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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

– २४४ § ३०८ ] द्वितीयोऽध्यायः १२९
सर्वघातिस्पर्धकोदये च शरीरनामलाभावष्टम्भे एकेन्द्रियजातिनामोदयवशवर्तितायां च सत्यां
स्पर्शनमेकमिन्द्रियमाविर्भवति ।
§ ३०५. इतरेषामिन्द्रियाणां स्वामित्वप्रदर्शनार्थमाह—
कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ॥ २३ ॥
§ ३०६. ‘एकैकम्’ इति वीप्सायां द्वित्वम् । एकैकेन वृद्धानि एकैकवृद्धानि । कृमिमादिं¹
कृत्वा, स्पर्शनाधिकारात् स्पर्शनमादिं कृत्वा एकैकवृद्धानीत्यभिसंबन्धः क्रियते । ‘आदि’शब्दः
प्रत्येकं परिसमाप्यते । कृम्यादीनां स्पर्शनं रसनाधिकम्, पिपीलिकादीनां स्पर्शनरसने घ्राणाधिके,
भ्रमरादीनां स्पर्शनरसनघ्राणानि चक्षुरधिकानि, मनुष्यादीनां तान्येव श्रोत्राधिकानीति यथा-
संख्येनाभिसंबन्धो व्याख्यातः । तेषां निष्पत्तिः स्पर्शनोत्पत्त्या व्याख्याता उत्तरोत्तरसर्वघाति-
स्पर्धकोदयेन ।
§ ३०७. एवमेतेषु संसारिषु द्विभेदेषु इन्द्रियभेदात्पञ्चविधेषु ये पञ्चेन्द्रियास्तद्भेदस्या-
नुक्तस्य प्रतिपादनार्थमाह—
संज्ञिनः समनस्काः ॥२४॥
§ ३०८. मनो व्याख्यातम् । सह तेन ये वर्तन्ते ते समनस्काः । संज्ञिन² इत्युच्यन्ते । पारि-
शेष्यादितरे संसारिणः प्राणिनोऽसंज्ञिन इति सिद्धम् । ननु च संज्ञिन इत्यनेनैव गतार्थत्वात्समनस्का
न्तराय तथा स्पर्शन इन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमके होनेपर और शेष इन्द्रियोंके सर्वघाती
स्पर्धकोंके उदयके होनेपर तथा शरीर नामकर्मके आलम्बनके होनेपर और एकेन्द्रिय जाति नाम-
कर्मके उदयकी आधीनताके रहते हुए एक स्पर्शन इन्द्रिय प्रकट होती है
§ ३०५. अब इतर इन्द्रियोंके स्वामित्वका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
कृमि, पिपीलिका, भ्रमर और मनुष्य आदिके क्रमसे एक-एक इन्द्रिय अधिक होती है ॥२३॥
§ ३०६. ‘एकैकम्’ यह वीप्सामें द्वित्व है । इन्द्रियाँ एक-एकके क्रमसे बढ़ी हैं इसलिए वे
‘एकैकवृद्ध’ कही गयी हैं । ये इन्द्रियाँ कृमिसे लेकर बढ़ी हैं । यहाँ स्पर्शन इन्द्रिय का अधिकार
स्पर्शन इन्द्रियसे लेकर एक-एकके होनेसे क्रमसे बढ़ी हैं इस प्रकार यहाँ सम्बन्ध कर लेना चाहिए ।
आदि शब्दका प्रत्येकके साथ सम्बन्ध होता है । जिससे यह अर्थ हुआ कि कृमि आदि जीवोंके
स्पर्शन और रसना ये दो इन्द्रियाँ होती हैं । पिपीलिका आदि जोवोंके स्पर्शन, रसना और घ्राण
ये तीन इन्द्रियाँ होतो हैं । भ्रमर आदि जीवोंके स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षु ये चार
इन्द्रियाँ होती हैं । मनुष्यादिकके श्रोत्र इन्द्रियके और मिला देनेपर पांच इन्द्रियाँ होती हैं ।
इस प्रकार उक्त जीव और इन्द्रिय इनका यथाक्रमसे सम्बन्धका व्याख्यान किया । पहले स्पर्शन
इन्द्रियकी उत्पत्तिका व्याख्यान कर आये हैं उसी प्रकार शेष इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका व्याख्यान
करना चाहिए । किन्तु उत्पत्तिके कारणका व्याख्यान करते समय जिस इन्द्रियकी उत्पत्तिके
कारणका व्याख्यान किया जाय, वहाँ उससे अगली इन्द्रिय सम्बन्धी सर्वघाती स्पर्धकोंके उदयके
साथ वह व्याख्यान करना चाहिए ।
§ ३०७. इस प्रकार इन दो प्रकारके और इन्द्रिय-भेदोंकी अपेक्षा पाँच प्रकारके संसारी
जीवमें जो पंचेन्द्रिय जीव हैं उनके भेद नहीं कहे अतः उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
मनवाले जीव संज्ञी होते हैं ॥२४॥
§ ३०८. मनका व्याख्यान कर आये । उसके साथ जो रहते हैं वे समनस्क कहलाते हैं ।
१. –किस्यादिं आ० । –कृम्यादि दि० १, दि० २ । २. –ज्ञिनः उच्च्य-दि० १, दि० २, आ० ।
१७

इति विशेषणमनर्थकम्¹ । यतो मनोव्यापारो हिताहितप्राप्तिपरिहारपरीक्षा । संज्ञापि सैवेति ।
नैतद्युक्तम्, संज्ञाशब्दार्थव्यभिचारात् । संज्ञा नामेत्युच्यते । तद्वन्तः संज्ञिन इति सर्वेषामतिप्रसङ्गः ।
संज्ञा ज्ञानमिति चेत्; सर्वेषां प्राणिनां ज्ञानात्मकत्वादतिप्रसङ्गः । आहारादिविषयाभिलाषः संज्ञेति
चेत् । तुल्यम् । तस्मात्समनस्का इत्युच्यते । एवं च कृत्वा गर्भाण्डजमूर्च्छितसुषुप्त्याद्यवस्थासु
५ हिताहितपरीक्षाभावेऽपि मनःसंनिधानात्संज्ञित्वमुपपन्नं भवति ।
§ ३०९. यदि हिताहितादिविषयपरिस्पन्दः प्राणिनां मनःप्रणिधानपूर्वकः । अथाभिनव-
शरीरग्रहणं प्रत्यागूर्णस्य विशीर्णपूर्वमूर्तेर्निर्मनस्कस्य यत्कर्म तत्कृत इत्युच्यते—
विग्रहगतौ कर्मयोगः ॥२५॥
§ ३१०. विग्रहो देहः । विग्रहार्था गतिर्विग्रहगतिः । अथवा विरुद्धो ग्रहो विग्रहो व्याघातः² ।
१० कर्मादानेऽपि नोकर्मपुद्गलादाननिरोध इत्यर्थः । विग्रहेण गतिर्विग्रहगतिः । सर्वशरीरप्ररोहणबीज-
और उन्हें ही संज्ञी कहते हैं । परिशेष न्यायसे यह सिद्ध हुआ कि इनसे अतिरिक्त जितने संसारी
जीव होते हैं वे सब असंज्ञी होते हैं । शंका—सूत्रमें 'संज्ञिनः' इतना पद देनेसे ही काम चल जाता
है, अतः 'समनस्काः' यह विशेषण देना निष्फल है, क्योंकि हितकी प्राप्ति और अहितके त्यागकी
परीक्षा करनेमें मनका व्यापार होता है और यही संज्ञा है ? समाधान—यह कहना उचित नहीं,
१५ क्योंकि संज्ञा शब्दके अर्थमें व्यभिचार पाया जाता है । अर्थात् संज्ञा शब्दके अनेक अर्थ हैं । संज्ञा-
का अर्थ नाम है । यदि नामवाले जीव संज्ञी माने जायें तो सब जीवोंको संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त
होता है । संज्ञाका अर्थ यदि ज्ञान लिया जाता है तो भी सभी प्राणी ज्ञान स्वभाव होनेसे सबको
संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त होता है । यदि आहारादि विषयोंकी अभिलाषाको संज्ञा कहा जाता है तो
भी पहलेके समान दोष प्राप्त होता है । अर्थात् आहारादि विषयक अभिलाषा सबके पायी जाती
२० है इसलिए भी सबको संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त होता है । चूंकि ये दोष न प्राप्त हों अतः सूत्रमें
'समनस्काः' यह पद रखा है । इससे यह लाभ है कि गर्भज, अण्डज, मूर्च्छित और सुषुप्ति आदि
अवस्थाओंमें हिताहितकी परीक्षाके न होनेपर भो मनके सम्बन्धसे संज्ञीपना बन जाता है ।
विशेषार्थ—प्रायः एकेन्द्रिय आदि प्रत्येक जीव अपने इष्ट विषयमें प्रवृत्ति करता है और
अनिष्ट विषयसे निवृत्त होता है, फिर भो मनकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की गयी है सो इसका
२५ कारण यह है कि तुलनात्मक अध्ययन, लोक-परलोकका विचार, हिताहितका विवेक आदि कार्य
ऐसे हैं जो मनके बिना नहीं हो सकते । इसीसे मनकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की गयी है । यह
मन जिनके होता है वे संज्ञी होते हैं अन्य नहीं । जीवोंका संज्ञी और असंज्ञी यह भेद पंचेन्द्रिय
जीवोंमें ही पाया जाता है । अन्य एकेन्द्रियसे लेकर चतुरिन्द्रिय तकके जीव तो असंज्ञी ही होते
हैं । अर्थात् उनके मन न होनेसे उक्त प्रकारके ज्ञानसे वंचित रहते हैं ।
३० § ३०९. यदि जीवोंके हित और अहित आदि विषयके लिए क्रिया मनके निमित्तसे होती
है तो जिसने पूर्व शरीरको छोड़ दिया है और जो मनरहित है ऐसा जीव जब नूतन शरीरको
ग्रहण करनेके लिए उद्यत होता है तब उसके जो क्रिया होती है वह किस निमित्तसे होती है यही
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विग्रहगतिमें कर्मयोग होता है ॥२५॥
३५ § ३१०. विग्रहका अर्थ देह है । विग्रह अर्थात् शरीरके लिए जो गति होती है वह विग्रह-
गति है । अथवा विरुद्ध ग्रहको विग्रह कहते हैं जिसका अर्थ व्याघात है । तात्पर्य यह है कि जिस
अवस्था में कर्मके ग्रहण होनेपर भी नोकर्मरूप पुद्गलोंका ग्रहण नहीं होता वह विग्रह है और
१. -नर्थकम् । मनो- ता०, मु० । २. नोकर्म- ता०, ना० ।

