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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
  • १।७ § २७ ] प्रथमोऽध्यायः १७

मौपशमिकमस्ति । क्षायिकं क्षायोपशमिकं च पर्याप्तापर्याप्तानाम् । तिरश्चीनां क्षायिकं नास्ति¹ ।
औपशमिकं क्षायोपशमिकं च पर्याप्तिकानामेव नापर्याप्तिकानाम् । मनुष्यगतौ मनुष्याणां पर्याप्ता-
पर्याप्तानां क्षायिकं क्षायोपशमिकं चास्ति । औपशमिकं पर्याप्तिकानामेव नापर्याप्तिकानाम् । मानु-
षीणां त्रितयमप्यस्ति पर्याप्तिकानामेव नापर्याप्तिकानाम्² । देवगतौ³ देवानां पर्याप्तापर्याप्तानां त्रितय-
मप्यस्ति । औपशमिकमपर्याप्तिकानां कथमिति चेच्चारित्रमोहोपशमेन सह मृतान्प्रति⁴ । भवनवासि- ५
व्यन्तरज्योतिष्काणां देवानां देवीनां च सौधर्मैशानकल्पवासिनीनां च क्षायिकं नास्ति । तेषां
पर्याप्तिकानामोपशमिकं क्षायोपशमिकं चास्ति ।
§ २७. इन्द्रियानुवादेन पञ्चेन्द्रियाणां संज्ञिनां त्रितयमप्यस्ति नेतरेषाम् । कायानुवादेन
त्रसकायिकानां त्रितयमप्यस्ति नेतरेषाम् । योगानुवादेन त्रयाणां योगानां त्रितयमप्यस्ति । अयोगिनां
क्षायिकमेव । वेदानुवादेन त्रिवेदीनां त्रितयमप्यस्ति । अपगतवेदानामोपशमिकं क्षायिकं चास्ति । १०
कषायानुवादेन चतुष्कषायाणां त्रितयमप्यस्ति । अकषायाणामौपशमिकं क्षायिकं चास्ति । ज्ञाना-
नुवादेन आभिनिबोधिकश्रुतावधिकमनःपर्ययज्ञानिनां त्रितयमप्यस्ति । केवलज्ञानिनां क्षायिकमेव ।
संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनासंयतानां त्रितयमप्यस्ति । परिहारविशुद्धिसंयतानामौप-
पर्याप्तक और अपर्याप्तक दोनों प्रकारके तिर्यंचोंके होता है । तिर्यंचनीके क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं
होता । औपशमिक और क्षायोपशमिक पर्याप्तिक तिर्यंचनीके ही होता है अपर्याप्तिक तिर्यंचनीके १५
नहीं । मनुष्य गतिमें क्षायिक और क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तिक और अपर्याप्तिक दोनों प्रकार-
के मनुष्योंके होता है । औपशमिक सम्यग्दर्शन पर्याप्तिक मनुष्यके ही होता है अपर्याप्तिक मनुष्यके
नहीं । मनुष्यनियोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु ये पर्याप्तिक मनुष्यनीके ही होते हैं अपर्याप्तिक
मनुष्यनीके नहीं । देवगतिमें पर्याप्तक और अपर्याप्तिक दोनों प्रकारके देवोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन
होते हैं । शंका—अपर्याप्तिक देवोंके औपशमिक सम्यग्दर्शन कैसे होता है ? समाधान—जो मनुष्य २०
चारित्रमोहनीयका उपशम करके या करते हुए उपशमश्रेणीमें मरकर देव होते हैं उन देवोंके
अपर्याप्तिक अवस्थामें औपशमिक सम्यग्दर्शन होता है । भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंके,
इन तोनोंकी देवांगनाओंके, तथा सौधर्म और ऐशान कल्पमें उत्पन्न हुई देवांगनाओंके क्षायिक
सम्यग्दर्शन नहीं होता शेष दो होते हैं सो वे भी पर्याप्तक अवस्थामें ही होते हैं ।
§ २७. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । २५
अन्य जीवोंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं होता । कायमार्गणाके अनुवादसे त्रसकायिक जीवोंके तीनों
सम्यग्दर्शन होते हैं । अन्य कायवाले जीवोंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं होता । योगमार्गणाके
अनुवादसे तीनों योगवाले जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु अयोगी जीवोंके एक क्षायिक
सम्यग्दर्शन ही होता है । वेदमार्गणाके अनुवादसे तीनों वेदवाले जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते
हैं किन्तु अयोगी जीवोंके औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । कषायमार्गणाके ३०
अनुवादसे चारों कषायवाले जीवोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु कषायरहित जीवोंके
औपशमिक और क्षायिक ये दो सम्यग्दर्शन होते हैं । ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे आभिनिबोधिक ज्ञानी,
श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी और मनःपर्ययज्ञानी जीवोंके तीनों ही सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु केवलज्ञानी
जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है । संयममार्गणाके अनुवादसे सामायिक और छेदोप-
१. नास्ति । कुत इत्युक्ते मनुष्यः कर्मभूमिज एव दर्शनमोहक्षपणाप्रारम्भको भवति । क्षपणाप्रारम्भकालात्पूर्वं ३५
तिर्यक्षु बद्धायुष्कोऽपि उत्कृष्टभोगभूमितिर्यक्पुरुषेष्वेवोत्पद्यते न तिर्यक्स्त्रीषु द्रव्यदेवस्त्रीणां तासां क्षायिकासंभवात् ।
एवं तिरश्चामप्यपर्याप्तिकानां क्षायोपशमिकं ज्ञेयं न पर्याप्तिकानाम् । औप-मु० । २. -कानाम् । क्षायिकं पुनर्भावि-
वेदेनैव । देव- मु० । ३. -गतौ सामान्येन देवा-मु० । ४. प्रति । विशेषेण भवन-मु० ।
३

शमिकं नास्ति, इतरद् द्वितयमप्यस्ति । सूक्ष्मसांपराययथाख्यातसंयतानामौपशमिकं क्षायिकं
चास्ति । संयतासंयतानां असंयतानां १ च त्रितयमप्यस्ति । दर्शनानुवादेन चक्षुदर्शनाचक्षुदर्शनावधि-
दर्शिननां त्रितयमप्यस्ति । केवलदर्शिनां क्षायिकमेव । लेश्यानुवादेन षड्लेश्यानां त्रितयमप्यस्ति ।
अलेश्यानां क्षायिकमेव । भव्यान्वादेन भव्यानां त्रितयॅमप्यस्ति नाभव्यानाम् । सम्यक्त्वानुवादेन
५ यत्र यत्सम्यग्दर्शनं तत्र तदेव ज्ञेयम् । संज्ञानुवादेन संज्ञिनां त्रितयमप्यस्ति नासंज्ञिनाम् ।
तदुभयव्यपदेशरहितानां क्षायिकमेव आहारानुवादेन आहारकाणां त्रितयमप्यस्ति । अनाहारकाणां
छद्मस्थानां त्रितयमप्यस्ति केवलिनां समुद्घातगतानां क्षायिकमेव ।
स्थापना संयत जीवोंके तोनों सम्यग्दर्शन होते हैं । परिहारविशुद्धिसंयतोंके औपशामिक सम्यग्दर्शन
नहीं होता शेष दो होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायिकसंयत और यथाख्यातसंयत जीवोंके औपशामिक और
१० क्षायिक सम्यग्दर्शन होते हैं । संयतासंयत और असंयत जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । दर्शन-
मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवाले, अचक्षुदर्शनवाले और अवधिदर्शनवाले जीवोंके तीनों सम्य-
ग्दर्शन होते हैं किन्तु केवल दर्शनवाले जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है ।
लेश्यामार्गणाके अनुवादसे छहों लेश्यावाले जीवोंके तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं किन्तु लेश्यारहित
जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है । भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्य जीवोंके तीनों
१५ सम्यग्दर्शन होते हैं । अभव्योंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं होता । सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे
जहाँ जो सम्यग्दर्शन है वहाँ वही जानना । संज्ञामार्गणाके अनुवादसे संज्ञी जीवोंके तीनों
सम्यग्दर्शन हैं । असंज्ञियोंके कोई भी सम्यग्दर्शन नहीं है । तथा संज्ञी और असंज्ञी इस संज्ञासे
रहित जीवोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है । आहारकमार्गणाके अनुवादसे आहारकोंके
तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं। अनाहारक छद्मस्थोंके भी तीनों सम्यग्दर्शन होते हैं । किन्तु
२० समुद्घातगत केवली अनाहारकोंके एक क्षायिक सम्यग्दर्शन ही होता है ।
विशेषार्थ—पदार्थोंके विवेचन करनेकी प्राचीन दो परम्पराएँ रही हैं—निर्देश आदि
छह अधिकारों द्वारा विवेचन करनेकी एक परम्परा और सदादि आठ अधिकारों द्वारा
विवेचन करनेकी दूसरी परम्परा । यहाँ तत्त्वार्थसूत्रके कर्ता गृद्धपिच्छ आचार्यने ७वें और
८वें सूत्रों द्वारा इन्हीं दो परम्पराओंका निर्देश किया है। यहाँ टीकामें निर्देश आदिके स्वरूपका
२५ कथन करके उन द्वारा सम्यग्दर्शनका विचार किया गया है। उसमें भी स्वामित्वकी अपेक्षा जो
कथन किया है उसका भाव समझनेके लिए यहाँ मुख्य बातोंका उल्लेख कर देना आवश्यक प्रतीत
होता है । इन बातोंको ध्यानमें रखनेसे चारों गतियोंमें किस अवस्थामें कहाँ कौन सम्यग्दर्शन
होता है इसका निर्णय करनेमें सहायता मिलती है । वे बातें ये हैं—१. क्षायिक सम्यग्दर्शनका
प्रस्थापक कर्मभूमिका मनुष्य ही होता है । किन्तु ऐसा जीव कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि या क्षायिक
३० सम्यग्दृष्टि हो जानेके बाद मरकर चारों गतियोंमें जन्म ले सकता है । २. नरकमें उक्त जीव प्रथम
नरकमें ही जाता है । दूसरे आदि नरकोंमें कोई भी सम्यग्दृष्टि मरकर नहीं उत्पन्न होता । ३.
तिर्यंचोंमें व मनुष्योंमें उक्त जीव उत्तम भोगभूमिके पुरुषवेदी तिर्यंचोंमें व मनुष्योंमें ही उत्पन्न हो
सकता है । ४. तिर्यंच, मनुष्य और देवगतिके स्त्रीवेदियोंमें कोई भी सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नहीं
उत्पन्न होता । ५. भवनत्रिकमें भी कोई भी सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नहीं उत्पन्न होता । ६. उपशम
३५ सम्यग्दृष्टि जीव मरकर देवोंमें ही उत्पन्न होता है । उसमें भी उपशमश्रेणिमें स्थित उपशम
१. संयतासंयतानां च मु० । २. -तयमस्ति ता० ।

  • १७ § २८ ] प्रथमोऽध्यायः १९

§ २८. साधनं द्विविधं अभ्यन्तरं बाह्यं च । अभ्यन्तरं दर्शनमोहस्योपशमः क्षयः क्षयोपशमो
वा । बाह्यं नारकाणां प्राक्चतुर्थ्याः सम्यग्दर्शनस्य साधनं केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं
केषांचिद्वेदनाभिभवः । चतुर्थीमारभ्य आ सप्तम्या नारकाणां जातिस्मरणं वेदनाभिभवश्च ।
तिरश्चां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिनबिम्बदर्शनम् । मनुष्याणामपि तथैव ।
देवानां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणं केषांचिज्जिनमहिमदर्शनं केषांचिद्देवर्द्धिदर्शनम् । ५
एवं प्रागानतात् । आनतप्राणतारणाच्युतदेवानां देवर्द्धिदर्शनं मुक्तान्यत्त्रितयमप्यस्ति । नवग्रैवेयक-
वासिनां केषांचिज्जातिस्मरणं केषांचिद्धर्मश्रवणम् । अनुदिशानुत्तरविमानवासिनामिदं कल्पना
न संभवति; प्रागेव गृहीतसम्यक्त्वानां तत्रोत्पत्तेः ।

