फिर भी सूत्रमें जो 'नदी' पदका ग्रहण
किया है वह 'द्विगुणा द्विगुणाः' इसके सम्बन्धके लिए किया है। गंगाकी परिवार नदियां चौदह
हजार हैं। इसी प्रकार सिन्धुकी भी परिवार नदियां चौदह हजार हैं। इस प्रकार आगेकी परिवार
नदियां विदेह क्षेत्र पर्यन्त दूनी-दूनी होती गयी हैं। और इससे आगेकी परिवार नदियां आधी-
आधी होती गयी हैं।
§ ४११. अब उक्त क्षेत्रोंके विस्तारका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत क्षेत्रका विस्तार पाँच सौ छब्बीस सही छह बटे उन्नीस योजन है ॥ २४ ॥
§ ४१२. यहाँ टीकामें 'पहले 'षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारः' पदका समास किया गया
है जिसका अभिप्राय यह है कि भरतवर्ष पांच सौ छब्बीस योजनप्रमाण विस्तार है ? शंका—क्या
इसका इतना ही विस्तार है ? समाधान—नहीं, क्योंकि इसका एक योजनका छह बटे उन्नीस
योजन विस्तार और जोड़ लेना चाहिए।
§ ४१३. अब इतर क्षेत्रोंके विस्तार विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विदेह पर्यन्त पर्वत और क्षेत्रोंका विस्तार भरत क्षेत्रके विस्तारसे दूना-दूना है ॥ २५ ॥
§ ४१४. जिनका भरतसे दूना-दूना विस्तार है वे भरतसे दूने-दूने विस्तारवाले कहे गये हैं।
यहाँ 'तद्द्विगुणद्विगुणविस्ताराः' में बहुव्रीहि समास है। शंका—वे दूने-दूने विस्तारवाले क्या हैं ?
समाधान—पर्वत और क्षेत्र। शंका—क्या सबका दूना-दूना विस्तार है ? समाधान—नहीं, किन्तु
१. पा० म० मा०, पृ० ३३५ । २. -क्षेत्रं द्विगुणा द्विगुणा मु० । ३. -रधिकानि येषु मु० । ४. ततो
द्विगुणो ता०, ना० ।
२१
§ ४१५. अथोत्तरेषां कथमित्यत आह—
उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥२६॥
§ ४१६. उत्तरा ऐरावतादयो नीलान्ता भरतादिभिर्दक्षिणैस्तुल्या द्रष्टव्याः । अतीतस्य
सर्वस्यायं विशेषो वेदितव्यः । तेन ह्रदपुष्करादीनां तुल्यता योज्या ।
§ ४१७. अत्राह, उक्तेषु भरतादिषु क्षेत्रेषु मनुष्याणां किं तुल्योऽनुभवादिः१, आहोस्विदस्ति
कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ॥२७॥
§ ४१८. वृद्धिश्च ह्रासश्च वृद्धिह्रासौ । काभ्याम् । षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ।
कयोः । भरतैरावतयोः । न तयोः क्षेत्रयोर्वृद्धिह्रासौ स्तः; असंभवात् । तत्स्थानां मनुष्याणां वृद्धि-
ह्रासौ भवतः । अथवाधिकरणनिर्देशः । भरते ऐरावते च मनुष्याणां वृद्धिह्रासाविति । किंकृतौ
वृद्धिह्रासौ । अनुभवायुःप्रमाणादिकृतौ । अनुभव उपभोगः, आयुर्जीवितपरिमाणम्३, प्रमाणं
शरीरोत्सेध इत्येवमादिभिर्वृद्धिह्रासौ मनुष्याणां भवतः४ । किंहेतुकौ पुनस्तौ । कालहेतुकौ । स च
कालो द्विविधः-उत्सर्पिणी अवसर्पिणी चेति । तद्भेदाः प्रत्येकं षट् । अन्वर्थसंज्ञे चैते । अनुभवादि-
विदेह तक दूना-दूना विस्तार है ।
§ ४१५. आगेके पर्वत और क्षेत्रोंका विस्तार किस प्रकार है अब इस बात के बतलानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
उत्तरके क्षेत्र और पर्वतोंका विस्तार दक्षिणके क्षेत्र और पर्वतोंके समान है ॥ २६ ॥
§ ४१६. 'उत्तर' इस पदसे ऐरावत क्षेत्रसे लेकर नील पर्यन्त क्षेत्र और पर्वत लिये गये हैं ।
इनका विस्तार दक्षिण दिशावर्ती भरतादिके समान जानना चाहिए । पहले जितना भी कथन कर