भूतं कार्मणं शरीरं कर्मेत्युच्यते । योगो वाङ्मनसकायवर्गणानिमित्त आत्मप्रदेशपरिस्पन्दः । कर्मणा
कृतो योगः कर्मयोगो विग्रहगतौ भवतीत्यर्थः । तेन कर्मादानं देशान्तरसंक्रमश्च भवति ।
§ ३११. आह जीवपुद्गलानां गतिमास्कन्दतां देशान्तरसंक्रमः किमाकाशप्रदेशक्रमवृत्त्या
भवति, उताविशेषेणेत्यत आह—
अनुश्रेणि गतिः ॥२६॥
§ ३१२. लोकमध्यादारभ्य ऊर्ध्वमधस्तिर्यक् च आकाशप्रदेशानां क्रमसंनिविष्टानां पङ्क्तिः
श्रेणिः इत्युच्यते । 'अनु'शब्दस्यानुपूर्व्येण वृत्तिः । १श्रेणेरानुपूर्व्येणानुश्रेणीति जीवानां पुद्गलानां
च गतिर्भवतीत्यर्थः । अनधिकृतानां पुद्गलानां कथं ग्रहणमिति चेत् । गतिग्रहणात् । यदि जीवाना-
मेव गतिरिष्टा स्याद् गतिग्रहणमनर्थकम्; अधिकारात्तत्सिद्धेः । उत्तरत्र जीवग्रहणाच्च पुद्गल-
संप्रत्ययः । ननु चन्द्रादीनां ज्योतिष्काणां२ मेरुप्रदक्षिणाकाले विद्याधरादीनां च विश्रेणिगतिरपि
दृश्यते, तत्र किमुच्यते, 'अनुश्रेणि गतिः' इति । कालदेशनियमोऽत्र वेदितव्यः । तत्र कालनियम-
स्तावज्जीवानां मरणकाले भवान्तरसंक्रमे मुक्तानां चोर्ध्वगमनकाले अनुश्रेण्येव गतिः । देश-
नियमोऽपि ऊर्ध्वलोकादधोगतिः, अधोलोकादूर्ध्वगतिः, तिर्यग्लोकादधोगतिरूर्ध्वा वा तत्रानुश्रेण्येव ।
पुद्गलानां च या लोकान्तप्रापिणी सा नियमादनुश्रेण्येव । इतरा गतिर्भजनीया ।
इस विग्रहके साथ होनेवाली गतिका नाम विग्रहगति है । सब शरीरोंकी उत्पत्तिके मूलकारण
कार्मण शरीरको कर्म कहते हैं । तथा वचनवर्गणा, मनोवर्गणा और कायवर्गणाके निमित्तसे होने-
वाले आत्मप्रदेशोंके हलनचलनको योग कहते हैं । कर्मके निमित्तसे जो योग होता है वह कर्मयोग
है । वह विग्रहगतिमें होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इससे नूतन कर्मका ग्रहण और एक
देशसे दूसरे देशमें गमन होता है ।
§ ३११. गमन करनेवाले जीव और पुद्गलोंका एक देशसे दूसरे देशमें गमन आकाश-
प्रदेशोंकी पंक्तिक्रमसे होता है या इसके बिना होता है, अब इसका खुलासा करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
गति श्रेणीके अनुसार होती है ॥२६॥
§ ३१२. लोकके मध्यसे लेकर ऊपर नीचे और तिरछे क्रमसे स्थित आकाशप्रदेशोंकी
पंक्तिको श्रेणी कहते हैं । अनु शब्द 'आनुपूर्वी' अर्थमें समसित है । इसलिए 'अनुश्रेणि' का अर्थ
'श्रेणीकी आनुपूर्वीसे' होता है । इस प्रकारकी गति जीव और पुद्गलोंकी होती है यह इसका भाव
है । शंका—पुद्गलोंका अधिकार न होनेसे यहाँ उनका ग्रहण कैसे हो सकता है ? समाधान—
सूत्रमें गतिपदका ग्रहण किया है इससे सिद्ध हुआ कि अनधिकृत पुद्गल भी यहाँ विवक्षित हैं ।
यदि जीवोंकी गति ही इष्ट होती तो सूत्रमें गति पदके ग्रहण करनेकी आवश्यकता न थी, क्योंकि
गति पदका ग्रहण अधिकारसे सिद्ध है । दूसरे अगले सूत्रमें जीव पदका ग्रहण किया है इसलिए
इस सूत्रमें पुद्गलोंका भी ग्रहण इष्ट है यह ज्ञान होता है । शंका — चन्द्रमा आदि ज्योतिषियोंकी
और मेरुकी प्रदक्षिणा करते समय विद्याधरोंकी विश्रेणी गति देखी जाती है, इसलिए जीव और
पुद्गलोंकी अनुश्रेणि गति होती है यह किसलिए कहा ? समाधान—यहाँ कालनियम और देश-
नियम जानना चाहिए । कालनियम यथा— मरणके समय जब जीव एक भवको छोड़कर दूसरे
भवके लिए गमन करते हैं और मुक्त जीव जब ऊर्ध्व गमन करते हैं तब उनकी गति अनुश्रेणि ही
होती है । देशनियम यथा—जब कोई जीव ऊर्ध्वलोकसे अधोलोकके प्रति या अधोलोकसे ऊर्ध्व-
लोकके प्रति आता जाता है । इसी प्रकार तिर्यग्लोकसे अधोलोकके प्रति या ऊर्ध्वलोकके प्रति
१. –रानुपूर्वेणा-आ० । २. ज्योतिषां आ०, दि० १, दि० २ ।

१३२ सर्वार्थसिद्धौ [ २।२७ § ३१३ -
§ ३१३. पुनरपि गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह -
अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥
§ ३१४. विग्रहो व्याघातः कौटिल्यमित्यर्थः । स यस्यां न विद्यतेऽसावविग्रहा गतिः ।
कस्य । जीवस्य । कीदृशस्य । मुक्तस्य । कथं गम्यते मुक्तस्येति । उत्तरसूत्रे संसारिग्रहणादिह
५ मुक्तस्येति विज्ञायते । ननु च 'अनुश्रेणि गतिः' इत्यनेनैव श्रेण्यन्तरसंक्रमाभावो व्याख्यातः ।
नार्थोऽनेन । पूर्वसूत्रे विश्रेणिगतिरपि क्वचिदस्तीति ज्ञापनार्थमिदं वचनम् । ननु तत्रैव देशकाल-
नियम उक्तः । न; अतस्तत्सिद्धेः ।
§ ३१५. यद्यसङ्गस्यात्मनोऽप्रतिबन्धेन गतिरालोकान्तादवधृतकाला¹ प्रतिज्ञायते, सदेहस्य
पुनर्गतिः किं प्रतिबन्धिनी उत मुक्तात्मवदित्यत आह -
१० विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्भ्यः ॥२८॥
§ ३१६. कालावधारणार्थं 'प्राक्चतुर्भ्यः' इत्युच्यते । 'प्राग्' इति वचनं मर्यादार्थम्, चतुर्था-
त्समयाद्विग्रहवती गतिर्भवति न चतुर्थ इति । कुत इति चेत् । सर्वोत्कृष्टविग्रहनिमित्तनिष्कुट-
क्षेत्रे उत्प्सुः प्राणी निष्कुटक्षेत्रानुपूर्व्यनुश्रेण्यभावादिषु गत्यभावे निष्कुटक्षेत्रप्रापणनिमित्तां त्रिवि-
जाता है तब उस अवस्थामें गति अनुश्रेणि ही होती है । इसी प्रकार पुद्गलोंकी जो लोकके अन्त-
१५ को प्राप्त करानेवाली गति होती है वह अनुश्रेणि ही होती है । हां, इसके अतिरिक्त जो गति होती
है वह अनुश्रेणि भी होती है और विश्रेणि भी । किसी एक प्रकारकी होनेका कोई नियम नहीं है ।
§ ३१३. अब फिर भी गति विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं -
मुक्त जीवकी गति विग्रहरहित होती है ॥२७॥
§ ३१४. विग्रहका अर्थ व्याघात या कुटिलता है । जिस गतिमें विग्रह अर्थात् कुटिलता
२० नहीं होती वह विग्रहरहित गति है । शंका- यह किसके होती है ? समाधान - जीवके । शंका--,
किस प्रकारके जीवके ? समाधान - मुक्त जीवके । शंका- यह किस प्रमाणसे जाना जाता है कि
मुक्तजीवके विग्रहरहित गति होती है ? समाधान-अगले सूत्रमें संसारी पदका ग्रहण किया है
इससे ज्ञात होता है कि इस सूत्रमें मुक्त जीवके विग्रहरहित गति ली गयी है । शंका-'अनुश्रेणि
गतिः' इस सूत्रसे ही यह ज्ञात हो जाता है कि एक श्रेणिसे दूसरी श्रेणिमें संक्रमण नहीं होता फिर
२५ इस सूत्रके लिखनेसे क्या प्रयोजन है ? समाधान - पूर्व सूत्रमें कहींपर विश्रेणिगति भी होती है
इस बातका ज्ञान करानेके लिए यह सूत्र रचा है । शंका- पूर्वसूत्रकी टीकामें ही देशनियम और
कालनियम कहा है ? समाधान-नहीं; क्योंकि उसकी सिद्धि इस सूत्रसे होती है ।
§ ३१५. मुक्तात्माकी लोकपर्यन्त गति बिना प्रतिबन्धके नियत समयके भीतर होती है
यदि ऐसा आपका निश्चय है तो अब यह बतलाइए कि सदेह आत्माकी गति क्या प्रतिबन्धके
३० साथ होती है या मुक्तात्माके समान बिना प्रतिबन्धके होती है, इसी बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं -
संसारी जीवकी गति विग्रहरहित और विग्रहवाली होती है । उसमें विग्रहवाली गति चार
समयसे पहले अर्थात् तीन समय तक होती है ॥२८॥
§ ३१६. कालका अवधारण करनेके लिए 'प्राक्चतुर्भ्यः' पद दिया है । 'प्राक्' पद मर्यादा
३५ निश्चित करनेके लिए दिया है । चार समयसे पहले मोड़ेवाली गति होती है चौथे समयमें नहीं यह
इसका तात्पर्य है । शंका- मोड़ेवाली गति चार समयसे पूर्व अर्थात् तीन समय तक ही क्यों होती
है चौथे समयमें क्यों नहीं होती ? समाधान - निष्कुट क्षेत्रमें उत्पन्न होनेवाले जीवको सबसे अधिक
१. -न्तादवगतकाला मु० ।

  • २।३० § ३२० ] द्वितीयोऽध्यायः १३३
    ग्रहां गतिमारभते नोर्ध्वम्; तथाविधोपपादक्षेत्राभावात् । 'च'शब्दः समुच्चयार्थः । विग्रहवती
    चाविग्रहा¹ चेति ।
    § ३१७. विग्रहवत्या गतेः कालोऽवधृतः । अविग्रहायाः कियान् काल इत्युच्यते—
    एकसमयाऽविग्रहा ॥२९॥
    § ३१८. एकः समयो ²यस्याः सा एकसमया । न विद्यते विग्रहो³ यस्याः सा अविग्रहा । ५
    गतिमतां हि जीवपुद्गलानांमव्याघातैनैकसमयिकी गतिरालोकान्तादपीति ।
    § ३१९. अनादिकर्मसंबन्धसंततौ मिथ्यादर्शनादिप्रत्ययवशात्कर्माण्यादादानो विग्रहगतावप्या-
    हारकः प्रसक्तस्ततो नियमार्थमिदमुच्यते—
    एकं द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः ॥३०॥
    § ३२०. अधिकारात्समयाभिसंबन्धः । 'वा'शब्दो विकल्पार्थः । विकल्पश्च यथेच्छाति- १०
    सर्गः । एकं वा द्वौ वा त्रीन्वा ⁴समयाननाहारको भवतीत्यर्थः । त्रयाणां शरीराणां षण्णां पर्याप्तीनां
    योग्यपुद्गलग्रहणमाहारः । तदभावादनाहारकः । कर्मादानं हि निरन्तरं कार्मणशरीरसद्भावे ।
    उपपादक्षेत्रं प्रति ऋज्ज्व्यां गतौ आहारकः । इतरेषु त्रिषु समयेषु अनाहारकः ॥
    मोड़े लेने पड़ते हैं; क्योंकि वहाँ आनुपूर्वीसे अनुश्रेणिका अभाव होनेसे इषुगति नहीं हो पाती ।
    अतः यह जीव निष्कुट क्षेत्रको प्राप्त करनेके लिए तीन मोड़ेवाली गतिका आरम्भ करता. है । यहाँ १५
    इससे अधिक मोड़ोंकी आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि इस प्रकारका कोई उपपादक्षेत्र नहीं पाया
    जाता, अतः मोड़ेवाली गति तीन समय तक ही होती है, चौथे समयमें नहीं होती । 'च' शब्द
    समुच्चयके लिए दिया है । जिससे विग्रहवाली और विग्रहरहित दोनों गतियोंका समुच्चय होता है ।
    § ३१७. विग्रहवाली गतिका काल मालूम पड़ा । अब विग्रहरहित गतिका कितना काल
    है इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
    एक समयवाली गति विग्रहरहित होती है ॥२९॥
    § ३१८. जिस गतिमें एक समय लगता है वह एक समयवाली गति है । जिस गतिमें विग्रह
    अर्थात् मोड़ा नहीं लेना पड़ता वह मोड़ारहित गति है । गमन करनेवाले जीव और पुद्गलोंके
    व्याघातके अभावमें एक समयवाली गति लोकपर्यन्त भी होती है यह इस सूत्रका तात्पर्य है ।
    § ३१९. कर्मबन्धकी परम्परा अनादिकालीन है अतः मिथ्यादर्शन आदि बन्ध कारणोंके २५
    वशसे कर्मोंको ग्रहण करनेवाला जीव विग्रहगतिमें भी आहारक प्राप्त होता है, अतः नियम करनेके
    लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    एक, दो या तीन समय तक जीव अनाहारक रहता है ॥३०॥
    § ३२०. समयका अधिकार होनेसे यहाँ उसका सम्बन्ध होता है । 'वा' पदका अर्थ विकल्प
    है और विकल्प जहाँ तक अभिप्रेत है वहाँ तक लिया जाता है । जीव एक समय तक, दो समय ३०
    तक या तीन समय तक अनाहारक होता है यह इस सूत्रका अभिप्राय है । तीन शरीर और छह
    पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गलोंके ग्रहण करनेको आहार कहते हैं । जिन जीवोंके इस प्रकारका आहार
    नहीं होता वे अनाहारक कहलाते हैं । किन्तु कार्मण शरीरके सद्भावमें कर्मके ग्रहण करनेमें
    अन्तर नहीं पड़ता । जब यह जीव उपपादक्षेत्रके प्रति ऋजुगतिमें रहता है तब आहारक होता
    है । बाकीके तीन समयोंमें अनाहारक होता है । ३५
    १. चाविग्रहवती चेति मु० । २. समयोऽस्याः, एक-आ०, दि० १ । समयोऽस्याः सा एक- दि० २, ता०,
    ना० । ३. -ग्रहोऽस्याः अवि-आ०, दि० १, ता०, ना० । ४. 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे ।' -पा० २, ३, ५ ।