सम्यग्दृष्टिका ही मरण सम्भव है अन्यका नहीं । ७. कृतकृत्यवेदक सम्यग्दर्शन क्षयोपशम सम्यग्-
दर्शनका एक भेद है। इसके सिवा दूसरे प्रकारके क्षयोपशम सम्यग्दृष्टि जीव मरकर देव और १०
मनुष्यगतिमें ही जन्म लेते हैं नरक और तिर्यंचगतिमें नहीं । ऐसे जीव यदि तिर्यंचगति और
मनुष्यगतिके होते हैं तो देवोंमें उत्पन्न होते हैं। यदि नरकगति और देवगतिके होते हैं तो वे
मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं। ८. सम्यग्दृष्टि जीव मरकर नपुंसकवेदियोंमें उत्पन्न होता हुआ भी
प्रथम नरकके नपुंसकवेदियोंमें उत्पन्न होता हुआ भी प्रथम नरकके नपुंसकवेदियोंमें ही उत्पन्न
होता है। मनुष्यगति और तिर्यंचगतिके नपुंसकवेदियोंमें नहीं उत्पन्न होता १। ये ऐसी बातें १५
हैं जिनको ध्यानमें रखनेसे किस गतिकी किस अवस्थामें कौन सम्यग्दर्शन होता है इसका पता
लग जाता है जिसका स्पष्ट उल्लेख मूल टीकामें किया ही है। एक बातका उल्लेख कर देना
और आवश्यक प्रतीत होता है वह यह कि गति मार्गणाके अवान्तर भेद यद्यपि भाववेदकी
प्रधानतासे किये गये हैं द्रव्य वेदकी प्रधानतासे नहीं, इसलिए यहाँ सर्वत्र भाववेदी स्त्रियोंका ही
ग्रहण किया गया है । तथापि द्रव्यस्त्रियोंमें सम्यग्दृष्टि मरकर नहीं उत्पन्न होता यह बात अन्य २०
प्रमाणोंसे जानी जाती है। इस प्रकार किस गतिकी किस अवस्थामें कौन सम्यग्दर्शन होता है
इसका विचार किया। शेष मार्गणाओंमें कहाँ कितने सम्यग्दर्शन हैं और कहाँ नहीं इसका विचार
सुगम है, इसलिए यहाँ हमने स्पष्ट नहीं किया ।
§ २८. साधन दो प्रकारका है—अभ्यन्तर और बाह्य । दर्शनमोहनीयका उपशम, क्षय या
क्षयोपशम अभ्यन्तर साधन है । बाह्य साधन निम्न प्रकार है—नारकियोंके चौथे नरकसे पहले २५
तक अर्थात् तीसरे नरक तक किन्हींके जातिस्मरण, किन्हींके धर्मश्रवण और किन्हींके वेदना-
भिभवसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। चौथेसे लेकर सातवें तक किन्हींके जातिस्मरण और
किन्हींके वेदनाभिभवसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। तिर्यंचोंमें किन्हींके जातिस्मरण, किन्हींके
धर्मश्रवण, और किन्हींके जिनबिम्बदर्शनसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है। मनुष्योंके भी इसी प्रकार
जानना चाहिए । देवोंमें किन्हींके जातिस्मरण, किन्हींके धर्मश्रवण, किन्हींके जिनमहिमादर्शन, ३०
और किन्हींके देवऋद्धिदर्शनसे सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है । यह व्यवस्था आनत कल्पसे पूर्वतक
जानना चाहिए । आनत, प्राणत, आरण और अच्युत कल्पके देवोंके देवऋद्धिदर्शनको छोड़कर
शेष तीन साधन पाये जाते हैं। नौ ग्रैवेयकमें निवास करनेवाले देवोंके सम्यग्दर्शनका साधन
किन्हींके जातिस्मरण और किन्हींके धर्मश्रवण है। अनुदिश और अनुत्तरविमानोंमें रहनेवाले
देवोंके यह कल्पना नहीं है, क्योंकि वहाँ सम्यग्दृष्टि जीव ही उत्पन्न होते हैं। ३५

१. इस नियमके अनुसार जीवकाण्डकी 'हेट्ठिमछप्पुढवीणं' इत्यादि गाथामें 'सव्वइत्थीणं' के स्थानमें 'संडइत्थीणं'
पाठ समीचीन प्रतीत होता है ।

§ २९. अधिकरणं द्विविधं अभ्यन्तरं बाह्यं च । अभ्यन्तरं स्वस्वामिसम्बन्धार्ह एव आत्मा;
विवक्षातः कारकप्रवृत्तेः । बाह्यं लोकनाडी । सा कियती । एकरज्जुविष्कम्भा चतुर्दशरज्ज्वायामा ।
§ ३०. स्थितिरौपशमिकस्य जघन्योत्कृष्टा चान्तर्मुहूर्तकी । क्षायिकस्य संसारिणो जघन्या-
न्तर्मुहूर्तकी । उत्कृष्टा त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सान्तर्मुहूर्ताष्टवर्षहीनपूर्वकोटिद्वयाधिकानि । मुक्तस्य
सादिरपर्यवसाना । क्षायोपशमिकस्य जघन्यान्तर्मुहूर्तकी उत्कृष्टा षट्षष्ट्रिसागरोपमाणि ।
§ ३१. विधानं सामान्यादेकं सम्यग्दर्शनम् । द्वितयं निसर्गजाधिगमजभेदात् १। त्रितयं
औपशमिकक्षायिकक्षायोपशमिकभेदात् । एवं संख्यैया विकल्पाः शब्दतः । असंख्येया अनन्ताश्च
भवन्ति श्रद्धातृश्रद्धातव्यभेदात् । एवमयं निर्देशादिविधिर्ज्ञानचारित्रयोर्जीवाजीवादिषु चागमानु-
सारेण योजयितव्यः ।
§ २९. अधिकरण दो प्रकारका है—अभ्यन्तर और बाह्य । अभ्यन्तर अधिकरण—जिस
सम्यग्दर्शनका जो स्वामी है वही उसका अभ्यन्तर अधिकरण है । यद्यपि सम्बन्धमें षष्ठी और
अधिकरणमें सप्तमी विभक्ति होती है फिर भी विवक्षाके अनुसार कारककी प्रवृत्ति होती है, अतः
षष्ठी विभक्ति द्वारा पहले जो स्वामित्वका कथन किया है उसके स्थानमें सप्तमी विभक्ति करनेसे
अधिकरणका कथन हो जाता है । बाह्य अधिकरण लोकनाडी है । शंका—वह कितनी बड़ी है ?
समाधान—एक राजु चौड़ी और चौदह राजु लम्बी है ।
§ ३०. औपशमिक सम्यग्दर्शनकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति एक अन्तर्मुहूर्त है । क्षायिक
सम्यग्दर्शनकी संसारी जीवके जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट स्थिति आठ वर्ष और
अन्तर्मुहूर्तकम दो पूर्वकोटि अधिक तेतीस २सागर है । मुक्त जीवके सादि—अनन्त है । क्षायोपश-
मिक३ सम्यग्दर्शनकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट स्थिति छयासठ सागर है ।
§ ३१. भेदकी अपेक्षा सम्यग्दर्शन सामान्यसे एक है । निसर्गज और अधिगमजके भेदसे दो
प्रकारका है । औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिकके भेदसे तीन प्रकारका है । शब्दोंकी अपेक्षा
संख्यात प्रकारका है तथा श्रद्धान करनेवालोंकी अपेक्षा असंख्यात प्रकारका और श्रद्धान करने
१. -गमजभेदात् । एवं मु० । २. क्षायिक सम्यग्दृष्टि उसी भवमें, तीसरे भवमें या चौथे भवमें मोक्ष जाता है ।
जो चौथे भवमें मोक्ष जाता है वह पहले भोगभूमिमें उसके बाद देव पर्यायमें जन्म लेकर और अन्तमें मनुष्य
होकर मोक्ष जाता है । जो तीसरे भवमें मोक्ष जाता है वह पहले नरकमें या देवपर्यायमें जन्म लेकर और
अन्तमें मनुष्य होकर मोक्ष जाता है। यहाँ तीन और चार भवोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शनके उत्पन्न होनेके भवका
भी ग्रहण कर लिया है । संसारी जीवके क्षायिक सम्यग्दर्शनकी यह उत्कृष्ट स्थिति तीन भवकी अपेक्षा बत-
लायी है । प्रथम और अन्तके दो भव मनुष्य पर्यायके लिये गये हैं और दूसरा भव देव पर्यायका लिया गया
है। इन तीनों भवोंकी उत्कृष्ट स्थिति दो पूर्व कोटि अधिक तेतीस सागर होती है । किन्तु क्षायिक सम्यग्दर्शन
की प्राप्ति आठ वर्ष और अन्तर्मुहूर्तके पहले नहीं हो सकती इसलिए उक्त कालमें से इतना काल कम करके
क्षायिक सम्यग्दर्शनकी उत्कृष्ट स्थिति आठ वर्ष अन्तर्मुहूर्त कम दो पूर्व कोटि वर्ष अधिक तेतीस सागर बतलायी
है । ३. खुद्दाबन्धमें क्षायोपशमिकसम्यग्दर्शनका उत्कृष्ट काल छयासठ सागर इस प्रकार घटित करके बतलाया
है—एक जीव उपशम सम्यक्त्वसे वेदक सम्यक्त्वको प्राप्त होकर शेष भुज्यमान आयुसे कम बीस सागरकी
आयु वाले देवोंमें उत्पन्न हुआ । फिर मनुष्योंमें उत्पन्न होकर पुनः मनुष्यायुसे कम बाईस सागरकी आयुवाले
देवोंमें उत्पन्न हुआ । फिर मनुष्यगतिमं जाकर भुज्यमान मनुष्यायुसे तथा दर्शनमोहकी क्षपणा पर्यन्त आगे
भोगी जानेवाली मनुष्यायुसे कम चौबीस सागरकी आयुवाले देवोंमें उत्पन्न हुआ । वहाँसे फिर मनुष्य गतिमें
आकर वहाँ वेदक सम्यक्त्वके कालमें अन्तर्मुहूर्त रह जाने पर दर्शनमोहकी क्षपणाका प्रारम्भ करके कृतकृत्य
वेदक सम्यग्दृष्टि हो गया । यह जीव जब कृतकृत्यवेदकके अन्तिम समयमें स्थित होता है तब क्षायोपशमिक
सम्यग्दर्शनका उत्कृष्ट काल छयासठ सागर प्राप्त होता है ।