आये हैं उन सबमें यह विशेषता जाननी चाहिए । इससे तालाब और कमल आदिकी समानता
लगा लेनी चाहिए ।
§ ४१७. यहाँपर शंकाकार कहता है कि इन पूर्वोक्त, भरतादि क्षेत्रोंमें मनुष्योंका अनुभव आदि
क्या समान हैं या कुछ विशेषता है । इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत और ऐरावत क्षेत्रोंमें उत्सर्पिणीके. और अवसर्पिणीके छह समयोंकी अपेक्षा वृद्धि और
ह्रास होता रहता है ॥ २७ ॥
§ ४१८. वृद्धि और ह्रास इन दोनों पदोंमें कर्मधारय समास है । शंका—किनकी अपेक्षा
वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान—छह समयोंकी अपेक्षा । शंका—किनका छह समयोंकी
अपेक्षा वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान—भरत और ऐरावत क्षेत्रका । इसका यह
मतलब नहीं कि उन क्षेत्रोंका वृद्धि और ह्रास होता है, क्योंकि ऐसा होना असम्भव है । किन्तु
उन क्षेत्रोंमें रहनेवाले मनुष्योंका वृद्धि और ह्रास होता है । अथवा, 'भरतैरावतयोः' षष्ठी
विभक्ति न होकर अधिकरणमें यह निर्देश किया है जिससे इस प्रकार अर्थ होता है कि भरत
और ऐरावत क्षेत्रमें मनुष्योंकी वृद्धि और ह्रास होता है । शंका—यह वृद्धि और ह्रास
किंनिमित्तक होता है ? समाधान—अनुभव, आयु और प्रमाण आदि निमित्तक होता है ।
अनुभव, उपभोगको कहते हैं, जीवित रहनेके परिमाणको आयु कहते हैं । और शरीरकी
ऊँचाईको प्रमाण कहते हैं । इस प्रकार इन पूर्वोक्त कारणोंसे और अन्य कारणोंसे मनुष्योंका वृद्धि
और ह्रास होता है । शंका—ये वृद्धि-ह्रास किस निमित्तसे होते हैं ? समाधान--ये कालके निमित्त
से होते हैं । वह काल दो प्रकारका है-उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी । और इनमें-से प्रत्येकके छह
१. -तुल्योऽनुभवः आहो-ता०, ना० । २. -याभ्याम् । कयोः मु० । ३. -परिमाणम्, शरी -मु० । ४. भवतः
तयोः । किहेतु-ता०, ना० ।
- ३।२९ § ४२१ ] तृतीयोऽध्यायः १६३
भिरुत्सर्पणशीला उत्सर्पिणी । तैरेवावसर्पणशीला अवसर्पिणी । तत्रावसर्पिणी षड्विधा—सुषमसुषमा
सुषमा सुषमदुःषमा दुःषमसुषमा दुःषमा अतिदुःषमा चेति । उत्सर्पिण्यपि अतिदुःषमाद्या सुषमसुष-
मान्ता षड्विधैव भवति । अवसर्पिण्याः परिमाणं दशसागरोपमकोटीकोट्यः । उत्सर्पिण्या अपि
तावत्य एव । सोभयी कल्प इत्याख्याते । तत्र सुषमसुषमा चतस्रः सागरोपमकोटीकोट्यः ।
तदादौ मनुष्या उत्तरकुरुमनुष्यतुल्याः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमा भवति तिस्रः सागरोपम-
कोटीकोट्यः । तदादौ मनुष्या हरिवर्षमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमदुःषमा भवति
द्वे सागरोपमकोटीकोट्यौ । तदादौ मनुष्या हैमवतकमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां दुःषम-
सुषमा भवति एकसागरोपमकोटीकोटी द्विचत्वारिंशद्वर्षसहस्रोना । तदादौ मनुष्या विदेहजनतुल्या
भवन्ति । ततः क्रमेण हानौ सत्यां दुःषमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि । ततः क्रमेण हानौ सत्या-
मतिदुःषमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि । एवमुत्सर्पिण्यपि विपरीतक्रमा वेदितव्या ।
§ ४१९. अथेतरासु भूमिषु कावस्थेत्यत आह—
ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२८॥
§ ४२०. ताभ्यां भरतैरावताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता भवन्ति । न हि तत्रोत्सर्पिण्यव-
सर्पिण्यौ स्तः ।
§ ४२१. किं तासु भूमिषु मनुष्यास्तुल्यायुष आहोस्चित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आह—
एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्षकदैवकुरवकाः ॥२९॥
भेद हैं । ये दोनों काल सार्थक नामवाले हैं। जिसमें अनुभव आदिकी वृद्धि होती है वह उत्सर्पिणी
काल है । और जिसमें इनका ह्रास होता है वह अवसर्पिणी काल है। अवसर्पिणीके छह
भेद हैं—सुषमसुषमा, सुषमा, सुषमदुःषमा, दुःषमसुषमा, दुःषमा और अतिदुःषमा । इसी प्रकार
उत्सर्पिणी भी अतिदुःषमासे लेकर सुषमसुषमा तक छह प्रकारकी है। अवसर्पिणी कालका
परिमाण दस कोड़ाकोड़ी सागर है और उत्सर्पिणी भी इतना ही है। ये दोनों मिलकर एक
कल्पकाल कहे जाते हैं। इनमें-से सुषमसुषमा चार कोड़ाकोड़ी सागरका होता है। इसके
प्रारम्भमें मनुष्य उत्तरकुरुके मनुष्योंके समान होते हैं। फिर क्रमसे हानि होनेपर तीन कोड़ा-
कोड़ी सागर प्रमाण सुषमा काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हरिवर्षके मनुष्योंके
समान होते हैं। तदनन्तर क्रमसे हानि होनेपर दो कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण सुषमदुःषमा
काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हैमवतके मनुष्योंके समान होते हैं। तदनन्तर
क्रमसे हानि होकर ब्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागरका दुःषमसुषमा काल
प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य विदेह क्षेत्रके मनुष्योंके समान होते हैं। तदनन्तर क्रमसे
हानि होकर इक्कीस हजार वर्षका दुःषमा काल प्राप्त होता है। तदनन्तर क्रमसे हानि
होकर इक्कीस हजार वर्षका अतिदुःषमा काल प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्सर्पिणी भी इससे
विपरीत क्रमसे जाननी चाहिए।
§ ४१९. इतर भूमियोंमें क्या अवस्था है अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
भरत और ऐरावतके सिवा शेष भूमियां अवस्थित हैं ॥ २८ ॥
§ ४२०. सूत्रमें 'ताभ्याम्' पदसे भरत और ऐरावत क्षेत्रका ग्रहण किया है। इन दोनों
क्षेत्रोंसे शेष भूमियां अवस्थित हैं। उन क्षेत्रोंमें उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल नहीं हैं।
§ ४२१. इन भूमियोंमें मनुष्य क्या तुल्य आयुवाले होते हैं या कुछ विशेषता है। इस बातके
बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
हैमवत, हरिवर्ष और देवकुरुके प्राणियोंकी स्थिति क्रमसे एक, दो और तीन पल्य
प्रमाण है ॥ २९ ॥
१६४ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३० § ४२२ –
§ ४२२. हैमवते भवा हैमवतका इत्येवं 'वुञि' सति मनुष्यसंप्रत्ययो भवति । एवमुत्तरयो-
रपि । हैमवतकादयस्त्रयः । एकादयस्त्रयः । तत्र यथासंख्यमभिसंबन्धः क्रियते । एकपल्योपमस्थितयो
हैमवतकाः । द्विपल्योपमस्थितयो हारिवर्षकाः । त्रिपल्योपमस्थितयो दैवकुरवका इति । तत्र पञ्चसु
हैमवतेषु सुषमदुःषमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या एकपल्योपमायुषो द्विधनुःसहस्रोच्छ्रिताश्चतुर्थ-