१३४ सर्वार्थसिद्धौ [ २।३१ § ३२१ –
§ ३२१. एवं गच्छतोऽभिनवमूर्त्यन्तरनिर्वृत्तिप्रकारप्रतिपादनार्थमाह—
सम्मूर्च्छनगर्भोषपादा जन्म ॥३१॥
§ ३२२. त्रिषु लोकेषूर्ध्वमधस्तिर्यक् च देहस्य समन्ततो मूच्छनं संमूच्छनमवयवप्रकल्पनम् ।
स्त्रिया उदरे शुक्रशोणितयोर्गरणं मिश्रणं गर्भः । मात्रुपभुक्ताहारगरणाद्वा गर्भः । उपेत्य पद्य-
५ तेऽस्मिन्निति उपपादः । देवनारकोत्पत्तिस्थानविशेषसंज्ञा । एते त्रयः संसारिणां जीवानां जन्म-
प्रकाराः शुभाशुभपरिणामनिमित्तकर्मभेदविपाककृताः ।
§ ३२३. अथाधिकृतस्य संसारविषयोपभोगोपलब्ध्यधिष्ठानप्रवणस्य जन्मनो योनिविकल्पा
वक्तव्या इत्यत आह—
सचित्तशीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः ॥३२॥
१० § ३२४. आत्मनश्चैतन्यविशेषपरिणामश्चित्तम् । सह चित्तेन वर्तत इति सचित्तः । शीत
इति स्पर्शविशेषः; शुक्लादिवदुभयवचनत्वात्तद्युक्तं द्रव्यमप्याह सम्यग्वृतः संवृतः । संवृत इति
दुरुपलक्ष्यप्रदेश उच्यते । सह इतरैर्वर्तन्त इति सेतराः । सप्रतिपक्षा इत्यर्थः । के पुनरितरे । अचि-
तोष्णविवृताः । उभयात्मको मिश्रः । सचित्ताचित्तः शीतोष्णः संवृतविवृत इति । 'च'शब्दः
समुच्चयार्थः । मिश्राश्च योनयो भवन्तीति । इतरथा हि पूर्वोक्तानामेव विशेषणं स्यात् । 'एकशः'
१५ § ३२१. इस प्रकार अन्य गतिको गमन करनेवाले जीवके नूतन दूसरे पर्यायकी उत्पत्तिके
भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सम्मूर्च्छन, गर्भ और उपपाद ये (तीन) जन्म हैं ॥३१॥
§ ३२२. तीनों लोकोंमें ऊपर, नीचे और तिरछे देहका चारों ओरसे मूच्छंन अर्थात् ग्रहण
होना संमूर्च्छन है। इसका अभिप्राय है चारों ओरसे पुद्गलोंको ग्रहण कर अवयवोंकी रचना
२० होना । स्त्रीके उदरमें शुक्र और शोणितके परस्पर गरण अर्थात् मिश्रणको गर्भ कहते हैं । अथवा
माताके द्वारा उपभुक्त आहारके गरण होनेको गर्भ कहते हैं । प्राप्त होकर जिसमें जीव हलन-चलन
करता है उसे उपपाद कहते हैं। उपपाद यह देव और नारकियोंके उत्पत्तिस्थान विशेषकी संज्ञा
है। संसारी जीवोंके ये तीनों जन्मके भेद हैं, जो शुभ और अशुभ परिणामोंके निमित्तसे अनेक
प्रकारके कर्म बँधते हैं, उनके फल हैं।
२५ § ३२३. यहाँ तक संसारी विषयोंके उपभोगकी प्राप्तिमें आधारभूत जन्मोंका अधिकार
था। अब इनकी योनियोंके भेद कहने चाहिए, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सचित्त, शीत और संवृत तथा इनकी प्रतिपक्षभूत अचि उष्ण और विवृत तथा मिश्र
अर्थात् सचित्ताचित्त, शोतोष्ण और संवृतविवृत ये उसकी अर्थात् जन्मकी योनियाँ हैं ॥३२॥
§ ३२४. आत्माके चैतन्यविशेषरूप परिणामको चित्त कहते हैं। जो उसके साथ रहता है
३० वह सचित्त कहलाता है। शीत यह स्पर्शका एक भेद है। शुक्ल आदिके समान यह द्रव्य और
गुण दोनोंका वाची है अतः शीतगुणवाला द्रव्य भो शीत कहलाता है। जो भले प्रकार ढका हो
वह संवृत कहलाता है। यहाँ संवृत ऐसे स्थानको कहते हैं जो देखनेमें न आवे। इतरका अर्थ अन्य
है और इनके साथ रहनेवाले सेतर कहे जाते हैं। शंका-वे इतर कौन हैं ? समाधान-अचित्त,
उष्ण और विवृत । जो उभयरूप होते हैं वे मिश्र कहलाते हैं। यथा-सचित्ताचित्त, शीतोष्ण
३५ १. -निर्वृत्तिजन्मप्रका-मु० । २. शुक्लशोणित-ता०, ना०, दि० १, मु० । ३. मात्रोपभुक्त-मु० । मात्रो-
पयुक्त -दि० १, दि० २ । ४. उपेत्योत्पद्य-मु० । ५. -लब्ध्याधिष्ठा-आ०, दि० १, दि० २ । ६. -कल्पो
वक्तव्यः आ० ता०, ना० । ७. सम्यग्वृतः संवृत इति आ० दि० १, दि० २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

इति वीप्सार्थः । तस्य ग्रहणं क्रममिश्रप्रतिपत्त्यर्थम् । यथैवं विज्ञायेत—सचित्तश्च अचित्तश्च,
शीतश्च उष्णश्च, संवृतश्च विवृतश्चेति । मैवं विज्ञायि—सचित्तश्च शीतश्चेत्यादि । 'तद्ग्रहणं
जन्मप्रकारप्रतिनिर्देशार्थम् । तेषां संमूर्च्छनादीनां जन्मनां योनय इति । त एते नव योनयो वेदि-
तव्याः । योनिजन्मनोरविशेष इति चेत् । न; आधाराधेयभेदात्तद्भेदः । त एते सचित्तादयो योनय
आधाराः । आधेया जन्मप्रकाराः । यतः सचित्तादियोन्यधिष्ठाने आत्मा संमूर्च्छनादिना जन्मना
शरीराहारेन्द्रियादियोग्यान्पुद्गलानुपादत्ते । देवनारका अचित्तयोनयः । तेषां हि योनिरुपपाददेश-
पुद्गलप्रचयोऽचित्तः । गर्भजा मिश्रयोनयः । तेषां हि मातुरुदरे शुक्रशोणितमचित्तम्, तदात्मना
चित्तवता मिश्रणान्मिथयोनिः१। संमूर्च्छनजास्त्रिविकल्पयोनयः । केचित्सचित्तयोनयः । अन्ये
अचित्तयोनयः । अपरे मिश्रयोनयः । सचित्तयोनयः साधारणशरीराः । कुतः । परस्पराश्रयत्वात् ।
इतरे अचित्तयोनयो मिश्रयोनयश्च । शीतोष्णयोनयो देवनारकाः । तेषां हि उपपादस्थानानि
कानिचिच्छीतानि कानिचिदुष्णानीति । उष्णयोनयस्तैजस्कायिकाः । इतरे त्रिविकल्पयोनयः ।
केचिच्छीतयोनयः । केचिदुष्णयोनयः । अपरे मिश्रयोनय इति । देवनारकैकेन्द्रियाः संवृतयोनयः ।
विकलेन्द्रिया विवृतयोनयः । गर्भजाः मिश्रयोनयः । तद्भेदाश्चतुरशीतिशतसहस्रसंख्या आगमतो
वेदितव्याः । उक्तं च—
और संवृतविवृत । सूत्रमें 'च' शब्द समुच्चयवाची है । जिससे योनियां मिश्र भी होती हैं' इसका
समुच्चय हो जाता है । यदि 'च' पदका यह अर्थ न लिया जाय तो मिश्रपद पूर्वोक्त पदोंका ही
विशेषण हो जाता । 'एकशः' यह पद वीप्सावाची है । सूत्रमें इस पदका ग्रहण क्रम और मिश्रका
ज्ञान करानेके लिए किया है । जिससे यह ज्ञान हो कि सचित्त, अचित्त, शीत, उष्ण, संवृत, विवृत
इस क्रमसे योनियाँ ली हैं । यह ज्ञान न हो कि सचित्त, शीत इत्यादि क्रमसे योनियाँ ली हैं ।
जन्मके भेदोंके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'तत्' पदका ग्रहण किया है । उन संमूर्च्छन आदि जन्मोंकी
ये नौ योनियां हैं यह इसका भाव है । शंका—योनि और जन्ममें कोई भेद नहीं ? समाधान—
नहीं, क्योंकि आधार और आधेयके भेदसे उनमें भेद हैं । ये सचित्त आदिक योनियाँ आधार हैं
ओर जन्मके भेद आधेय हैं, क्योंकि सचित्त आदि योनिरूप आधारमें संमूर्च्छन आदि जन्मके द्वारा
आत्मा, शरीर, आहार और इन्द्रियोंके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करता हैं । देव और नारकियोंकी
अचित्त योनि होती है, क्योंकि उनके उपपाददेशके पुद्गलप्रचयरूप योनि अचित्त है । गर्भजोंकी
मिश्र योनि होती है, क्योंकि उनकी माताके उदरमें शुक्र और शोणित अचित्त होते हैं जिनका
सचित्त माताकी आत्मासे मिश्रण है इसलिए वह मिश्रयोनि है । संमूर्च्छनोंकी तीन प्रकारकी
योनियाँ होती हैं । किन्हींकी सचित्त योनि होती है, किन्हींको अचित्तयोनि होती है और किन्हींकी
मिश्रयोनि होतो है । साधारण शरीरवाले जीवोंकी सचित्त योनि होती है क्योंकि ये एक-दूसरेके
आश्रयसे रहते हैं । इनमें अतिरिक्त शेष संमूर्च्छन जीवोंके अचित्त और मिश्र दोनों प्रकारकी
योनियाँ होती हैं । देव और नारकियोंकी शीत और उष्ण दोनों प्रकारकी योनियाँ होती हैं;
क्योंकि इनके कुछ उपपादस्थान शीत हैं और कुछ उष्ण । तेजस्कायिक जीवोंकी उष्णयोनि होती
है । इनसे अतिरिक्त जीवोंकी योनियाँ तीन प्रकारकी होती हैं । किन्हींकी शीत योनियाँ होती हैं,
किन्हींको उष्णयोनियाँ होती हैं और किन्हींकी मिश्रयोनियाँ होती हैं । देव, नारकी और एके-
न्द्रियोंकी संवृत योनियाँ होती हैं । विकलेन्द्रियोंकी विवृत योनियाँ होती हैं । तथा गर्भजोंकी मिश्र
योनियाँ होती हैं । इन सब योनियोंके चौरासी लाख भेद हैं यह बात आगमसे जाननी चाहिए ।
कहा भी है—