  • १।८ § ३३ ] प्रथमोऽध्यायः २१
    § ३२. किमेतैरेव जीवादीनामधिगमो भवति उत अन्योऽप्यधिगमोपायोऽस्तीति परि-
    पृष्टोऽस्तीत्याह—
    सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैश्च ॥८॥
    § ३३. सदित्यस्तित्वनिर्देशः १। स प्रशंसादिषु वर्तमानो नेह गृह्यते । संख्या भेदगणना ।
    क्षेत्रं निवासो वर्तमानकालविषयः । तदेव स्पर्शनं त्रिकालगोचरम् । कालो द्विविधः मुख्यो व्याव- ५
    हारिकश्च । तयोरुत्तरत्र निर्णयो वक्ष्यते । अन्तरं विरहकालः । भावः औपशमिकादिलक्षणः । अल्प-
    बहुत्वमन्योऽन्यापेक्षया विशेषप्रतिपत्तिः । एतैश्च सम्यग्दर्शनादीनां जीवादीनां चाधिगमो वेदितव्यः ।
    ननु च निर्देशादेव सद्ग्रहणं सिद्धम् । विधानग्रहणात्संख्यागतिः । अधिकरणग्रहणात्क्षेत्रस्पर्शनाव-
    बोधः । स्थितिग्रहणात्कालसंग्रहः । भावो नामादिषु संगृहीत एव । पुनरेषां किमर्थं ग्रहणं २ मिति ।
    सत्यं, सिद्धम् । विनेयाशयवशात्तत्त्वदेशनाविकल्पः । केचित्संक्षेपरुचयः ३ केचित् विस्ताररुचयः । अपरे १०
    नातिसंक्षेपेण नातिविस्तरेण प्रतिपाद्याः । सर्वसत्त्वानुग्रहार्थो हि सतां प्रयास इति अधिगमाभ्युपाय-
    भेदोद्देशः कृतः । इतरथा हि "प्रमाणनयैरधिगमः" इत्यनेनैव सिद्धत्वादितरेषां ग्रहणमनर्थकं स्यात् ।
    योग्य पदार्थोंकी अपेक्षा अनन्त प्रकारका है। इसी प्रकार यह निर्देश आदि विधि ज्ञान और
    चारित्रमें तथा जीव और अजीव आदि पदार्थोंमें आगमके अनुसार लगा लेना चाहिए ।
    § ३२. क्या इन उपर्युक्त कारणोंसे ही जीवादि पदार्थों का ज्ञान होता है या और दूसरे भी १५
    ज्ञानके उपाय हैं इस प्रकार ऐसा प्रश्न करनेपर दूसरे उपाय हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
    कहते हैं—
    सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्वसे भी सम्यग्दर्शन आदि
    विषयोंका ज्ञान होता है ॥८॥
    § ३३. 'सत्' अस्तित्वका सूचक है । वह प्रशंसा आदि अनेक अर्थोंमें रहता है पर उनका २०
    यहाँ ग्रहण नहीं किया है । संख्यासे भेदोंकी गणना ली है । वर्तमानकालविषयक निवासको क्षेत्र
    कहते हैं । त्रिकालविषयक निवासको स्पर्शन कहते हैं । काल दो प्रकारका है—मुख्य और व्याव-
    हारिक । इनका निर्णय आगे करेंगे । विरहकालको अन्तर कहते हैं । भावसे औपशमिक आदि
    भावोंका ग्रहण किया गया है और एक दूसरेकी अपेक्षा न्यूनाधिकका ज्ञान करनेको अल्पबहुत्व
    कहते हैं । इन सत् आदिके द्वारा सम्यग्दर्शनादिक और जीवादि पदार्थों का ज्ञान होता है ऐसा यहाँ २५
    जानना चाहिए । शंका—निर्देशसे ही 'सत्'का ग्रहण हो जाता है । विधानके ग्रहण करनेसे संख्या-
    का ज्ञान हो जाता है । अधिकरणके ग्रहण करनेसे क्षेत्र और स्पर्शनका ज्ञान हो जाता है । स्थिति-
    के ग्रहण करनेसे कालका संग्रह हो जाता है । भावका नामादिकमें संग्रह हो ही गया है फिर इनका
    अलगसे किस लिए ग्रहण किया है ? समाधान—यह बात सही है कि निर्देश आदिके द्वारा 'सत्'
    आदिकी सिद्धि हो जाती है तो भी शिष्योंके अभिप्रायनुसार तत्त्वदेशनामें भेद पाया जाता है । ३०
    कितने ही शिष्य संक्षेपरुचिवाले होते हैं । कितने ही शिष्य विस्ताररुचिवाले होते हैं और
    दूसरे शिष्य न तो अतिसंक्षेप कथन करनेसे समझते हैं और न अति विस्तृत कथन करनेसे समझते
    हैं । किन्तु सज्जनोंका प्रयास सब जीवोंका उपकार करना है इसलिए यहाँ अलगसे ज्ञानके उपायके
    भेदोंका निर्देश किया है । अन्यथा 'प्रमाणनयैरधिगमः' इतनेसे ही काम चल जाता, उपायोंका
    ग्रहण करना निष्फल होता । ३५
    १. -र्देशः । प्रशंसा-मु० ता० न० । २. ग्रहणमुच्यते ? सत्यं ता० न० । ३. संक्षेपरुचयः । अपरे
    नाति-मु० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

§ ३४. तत्र जीवद्रव्यमधिकृत्य सदाद्यनुयोगद्वारनिरूपणं क्रियते । जीवाश्चतुर्दशसु गुण-
स्थानेषु व्यवस्थिताः । मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिः सम्यङ्मिथ्यादृष्टिः असंयतसम्यग्दृष्टिः संयता-
संयतः प्रमत्तसंयतः अप्रमत्तसंयतः अपूर्वकरणस्थाने उपशमकः क्षपकः अनिवृत्तिबादरसांपराय-
स्थाने उपशमकः क्षपकः सूक्ष्मसांपरायस्थाने उपशमकः क्षपकः उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थः
५ क्षीणकषायवीतरागछद्मस्थः सयोगकेवली अयोगकेवली चेति । एतेषामेव जीवसमासानां निरूप-
णार्थं चतुर्दश मार्गणास्थानानि ज्ञेयानि । गतीन्द्रियकाययोगवेदकषायज्ञानसंयमदर्शनलेश्या-
भव्यसम्यक्त्वसंज्ञाहारका इति ।
§ ३५. तत्र सत्प्ररूपणा द्विविधा सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन अस्ति मिथ्यादृष्टिः
सासादनसम्यग्दृष्टिरित्येवमादि । विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु आद्यानि चत्वारि
१० गुणस्थानानि सन्ति । तिर्यग्गतौ तान्येव संयतासंयतस्थानाधिकानि सन्ति । मनुष्यगतौ चतुर्दशापि
सन्ति । देवगतौ नारकवत् । इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियादिषु चतुरिन्द्रियपर्यन्तेषु एकमेव मिथ्या-
दृष्टिस्थानम् । पञ्चेन्द्रियेषु चतुर्दशापि सन्ति । कायानुवादेन पृथिवीकायादिवनस्पतिकायन्तेषु
एकमेव मिथ्यादृष्टिस्थानम् । त्रसकायेषु चतुर्दशापि सन्ति । योगानुवादेन त्रिषु योगेषु त्रयोदश
गुणस्थानानि भवन्ति । ततः परं अयोगकेवली । वेदानुवादेन त्रिषु वेदेषु मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबाद-
१५ रान्तानि सन्ति । अपगतवेदेषु अनिवृत्तिबादराद्ययोगकेवल्यन्तानि ।
§ ३६. कषायानुवादेन क्रोधमानमायासु मिथ्यादृष्ट्यादीनि अनिवृत्तिबादरस्थानान्तानि
सन्ति । लोभकषाये तान्येव सूक्ष्मसांपरायस्थानाधिकानि । अकषायः उपशान्तकषायः क्षीणकषायः
§ ३४. अब जीव द्रव्यकी अपेक्षा 'सत्' आदि अनुयोगद्वारोंका कथन करते हैं यथा—जीव
चौदह गुणस्थानोंमें स्थित हैं। मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत,
२० प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत, अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक, अनिवृत्तिबादरसाम्पराय
गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक, सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक, उप-
शान्तकषाय वीतराग छद्मस्थ, क्षीणकषाय वीतराग छद्मस्थ, सयोगकेवली और अयोगकेवली ।
इन चौदह जीवसमासोंके निरूपण करनेके लिए चौदह मार्गणास्थान जानने चाहिए । यथा—
गति, इन्द्रिय, काय योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्य, सम्यक्त्व, संज्ञा
२५ और आहारक ।
§ ३५. इनमें-से सामान्य और विशेषकी अपेक्षा सत्प्ररूपणा दो प्रकारकी है । मिथ्यादृष्टि है,
सासादन सम्यग्दृष्टि है इत्यादिरूपसे कथन करना सामान्यकी अपेक्षा सत्प्ररूपणा है । विशेषकी
अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब पृथिवियोंमें प्रारम्भके चार गुणस्थान हैं ।
तिर्यंचगतिमें वे ही चार गुणस्थान हैं किन्तु संयतासंयत एक गुणस्थान और है । मनुष्यगतिमें
३० चौदह ही गुणस्थान हैं और देवगतिमें नारकियोंके समान चार गुणस्थान हैं। इन्द्रिय मार्गणाके
अनुवादसे एकेन्द्रियोंसे लेकर चौइन्द्रिय तकके जीवोंमें एक ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थान है ।
पंचेन्द्रियोंमें चौदह ही गुणस्थान हैं। कायमार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायसे लेकर वनस्पति
तकके जीवोंमें एक ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थान है। त्रसकायिकोंमें चौदह ही गुणस्थान हैं। योग
मार्गणाके अनुवादसे तीनों योगोंमें तेरह गुणस्थान हैं और इसके बाद अयोगकेवली गुणस्थान है ।
३५ वेदमार्गणाके अनुवादसे तीनों वेदोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक नौ गुणस्थान हैं ।
अपगतवेदियोंमें अनिवृत्तिबादरसे लेकर अयोगकेवली तक छह गुणस्थान हैं ।
§ ३६. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोध, मान और माया कषायमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
अनिवृत्तिबादर तक नौ गुणस्थान हैं, लोभकषायमें वे ही नौ गुणस्थान हैं किन्तु सूक्ष्मसाम्पराय
१. कायादिषु वनस्प-मु० न० ।

