सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ११८ § ७६ ] प्रथमोऽध्यायः ३३
§ ७५. स्पर्शनमुच्यते । तद् द्विविधं सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावन्मिथ्यादृष्टिभिः
सर्वलोकः स्पृष्टः । सासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ भागा वा चतुर्दशभागा देशोनाः ।
सम्यङ्मथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः । संयता-
संयतैर्लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दशभागा वा देशोनाः । प्रमत्तसंयतादीनामयोगकेवल्यन्तानां
क्षेत्रवत्स्पर्शनम् ।
§ ७६. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ प्रथमायां पृथिव्यां नारकैश्चतुर्गुणस्थानैर्लोकस्या-
संख्येयभागः स्पृष्टः । द्वितीयादिषु प्राक्सप्तम्या मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः
एको द्वौ त्रयः चत्वारः पञ्च चतुर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिभि-
र्लोकस्यासंख्येयभागः । सप्तम्यां पृथिव्यां मिथ्यादृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दशभागा वा
लोक पूरण समुद्घातके समय जो मार्गणाएँ गिनायी हैं वे सब यहाँ भी जानना चाहिए। इनके अति-
रिक्त शेष सब मार्गणाएँ ऐसी हैं जिनका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण ही प्राप्त होता है ।
लोक पूरण और प्रतर समुद्घातके समय प्राप्त होनेवाली जो मार्गणाएँ गिनायी हैं उनमें-से काययोग
भव्यत्व और अनाहार इन तीनको छोड़कर शेष सब मार्गणाएँ भी ऐसी हैं जिनका भी क्षेत्र उक्त
अवस्थाके सिवा अन्यत्र लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण प्राप्त होता है । इस प्रकार क्षेत्रका
निर्णय किया ।
§ ७५. अब स्पर्शनका कथन करते हैं वह दो प्रकारका है सामान्य और विशेष । सामान्य-
की अपेक्षा मिथ्यादृष्टियोंने सब लोकका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टियोंने लोकके
असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और त्रसनालीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम १आठ भाग और कुछ कम
२बारह भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । सम्यग्मिथ्यादृष्टियों व असंयतसम्यग्दृष्टियोंने लोकके
असंख्यातवें भागका और त्रसनालीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ३आठ भागका स्पर्श किया है ।
संयतासंयतोंने लोकके असंख्यातवें भागका और त्रसनालीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम छह
४भागका स्पर्श किया है । तथा प्रमत्तसंयतोंसे लेकर अयोग केवली गुणस्थान तकके जीवोंका स्पर्श
क्षेत्रके समान है ।
§ ७६. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरक गतिमें पहली पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि
आदि चार गुणस्थानवाले नारकियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। दूसरीसे
लेकर छठी पृथिवी तकके मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि नारकियोंने लोकके असंख्यातवें
भाग क्षेत्रका और क्रमसे लोक नाड़ीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम एक राजु, कुछ कम दो राजु,
कुछ कम तीन राजु, कुछ कम चार राजु और कुछ कम पाँच राजु क्षेत्रका स्पर्श किया है ।
सम्यग्मिथ्या दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि नारकियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया
है । सातवीं पृथिवीमें मिथ्यादृष्टि नारकियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और त्रसनालीके
१. मेरुपर्वतके मूलसे नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना,
कषाय और वैक्रियिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । २. मेरु पर्वतके मूलसे नीचे कुछ कम पाँच राजु
और ऊपर सात राजु । यह स्पर्शन मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है । ३. मेरु पर्वतके मूलसे
नीचे कुछ कम दो राजु और ऊपर छह राजु । यह स्पर्शन विहारवत्स्वस्थान, वेदना, कषाय और वैक्रियिक
समुद्घातकी अपेक्षा प्राप्त होता है। असंयत सम्यग्दृष्टियोंके मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा भी यह स्पर्शन बन
जाता है । ४. ऊपर अच्युत कल्पतक छह राजु । इसमें-से चित्रा पृथिवीका एक हजार योजन व आरण
अच्युत कल्पके उपरिम विमानोंके ऊपरका भाग छोड़ देना चाहिए । यह स्पर्श मारणान्तिक समुद्घातकी
अपेक्षा प्राप्त होता है ।
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