१. –मिश्रं मिश्रयोनिः आ०, दि० १, दि० २ ।

१३६ सर्वार्थसिद्धौ [ २।३३ § ३२५ -
'णिच्चिदरधादु सत्त य तरु दस वियलिंदिएसु छच्चेव ।
सुरणिरयतिरिय चउरो चोद्दस मणुए सदसहस्सा१ ॥'
§ ३२५. एवमेतस्मिन्नवयोनिभेदसंकटे त्रिविधजन्मनि सर्वप्राणभृतामनियमेन प्रसक्ते तदव-
धारणार्थमाह—
जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः ॥३३॥
§ ३२६. यज्जालवत्प्राणिपरिवरणं विततमांसशोणितं तज्जरायुः । यन्नखत्वक्सदृशमुपात्त-
काठिन्यं शुक्रशोणितपरिवरणं परिमण्डलं तदण्डम् । किंचित्परिवरणमन्तरेण परिपूर्णावयवो योनि-
निर्गतमात्र एव परिस्पन्दादिसामर्थ्योपेतः पोतः । जरायो जातां जरायुजाः । अण्डे जाता अण्डजाः ।
जरायुजाश्च अण्डजाश्च पोताश्च जरायुजाण्डजपोता गर्भोयोनयः ।
§ ३२७. यद्यमीषां जरायुजाण्डजपोतानां गर्भोऽवध्रियते, अथोपपादः केषां भवतीत्यत आह—
देवनारकाणामुपपादः ॥३४॥
देवानां नारकाणां चोपपादो जन्म वेदितव्यम् ।
§ ३२८. अथान्येषां किं जन्मेत्यत आह—
शेषाणां संमूर्च्छनम् ॥३५॥
§ ३२९. गर्भजेभ्य औपपादिकेभ्यश्चान्ये शेषाः । संमूर्च्छनं जन्मेति । एते त्रयोऽपि योगा
नियमार्थाः । उभयतो नियमश्च द्रष्टव्यः । जरायुजाण्डजपोतानामेव गर्भः । गर्भ एव च जरायु-
'नित्यनिगोद, इतरनिगोद, पृथिवीकायिक जलकायिक, अग्निकायिक, और वायुकायिक
जीवोंकी सात-सात लाख योनियां हैं । वृक्षोंको दस लाख योनियाँ हैं । विकलेन्द्रियोंकी मिलाकर
छह लाख योनियाँ हैं । देव, नारकी और तिर्यंचोंकी चार-चार लाख योनियाँ हैं तथा मनुष्योंकी
चौदह लाख योनियाँ हैं ।'
§ ३२५. इस प्रकार नौ योनियोंसे युक्त तीन जन्म सब जीवोंके अनियमसे प्राप्त हुए अतः
निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जरायुज, अण्डज और पोत जीवोंका गर्भजन्म होता है ॥३३॥
§ ३२६. जो जालके समान प्राणियोंका आवरण है और जो मांस और शोणितसे बना है
उसे जरायु कहते हैं। जो नखकी त्वचाके समान कठिन है, गोल है और जिसका आवरण शुक्र
और शोणितसे बना है उसे अण्ड कहते हैं । जिसके सब अवयव बिना आवरणके पूरे हुए हैं और
जो योनिसे निकलते ही हलन-चलन आदि सामर्थ्यसे युक्त है उसे पोत कहते हैं । इनमें जो जरसे
पैदा होते हैं वे जरायुज कहलाते हैं। जो अण्डोंसे पैदा होते हैं वे अण्डज कहलाते हैं। सूत्रमें
जरायुज, अण्डज और पोत इनका द्वन्द्व समास है । ये सब गर्भकी योनियां हैं ।
§ ३२७. यदि इन जरायुज, अण्डज और पोत जीवोंका गर्भ जन्म निर्णीत होता है तो अब
यह बतलाइए कि उपपाद जन्म किन जीवोंके होता है, अतः इस बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
देव और नारकियोंका उपपाद जन्म होता है ॥३४॥
§ ३२८. इनसे अतिरिक्त अन्य जीवोंके कौन-सा जन्म होता है । अब इस बातका ज्ञान
करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शेष सब जीवोंका सम्मूर्च्छन जन्म होता है ॥३५॥
§ ३२९. इस सूत्रमें 'शेष' पदसे वे जीव लिये गये हैं जो गर्भ और उपपाद जन्मसे नहीं
पैदा होते । इनके संमूर्च्छन जन्म होता है । ये तीनों ही सूत्र नियम करते हैं । और यह नियम
१. मूलाचा० गा० । गो० जी० गा० ।
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  • २।३७ § ३३३ ] द्वितीयोऽध्यायः १३७

जाण्डजपोतानाम् । देवनारकाणामेवोपपादः । उपपाद एव च देवनारकाणाम् । शेषाणामेव संमूर्च्छ-
नम् । संमूर्च्छनमेव शेषाणामिति ।
§ ३३०. तेषां पुनः संसारिणां त्रिविधजन्मनामाहितबहुविकल्पनवयोनिवेदानां शुभाशुभ-
नामकर्मविपाकनिर्वर्तितानि बन्धफलानुभवनाधिष्ठानानि शरीराणि कानीत्यत आह—
औदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसकार्मणानि शरीराणि ॥३६॥ ५
§ ३३१. विशिष्टनामकर्मोदयापादितवृत्तीनि शीर्यन्त इति शरीराणि१। औदारिकादि-
प्रकृतिविशेषोदयप्राप्तवृत्तीनि औदारिकादीनि । उदारं स्थूलम् । उदारे२ भवं उदारं प्रयोजनमस्येति
वा, औदारिकम् । अष्टगुणैश्वर्ययोगादेकानेकाणुमहच्छरीरविविधकरणं विक्रिया, सा प्रयोजनमस्येति
वैक्रियिकम् । सूक्ष्मपदार्थनिर्ज्ञानार्थमसंयमपरिजिहीर्षया वा प्रमत्तसंयतेनाह्रियते निर्वर्त्यते
तदित्याहारकम् । यत्तेजोनिमित्तं तेजसि वा भवं तत्तैजसम् । कर्मणां कार्यं कार्मणम् । सर्वेषां १०
कर्मनिमित्तत्वेऽपि रूढिवशाद्विशिष्टविषये वृत्तिरवसेया ।
§ ३३२. यथौदारिकस्येन्द्रियैरुपलब्धिस्तथेतरेषां कस्मान्न भवतीत्यत आह—
परं परं सूक्ष्मम् ॥३७॥
§ ३३३. 'पर'शब्दस्यानेकार्थवृत्तित्वेऽपि विवक्षातो व्यवस्थार्थगतिः । पृथग्भूतानां शरीराणां
सूक्ष्मगुणेन वीप्सानिर्देशः क्रियते परम्परमिति । औदारिकं स्थूलम्, ततः सूक्ष्मं वैक्रियिकम्, ततः १५
दोनों ओरसे जानना चाहिए । यथा—गर्भ जन्म जरायुज, अण्डज और पोत जीवोंका ही होता है ।
या जरायुज, अण्डज और पोत जीवों के गर्भजन्म ही होता है। उपपाद जन्म देव और नारकियों
के ही होता है या देव और नारकियोंके उपपाद जन्म ही होता है सम्मूर्च्छन जन्म शेष जीवोंके ही
होता है या शेष जीवोंके संमूर्च्छन जन्म ही होता है ।
§ ३३०. जो तीन जन्मोंसे पैदा होते हैं और जिनके अपने अवान्तर भेदोंसे युक्त नौ योनियां २०
हैं उन संसारी जीवोंके शुभ और अशुभ नामकर्मके उदयसे निष्पन्न हुए और बन्धफलके अनुभव
करनेमें आधारभूत शरीर कितने हैं । अब इसी बातको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये पाँच शरीर हैं ॥३६॥
§ ३३१. जो विशेष नामकर्मके उदयसे प्राप्त होकर शीर्यन्ते अर्थात् गलते हैं वे शरीर हैं।
इसके औदारिक आदि पाँच भेद हैं। ये औदारिक आदि प्रकृति विशेषके उदयसे होते हैं। उदार २५
और स्थूल ये एकार्थवाची शब्द हैं। उदार शब्दसे होनेरूप अर्थमें या प्रयोजनरूप अर्थमें ठक्
प्रत्यय होकर औदारिक शब्द बनता है। अणिमा आदि आठ गुणोंके ऐश्वर्यके सम्बन्धसे एक,
अनेक, छोटा, बड़ा आदि नाना प्रकारका शरीर करना विक्रिया है। यह विक्रिया जिस शरीरका
प्रयोजन है वह वैक्रियिक शरीर है। सूक्ष्म पदार्थका ज्ञान करनेके लिए या असंयमको दूर करनेकी
इच्छासे प्रमत्तसंयत जिस शरीरको रचना करता है वह आहारक शरीर है । जो दीप्तिका कारण ३०
है या तेजमें उत्पन्न होता है उसे तैजस शरीर कहते हैं। कर्मोंका कार्य कार्मण शरीर है। यद्यपि
सब शरीर कर्मके निमित्तसे होते हैं तो भी रूढ़िसे विशिष्ट शरीरको कार्मण शरीर कहा है।
§ ३३२. जिस प्रकार इन्द्रियाँ औदारिक शरीरको जानती हैं उस प्रकार इतर शरीरोंको
क्यों नहीं जानतीं ? अब इस बातको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आगे-आगेका शरीर सूक्ष्म है ॥३७॥ ३५
§ ३३३. पर शब्दके अनेक अर्थ हैं तो भी यहाँ विवक्षासे व्यवस्थारूप अर्थका ज्ञान होता
है। यद्यपि शरीर अलग-अलग हैं तो भी उनमें सूक्ष्म गुणका अन्वय है यह दिखलानेके लिए

१. 'चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ।' न्या० सू० १, १, ११ । २. उदारे भवमौदारिकम् । उदारं मु० ।
१८

[header] १३८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।३८ § ३३४ - [/header]