  • १।८ § ४१ ] प्रथमोऽध्यायः २३
    सयोगकेवली अयोगकेवली १ चेति ।
    § ३७. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभङ्गज्ञानेषु मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिश्चां-
    स्ति । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानेषु असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि क्षीणकषायान्तानि सन्ति । मनः-
    पर्ययज्ञाने प्रमत्तसंयतादयः क्षीणकषायान्ताः सन्ति । केवलज्ञाने सयोगोऽयोगश्च ।
    § ३८. संयमानुवादेन संयताः प्रमत्तादयोऽयोगकेवल्यन्ताः । सामायिकच्छेदोपस्थापनाशुद्धि- ५
    संयताः प्रमत्तादयोऽनिवृत्तिस्थानान्ताः । परिहारविशुद्धिसंयताः प्रमत्ताश्चाप्रमत्ताश्च । सूक्ष्मसांप-
    रायशुद्धिसंयता एकस्मिन्नेव सूक्ष्मसांपरायस्थाने । यथाख्यातविहारशुद्धिसंयता उपशान्तकषाया-
    दयोऽयोगकेवल्यन्ताः । संयतासंयता एकस्मिन्नेव संयतासंयतस्थाने । असंयता आद्येषु चतुर्षु
    गुणस्थानेषु ।
    § ३९. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनाचक्षुर्दर्शनयोर्मिथ्यादृष्ट्यादीनि क्षीणकषायान्तानि सन्ति । १०
    केवलदर्शने सयोगकेवली अयोगकेवली च ।
    § ४०. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकपोतलेश्यासु मिथ्यादृष्ट्यादीनि असंयतसम्यग्दृष्ट्यन्तानि
    सन्ति । तेजःपद्मलेश्ययोर्मिथ्यादृष्ट्यादीनि अप्रमत्तस्थानान्तानि । शुक्ललेश्यायां मिथ्यादृष्ट्यादीनि
    सयोगकेवल्यन्तानि । अलेश्या अयोगकेवलिनः ।
    § ४१. भव्यानुवादेन भव्येषु चतुर्दशापि सन्ति । अभव्या आद्य एव स्थाने । १५
    एक गुणस्थान और है । उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय, सयोगो और अयोगो ये चार गुणस्थान
    कषायरहित हैं ।
    § ३७. ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञान, श्रुताज्ञान और विभंगज्ञानमें मिथ्यादृष्टि और
    सासादनसम्यग् दृष्टि ये दो गुणस्थान हैं । आभिनिबोधिक ज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञानमें असंयत-
    सम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक नौ गुणस्थान हैं । मनःपर्ययज्ञानमें प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीण- २०
    कषाय तक सात गुणस्थान हैं । केवलज्ञानमें सयोग और अयोग ये दो गुणस्थान हैं।
    § ३८. संयम मार्गणाके अनुवादसे प्रमत्तसंयतसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक संयत
    जीव होते हैं । सामायिक संयत और छेदोपस्थापनशुद्धिसंयत जीव प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्ति
    गुणस्थान तक होते हैं । परिहारविशुद्धिसंयत जीव प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें होते
    हैं। सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत जीव एक सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें होते हैं । यथाख्यात विहार- २५
    शुद्धिसंयत जीव उपशान्तकषाय गुणस्थानसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक होते हैं । संयतासंयत
    जीव एक संयतासंयत गुणस्थानमें होते हैं । असंयत जीव प्रारम्भके चार गुणस्थानोंमें होते हैं ।
    § ३९. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शनमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीण-
    कषाय तक बारह गुणस्थान हैं । अवधिदर्शनमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक नौ
    गुणस्थान हैं। केवलदर्शनमें सयोगकेवली और अयोगकेवली ये दो गुणस्थान हैं । ३०
    § ४०. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे कृष्ण, नील और कपोत लेश्यामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
    असंयत सम्यग्दृष्टि तक चार गुणस्थान हैं । पीत और पद्मलेश्यामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत
    तक सात गुणस्थान हैं । शुक्ललेश्यामें मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक तेरह गुणस्थान हैं ।
    किन्तु अयोगकेवली जीव लेश्या रहित हैं ।
    § ४१. भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्योंने चौदह ही गुणस्थान हैं। किन्तु अभव्य पहले ही ३५
    गुणस्थान में पाये जाते हैं ।
    १. -वली च । ज्ञाना-ता० न० । २. दृष्टिश्चास्ति । सम्यग्मिथ्यादृष्टेः टिप्पणकारकाभिप्रायेण ज्ञातव्यम् ।
    आभिनि-न० ।

२४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ ६४२ -
§ ४२. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यक्त्वे असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि अयोगकेवल्यन्तानि
सन्ति । क्षायोपशमिकसम्यक्त्वे असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि अप्रमत्तान्तानि । औपशमिकसम्यक्त्वे
असंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनि उपशान्तकषायान्तानि । सासादनसम्यग्दृष्टिः सम्यङ्ममिथ्यादृष्टिमिथ्या-
दृष्टिश्च स्वे स्वे स्थाने ।
५ § ४३. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु द्वादश गुणस्थानानि क्षीणकषायान्तानि । असंज्ञिषु एकमेव
मिथ्यादृष्टिस्थानम् । तदुभयव्यपदेशरहितः सयोगकेवली अयोगकेवली च ।
§ ४४. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्ट्यादीनि केवल्यन्तानि । अनाहारकेषु विग्रह-
गत्यापन्नेषु त्रीणि गुणस्थानानि मिथ्यादृष्टिः सासादनसम्यग्दृष्टिरसंयतसम्यग्दृष्टिश्च । समुद्घात-
गतः सयोगकेवली अयोगकेवली च । सिद्धाः परमेष्ठिनः अतीतगुणस्थानाः । उक्ता सत्प्ररूपणा ।
§ ४५. संख्याप्ररूपणोच्यते । सा द्विविधा सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावद् जीवा
१० मिथ्यादृष्टयोनन्तानन्ताः । सासादनसम्यग्दृष्टयः सम्यङ्ममिथ्यादृष्टयोऽसंयतसम्यग्दृष्टयः संयता-
संयताश्च पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । प्रमत्तसंयताः कोटीपृथक्त्वसंख्याः । पृथक्त्वमित्यागमसंज्ञा
तिसृणां कोटीनामुपरि नवानामधः । अप्रमत्तसंयताः संख्येयाः । चत्वार उपशमकाः प्रवेशेन एको
वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेण चतुःपञ्चाशत् । स्वकालेन समुदिताः संख्येयाः । चत्वारः क्षपका
अयोगकेवलिनश्च प्रवेशेन एको वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेणाष्टोत्तरशतसंख्याः । स्वकालेन
१५ समुदिताः संख्येयाः । सयोगकेवलिनः प्रवेशेन एको वा द्वौ वा त्रयो वा । उत्कर्षेणाष्टोत्तरशतसंख्याः ।
स्वकालेन समुदिताः शतसहस्रपृथक्त्वसंख्याः ।
§ ४२. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यक्त्वमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोग-
केवली तक ग्यारह गुणस्थान हैं। क्षायोपशमिक सम्यक्त्वमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत
तक चार गुणस्थान हैं। औपशमिक सम्यक्त्वमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर उपशान्तकषाय तक
२० आठ गुणस्थान हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टि अपने-अपने गुणस्थान
में होते हैं ।
§ ४३. संज्ञामार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंमें क्षोणकषाय तक बारह गुणस्थान हैं। असंज्ञियोंमें
एक ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थान है। संज्ञी और असंज्ञी इस संज्ञासे रहित जीव सयोगकेवली और
अयोगकेवली इन दो गुणस्थानवाले होते हैं।
२५ § ४४. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे लेकर सयोगकेवली
तक तेरह गुणस्थान होते हैं। विग्रहगतिको प्राप्त अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और
असंयतसम्यग्दृष्टि ये तीन गुणस्थान होते हैं। तथा समुद्घातगत सयोगकेवलो और अयोगकेवलो
जीव भी अनाहारक होते हैं। सिद्ध परमेष्ठी गुणस्थानातीत हैं। इस प्रकार सत्प्ररूपणाका कथन
समाप्त हुआ।
३० § ४५. अब संख्या प्ररूपणाका कथन करते हैं। सामान्य और विशेषकी अपेक्षा वह दो
प्रकारको है। सामान्यकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्या-
दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत इनमें-से प्रत्येक गुणस्थानवाले जीव पल्यके असंख्यातवें
भागप्रमाण हैं। प्रमत्तसंयतोंकी संख्या कोटिपृथक्त्व है। पृथक्त्व यह आगमिक संज्ञा है। इससे
तीन से ऊपर और नौके नीचे मध्यकी किसी संख्याका बोध होता है। अप्रमत्तसंयत जीव संख्यात
३५ हैं। चारों उपशमक गुणस्थानवाले जीव प्रवेशकी अपेक्षा एक-दो या तीन हैं, उत्कृष्टरूपसे चौवन
हैं और अपने कालके द्वारा संचित हुए उक्त जीव संख्यात हैं। चारों क्षपक और अयोगकेवली
प्रवेशकी अपेक्षा एक दो या तीन हैं, उत्कृष्टरूपसे एकसौ आठ हैं और अपने कालके द्वारा संचित
१. द्विविधा । सामान्येन तावत्-मु० ।
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  • ११८ § ४७ ] प्रथमोऽध्यायः २३
    § ४६. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ प्रथमायां पृथिव्यां नारका मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः
    श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । द्वितीयादिष्वा सप्तम्या मिथ्यादृष्टयः श्रेण्यसंख्येयभागप्रमिताः ।
    स चासंख्येयभागः असंख्येया योजनकोटीकोटयः । सर्वासु पृथिवीषु सासादनसम्यग्दृष्टयः सम्यङ्-
    मिथ्यादृष्टयोऽसंयतसम्यग्दृष्टयश्च पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां १ मध्ये
    मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः पल्योपमासंख्येयभाग- ५
    प्रमिताः । मनुष्यगतौ मनुष्या मिथ्यादृष्टयः श्रेण्यसंख्येयभागप्रमिताः । स चासंख्येयभागः असंख्येया
    योजनकोटीकोटयः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः संख्येयाः । प्रमत्तादीनां सामा-
    न्योक्ता संख्या । देवगतौ देवा मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । सासादन-
    सम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टयः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः ।
    § ४७. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रिया मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । द्वीन्द्रियास्त्रीन्द्रियाश्चतुरि- १०
    न्द्रिया असंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । पञ्चेन्द्रियेषु मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः
    प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयोऽयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः ।
    हुए उक्त जीव संख्यात हैं। सयोगकेवली जीव प्रवेशकी अपेक्षा एक, दो या तीन हैं, उत्कृष्टरूपसे
    एकसौ आठ हैं और अपने कालके द्वारा संचित हुए उक्त जीव लाखपृथक्त्व हैं।
    § ४६. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें पहली पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि १५
    नारकी असंख्यात जगच्छ्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। दूसरी
    पृथिवीसे लेकर सातवीं पृथिवी तक प्रत्येक पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि नारकी जगश्रेणीके असंख्यातवें
    भागप्रमाण हैं। जो जगश्रेणीका असंख्यातवां भाग असंख्यात कोटि योजनप्रमाण है। सब पृथिवियोंमें
    सासादनसम्यग्दृष्टि, और सम्यग्मिथ्यादृष्टि असंयतसम्यग्दृष्टि नारकी पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण
    हैं। तिर्यंचगतिमें मिथ्यादृष्टि तिर्यंच अनन्तानन्त हैं। सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक २०
    प्रत्येक गुणस्थानवाले तिर्यंच पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। मनुष्यगतिमें मिथ्यादृष्टि मनुष्य-
    जग श्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। जो जगश्रेणीका असंख्यातवां भाग असंख्यातकोटि योजन
    प्रमाण है। ६ सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले मनुष्य संख्यात हैं।
    प्रमत्तसंयत आदि मनुष्योंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कह आये हैं। देवगतिमें मिथ्यादृष्टि देव
    असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण ७ हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। सासादन- २५
    सम्यग्दृष्टि सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि इनमेंसे प्रत्येक गुणस्थानवाले देव पल्यके
    असंख्यातवें भागप्रमाण हैं।
    § ४७. इन्द्रियमार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रिय मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं। दोइन्द्रिय
    तीनइन्द्रिय और चार इन्द्रिय जीव असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्या-
    तवें भागप्रमाण हैं। पंचेन्द्रियोंमें मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां ३०
    १. तिरञ्चा मिथ्या-मु० । २. सात राजु लम्बी और एक प्रदेशप्रमाण चौड़ी आकाश प्रदेश-पंक्तिको जगश्रेणि
    कहते हैं। ऐसी जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण जगश्रेणियोंमें जितने प्रदेश होते हैं उतने प्रथम नरकके
    मिथ्यादृष्टि नारकी हैं यह उक्त कथनका तात्पर्य है। ३. जगश्रेणिके वर्गको जगप्रतर कहते हैं। ४. जगश्रेणिमें
    ऐसे असंख्यातका भाग दो जिससे असंख्यात योजन कोटि प्रमाण आकाश प्रदेश प्राप्त हों, इतनी दूसरे आदि
    प्रत्येक नरकके नारकियोंकी संख्या है। यह संख्या उत्तरोत्तर हीन है। ५. इसमें संमूर्च्छिम मनुष्योंकी संख्या ३५
    सम्मिलित है। ६. सासादनसम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानवाले मनुष्योंकी संख्या जीवस्थान द्रव्यप्रमाणानुगमकी
    धवला टीकामें विस्तारसे बतलायी है। ७. मिथ्यादृष्टि देवोंकी संख्याका खुलासा प्रथम नरकके मिथ्यादृष्टि
    नारकियोंके खुलासाके समान जानना चाहिए। आगे भी इसी प्रकार यथायोग्य सुस्पष्ट कर लेना चाहिए।
    ४