भक्ताहारा नीलोत्पलवर्णाः । पञ्चसु हरिवर्षेषु सुषमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या द्विपल्योपमायुष-
श्चापसहस्रोत्सेधाः षष्ठभक्ताहाराः शङ्खवर्णाः । पञ्चसु देवकुरुषु सुषमसुषमा सदावस्थिता । तत्र
मनुष्या स्त्रिपल्योपमायुषः षड्धनुःसहस्रोच्छ्राया अष्टमभक्ताहाराः कनकवर्णाः ।
§ ४२३. अथोत्तरेषु कावस्थेत्यत आह—
तथोत्तराः ॥३०॥
§ ४२४. यथा दक्षिणा व्याख्यातास्तथैवोत्तरा वेदितव्याः । हैरण्यवतका हैमवतकैस्तुल्याः ।
रम्यका हारिवर्षकैस्तुल्याः । दैवकुरवकैरौत्तरकुरवकाः समाख्याताः ।
§ ४२५. अथ विदेहेष्ववस्थितेषु का स्थितिरित्यत्रोच्यते—
विदेहेषु संख्येयकालाः ॥३१॥
§ ४२६. १सर्वेषु विदेहेषु संख्येयकाला मनुष्याः । तत्र कालः २सुषमदुष्षमान्तोपमः सदा-
§ ४२२. हैमवत क्षेत्रमें उत्पन्न हुए हैमवतक कहलाते हैं। यहां हैमवंत शब्दसे 'वुञ्' प्रत्यय
करके हैमवतक शब्द बना है जिससे मनुष्योंका ज्ञान होता है। इसी प्रकार आगेके हारिवर्षक और
दैवकुरवंक इन दो शब्दोंमें जान लेना चाहिए। हैमवतक आदि तीन हैं और एक आदि तीन हैं।
यहाँ इनका क्रमसे सम्बन्ध करते हैं जिससे यह अर्थ हुआ कि हैमवत क्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति एक
पल्यकी है। हरिवर्ष क्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति दो पल्यकी है और देवकुरुक्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति
तीन पल्यकी है। ढाई द्वीपमें जो पाँच हैमवत क्षेत्र हैं उनमें सदा सुषमदुषमा काल है । वहाँ
मनुष्योंकी आयु एक पल्यकी है, शरीरकी ऊँचाई दो हजार धनुष है, उनका आहार एक दिनके
अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग नील कमलके समान है। पाँच हरिवर्ष नामके क्षेत्रोंमें सदा
सुषमा काल रहता है। वहाँ मनुष्योंकी आयु दो पल्यकी है, शरीरकी ऊँचाई चार हजार धनुष है,
उनका आहार दो दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग शंखके समान सफेद है। पाँच
देवकुरु नामके क्षेत्रमें सदा सुषमसुषमा काल है। वहाँ मनुष्योंकी आयु तीन पल्यकी है, शरीरकी
ऊँचाई छह हजार धनुष है। उनका भोजन तीन दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग
सोनेके समान पीला है।
§ ४२३. उत्तर दिशावर्ती क्षेत्रोंमें क्या अवस्था है इसके बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र
कहते हैं—
दक्षिणके समान उत्तरमें है ॥ ३०॥
§ ४२४. जिस प्रकार दक्षिणके क्षेत्रोंका व्याख्यान किया उसी प्रकार उत्तरके क्षेत्रोंका
जानना चाहिए। हैरण्यवत क्षेत्रोंके मनुष्योंकी सब बातें हैमवतके मनुष्योंके समान हैं, रम्यक क्षेत्रके
मनुष्योंकी सब बातें हरिवर्ष क्षेत्रके मनुष्योंके समान हैं और देवकुरु क्षेत्रके मनुष्योंकी सब बातें
उत्तरकुरु क्षेत्रके मनुष्योंके समान हैं।
§ ४२५. पाँच विदेहोंमें क्या स्थिति है इसके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विदेहोंमें संख्यात वर्षकी आयुवाले प्राणी हैं ॥ ३१ ॥
§ ४२६. सब विदेहोंमें संख्यात वर्षकी आयुवाले मनुष्य होते हैं। वहाँ सुषमदुःषमा कालके
१. सर्वेषु पञ्चसु महाविदे-मु० । २. कालः दुःषमसुषमादिः सदा तां०, ना० ।