सूक्ष्मं आहारकम्, ततः सूक्ष्मं तैजसम्, तैजसात्कार्मणं सूक्ष्ममिति ।
§ ३३४. यदि परम्परं सूक्ष्मम्, प्रदेशतोऽपि¹ न्यूनं परम्परं हीनमिति विपरीतप्रतिपत्ति-
निवृत्त्यर्थमाह—
प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् ॥३८॥
§ ३३५. प्रदिश्यन्त इति प्रदेशाः परमाणवः । संख्यामतीतोऽसंख्येयः । असंख्येयो गुणोऽस्य
तदिदमसंख्येयगुणम् । कुतः । प्रदेशतः । नावगाहतः । परम्परमित्यनुवृत्तेरा कार्मणात्प्रसङ्गे तन्नि-
वृत्त्यर्थमाह प्राक्तैजसादिति । औदारिकादसंख्येयगुणप्रदेशं वैक्रियिकम् । वैक्रियिकादसंख्येयगुण-
प्रदेशमाहारकमिति । को गुणकारः । पल्योपमासंख्येयभागः । यद्येवम्, परम्परं महापरिमाणं
प्राप्नोति²। नैवम्; बन्धविशेषात्परिमाणभेदाभावस्तूलनिचय्यायःपिण्डवत् ।
§ ३३६. अथोत्तरयोः किं समप्रदेशत्वमुतास्ति कश्चिद्विशेष इत्यत आह--
अनन्तगुणे परे ॥३६॥
§ ३३७. प्रदेशत इत्यनुवर्तते, तेनैवमभिसंबन्धः क्रियते—आहारकात्तैजसं प्रदेशतोऽनन्त-
गुणम्, तैजसात्कार्मणं प्रदेशतोऽनन्तगुणमिति । को गुणकारः । अभव्यानामनन्तगुणः सिद्धानाम-
नन्तभागः³ ।
'परम्परम्' इस प्रकार वीप्सा निर्देश किया है । औदारिक शरीर स्थूल है । इससे वैक्रियिक शरीर
सूक्ष्म है । इससे आहारक शरीर सूक्ष्म है । इससे तैजस शरीर सूक्ष्म है और इससे कार्मण
शरीर सूक्ष्म है ।
§ ३३४. यदि ये शरीर उत्तरोत्तर सूक्ष्म हैं तो प्रदेशोंकी अपेक्षा भी उत्तरोत्तर हीन होंगे ।
इस प्रकार विपरीत ज्ञानका निराकरण करने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तैजससे पूर्व तीन शरीरोंमें आगे-आगेका शरीर प्रदेशों की अपेक्षा असंख्यातगुणा है ॥३८॥
§ ३३५. प्रदेश शब्दकी व्युत्पत्ति 'प्रदिश्यन्ते' होती है । इसका अर्थ परमाणु है । संख्यातीत-
को असंख्येय कहते हैं । जिसका गुणकार असंख्यात है वह असंख्येयगुणा कहलाता है । शंका—
किसकी अपेक्षा ? समाधान—प्रदेशोंकी अपेक्षा, अवगाहनकी अपेक्षा नहीं । पूर्व सूत्रमें 'परम्परम्'
इस पदकी अनुवृत्ति होकर असंख्येयगुणत्वका प्रसंग कार्मण शरीर तक प्राप्त होता है अतः उसकी
निवृत्तिके लिए सूत्रमें 'प्राक् तैजसात्' पद रखा है । अर्थात् तैजस शरीरसे पूर्ववर्ती शरीर तक ये
शरीर उत्तरोत्तर असंख्यातगुणे हैं । औदारिक शरीरसे वैक्रियिक शरीर असंख्यातगुणे प्रदेशवाला
हैं। शंका—गुणकारका प्रमाण क्या है ? समाधान—पल्यका असंख्यातवाँ भाग । शंका—यदि
ऐसा है तो उत्तरोत्तर एक शरीरसे दूसरा शरीर महापरिमाणवाला प्राप्त होता है ? समाधान—
यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, बन्धविशेषके कारण परिमाणमें भेद नहीं होता । जैसे रूईका ढेर
और लोहेका गोला ।
§ ३३६. आगेके दो शरीरोंके प्रदेश क्या समान हैं या उनमें भी कुछ भेद है । इस बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
परवर्ती दो शरीर प्रदेशोंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर अनन्तगुणे हैं ॥ ३९ ॥
§ ३३७. पूर्व सूत्रसे 'प्रदेशतः' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। जिससे इस प्रकार सम्बन्ध
करना चाहिए कि आहारक शरीरसे तैजस शरीरके प्रदेश अनन्तगुणे हैं और तैजस शरीरसे कार्मण
शरीरके प्रदेश अनन्तगुणे हैं । शंका—गुणकार क्या है ? समाधान—अभव्योंसे अनन्तगुणा और
सिद्धोंका अनन्तवाँ भाग गुणकार है ।

[footnotes]
१. -प्रदेशतः । परस्पर-ता०, ना० । २. प्राप्नोति । बन्ध-ता० । ३. -मनन्तो भागः ता०, ना० ।
[/footnotes]

– २४२ § ३४२ ] द्वितीयोऽध्यायः १३९
§ ३३८. तत्रैतत्स्याच्छल्यकवन्मूर्तिमद्द्रव्योपचितत्वात्संसारिणो जीवस्याभिप्रेतगतिनिरोध-
प्रसङ्ग इति । तन्न; किं कारणम् । यस्मादुभे अप्येते—
अप्रतीघाते ॥४०॥
§ ३३९. मूर्तिमतो मूर्त्यन्तरेण व्याघातः प्रतीघातः । स नास्त्यनयोरित्यप्रतीघाते; सूक्ष्म-
१परिणामात् । अयःपिण्डे तेजोऽनुप्रवेशवत्तैजसकार्मणयोर्नास्ति वज्रपटलादिषु व्याघातः । ननु च ५
वैक्रियिकाहारकयोरपि नास्ति प्रतीघातः । सर्वत्राप्रतीघातोऽत्र विवक्षितः । यथा तैजसकार्मणयोरा-
लोकान्तात् सर्वत्र नास्ति प्रतीघातः, न तथा वैक्रियिकाहारकयोः ।
§ ३४०. आह किमेतावानेव विशेषः उत कश्चिदन्योऽप्यस्तीत्याह—
अनादिसंबन्धे च ॥४१॥
§ ३४१. 'च' शब्दो विकल्पार्थः । अनादिसंबन्धे सादिसंबन्धे चेति । कार्यकारणभावसंतत्या १०
अनादिसंबन्धे, विशेषापेक्षया सादिसंबन्धे २ च बीजवृक्षवत् । यथौदारिकवैक्रियिकाहारकाणि
जीवस्य कदाचित्कानि, न तथा तैजसकार्मणे । नित्यसंबन्धिनी हि ते आ संसारक्षयात् ।
– § ३४२. त एते तैजसकार्मणे किं कस्यचिदेव भवत उताविशेषेणेत्यत आह—
सर्वस्य ॥४२॥
§ ३३८. शंका—जिस प्रकार कील आदिके लग जानेसे कोई भी प्राणी इच्छित स्थानको १५
नहीं जा सकता उसी प्रकार मूर्तिक द्रव्यसे उपचित होनेके कारण संसारी जीवकी इच्छित गतिके
निरोधका प्रसंग प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि ये दोनों शरीर—
प्रतीघातरहित हैं ॥ ४० ॥
§ ३३९. एक मूर्तिक पदार्थका दूसरे मूर्तिक पदार्थके द्वारा जो व्याघात होता है उसे
प्रतीघात कहते हैं। इन दोनों शरीरोंका इस प्रकारका प्रतीघात नहीं होता इसलिए ये प्रतीघात २०
रहित हैं। जिस प्रकार सूक्ष्म होनेसे अग्नि लोहेके गोलेमें प्रवेश कर जाती है। उसी प्रकार तैजस
और कार्मण शरीरका वज्रपटलादिकमें भी व्याघात नहीं होता । शंका—वैक्रियिक और आहारक
शरीरका भी प्रतीघात नहीं होता फिर यहाँ तैजस और कार्मण शरीरको ही अप्रतीघात क्यों
कहा ? समाधान—इस सूत्रमें सर्वत्र प्रतीघातका अभाव विवक्षित है। जिस प्रकार तैजस और
कार्मण शरीरका लोक पर्यन्त सर्वत्र प्रतीघात नहीं होता वह बात वैक्रियिक और आहारक २५
शरीरकी नहीं है।
§ ३४०. इन दोनों शरीरोंमें क्या इतना ही विशेषता है या और भी कोई विशेषता है।
इसी बातको बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
आत्माके साथ अनादि सम्बन्धवाले हैं ॥ ४१ ॥
§ ३४१. सूत्रमें 'च'शब्द विकल्पको सूचित करनेके लिए दिया है। जिससे यह अर्थ हुआ ३०
कि तैजस और कार्मण शरीरका अनादि सम्बन्ध है और सादि सम्बन्ध भी है। कार्यकारणभावकी
परम्पराकी अपेक्षा अनादि सम्बन्ध है और विशेषकी अपेक्षा सादि सम्बन्ध है। यथा बीज और
वृक्ष । जिस प्रकार औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर जीवके कदाचित् होते हैं उस प्रकार
तैजस और कार्मण शरीर नहीं हैं। संसारका क्षय होने तक उनका जीवके साथ सदा सम्बन्ध है।
§ ३४२. ये तैजस और कार्मण शरीर क्या किसी जीवके ही होते हैं या सामान्यरूपसे ३५
सबके होते हैं । इसी बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा सब संसारी जीवोंके होते हैं ॥ ४२ ॥
१. -परिमाणात् मु० । २. -सम्बन्धेऽपि च मु० ।

१४० सर्वार्थसिद्धौ [ २।४३ § ३४३ -
§ ३४३. 'सर्वं' शब्दो निरवशेषवाची । निरवशेषस्य संसारिणो जीवस्य ते द्वे अपि शरीरे
भवत इत्यर्थः ।
§ ३४४. अविशेषाभिधानात्तैरोदारिकादिभिः सर्वस्य संसारिणो यौगपद्येन संबन्धप्रसङ्गे
संभवशरीरप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते—
तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्या¹ चतुर्भ्यः ॥४३॥
§ ३४५. 'तत्' शब्दः प्रकृततैजसकार्मणप्रतिनिर्देशार्थः । ते तैजसकार्मणे आदिर्येषां तानि
तदादीनि । भाज्यानि विकल्प्यानि । आ कुतः । आ चतुर्भ्यः । युगपदेकस्यात्मनः । कस्यचिद् द्वे
तैजसकार्मणे । अपरस्य त्रीणि औदारिकतैजसकार्मणानि वैक्रियिकतैजसकार्मणानि वा । अन्यस्य
चत्वारि औदारिकाहारकतैजसकार्मणानीति विभागः क्रियते ।
§ ३४६. पुनरपि तेषां विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥
§ ३४७. अन्ते भवमन्त्यम् । किं । तत् कार्मणम् । इन्द्रियप्रणालिकया शब्दादीनामुपलब्धिरूप-
§ ३४३. यहाँ 'सर्व' शब्द निरवशेषवाची है । वे दोनों शरीर सब संसारी जीवोंके होते हैं
यह इस सूत्रका तात्पर्य है ।
§ ३४४. सामान्य कथन करनेसे उन औदारिकादि शरीरों के साथ सब संसारी जीवोंका
एक साथ सम्बन्ध प्राप्त होता है अतः एक साथ कितने शरीर सम्भव है इस बातको दिखलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
एक साथ एक जीवके तैजस और कार्मणसे लेकर चार शरीर तक विकल्पसे होते हैं ॥४३॥
§ ३४५. सूत्रमें प्रकरणप्राप्त तैजस और कार्मण शरीरका निर्देश करनेके लिए 'तत्' शब्द
दिया है । तदादि शब्दका समास लभ्य अर्थ है—तैजस और कार्मण शरीर जिनके आदिमें हैं वे ।
भाज्य और विकल्प्य ये पर्यायवाची नाम हैं । तात्पर्य यह है कि एक साथ एक आत्माके पूर्वोक्त
दो शरीरसे लेकर चार शरीर तक विकल्पसे होते हैं । किसीके तैजस और कार्मण ये दो शरीर
होते हैं । अन्यके औदारिक तैजस और कार्मण या वैक्रियिक, तैजस और कार्मण ये तीन शरीर होते
हैं । किसी दूसरेके औदारिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये चार शरीर होते हैं । इस प्रकार यह
विभाग यहाँ किया गया है ।
विशेषार्थ—आगे ४७वें सूत्रमें तपोविशेषके बलसे वैक्रियिक शरीरकी उत्पत्तिका निर्देश
किया है इसलिए प्रश्न होता है कि किसी ऋद्धिधारी साधुके एक साथ पाँच शरीरका सद्भाव
माननेमें क्या हानि है ? समाधान यह है कि एक साथ वैक्रियिक और आहारक ऋद्धिकी प्रवृत्ति
नहीं होती इसलिए एक तो एक साथ आहारक शरीरके साथ वैक्रियिक शरीरका अवस्थान नहीं
बन सकता । दूसरे तपोविशेषसे जो विक्रिया प्राप्त होती है वह औदारिक शरीर सम्बन्धी ही
विक्रिया है । उसे स्वतन्त्र वैक्रियिक शरीर मानना उचित नहीं है । कर्मसाहित्यमें वैक्रियिक शरीर
नामकर्मके उदयसे जो शरीर प्राप्त होता है उसकी परिगणना ही वैक्रियिक शरीरमें की गयी है ।
इसलिए अधिकारी भेद होनेसे औदारिक और आहारक शरीरके साथ वैक्रियिक शरीर नहीं बन
सकता । यही कारण है कि एक साथ अधिकसे अधिक चार शरीर बतलाये हैं ।
§ ३४६. फिर भी उन शरीरोंका विशेष ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अन्तिम शरीर उपभोगरहित है ॥४४॥
§ ३४७. जो अन्तमें होता है वह अन्त्य कहलाता है । शंका—अन्तका शरीर कौन है ?
१. -देकस्मिन्ना च-म० ।