२६ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ४८ -
§ ४८. कायानुवादेन पृथिवीकायिका अप्कायिकास्तेजःकायिका वायुकायिका असंख्येया
लोकाः । वनस्पतिकायिकाः अनन्तानन्ताः । त्रसकायिकसंख्या पञ्चेन्द्रियवत् ।
§ ४९. योगानुवादेन मनोयोगिनो वाग्योगिनश्च मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरा-
संख्येयभागप्रमिताः । काययोगिनो¹ मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः² । त्रयाणामपि योगिनां सासादन-
सम्यग्दृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । प्रमत्तसंयतादयः सयोगकेवल्यन्ताः
संख्येयाः । अयोगकेवलिनः सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५०. वेदानुवादेन स्त्रीवेदाः पुंवेदाश्च मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभाग-
प्रमिताः । नपुंसकवेदा मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । स्त्रीवेदा नपुंसकवेदाश्च सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः
संयतासंयतान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । प्रमत्तसंयतादयोऽनिवृत्तिबादरान्ताः संख्येयाः । पुंवेदाः
सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयो³ऽनिवृत्तिबादरान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । अपगतवेदा अनिवृत्तिबादरादयो-
ऽयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५१. कषायानुवादेन क्रोधमानमायासु मिथ्यादृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः सामान्योक्त-
जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक
प्रत्येक गुणस्थानवाले पंचेन्द्रियोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कह आये हैं ।
§ ४८. काय मार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक और वायु-
कायिक जीवोंकी संख्या असंख्यात लोकप्रमाण है । वनस्पतिकायिक जीव अनन्तानन्त हैं । और
त्रसकायिक जीवोंकी संख्या पंचेन्द्रियोंके⁴ समान है ।
§ ४९. योग मार्गणाके अनुवादसे मनोयोगी और वचनयोगी मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात
जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियां जगप्रतरके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं । काययोगियोंमें मिथ्या-
दृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं । तीनों योगवालोंमें सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक
गुणस्थानवाले जीव पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । प्रमत्तसंयतसे लेकर सयोगकेवली गुणस्थान
तकके तीनों योगवाले जीव प्रत्येक गुणस्थानमें संख्यात हैं । अयोगकेवलियोंकी वही संख्या है जो
सामान्यसे कह आये हैं ।
§ ५०. वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदवाले और पुरुषवेदवाले मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात
जगश्रेणीप्रमाण हैं जो जगश्रेणियाँ जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । नपुंसकवेदवाले मिथ्या-
दृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं । सासादनसम्यग्दृष्टि से लेकर संयतासंयत तक स्त्रीवेदवाले और नपुं-
सकवेदवाले जीवोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है । प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्तिबादर
तक स्त्रीवेदवाले और नपुंसक वेदवाले जीव संख्यात हैं । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर संयतासंयत
तक पुरुषवेदवाले जीवोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है । प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्ति-
बादर तक पुरुषवेदवालोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है । अनिवृत्तिबादरसे लेकर अयोग-
केवली गुणस्थान तक अपगतवेदवाले जीवोंकी वही संख्या है जो सामान्यसे कही है ।
§ ५१. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोध, मान और माया कषायमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
१. योगिषु मिथ्या-मु० । -योगेषु मिथ्या-दि० २ । २. -नन्ताः । त्रियोगिनां सासा-मु० । ३. -दयो
संयतासंयतान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । प्रमत्तसंयतादयोऽनिवृत्ति-मु०, आ०, दि० १ दि० २ । ४. वैसे तो
त्रस कायिकोंकी संख्या पंचेन्द्रियोंकी संख्यासे अधिक है । पर असंख्यात सामान्यकी अपेक्षा यहाँ त्रसकायिकों
की संख्याको पंचेन्द्रियोंकी संख्याके समान बतलाया है ।
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संख्याः । प्रमत्तसंयतादयोऽनिवृत्तिबादरान्ताः संख्येयाः । लोभकषायाणामुक्त एव क्रमः । अयं तु
विशेषः सूक्ष्मसांपरायसंयताः सामान्योक्तसंख्याः । अकषाया उपशान्तकषायादयोऽयोगकेवल्यन्ताः
सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५२. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिनः श्रुताज्ञानिनश्च मिथ्यादृष्टिससादनसम्यग्दृष्टयः सामा- ५
न्योक्तसंख्याः । विभङ्गज्ञानिनो मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेण्यः प्रतरासंख्येयभागप्रमिताः । सासादन-
सम्यग्दृष्टयः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । मतिश्रुतज्ञानिनोऽसंयतसम्यग्दृष्ट्यादयः क्षीणकषायान्ताः
सामान्योक्तसंख्याः । अवधिज्ञानिनोऽसंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयताः२ सामान्योक्तसंख्याः । प्रमत्त-
संयतादयः क्षीणकषायान्ताः संख्येयाः । मनःपर्ययज्ञानिनः प्रमत्तसंयतादयः क्षीणकषायान्ताः
संख्येयाः । केवलज्ञानिनः सयोगा अयोगाश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५३. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयताः प्रमत्तादयोऽनिवृत्तिबादरान्ताः १०
सामान्योक्तसंख्याः । परिहारविशुद्धिसंयताः प्रमत्ताश्चाप्रमत्ताश्च संख्येयाः । सूक्ष्मसांपरायशुद्धि-
संयता यथाख्यातविहारशुद्धिसंयताः संयतासंयता असंयताश्च सामान्योक्तसंख्याः ।

संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले जीवोंकी वही संख्या है जो ३सामान्यसे कही है। प्रमत्त-
संयतसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक उक्त कषायवाले जीव संख्यात हैं। यही क्रम लोभकषायवाले
जीवोंका जानना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता है कि सूक्ष्मसाम्परायिक संयत जीवोंकी वही १५
संख्या है जो सामान्यसे कही गयी है। उपशान्त कषायसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तक
कषाय रहित जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ४ है।
§ ५२. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी मिथ्यादृष्टि और सासादन-
सम्यग्दृष्टि जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ५ है। विभंगज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात जगश्रेणीप्रमाण
हैं जो जगश्रेणियाँ जगप्रतरके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि विभंगज्ञानी जीव २०
पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तक मतिज्ञानी
और श्रुतज्ञानी जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ६ है । असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयत अवधिज्ञानी
जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ७ है। प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानमें
अवधिज्ञानी जीव संख्यात हैं। प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थानमें मनःपर्यय-
ज्ञानी जीव संख्यात हैं। सयोगी और अयोगी केवलज्ञानियोंकी संख्या सामान्यवत् ८ है। २५
§ ५३. संयम मार्गणाके अनुवादसे प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक सामायिकसंयत
और छेदोपस्थापनासंयत जीवोंकी संख्या सामान्यवत् है । प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानमें परि-
हार-विशुद्धि संयत जीव संख्यात हैं । सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत, यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत, संयता-
संयत और असंयत जीवोंकी संख्या सामान्यवत् १० है ।

१. -दृष्टयः सासा- ता० । २. -यतान्ताः सामा- -मु०, दि० १, दि० २, आ० । ३. यों तो जिस ३०
गुणस्थानवालोंकी संख्या बतलायी है वह क्रोध आदि चार भागोंमें बँट जाती है फिर भी सामान्यसे
उस संख्याका अतिक्रम नहीं होता इसलिए क्रोध, मान, माया और लोभ कषायमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवालोंकी संख्या ओघके समान बतलायी है। आगे भी जहाँ इस प्रकार
संख्या बतलायी हो वहाँ यही क्रम जान लेना चाहिए। ४. संख्यात । ५. अनन्तानन्त । ६. जिस गुणस्थान-
वालोंकी जितनी संख्या है सामान्यसे उतनी संख्या है। ७. पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण । ८. संख्यात । ९. ३५
संख्यात । १०. सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयत और यथाख्यात विहारशुद्धिसंयत जीव संख्यात हैं। तथा संयतासंयत
जीव पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं और असंयत जीव अनन्तानन्त हैं।

२८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ५४ -
§ ५४. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनिनो मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयाः श्रेणयः प्रतरासंख्येयभाग-
प्रमिताः । अचक्षुर्दर्शनिनो मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । उभये च सासादनसम्यग्दृष्ट्यादयः क्षीण-
कषायान्ताः सामान्योक्तसंख्याः । अवधिदर्शनिनोऽवधिज्ञानिवत् केवलदर्शनिनः केवलज्ञानिवत् ।
§ ५५. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्या मिथ्यादृष्ट्यादयोऽसंयतसम्यग्दृष्ट्यन्ताः सामा-
न्योक्तसंख्याः । तेजःपद्मलेश्या मिथ्यादृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः स्त्रीवेदवत् । प्रमत्ताप्रमत्तसंयताः
संख्येयाः । शुक्ललेश्या मिथ्यादृष्ट्यादयः संयतासंयतान्ताः पल्योपमासंख्येयभागप्रमिताः । प्रमत्ता-
प्रमत्तसंयताः संख्येयाः । अपूर्वकरणादयः सयोगकेवल्यन्ता अलेश्याश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५६. भव्यानुवादेन भव्येषु मिथ्यादृष्ट्यादयोऽयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः । अभव्या
अनन्ताः ।
§ ५७. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टयः पल्योपमासंख्येयभाग-
प्रमिताः । संयतासंयतादय उपशान्तकषायान्ताः संख्येयाः । चत्वारः क्षपकाः सयोगकेवलिनोऽयोग-
केवलिनश्च सामान्योक्तसंख्याः । क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्ट्यादयोऽप्रमत्तान्ताः
सामान्योक्तसंख्याः । औपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयताः पल्योपमासंख्येयभाग-
प्रमिताः । प्रमत्ताप्रमत्तसंयताः संख्येयाः । चत्वार औपशमिकाः सामान्योक्तसंख्याः । सासादनसम्य-
ग्दृष्टयः सम्यङ्मिथ्यादृष्टयो मिथ्यादृष्टयश्च सामान्योक्तसंख्याः ।
§ ५४. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवाले मिथ्यादृष्टि जीव असंख्यात जगश्रेणी
प्रमाण हैं जो श्रेणियाँ जगप्रतरके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । अचक्षुदर्शनवाले मिथ्यादृष्टि जीव
अनन्तानन्त हैं । सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान तकके उक्त दोनों दर्शनवाले
जीवोंकी संख्या सामान्यवत् १ है । अवधिदर्शनवाले जीवोंकी संख्या अवधिज्ञानियोंके समान है ।
केवलदर्शनवाले जीवोंकी संख्या केवलज्ञानियों के समान है ।
§ ५५. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक कृष्ण, नील
और कापोत लेश्यावाले जीवोंकी संख्या २सामान्यवत् है । मिथ्यादृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक पीत
और पद्मलेश्यावाले जीवोंकी संख्या ३स्त्रीवेदके समान है । प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत गुण-
स्थानवाले पीत और पद्मलेश्यावाले जीव संख्यात हैं । मिथ्यादृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक शुक्ल
लेश्यावाले जीव पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं । प्रमत्त और अप्रमत्तसंयत जीव संख्यात हैं ।
अपूर्वकरणसे लेकर सयोगकेवली तक जीव सामान्यवत् ४ हैं । लेश्यारहित जीव सामान्यवत् हैं ।
§ ५६. भव्यमार्गणाके अनुवादसे भव्योंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक जीव
सामान्यवत् ५ हैं । अभव्य अनन्त हैं ।
§ ५७. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि जीव पल्यके
असंख्यातवें भाग हैं । संयतासंयतसे लेकर उपशान्तकषाय तक जीव संख्यात हैं । चारों क्षपक,
सयोगकेवली और अयोगकेवली सामान्यवत् हैं । क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयत सम्यग्दृष्टि-
से लेकर अप्रमत्तसंयत तक सामान्यवत् हैं । औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि और
संयतासंयत जीव पल्यके असंख्यातवें भाग हैं । प्रमत्त और अप्रमत्तसंयत जीव संख्यात हैं । चारों
उपशमक सामान्यवत् हैं । सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवोंकी
संख्या सामान्यवत् है ।
१. जिस गुणस्थानवालोंकी जितनी संख्या है सामान्यसे उतनी संख्या उस गुणस्थानमें चक्षु और अचक्षु दर्शन-
वालोंकी है । २. मिथ्यात्वमें अनन्तानन्त और शेष गुणस्थानोंमें पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण । ३. असंख्यात
जगश्रेणिप्रमाण । ४. जिस गुणस्थानवालों की जितनी संख्या है उतनी है । ५. जिस गुणस्थानवालोंकी जितनी
संख्या है उतनी है । केवल मिथ्यात्वमें अभव्योंकी संख्या कम हो जाती है ।