  • २४५ § ३५० ] द्वितीयोऽध्यायः १४१
    भोगः । तदभावान्निरुपभोगम् । विग्रहगतौ सत्यामपि इन्द्रियलब्धौ द्रव्येन्द्रियनिर्वृत्त्यभावाच्छब्दा-
    द्युपभोगाभाव इति । ननु तैजसमपि निरुपभोगम् । तत्र किमुच्यते निरुपभोगमन्त्यमिति । तैजसं
    शरीरं योगनिमित्तमपि न भवति, ततोऽस्योपभोगविचारेऽनधिकारः ।१
    § ३४८. एवं तत्रोक्तलक्षणेषु जन्मसु अमूनि शरीराणि प्रादुर्भावमापद्यमानानि किमविशेषेण
    भवन्ति, उत कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आह—
    गर्भसंमूर्च्छनजमाद्यम् ॥४५॥
    § ३४९. सूत्रक्रमापेक्षया आदौ भवमाद्यम् । औदारिकमित्यर्थः । यद् गर्भजं यच्च संमूर्च्छनजं
    तत्सर्वमौदारिकं द्रष्टव्यम् ।
    § ३५०. तदनन्तरं यन्निर्दिष्टं तत्कस्मिन् जन्मनीत्यत आह—
    समाधान—कार्मण । इन्द्रियरूप नालियोंके द्वारा शब्दादिके ग्रहण करनेको उपभोग कहते हैं। यह
    बात अन्तके शरीरमें नहीं पायी जाती; अतः वह निरुपभोग है । विग्रहगतिमें लब्धिरूप भावेन्द्रिय-
    के रहते हुए भो वहाँ द्रव्येन्द्रियको रचना न होनेसे शब्दादिकका उपभोग नहीं होता । शंका—
    तैजस शरीर भी निरुपभोग है इसलिए वहाँ यह क्यों कहते हो कि अन्तका शरीर निरुपभोग है ?
    समाधान—तैजस शरीर योगमें निमित्त भी नहीं होता, इसलिए इसका उपभोगके विचारमें
    अधिकार नहीं है ।
    विशेषार्थ—औदारिक, वैक्रियिक और आहारक इन तीन शरीरोंमें इन्द्रियोंकी रचना
    होकर उन द्वारा अपने-अपने विषयोंका ग्रहण होता है इसलिए ये तीनों शरीर सोपभोग माने
    गये हैं । यद्यपि कार्मण काययोग केवली जिनके प्रतर और लोकपूरण समुद्घातके समय तथा
    विग्रहगतिमें होता है । पर इनमें-से प्रतर और लोकपूरण समुद्घातके समय केवलज्ञान होनेसे वहाँ
    उपभोगका प्रश्न ही नहीं उठता । मात्र विग्रहगतिमें कार्मण काययोगके रहते हुए उपभोग होता है
    या नहीं यह प्रश्न होता है और इसी प्रश्नका उत्तर देनेके लिए 'निरुपभोगमन्त्यम्' यह सूत्र रचा
    गया है । अन्तका शरीर उपभोगरहित क्यों है इस बातका खुलासा करते हुए बतलाया है कि
    विग्रहगतिमें भावेन्द्रियाँ तो होती हैं पर द्रव्येन्द्रियाँ नहीं होतीं इसलिए यहाँ शब्दादि विषयोंका
    ग्रहण नहीं होता । यही कारण है कि अन्तके शरीरको निरुपभोग कहा है । रहा तैजस शरीर सो
    अन्य चार शरीरोंके समान इसका स्वतन्त्र अधिकार नहीं है। अनिःसृत तैजस शरीर सब संसारी
    जीवोंके सदा होता है और निःसृत तैजस शरीर कादाचित्क होता है । इस प्रकार तैजस शरीर
    पाया तो जाता है सब संसारी जीवोंके, पर आत्मप्रदेश परिस्पन्दमें यह शरीर कारण नहीं है इस-
    लिए इन्द्रियों-द्वारा विषयोंके ग्रहण करनेमें इस शरीरको उपयोगी नहीं माना गया है। यही कारण
    है कि तैजस शरीर निरुपभोग है कि सोपभोग यह प्रश्न ही नहीं उठता ।
    § ३४८. इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षणवाले इन जन्मोंमें क्या सामान्यसे सब शरीर उत्पन्न होते
    हैं या इसमें कुछ विशेषता है । इस बातको बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
    पहला शरीर गर्भ और संमूर्च्छन जन्मसे पैदा होता है ॥ ४५ ॥
    § ३४९. सूत्रमें जिस क्रमसे निर्देश किया है तदनुसार यहाँ आद्यपदसे औदारिक शरीरका
    ग्रहण करना चाहिए। जो शरीर गर्भजन्मसे और संमूर्च्छन जन्मसे उत्पन्न होता है वह सब औदा-
    रिक शरीर है यह इस सूत्रका तात्पर्य है ।
    § ३५०. इसके अनन्तर जिस शरीरका निर्देश किया है उसकी उत्पत्ति किस जन्मसे होती
    है अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    १. -नधिकारः । तत्रोक्त-ता०, ना० ।

१४२ ] सर्वार्थसिद्धौ [ २।४६ § ३५१ –

औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥४६॥
§ ३५१. उपपादे भवमौपपादिकम् । तत्सर्वं वैक्रियिकं वेदितव्यम् ।
§ ३५२. यद्यौपपादिकं वैक्रियिकम्, अनौपपादिकस्य वैक्रियिकत्वाभाव इत्यत आह—
लब्धिप्रत्ययं च ॥४७॥
§ ३५३. ‘च’ शब्देन वैक्रियिकमभिसंबध्यते । तपोविशेषादृद्धिप्राप्तिर्लब्धिः । लब्धिः प्रत्ययः
कारणमस्य लब्धिप्रत्ययम् । वैक्रियिकं लब्धिप्रत्ययं च भवतीत्यभिसंबध्यते ।
§ ३५४. किमेतदेव लब्ध्यपेक्षमुतान्यदप्यस्तीत्यत आह—
तैजमपि ॥४८॥
§ ३५५. ‘अपि’शब्देन लब्धिप्रत्ययमभिसंबध्यते । तैजमपि लब्धिप्रत्ययं भवतीति ।
§ ३५६. वैक्रियिकानन्तरं यदुपदिष्टं तस्य स्वरूपनिर्धारणार्थं स्वामिनिर्देशार्थं चाह—
शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥४६॥
§ ३५७. शुभकारणत्वाच्छुभव्यपदेशः । शुभकर्मण आहारककाययोगस्य कारणत्वाच्छुभ-
मित्युच्यते अन्नस्य प्राणव्यपदेशवत् । विशुद्धकार्यत्वाद्विशुद्धव्यपदेशः । विशुद्धस्य १पुण्यकर्मणः


वैक्रियिक शरीर उपपाद जन्मसे पैदा होता है ॥ ४६ ॥
§ ३५१. जो उपपादमें होता है उसे औपपादिक कहते हैं । इस प्रकार उपपाद जन्मसे पैदा
होनेवाले शरीरको वैक्रियिक जानना चाहिए ।
§ ३५२. यदि जो शरीर उपपाद जन्मसे पैदा होता है वह वैक्रियिक है तो जो शरीर उप-
पाद जन्मसे नहीं पैदा होता उसमें वैक्रियिकपन नहीं बन सकता । अब इसी बातका स्पष्टीकरण
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा लब्धिसे भी पैदा होता है ॥ ४७ ॥
§ ३५३. सूत्रमें ‘च’ शब्द आया है । उससे वैक्रियिक शरीरका सम्बन्ध करना चाहिए ।
तपविशेषसे प्राप्त होनेवाली ऋद्धिको लब्धि कहते हैं । इस प्रकारको लब्धिसे जो शरीर उत्पन्न होता
है वह लब्धिप्रत्यय कहलाता है । वैक्रियिक शरीर लब्धिप्रत्यय भी होता है ऐसा यहाँ सम्बन्ध
करना चाहिए ।
§ ३५४. क्या यही शरीर लब्धिकी अपेक्षासे होता है या दूसरा शरीर भी होता है। अब
इसी बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तैजस शरीर भी लब्धिसे पैदा होता है ॥ ४८ ॥
§ ३५५. सूत्रमें ‘अपि’ शब्द आया है । उससे ‘लब्धिप्रत्ययम्’ पदका ग्रहण होता है । तैजस
शरीर भी लब्धिप्रत्यय होता है यह इस सूत्रका भाव है ।
§ ३५६. वैक्रियिक शरीरके पश्चात् जिस शरीरका उपदेश दिया है उसके स्वरूपका निश्चय
करनेके लिए और उसके स्वामीका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आहारक शरीर शुभ, विशुद्ध और व्याघात रहित है और वह प्रमत्तसंयतके ही होता है ॥४९॥
§ ३५७. शुभकर्मका कारण होनेसे इसे शुभ कहा है । यह शरीर आहारक काययोग रूप
शुभकर्मका कारण है, इसलिए आहारक शरीर शुभ कहलाता है । यहाँ कारणमें कार्यका उपचार
है । जैसे अन्नमें प्राणका उपचार करके अन्नको प्राण कहते हैं । विशुद्ध कर्मका कार्य होनेसे आहारक
शरीरको विशुद्ध कहा है । तात्पर्य यह है कि जो चित्र-विचित्र न होकर निर्दोष है ऐसे विशुद्ध


१. पुण्यस्य कर्मणः मु० ।

  • २५० § ३५९ ] द्वितीयोऽध्यायः १४३
    अशबलस्य निरवद्यस्य कार्यत्वाद्विशुद्धमित्युच्यते तन्तूनां कार्पासव्यपदेशवत् । उभयतो व्याघाता-
    भावादव्याघाति । न ह्याहारकशरीरेणान्यस्य व्याघातः । नाप्यन्येनाहारकस्येति । तस्य प्रयोजन-
    समुच्चयार्थः 'च'शब्दः क्रियते । तद्यथा—कदाचिल्लब्धिविशेषसद्भावज्ञापनार्थं कदाचित्सूक्ष्म-
    पदार्थावधारणार्थं संयमपरिपालनार्थं च । आहारकमिति प्रागुक्तस्य प्रत्याम्नायः । यदाहारकशरीरं
    निर्वर्तयितुमारभते तदा प्रमत्तो भवतीति 'प्रमत्तसंयतस्य' इत्युच्यते । इष्टतोऽवधारणार्थं 'एव'कारो- ५
    पादानम् । यथैवं विज्ञायेत प्रमत्तसंयतस्यैवाहारकं नान्यस्येति । मैवं विज्ञायि प्रमत्तसंयतस्याहार-
    कमेवेति । मा भूदौदारिकादिनिवृत्तिरिति ।
    § ३५८. एवं विभक्तानि शरीराणि बिभ्रतां संसारिणां प्रतिगति किं त्रिलिङ्गसंनिधानं
    उत लिङ्गनियमः कश्चिदस्तीत्यत आह—
    नारकसंमूर्च्छिनो नपुंसकानि ॥५०॥ १०
    § ३५९. नरकाणि वक्ष्यन्ते । नरकेषु भवा नारकाः । संमूर्छनं संमूर्च्छः स येषामस्ति१ ते
    संमूर्च्छिनः। नारकाश्च संमूर्च्छिनश्च नारकसंमूर्च्छिनः । चारित्रमोहविकल्पनोकषायभेदस्य नपुंसक-
    वेदस्याशुभनाम्नश्चोदयान्न स्त्रियो न पुमांस इति नपुंसकानि भवन्ति । नारकसंमूर्च्छिनो नपुंस-
    कान्येवेति नियमः । तत्र हि स्त्रीपुंसविषयमनोज्ञशब्दगन्धरूपरसस्पर्शसंबन्धनिमित्ता स्वल्पापि
    सुखमात्रा नास्ति । १५
    अर्थात् पुण्यकर्मका कार्य होनेसे आहारक शरीरको भी विशुद्ध कहते हैं। यहाँ कार्यमें कारणका
    उपचार है। जैसे तन्तुओंमें कपासका उपचार करके तन्तुओंको कपास कहते हैं। दोनों ओरसे
    व्याघात नहीं होता इसलिए यह अव्याघाती है। तात्पर्य यह है कि आहारक शरीरसे अन्य पदार्थ-
    का व्याघात नहीं होता और अन्य पदार्थसे आहारक शरीरका व्याघात नहीं होता । आहारक
    शरीरके प्रयोजनका समुच्चय करनेके लिए सूत्रमें 'च' शब्द दिया है। यथा—आहारक शरीर २०
    कदाचित् लब्धि-विशेषके सद्भावको जतानेके लिए, कदाचित् सूक्ष्म पदार्थका निश्चय करनेके लिए
    और संयमकी रक्षा करनेके लिए उत्पन्न होता है। सूत्रमें 'आहारक' पद आया है उससे पूर्वमें कहे
    गये आहारक शरीरको दुहराया है। जिस समय जीव आहारक शरीरकी रचनाका आरम्भ करता
    है उस समय वह प्रमत्त हो जाता है इसलिए सूत्रमें प्रमत्तसंयतके ही आहारक शरीर होता है यह
    कहा है। इष्ट अर्थके निश्चय करनेके लिए सूत्रमें 'एवकार' पदको ग्रहण किया है। जिससे यह २५
    जाना जाय कि आहारक शरीर प्रमत्तसंयतके ही होता है अन्यके नहीं। किन्तु यह न जाना जाय
    कि प्रमत्तसंयतके आहारक ही होता है। तात्पर्य यह है कि प्रमत्तसंयतके औदारिक आदि
    शरीरोंका निराकरण न हो इसलिए प्रमत्तसंयत पदके साथ ही एवकार पद लगाया है ।
    § ३५८. इस प्रकार इन शरीरोंको धारण करनेवाले संसारी जीवोंके प्रत्येक गतिमें क्या
    तीनों लिंग होते हैं या लिंगका कोई स्वतन्त्र नियम है। अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगे- ३०
    का सूत्र कहते हैं—
    नारक और सम्मूर्च्छिन नपुंसक होते हैं ॥ ५० ॥
    § ३५९. नरकोंका कथन आगे करेंगे । जो नरकोंमें उत्पन्न होते हैं वे नारकी कहलाते हैं ।
    जो सम्मूर्च्छन जन्मसे पैदा होते हैं वे सम्मूर्च्छिन कहलाते हैं। सूत्रमें नारक और सम्मूर्च्छिन इन
    दोनों पदोंका द्वन्द्वसमास है । चारित्रमोहके दो भेद हैं—कषाय और नोकषाय । इनमेंसे नोकषायके ३५
    भेद नपुंसकवेदके उदयसे और अशुभ नामकर्मके उदयसे उक्त जीव स्त्री और पुरुष न होकर नपुंसक
    होते हैं। यहाँ ऐसा नियम जानना कि नारक और सम्मूर्च्छिन नपुंसक ही होते हैं। इन जीवोंके
    १. -मस्तीति सम्मू-मु० ।

१४४ सर्वार्थसिद्धौ [ २।५१ § ३६० -
§ ३६०. यद्येवमवध्रियते, अर्थादापन्नमेतदुक्तेभ्योऽन्ये संसारिणस्त्रिलिङ्गा इति यत्रात्यन्तं¹
नपुंसकलिङ्गस्याभावस्तत्प्रतिपादनार्थमाह—
न देवाः ॥५१॥
§ ३६१. स्त्रैणं पौंस्नं च यन्निरतिशयसुखं² शुभगतिनामोदयापेक्षं तद्देवा अनुभवन्तीति न
५ तेषु नपुंसकानि³ सन्ति ।
§ ३६२. अथेतरे कियल्लिङ्गा इत्यत आह—
शेषास्त्रिवेदाः ॥५२॥
§ ३६३. त्रयो वेदा येषां ते त्रिवेदाः । के पुनस्ते वेदाः । स्त्रीत्वं पुंस्त्वं नपुंसकत्वमिति ।
कथं तेषां सिद्धिः । वेद्यत इति वेदः । लिङ्गमित्यर्थः । तद् द्विविधं द्रव्यलिङ्गं भावलिङ्गं चेति ।
१० द्रव्यलिङ्गं योनिमेहनादि नामकर्मोदयनिर्वर्तितम् । नोकषायोदयापादितवृत्ति भावलिङ्गम् । स्त्री-
वेदोदयात् स्त्यायत्यस्यां गर्भ इति स्त्री । पुंवेदोदयात् सूते जनयत्यपत्यमिति पुमान्⁴ । नपुंसकवेदो-
दयात्तदुभयशक्तिविकलं नपुंसकम् । रूढिशब्दाश्चैते । रूढिषु च क्रिया व्युत्पत्त्यर्थं च । यथा गच्छ-
तीति गौरिति । इतरथा हि गर्भधारणादिक्रियाप्राधान्ये बालवृद्धानां तिर्यङ्मनुष्याणां देवानां
कार्मणकाययोगस्थानां च तदभावात्स्त्रीत्वादिव्यपदेशो न स्यात् । त एते त्रयो वेदाः शेषाणां गर्भ-
१५ जानां भवन्ति ।
मनोज्ञ शब्द, गन्ध, रूप, रस और स्पर्शके सम्बन्धसे उत्पन्न हुआ स्त्री-पुरुष विषयक थोड़ा भी सुख
नहीं पाया जाता है।
§ ३६०. यदि उक्त जीवोंके नपुंसकवेद निश्चित होता है तो यह अर्थात् सिद्ध है कि इनसे
अतिरिक्त अन्य संसारी जीव तीन वेदवाले होते हैं। इसमें भी जिनके नपुंसकवेदका अत्यन्त अभाव
२० है उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
देव नपुंसक नहीं होते ॥ ५१ ॥
§ ३६१. शुभगति नामकर्मके उदयसे स्त्री और पुरुषसम्बन्धी जो निरतिशय सुख है उसका
देव अनुभव करते हैं इसलिए उनमें नपुंसक नहीं होते ।
§ ३६२. इनसे अतिरिक्त शेष जीव कितने लिंगवाले होते हैं, इस बातको बतलानेके लिए
२५ आगेका सूत्र कहते हैं—
शेषके सब जीव तीन वेदवाले होते हैं ॥ ५२ ॥
§ ३६३. जिनके तीन वेद होते हैं वे तीन वेदवाले कहलाते हैं। शंका—वे तीन वेद कौन
हैं ? समाधान—स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद । शंका—इसकी सिद्धि कैसे होती है ?
समाधान—जो वेदा जाता है उसे वेद कहते हैं। इसीका दूसरा नाम लिंग है। इसके दो भेद हैं—
३० द्रव्यलिंग और भावलिंग । जो योनि मेहन आदि नामकर्मके उदयसे रचा जाता है वह द्रव्यलिंग है
और जिसकी स्थिति नोकषायके उदयसे प्राप्त होती है वह भावलिंग है। स्त्रीवेदके उदयसे जिसमें
गर्भ रहता है वह स्त्री है। पुंवेदके उदयसे जो अपत्यको जनता है वह पुरुष है और नपुंसकवेदके
उदयसे जो उक्त दोनों प्रकारकी शक्तिसे रहित है वह नपुंसक है। वास्तवमें ये तीनों रूढ़िक शब्द
हैं और रूढ़िमें क्रिया व्युत्पत्तिके लिए ही होती है। यथा जो गमन करती है वह गाय है। यदि
३५ ऐसा न माना जाय और इसका अर्थ गर्भधारण आदि क्रियाप्रधान लिया जाय तो बालक और
वृद्धोंके, तिर्यंच और मनुष्योंके, देवोंके तथा कार्मणकाययोगमें स्थित जीवोंके गर्भधारण आदि
१. -त्यन्तनपुं-आ०, दि० १ । -न्यन्तिकनपुं-दि० २ । २. -शयं सुखं गति-मु० । ३. नपुंसकलिङ्गानि सन्ति
मु० । ४. पुमान् । तदुभय-आ०, दि० १- दि० २ ।
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  • २५३ § ३६५ ] द्वितीयोऽध्यायः १४५

§ ३६४. य इमे जन्मयोनिशरीरलिङ्गसंबन्धाहितविशेषाः प्राणिनो निर्दिश्यन्ते देवादयो
विचित्रधर्माधर्मवशोपकृताश्चतसृषु गतिषु शरीराणि धारयन्तस्ते किं यथाकालमुपभुक्तायुषो मृत्यन्तर-
राण्यास्कन्दन्ति उतायथाकालमपीत्यत आह—
औपपादिकचरमोत्तमदेहा संख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥५३॥
§ ३६५. औपपादिका व्याख्याता देवनारका इति । चरमशब्दोऽन्त्यवाची । उत्तम उत्कृष्टः ।
चरम उत्तमो देहो येषां ते चरमोत्तमदेहाः । १परीतसंसारास्तज्जन्मनिर्वाणार्हा २इत्यर्थः । असंख्येय-
मतीतसंख्यानमुपमाप्रमाणेण पल्यादिना गम्यमायुर्येषां त इमे असंख्येयवर्षायुषस्तिर्यङ्मनुष्या
उत्तरकुर्वादिषु प्रसूताः । औपपादिकाश्च चरमोत्तमदेहाश्च असंख्येयवर्षायुषश्च औपपादिकचरमो-
त्तमदेहा संख्येयवर्षायुषः । बाह्यस्योपघातनिमित्तस्य विषशस्त्रादेः सति संनिधाने ह्रस्वं भवतीत्य-
पवत्र्यंम् । अपवर्त्यमायुर्येषां त इमे अपवर्त्यायुषः । न अपवर्त्यायुषः अनपवर्त्यायुषः । न ह्येषामौप-
क्रियाका अभाव होनेसे स्त्री आदि संज्ञा नहीं बन सकती.है। ये तीनों वेद शेष जीवोंके अर्थात्
गर्भजोंके होते हैं।
विशेषार्थ—इसी अध्यायमें औदयिक भावोंका निर्देश करते समय उनमें तीन लिंग भी
गिनाये हैं। ये तीनों लिंग वेदके पर्यायवाची हैं जो वेदनाकषायके उदयसे होते हैं। यहाँ किन
जीवोंके कौन लिंग होता है इसका विचार हो रहा है। इसी प्रसंगसे आचार्य पूज्यपादने लिंगके दो
भेद बतलाये हैं—द्रव्यलिंग और भावलिंग। प्रश्न यह है कि लिंगके ये दो भेद सूत्रोंसे फलित होते
हैं या विशेष जानकारीके लिए मात्र टीकाकारने इनका निर्देश किया है। उत्तर स्पष्ट है कि मूल
सूत्रोंमें मात्र वेद नोकषायके उदयसे होनेवाले वेदोंका ही निर्देश किया है जैसा कि इसी अध्यायके
६वें सूत्रसे ज्ञात होता है।
§ ३६४. जो ये देवादिक प्राणी जन्म, योनि, शरीर और लिंगके सम्बन्धसे अनेक प्रकारके
बतलाये हैं वे विचित्र पुण्य और पापके वशीभूत होकर चारों गतियोंमें शरीरको धारण करते हुए
यथाकाल आयुको भोगकर अन्य शरीरको धारण करते हैं या आयुको पूरा न करके भी अन्य
शरीरको धारण करते हैं? अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उपपादजन्मवाले, चरमोत्तमदेहवाले और असंख्यात वर्षकी आयुवाले जीव अनपवर्त्य
आयुवाले होते हैं ॥ ५३ ॥
§ ३६५. उपपादजन्मवाले देव और नारकी हैं यह व्याख्यान कर आये । चरम शब्द अन्त्य-
वाची है। उत्तम शब्दका अर्थ उत्कृष्ट है। जिनका शरीर चरम और उत्तम है वे चरमोत्तम
देहवाले कहे जाते हैं। जिनका संसार निकट है अर्थात् उसी भवसे मोक्षको प्राप्त होनेवाले जीव
चरमोत्तम देहवाले कहलाते हैं। असंख्येय परिमाण विशेष है जो संख्यातसे परे है। तात्पर्य यह है
कि पल्य आदि उपमा प्रमाणके द्वारा जिनकी आयु जानी जाती है वे उत्तरकुरु आदिमें उत्पन्न हुए
तिर्यंच और मनुष्य असंख्यात वर्षकी आयुवाले कहलाते हैं। उपघातके निमित्त विष शस्त्रादिक
बाह्य निमित्तोंके मिलनेपर जो आयु घट जाती है वह अपवर्त्य आयु कहलाती है। इस प्रकार
जिनकी आयु घट जातो है वे अपवर्त्य आयुवाले कहलाते हैं और जिनकी आयु नहीं घटती वे
अनपवर्त्य आयुवाले कहलाते हैं। इन औपपादिक आदि जीवोंकी आयु बाह्य निमित्तसे नहीं घटती
यह नियम है तथा इनसे अतिरिक्त शेष जीवोंका ऐसा कोई नियम नहीं है। सूत्रमें जो उत्तम
विशेषण दिया है वह चरम शरोरके उत्कृष्टपनको दिखलानेके लिए दिया है। यहाँ इसका और कोई
विशेष अर्थ नहीं है। अथवा 'चरमोत्तमदेहा' पाठके स्थानमें 'चरमदेह' यह पाठ भी मिलता है।
१. -देहाः । विपरीत-मु० । २. इत्यर्थः । अतीतसंख्यान-ता० ना० ।
१९
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पादिकादीनां बाह्यनिमित्तवशादायुरपवर्त्यते, इत्ययं नियमः । इतरेषामनियमः । चरमस्य देहस्यो-
त्कृष्टत्वप्रदर्शनार्थमुत्तमग्रहणं नार्थान्तरविशेषोऽस्ति । चरमदेहा इति वा पाठः¹ ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञाकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
विशेषार्थ—भुज्यमान आयुका उत्कर्षण नहीं होता केवल उदीरणा होकर आयु घट सकती
है, इसलिए प्रश्न होता है कि क्या सब संसारी जीवोंकी आयुका ह्रास होता है या इसका भी कोई
अपवाद है। इसी प्रश्नके उत्तर स्वरूप प्रकृत सूत्रकी रचना हुई है। इसमें बतलाया है कि उपपाद-
जन्मवाले देव ओर नारकी, तद्भवमोक्षगामी मनुष्य और असंख्यात वर्षकी आयुवाले तिर्यंच और
मनुष्य इनकी आयुका ह्रास नहीं होता। इन्हें जो आयु प्राप्त होती है उसका पूरा भोग होकर ही
उस पर्यायका अन्त होता है। यह विशेष नियम करनेका कारण यह है कि कर्मशास्त्रके अनुसार
कोई भी अधिक स्थितिवाला कर्म कारणविशेषके मिलनेपर अल्पकालमें भोगा जा सकता है।
भुज्यमान आयुपर भी यह नियम लागू होता है, इसलिए इस सूत्र-द्वारा यह व्यवस्था दी