  • १।८ § ६२ ] प्रथमोऽध्यायः २९
    § ५८. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु मिथ्यादृष्ट्यादयः क्षीणकषायान्ताश्चक्षुर्दर्शनिवत् । असंज्ञिनो
    मिथ्यादृष्टयोऽनन्तानन्ताः । तदुभयव्यपदेशरहिताः सामान्योक्तसंख्याः ।
    § ५९. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्ट्यादयः सयोगकेवल्यन्ताः सामान्योक्तसंख्याः ।
    अनाहारकेषु मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टयः सामान्योक्तसंख्याः । सयोगकेवलिनः
    संख्येयाः । अयोगकेवलिनः सामान्योक्तसंख्याः । संख्या निर्णीता । ५
    § ६०. क्षेत्रमुच्यते । तद् द्विविधं सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावन्-मिथ्यादृष्टीनां
    सर्वलोकः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनामयोगकेवल्यन्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । सयोगकेवलिनां
    लोकस्यासंख्येयभागोऽसंख्येया भागाः सर्वलोको वा १।
    § ६१. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु नारकाणां चतुर्षु गुणस्थानेषु
    लोकस्यासंख्येयभागः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां मिथ्यादृष्ट्यादिसंयतासंयतान्तानां सामान्योक्तं क्षेत्रम् । १०
    मनुष्यगतौ मनुष्याणां मिथ्यादृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । सयोगकेवलिनां
    सामान्योक्तं क्षेत्रम् । देवगतौ देवानां सर्वेषां चतुर्षु गुणस्थानेषु लोकस्यासंख्येयभागः ।
    § ६२. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियाणां क्षेत्रं सर्वलोकः । विकलेन्द्रियाणां लोकस्यासंख्येयभागः ।
    पञ्चेन्द्रियाणां मनुष्यवत् ।
    § ५८. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक जीवोंकी १५
    संख्या चक्षुदर्शनवाले जीवोंके समान २ है । असंज्ञी मिथ्यादृष्टि अनन्तानन्त हैं । संज्ञी और असंज्ञी
    संज्ञासे रहित जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ३ है ।
    § ५९. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक
    जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ४ है । अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयत-
    सम्यग्दृष्टि जीवोंकी संख्या सामान्यवत् ५ है । सयोगकेवली संख्यात हैं और अयोगकेवली जीवोंकी २०
    संख्या सामान्यवत् ६ है । इस प्रकार संख्याका निर्णय किया ।
    § ६०. अब क्षेत्रका विचार करते हैं । सामान्य और विशेषकी अपेक्षा वह दो प्रकार का है ।
    सामान्यसे मिथ्यादृष्टियोंका सब लोक क्षेत्र है । सासादनसम्यग्दृष्टियोंसे लेकर अयोगकेवली तक
    जीवोंका लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्र है । सयोगकेवलियोंका लोकके असंख्यातवें भाग
    प्रमाण, लोकके असंख्यात बहुभाग प्रमाण और सब लोक क्षेत्र है । २५
    § ६१. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब पृथिवियोंमें नारकियों-
    का चार गुणस्थानोंमें लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है। तिर्यंचगतिमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थानसे
    लेकर संयतासंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले तिर्यंचोंका क्षेत्र सामान्यवत् है । अर्थात् मिथ्यादृष्टि
    तिर्यंचोंका सब लोक क्षेत्र है और शेष तिर्यंचोंका लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है । मनुष्य-
    गतिमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक गुणस्थानवाले मनुष्योंका क्षेत्र लोकका ३०
    असंख्यातवां भाग है। सयोगकेवलियोंका सामान्यवत् क्षेत्र है । देवगतिमें सब देवोंका चार गुण-
    स्थानोंमें लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है।
    § ६२. इन्द्रियमार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंका सब लोक क्षेत्र है । विकलेन्द्रियोंका लोकका
    असंख्यातवां भाग क्षेत्र है और पंचेन्द्रियोंका मनुष्योंके समान क्षेत्र है ।
    १. -भागः । समुद्घातेऽसंख्येया वा भागाः सर्व-मु० न० । २. मिथ्यादृष्टि संज्ञी असंख्यात जगश्रेणिप्रमाण ३५
    हैं । सासादन आदि संज्ञियोंकी संख्या जिस गुणस्थानवालोंकी जितनी संख्या है उतनी है । ३. संख्यात ।
    ४. मिथ्यादृष्टि आहारक अनन्तानन्त हैं । सासादनसे लेकर संयतासंयत तकके आहारक पल्यके असंख्यातवें
    भाग प्रमाण हैं । शेष संख्यात हैं । ५. मिथ्यादृष्टि अनाहारक अनन्तानन्त हैं । तथा सासादन सम्यग्दृष्टि और
    असंयत सम्यग्दृष्टि अनाहारक पल्यके असंख्यातवें भाग हैं। ६. संख्यात ।
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३० सर्वार्थसिद्धौ [ ११८ § ६३ -
§ ६३. कायानुवादेन पृथिवीकायादिवनस्पतिकाययान्तानां सर्वलोकः । त्रसकायिकानां
पञ्चेन्द्रियवत् ।
§ ६४. योगानुवादेन वाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादिसयोगकेवल्यन्तानां लोकस्यासंख्येय-
भागः । काययोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादिसयोगकेवल्यन्तानामयोगकेवलिनां च सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
५ § ६५. वेदानुवादेन १स्त्रीपुंवेदानां मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां लोकस्यासंख्येय-
भागः । नपुंसकवेदानां मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानामपगतवेदानां च सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ६६. कषायानुवादेन क्रोधमानमायाकषायाणां २लोभकषायाणां च मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्ति-
बादरान्तानां सूक्ष्मसांपरायाणामकषायाणां च सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ६७. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिश्रुताज्ञानिनां मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टीनां सामान्योक्तं
१० क्षेत्रम् । विभङ्गज्ञानानां मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टीनां लोकस्यासंख्येयभागः । आभिनिबोधिक-
श्रुतावधिज्ञानिनामसंयतसम्यग्दृष्ट्यादीनां ३क्षीणकषायान्तानां मनःपर्ययज्ञानिनां च प्रमत्तादीनां
क्षीणकषायान्तानां केवलज्ञानिनां सयोगानामयोगिनां च सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ६८. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयतानां चतुर्णां परिहारविशुद्धि-
संयतानां प्रमत्ताप्रमत्तानां सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयतानां यथाख्यातविहारशुद्धिसंयतानां चतुर्णां
१५ संयतासंयतानामसंयतानां च चतुर्णां सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ६३. काय मार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायसे लेकर वनस्पतिकाय तकके जीवोंका सब
लोक क्षेत्र है । त्रसकायिकोंका पंचेन्द्रियोंके समान क्षेत्र है ।
§ ६४. योग मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक प्रत्येक गुणस्थान-
वाले वचन योगी और मनोयोगी जीवोंका लोकका असंख्यातवाँ भाग क्षेत्र है । मिथ्यादृष्टिसे लेकर
२० सयोगकेवली तक प्रत्येक गुणस्थानवाले काययोगो जीवोंका और अयोगकेवली जीवोंका सामान्यवत्
क्षेत्र है ।
§ ६५. वेदमार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्ति बादर तक प्रत्येक गुणस्थान-
वाले स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवोंका लोकका असंख्यातवाँ भाग क्षेत्र है । तथा मिथ्यादृष्टिसे लेकर
अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येक गुणस्थानवाले नपुंसकवेदी जीवोंका और अपगतवेदियों का सामान्यवत्
२५ क्षेत्र है ।
§ ६६. कषायमार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येक गुण-
स्थानवाले क्रोध, मान, माया व लोभ कषायवाले, सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें लोभ कषायवाले और
कषाय रहित जीवोंका सामान्यवत् क्षेत्र है ।
§ ६७. ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थानवाले मत्य-
३० ज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है । मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि विभंग-
ज्ञानियोंका लोकका असंख्यातवाँ भाग क्षेत्र है । असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक
गुणस्थानवाले आभिनिबोधिक ज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंका, प्रमत्तसंयतसे लेकर
क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थानवाले मनःपर्ययज्ञानी जोवोंका तथा सयोग और अयोग गुणस्थान-
वाले केवलज्ञानी जीवोंका क्षेत्र सामान्योक्त है ।
३५ § ६८. संयम मार्गणाके अनुवादसे प्रमत्तादि चार गुणस्थानवाले सामायिक और छेदोप-
स्थापनासंयत जीवोंका, प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थानवाले परिहारविशुद्धिसंयत जीवोंका, सूक्ष्म-
साम्परायिक संयत जीवोंका, उपशान्त मोह आदि चार गुणस्थानवाले यथाख्यातसंयत जीवोंका
और संयतासंयत तथा चार गुणस्थानवाले असंयत जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है ।
१. स्त्रीपुंसवेदा-ता० । २. -मायालोभ-आ०, दि० २ । मायानां लोभ-दि० १ । ३. -दीनां मनःप-आ० ।
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  • ११८ § ७४ ] प्रथमोऽध्यायः ३१

§ ६९. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनानां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां लोकस्यासंख्येय-
भागः । अचक्षुर्दर्शनानां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तं क्षेत्रम् । अवधिदर्शनानाम-
वधिज्ञानिवत् । केवलदर्शनानां केवलज्ञानिवत् ।
§ ७०. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्यानां मिथ्यादृष्ट्याद्यसंयतसम्यग्दृष्ट्यन्तानां
सामान्योक्तं क्षेत्रम् । तेजःपद्मलेश्यानां मिथ्यादृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । शुक्ल- ५
लेश्यानां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां लोकस्यासंख्येयभागः । सयोगकेवलिनामलेश्यानां च
सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ७१. भव्यानुवादेन भव्यानां चतुर्दशानां सामान्योक्तं क्षेत्रम् । अभव्यानां सर्वलोकः ।
§ ७२. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टीनामसंयतसम्यग्दृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां क्षायो-
पशमिकसम्यग्दृष्टीनामसंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानामौपशमिकसम्यग्दृष्टीनामसंयतसम्यग्दृष्ट्या- १०
द्युपशान्तकषायान्तानां सासादनसम्यग्दृष्टीनां सम्यङ्मथ्यादृष्टीनां मिथ्यादृष्टीनां च सामान्योक्तं
क्षेत्रम् ।
§ ७३. संज्ञानुवादेन संज्ञिनां चक्षुर्दर्शनिवत् । असंज्ञिनां सर्वलोकः । तदुभयव्यपदेशरहितानां
सामान्योक्तं क्षेत्रम् ।
§ ७४. आहारानुवादेन आहारकाणां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तं १५
क्षेत्रम् । सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येयभागः । अनाहारकाणां मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्ट्य-