अथ तृतीयोऽध्यायः
§ ३६६. 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इत्यादिषु नारकाः श्रुतास्ततः पृच्छति के ते
नारका इति । तत्प्रतिपादनार्थं तदधिकरणनिर्देशः क्रियते—
रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतममोमहातमःप्रभा भूमयो
घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोधः ॥१॥ ५
§ ३६७. रत्नं च शर्करा च वालुका च पङ्कश्च धूमश्च तमश्च महातमश्च रत्नशर्करावालु-
कापङ्कधूमतममोमहातमांसि । 'प्रभा' शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । साहचर्यात्ताच्छब्द्यम् । चित्रादि-
रत्नप्रभासहचरिता भूमिः रत्नप्रभा, शर्कराप्रभासहचरिता भूमिः शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभासह-
चरिता भूमिर्वालुकाप्रभा, पङ्कप्रभासहचरिता भूमिः पङ्कप्रभा, धूमप्रभासहचरिता भूमिर्धूमप्रभा,
तमःप्रभासहचरिता भूमिस्तमःप्रभा, महातमःप्रभासहचरिता भूमिर्महातमःप्रभा इति । एताः संज्ञा १०
अनेनोपायेन व्युत्पाद्यन्ते । 'भूमि'ग्रहणमधिकरणविशेषप्रतिपत्त्यर्थम् । यथा स्वर्गपटलानि भूमिमना-
श्रित्य व्यवस्थितानि न तथा नारकावासाः । किं र्तहि। भूमिमाश्रिता इति¹ । आसां भूमीनामा-
लम्बननिर्ज्ञानार्थं घनाम्बुवातादिग्रहणं क्रियते । घनाम्बु च वातश्च आकाशं च घनाम्बुवाता-
काशानि । तानि प्रतिष्ठा आश्रयो यासां ता घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः² । सर्वा एता भूमयो घनो-
§ ३६६. 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इत्यादिक सूत्रोंमें नारक शब्द सुना है इसलिए १५
पूछते हैं कि वे नारकी कौन हैं ? अतः नारकियोंका कथन करनेके लिए उनकी आधारभूत पृथि-
वियोंका निर्देश करते हैं—
रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा और महातमःप्रभा ये
सात भूमियाँ घनाम्बु, वात और आकाशके सहारे स्थित हैं तथा क्रमसे नीचे-नीचे हैं ॥१॥
§ ३६७. 'रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतममोमहातमाः' इसमें सब पदोंका परस्पर द्वन्द्व समास २०
है । प्रभा शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । पृथिवियोंकी प्रभा क्रमसे रत्न आदिके
समान होनेसे इनके रत्नप्रभा आदि नाम पड़े हैं । यथा—जिसकी प्रभा चित्र आदि रत्नोंकी प्रभाके
समान है वह रत्नप्रभा भूमि है। जिसकी प्रभा शर्कराके समान है वह शर्कराप्रभा भूमि है । जिसकी
प्रभा बालुकाकी प्रभाके समान है वह वालुकाप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा कीचड़के समान है वह
पंकप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा धुँवाके समान है वह धूमप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा अन्धकारके २५
समान है वह तमःप्रभा भूमि है और जिसकी प्रभा गाढ अन्धकारके समान है वह महातमःप्रभा
भूमि है । इस प्रकार इन नामोंकी व्युत्पत्ति कर लेनी चाहिए । सूत्रमें भूमि पदका ग्रहण अधिकरण
विशेषका ज्ञान करानेके लिए किया है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्वर्गपटल भूमिके बिना
स्थित है उस प्रकार नारकियोंके निवासस्थान नहीं हैं । किन्तु वे भूमिके आश्रयसे अवस्थित हैं ।
इन भूमियोंके आलम्बनका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें 'घनाम्बुवात' आदि पदका ग्रहण किया है । ३०
अभिप्राय यह है कि ये भूमियाँ क्रमसे घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुवातवलय और आकाश-
के आश्रयसे स्थित हैं इस बातके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः' पद दिया है ।
१. -इति । तासां भूमी-मु०, ता०, ना० । २. प्रतिष्ठाः । घनं च घनो मन्दो महान् आयत, इत्यर्थः । अम्बु
च जलम् उदकमित्यर्थः । वात-शब्दोऽन्त्यदीपकः । तत एवं संबन्धनीयः । घनो घनवातः । अम्बु अम्बुवातः ।
वातस्तनुवातः । इति महदपेक्षया तनुरिति सामर्थ्यगम्यः । अन्यः पाठः । सिद्धान्तपाठस्तु घनाम्बु च वातश्चेति । ३५
वातशब्दः सोपस्क्रियते । वातस्तनुवात इति वा । सर्वा एता मु०, ता०, ना० ।

दधिवलयप्रतिष्ठाः । घनोदधिवलयं घनवातवलयप्रतिष्ठम् । घनवातवलयं तनुवातवलयप्रतिष्ठम् ।
तनुवातवलयमाकाशप्रतिष्ठम् । आकाशमात्मप्रतिष्ठं, तस्यैवाधाराधेयत्वात् । त्रीण्यप्येतानि वलयानि
प्रत्येकं विंशतियोजनसहस्रबाहुल्यानि । 'सप्त'ग्रहणं संख्यान्तरनिवृत्त्यर्थम् । सप्त भूमयो नाष्टौ न नव
चेति 'अधोऽधः'वचनं तिर्यक्प्रचयनिवृत्त्यर्थम् ।
§ ३६८. किं ता भूमयो नारकाणां सर्वत्रावासा आहोस्वित्क्वचित्क्वचिदिति तन्निर्धार-
णार्थमाह—
तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि
पञ्च चैव यथाक्रमम् ॥२॥
य सब भूमियाँ घनोदधिवातवलयके आश्रयसे स्थित हैं । घनोदधिवातवलय घनवातवलयके आधार-
से स्थित है। घनवातवलय तनुवातवलयके आश्रयसे स्थित है। तनुवातवलय आकाशके आश्रयसे
स्थित है और आकाश स्वयं अपने आधारसे स्थित है; क्योंकि वह आधार और आधेय दोनों है ।
ये तीनों वातवलय प्रत्येक बीस-बीस हजार योजन मोटे हैं । सूत्रमें 'सप्त' पदका ग्रहण दूसरी
संख्याके निराकरण करनेके लिए किया है। भूमियाँ सात ही हैं, न आठ हैं और न नौ । ये भूमियाँ
तिर्यक् रूपसे अवस्थित नहीं हैं। इस बातको दिखानेके लिए सूत्रमें 'अधोऽधः' यह वचन दिया है।
विशेषार्थ—आकाशके दो भेद हैं—अलोकाकाश और लोकाकाश । लोकाकाश अलोका-
काशके बीचोबीच अवस्थित है । यह अकृत्रिम, अनादिनिधन स्वभावसे निर्मित और छह द्रव्योंसे
व्यास है। यह उत्तर-दक्षिण अधोभागसे लेकर ऊर्ध्वभाग तक विस्तारकी अपेक्षा सर्वत्र सात राजु
है। पूर्व पश्चिम नीचे सात राजु चौड़ा है। फिर दोनों ओरसे घटते-घटते सात राजुकी ऊँचाईपर
एक राजु चौड़ा है। फिर दोनों ओर बढ़ते-बढ़ते साढ़े दस राजुकी ऊँचाईपर पाँच राजु चौड़ा है।
फिर दोनों ओर घटते-घटते चौदह राजुकी ऊँचाईपर एक राजु चौड़ा है। पूर्व पश्चिमकी ओरसे
लोकका आकार कटिपर दोनों हाथ रखकर और पैरोंको फैलाकर खड़े हुए मनुष्यके आकारका
प्रतीत होता है । इससे अधोभाग वेतके आसनके समान, मध्यभाग झालरके समान और ऊर्ध्वभाग
मृदंगके समान दिखाई देता है। इसके तीन भाग हैं—अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक ।
मध्यलोकके बीचोबीच मेरु पर्वत है जो एक लाख चालीस योजन ऊँचा है । उसके नीचेका भाग
अधोलोक, ऊपरका भाग ऊर्ध्वलोक और बराबर रेखामें तिरछा फैला हुआ मध्यलोक है। मध्य-
लोकका तिरछा विस्तार अधिक होनेसे इसे तिर्यग्लोक भी कहते हैं। प्रकृत सूत्रमें अधोलोकका
विचार किया गया है। इसमें सात भूमियाँ हैं जो उत्तरोत्तर नीचे-नीचे हैं पर आपसमें
भिड़कर नहीं हैं। किन्तु एक दूसरी भूमिके बीचमें असंख्य योजनोंका अन्तर है। इन भूमियोंके
नाम सूत्रमें क्रमसे दिये ही हैं। ये इनके गुणनाम हैं । घम्मा, वंशा, मेघा, अंजना, अरिष्टा,
मघवा और माधवी ये इनके रौढिक नाम हैं। पहली पृथिवी एक लाख अस्सी हजार योजन
मोटी है। दूसरी बत्तीस हजार योजन मोटी है, तीसरी अट्ठाईस हजार योजन मोटी है, चौथी
चौबीस हजार योजन मोटी है, पाँचवीं बीस हजार योजन मोटो है, छठी सोलह हजार
योजन मोटी है, और सातवीं आठ हजार योजन मोटी है । ये सातों भूमियाँ घनोदधि, घनवात,
तनुवात और आकाशके आधारसे स्थित हैं। अर्थात् प्रत्येक पृथिवी घनोदधिके आधारसे स्थित है,
घनोदधि घनवातके आधारसे स्थित है, घनवात तनुवातके आधारसे स्थित है, तनुवात आकाशके
आधारसे स्थित है और आकाश अपने आधारसे स्थित है ।
§ ३६८. क्या इन भूमियोंमें सर्वत्र नारकियोंके निवास-स्थान हैं या कहीं-कहीं, इस बातका
निश्चय करनेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
उन भूमियोंमें क्रमसे तीस लाख, पचीस लाख, पन्द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पाँच
कम एक लाख और पाँच नरक हैं ॥२॥