§ ६९. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थानमें
चक्षुदर्शनवाले जीवोंका लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है। मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक
प्रत्येक गुणस्थानवाले अचक्षुदर्शनवाले जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है। तथा अवधिदर्शनवालोंका
अवधिज्ञानियोंके समान और केवलदर्शनवालोंका केवलज्ञानियोंके समान क्षेत्र है। २०
§ ७०. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक प्रत्येक गुण-
स्थानवाले कृष्ण, नील और कपोत लेश्यावाले जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है। मिथ्यादृष्टिसे लेकर
अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानवाले पीत और पद्मलेश्यावाले जीवोंके लोकका असंख्यातवां
भाग क्षेत्र है। मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थानवाले शुक्ललेश्यावाले जीवोंका
लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है तथा शुक्ललेश्यावाले सयोगकेवलियोंका और लेश्या रहित २५
जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है।
§ ७१. भव्य मार्गणाके अनुवादसे चौदह गुणस्थानवाले भव्य जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है।
अभव्योंका सब लोक क्षेत्र है।
§ ७२. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे असयत सम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक
गुणस्थानवाले क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंका, असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक ३०
गुणस्थानवाले क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टियोंका, असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर उपशान्तकषाय गुणस्थान-
तक प्रत्येक गुणस्थानवाले औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंका तथा सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि
और मिथ्यादृष्टियोंका सामान्योक्त क्षेत्र है।
§ ७३. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंका चक्षुदर्शनवाले जीवोंके समान, असंज्ञियोंका
सब लोक और संज्ञी-असंज्ञी इस संज्ञासे रहित जीवोंका सामान्योक्त क्षेत्र है। ३५
§ ७४. आहार मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येक गुणस्थान-
वाले आहारकोंका सामान्योक्त क्षेत्र है। सयोगकेवलियोंका लोकका असंख्यातवां भाग क्षेत्र है।

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३२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ७४ -
संयतसम्यग्दृष्ट्ययोगकेवलिनां सामान्योक्तं क्षेत्रम् । सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येया¹ भागः सर्व-
लोको वा । क्षेत्रनिर्णयः कृतः ।
मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और अयोगकेवली अनाहारक जीवोंका
सामान्योक्त क्षेत्र है। तथा सयोगकेवली अनाहारकोंका लोकका असंख्यात बहुभाग और सब
५ लोक क्षेत्र है ।
विशेषार्थ—क्षेत्रप्ररूपणामें केवल वर्तमान कालीन आवासका विचार किया जाता है।
मिथ्यादृष्टि जीव सब लोकमें पाये जाते हैं इसलिए उनका सब लोक क्षेत्र बतलाया है। अन्य
गुणस्थानवाले जीव केवल लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र में ही पाये जाते हैं इसलिए
इनका लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र बतलाया है। केवल सयोगिकेवली इसके
१० अपवाद हैं। यों तो स्वस्थानगत सयोगिकेवलियोंका क्षेत्र भी लोकके असंख्यातवें भाग
प्रमाण ही है फिर भी जो सयोगिकेवली समुद्घात करते हैं उनका क्षेत्र तीन प्रकारका प्राप्त होता
है। दण्ड और कपाटरूप समुद्घातके समय लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण, प्रतररूप समुद्घातके
समय लोकका असंख्यात बहुभाग और लोकपूरक समुद्घातके समय सब लोक क्षेत्र प्राप्त होता है
इसलिए इनके क्षेत्रका निर्देश तीन प्रकारसे किया जाता है। गति आदि मार्गणाओंके क्षेत्रका
१५ विचार करते समय इसी दृष्टिको सामने रखकर विचार करना चाहिए । साधारणतया कहाँ
कितना क्षेत्र है इसका विवेक इन बातोंसे किया जा सकता है—१. मिथ्यादृष्टियोंमें एकेन्द्रियोंका
ही सब लोक क्षेत्र प्राप्त होता है। शेषका नहीं । इनके कुछ ऐसे अवान्तर भेद हैं जिनका सब लोक
क्षेत्र नहीं प्राप्त होता पर वे यहाँ विवक्षित नहीं । इस हिसाबसे जो-जो मार्गणा एकेन्द्रियोंके सम्भव
हो उन सबके सब लोक क्षेत्र जानना चाहिए । उदाहरणार्थ—गति मार्गणामें तिर्यंचगति मार्गणा,
२० इन्द्रिय मार्गणामें एकेन्द्रिय मार्गणा, काय-मार्गणामें पृथिवी आदि पाँच स्थावर काय मार्गणा,
योग मार्गणामें काययोग मार्गणा, वेदमार्गणामें नपुंसक वेदमार्गणा, कषाय मार्गणामें क्रोध, मान,
माया और लोभ कषाय मार्गणा, ज्ञान मार्गणामें मत्यज्ञान और श्रुताज्ञान मार्गणा, संयम मार्गणा-
में असंयत संयम मार्गणा, दर्शनमार्गणामें अचक्षुदर्शन मार्गणा, लेश्या मार्गणामें कृष्ण, नील और
कापोत लेश्या मार्गणा, भव्य मार्गणामें भव्य और अभव्य मार्गणा, सम्यक्त्व मार्गणामें मिथ्यादृष्टि
२५ सम्यक्त्व मार्गणा, संज्ञा मार्गणामें संज्ञी असंज्ञी मार्गणा, तथा आहार मार्गणामें आहार और
अनाहार मार्गणा इनका सब लोक क्षेत्र है। २. सासादन सम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय गुणस्थान
तकके जीवोंका और अयोगकेवलियोंका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण ही है । ३. दोइन्द्रिय,
तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पंचेन्द्रियोंमें असंज्ञियोंका क्षेत्र भी लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण
है । ४. संज्ञियोंमें समुद्घातगत सयोगिकेवलियोंके सिवा शेष सबका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भाग-
३० प्रमाण है । इन नियमोंके अनुसार जो मार्गणाएँ सयोगिकेवलीके समुद्घातके समय सम्भव हैं उनमें
भी सब लोक क्षेत्र बन जाता है। शेषके लोकका असंख्यातवाँ भाग प्रमाण ही क्षेत्र जानना
चाहिए । सयोगिकेवलीके लोकपूरण समुद्घातके समय मनुष्य गति, पंचेन्द्रिय जाति, त्रस काय,
काययोग, अपगतवेद, अकषाय, केवलज्ञान, यथाख्यात संयम, केवल दर्शन, शुक्ल लेश्या, भव्यत्व,
क्षायिक सम्यक्त्व, न संज्ञी न असंज्ञी और अनाहार ये मार्गणाएँ पायी जाती हैं इसलिए लोकपूरण
समुद्घातके समय इन मार्गणाओंका क्षेत्र भी सब लोक जानना चाहिए । केवलीके प्रतर समुद्घात-
३५ के समय लोकका असंख्यात बहुभाग प्रमाण क्षेत्र पाया जाता है। इसलिए इस समय जो मार्गणाएँ
सम्भव हों उनका क्षेत्र भी लोकका असंख्यात बहुभाग प्रमाण बन जाता है। उदाहरणके लिए
१. -स्यासंख्येयभागः मु०, दि० १, दि० २ ।
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  • ११८ § ७६ ] प्रथमोऽध्यायः ३३
    § ७५. स्पर्शनमुच्यते । तद् द्विविधं सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावन्मिथ्यादृष्टिभिः
    सर्वलोकः स्पृष्टः । सासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ भागा वा चतुर्दशभागा देशोनाः ।
    सम्यङ्मथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः । संयता-
    संयतैर्लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दशभागा वा देशोनाः । प्रमत्तसंयतादीनामयोगकेवल्यन्तानां
    क्षेत्रवत्स्पर्शनम् ।
    § ७६. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ प्रथमायां पृथिव्यां नारकैश्चतुर्गुणस्थानैर्लोकस्या-
    संख्येयभागः स्पृष्टः । द्वितीयादिषु प्राक्सप्तम्या मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः
    एको द्वौ त्रयः चत्वारः पञ्च चतुर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिभि-
    र्लोकस्यासंख्येयभागः । सप्तम्यां पृथिव्यां मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दशभागा वा
    लोक पूरण समुद्घातके समय जो मार्गणाएँ गिनायी हैं वे सब यहाँ भी जानना चाहिए। इनके अति-
    रिक्त शेष सब मार्गणाएँ ऐसी हैं जिनका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण ही प्राप्त होता है ।
    लोक पूरण और प्रतर समुद्घातके समय प्राप्त होनेवाली जो मार्गणाएँ गिनायी हैं उनमें-से काययोग
    भव्यत्व और अनाहार इन तीनको छोड़कर शेष सब मार्गणाएँ भी ऐसी हैं जिनका भी क्षेत्र उक्त
    अवस्थाके सिवा अन्यत्र लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण प्राप्त होता है । इस प्रकार क्षेत्रका
    निर्णय किया ।
    § ७५. अब स्पर्शनका कथन करते हैं वह दो प्रकारका है सामान्य और विशेष । सामान्य-
    की अपेक्षा मिथ्यादृष्टियोंने सब लोकका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टियोंने लोकके
    असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और त्रसनालीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम १आठ भाग और कुछ कम
    २बारह भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । सम्यग्मिथ्यादृष्टियों व असंयतसम्यग्दृष्टियोंने लोकके
    असंख्यातवें भागका और त्रसनालीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ३आठ भागका स्पर्श किया है ।
    संयतासंयतोंने लोकके असंख्यातवें भागका और त्रसनालीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम छह
    ४भागका स्पर्श किया है । तथा प्रमत्तसंयतोंसे लेकर अयोग केवली गुणस्थान तकके जीवोंका स्पर्श
    क्षेत्रके समान है ।
    § ७६. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरक गतिमें पहली पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि
    आदि चार गुणस्थानवाले नारकियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। दूसरीसे
    लेकर छठी पृथिवी तकके मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि नारकियोंने लोकके असंख्यातवें
    भाग क्षेत्रका और क्रमसे लोक नाड़ीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम एक राजु, कुछ कम दो राजु,
    कुछ कम तीन राजु, कुछ कम चार राजु और कुछ कम पाँच राजु क्षेत्रका स्पर्श किया है ।
    सम्यग्मिथ्या दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया
    है । सातवीं पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि नारकियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और त्रसनालीके
    १. मेरुपर्वतके मूलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना,
    कषाय और वैक्रियिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । २. मेरु पर्वतके मूलसे नीचे कुछ कम पाँच राजु
    और ऊपर सात राजु । यह स्पर्शन मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ३. मेरु पर्वतके मूलसे
    नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक
    समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है। असंयत सम्यग्दृष्टियोंके मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा भी यह स्पर्शन बन
    जाता है । ४. ऊपर अच्युत कल्पतक छह राजु । इसमें-से चित्रा पृथिवीका एक हजार योजन व आरण
    अच्युत कल्पके उपरिम विमानोंके ऊपरका भाग छोड़ देना चाहिए । यह स्पर्श मारणान्तिक समुद्घातकी
    अपेक्षा प्राप्त होता है ।
    ५

३४ सर्वार्थसिद्धौ [ ११८ § ७७ –
देशोनाः । शेषैस्त्रिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां मिथ्यादृष्टिभिः सर्वलोकः स्पृष्टः ।
सासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः सप्त चतुर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्टिभि-
र्लोकस्यासंख्येयभागः । असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतैर्लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दशभागा वा
देशोनाः । मनुष्यगतौ मनुष्यैर्मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः सर्वलोको वा स्पृष्टः । सासादन-
सम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः सप्त चतुर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यादीनाम-
योगकेवल्यन्तानां क्षेत्रवत्स्पर्शनम् । देवगतौ देवैर्मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येय-
भागः अष्टौ नव चतुर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येय-
भागः अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः ।
§ ७७. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियैः सर्वलोकः स्पृष्टः । विकलेन्द्रियैर्लोकस्यासंख्येयभागः सर्व-
चौदह भागोंमें-से कुछ कम छह राजु क्षेत्रका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टि आदि शेष तीन
गुणस्थानवाले उक्त नारकियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । तिर्यंचगतिमं
मिथ्यादृष्टि तिर्यंचोंने सब लोकका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टि तिर्यंचोंने लोकके असंख्या-
तवें भाग क्षेत्रका और लोक नाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ३सात भाग क्षेत्रका स्पर्श किया
· है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि तिर्यंचोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । असंयतसम्यग्दृष्टि
और संयतासंयत तिर्यंचोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोक नाडीके चौदह भागोंमें-से
कुछ कम छह ४भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। मनुष्यगतिमं मिथ्यादृष्टि मनुष्यों ने लोकके असंख्यातवें
भाग क्षेत्रका और सब लोकका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टि मनुष्यों ने लोकके असंख्यातवें
भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ५सात भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है ।
सम्यग्मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली गुणस्थान तकके मनुष्योंका स्पर्श क्षेत्रके समान है ।
देवगतिमं मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि देवोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका तथा
लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ६आठ भाग और कुछ कम नौ ७भाग क्षेत्रका स्पर्श किया
है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देवोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोक
नाड़ीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ८आठ भागक्षेत्रका स्पर्श किया है ।
§ ७७. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंने सब लोकका स्पर्श किया है। विकलेन्द्रियोंने
१. –दृष्टिभिः संयता-मु० ता०, न० । २.-दृष्टिभिः सासा-ता० । ३. मेरु पर्वतके मूलसे ऊपर सात राजु ।
यह स्पर्शन मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । यद्यपि तिर्यंच सासादन सम्यग्दृष्टि जीव मेरु
पर्वतके मूलसे नीचे भवन-वासियोंमें मारणान्तिक समुद्घात करते हुए पाये जाते हैं तथापि इतने मात्रसे
स्पर्शन क्षेत्र सात राजुसे अधिक न होकर कम ही रहता है। ऐसे जीव मेरुपर्वतके मूलसे नीचे
एकेन्द्रियोंमें व नारकियोंमें मारणान्तिक समुद्घात नहीं करते. यह उक्त कथनका तात्पर्य है । ४. ऊपर अच्युत
कल्प तक छह राजु । इसमें से चित्रा पृथिवीका एक हजार योजन व आरण अच्युत कल्पके उपरि म विमानोंके
ऊपरका भाग छोड़ देना चाहिए । यह स्पर्श मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ५. भवनवासी
लोकसे लेकर ऊपर लोकाग्र तक । इसमें-से अगम्यप्रदेश छूट जानेसे कुछ कम सात राजु स्पर्श रह जाता है ।
यह स्पर्श मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ६. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और
ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिकपदकी अपेक्षा प्राप्त होता है ।
७. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर सात राजु । यह स्पर्शन मारणान्तिक समुद्घातकी
अपेक्षा प्राप्त होता है । ८. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्व-
स्थान, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता हैं ।

लोको वा । पञ्चेन्द्रियेषु मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः सर्व-
लोको वा । शेषाणां सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ७८. कायानुवादेन स्थावरकायिकैः सर्वलोकः स्पृष्टः त्रसकायिनां पञ्चेन्द्रियवत् स्पर्शनम् ।
§ ७९. योगानुवादेन वाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ चतुर्दश-
भागा वा देशोनाः सर्वलोको वा। सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनां क्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तं ५
स्पर्शनम् । सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येयभागः । काययोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादीनां सयोगकेवल्य-
न्तानामयोगकेवलिनां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ८०. वेदानुवादेन ^१स्त्रीपुंवेदैर्मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः स्पृष्टः ^२अष्टौ चतुर्दश-
भागा वा देशोनाः सर्वलोको^३ वा । सासादनसम्यग्दृष्टिभिः लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ नव चतु-
लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और ^४सब लोकका स्पर्श किया है। पंचेन्द्रियोंमें मिथ्यादृष्टियोंने १०
लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोक नाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ^५आठ भाग क्षेत्रका
और ^६सत्र लोकका स्पर्श किया है। शेष गुणस्थानवाले तिर्यंचोंका स्पर्श ओघके समान है ।
§ ७८. काय मार्गणाके अनुवादसे स्थावरकायिक जीवोंने सब लोकका स्पर्श किया है ।
त्रसकायिकोंका स्पर्श पंचेन्द्रियोंके समान है।
§ ७९. योग मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टि वचनयोगी और मनोयोगी जीवोंने लोकके १५
असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ^७आठ भाग क्षेत्रका और
^८सब लोकका स्पर्श किया है। सासादनसम्यग्दृष्टियोंसे लेकर क्षीणकषाय तकके गुणस्थानवालोंका
स्पर्श ओघके समान है। और सयोगकेवली जीवोंका स्पर्श लोकका^९ असंख्यातवां भाग है। तथा
मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवली गुणस्थान तकके काययोगवालोंका और अयोगकेवली जीवोंका
स्पर्श ओघके समान है। २०
§ ८०. वेद मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टि स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवोंने लोकके
असंख्यातवें भाग क्षेत्रका तथा लोक नाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ^१०आठ भाग और सब लोक
क्षेत्रका स्पर्श किया है। सासादन सम्यग्दृष्टियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका तथा लोक
नाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ^११आठ भाग और कुछ कम नौ ^१२भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है।
१. स्त्रीपुंसवे-ता० । २. अष्टौ नव चतु-मु० । ३. -लोको वा । नपुंसकवेदेषु मु० । ४. विकलेन्द्रियोंका सब २५
लोक स्पर्श मारणान्तिक और उपपाद पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ५. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु
और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी अपेक्षा प्राप्त
होता है। ६. सब लोक स्पर्श मारणान्तिक और उपपादकी अपेक्षा प्राप्त होता है। ७. मेरुतलसे नीचे
कुछ कम दो राजु और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी
अपेक्षा प्राप्त होता है । ८. सब लोक स्पर्श मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है। ९. समुद्घात- ३०
के कालमें मनोयोग और वचनयोग नहीं होता, इससे वचनयोगी और मनोयोगी सयोगी केवलियोंका
स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण बतलाया है । १०. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर
छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है । सब
लोक स्पर्श मारणान्तिक और उपपाद पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ११. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु
और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी अपेक्षा प्राप्त ३५
होता है । १२. मेरुतलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर सात राजु । यह स्पर्शन मारणान्तिक पदकी
अपेक्षा प्राप्त होता है। यहाँ उपपाद पदकी अपेक्षा ग्यारह घनराजु स्पर्शन प्राप्त होता है । किन्तु उपपादपदकी
विवक्षा नहीं होनेसे उसका उल्लेख नहीं किया है। यह स्पर्शन मेरुतलसे नीचे कुछ कम पाँच राजु और
ऊपर छह राजु इस प्रकार प्राप्त होता है ।

र्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां सामान्योक्तं स्पर्शनम् । नपुंसक-
वेदेषु मिथ्यादृष्टीनां सासादनसम्यग्दृष्टीनां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् । १सम्यङ्मिथ्यादृष्टिभि-
र्लोकस्यासंख्येयभागः । असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतैर्लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दशभागा वा
देशोनाः । प्रमत्ताद्यनिवृत्तिबादरान्तानामपगतवेदानां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ८१. कषायानुवादेन चतुष्कषायाणामकषायाणां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ८२. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिश्रुताज्ञानिनां मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टीनां सामान्योक्तं
स्पर्शनम् । विभङ्गज्ञानिनां मिथ्यादृष्टीनां लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः
सर्वलोको वा । सासादनसम्यग्दृष्टीनां सामान्योक्तं स्पर्शनम् । आभिनिबोधिकश्रुतावधिमनःपर्यय-
केवलज्ञानिनां स.मान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ८३. संयमानुवादेन संयतानां सर्वेषां संयतासंयतानामसंयतानां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
सम्यग्मिथ्यादृष्टियोंसे लेकर अनिवृत्ति बादर गुणस्थान तकके जीवोंका स्पर्श ओघके समान है ।
नपुंसकवेदियोंमें मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यग्दृष्टियोंका स्पर्श २ओघके समान है । सम्यग्मिथ्या-
दृष्टियोंने लोकके असंख्यातवें भागका स्पर्श किया है । असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयतोंने लोक-
के असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ३छह भाग क्षेत्रका स्पर्श
किया है । तथा प्रमत्तसंयतोंने लेकर अनिवृत्ति बादर गुणस्थान तकके जोवोंका स्पर्श ओघके
समान है ।
§ ८१. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोधादि चारों कषायवाले और कषायरहित जीवोंका
स्पर्श ओघके समान है ।
§ ८२. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी मिथ्यादृष्टि और सासादन-
सम्यग्दृष्टि जीवोंका स्पर्श ओघके समान है । विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टियांका स्पर्श लोकका
असंख्यातवाँ भाग, लोकनाड़ीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम आठ४ भाग और सर्व लोक५ है ।
सासादनसम्यग्दृष्टियोंका स्पर्श ओघके समान है । आभिनिबोधिक ज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी,
मनःपर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी जीवोंका स्पर्श ओघके समान है ।
§ ८३. संयम मार्गणाके अनुवादसे सब संयतोंका, संयतासयतोंका और असंयतोंका स्पर्श
ओघके समान है ।
१. सम्यङ्मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः स्पृष्टः । सासादनसम्यग्दृष्टिभिः लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ नव
चतुर्दश भागा वा देशोनाः । सम्यग्मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां सामान्योक्तं स्पर्शनम् । असंयतसम्य-
मु० । २. यहाँ नपुंसकवेदी मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यग्दृष्टि जीवोंका स्पर्शन ओघके समान बतलाया है ।
सो यह सामान्य निर्देश है । विशेषकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि नपुंसकवेदियोंने वैक्रियिक पदकी अपेक्षा पाँच
घनराजु क्षेत्रका स्पर्श किया है, क्योंकि वायुकायिक जीव इतने क्षेत्रमें विक्रिया करते हुए पाये जाते हैं ।
नपुंसकवेदी सासादन सम्यग्दृष्टियोंने स्वस्थानस्वस्थान, विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिकपदकी
अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्शन किया है । उपपादपदकी अपेक्षा कुछ कम ग्यारह बटे चौदह
भाग त्रसनालीका स्पर्श किया है । मारणान्तिक पदकी अपेक्षा कुछ कम बारह बटे चौदह भाग त्रसनालीका
स्पर्श किया है । शेष कथन ओघके समान है । ३. यह स्पर्श मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है ।
४. यह स्पर्श विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है, क्योंकि नीचे दो
राजु और ऊपर छह राजु क्षेत्रमें गमनागमन देखा जाता है । ५. यह स्पर्श मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त
होता है, क्योंकि ये